नवरात्रि विशेष – 6

 नवदुर्गा: छठा दर्शन — माँ कात्यायनी 

तीन सृष्टियों में तीन बार महिषासुर का संहार और देवी के चरणों में उसका अंतिम आश्रय

लेखक: कुलदीप ठुसू “पम्पोष”


माँ शैलपुत्री से आरम्भ हुई हमारी नवदुर्गा दर्शन यात्रा अब छठे स्वरूप तक पहुँच चुकी है।

हमने माँ ब्रह्मचारिणी की कठोर तपस्या, माँ चन्द्रघण्टा का तेजस्वी स्वरूप, माँ कूष्माण्डा की सृष्टिशक्ति और माँ स्कन्दमाता की मातृमहिमा को समझने का प्रयास किया।

अब दर्शन है माँ कात्यायनी का।

देवीकवच में नवदुर्गा के स्वरूपों का क्रम बताते हुए कहा गया है—

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।

सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥

अर्थ: देवी का पाँचवाँ स्वरूप स्कन्दमाता, छठा कात्यायनी, सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ महागौरी कहलाता है।

माँ कात्यायनी का प्राकट्य महिषासुर के संहार से जुड़ा है।

लेकिन कालिकापुराण में महिषासुर की कथा केवल एक युद्ध और एक मृत्यु तक सीमित नहीं है।

वहाँ तीन सृष्टियों में उसके जन्म और आदिशक्ति के तीन स्वरूपों द्वारा उसके संहार का वर्णन है।

इस कथा में भगवान शिव का वरदान है, महर्षि कात्यायन का शाप है और महिषासुर की ऐसी प्रार्थना भी है, जिसमें वह पुनर्जन्म से छुटकारा माँगता है।

सबसे विशेष बात यह कि जिस महिषासुर का जगज्जननी संहार करती हैं, उसी को अंततः अपने चरणों में स्थान भी देती हैं।

इस रहस्य को समझने के लिए हमें कालिकापुराण के महिषासुरोपाख्यान में प्रवेश करना होगा।


रम्भ की तपस्या — और भगवान शिव का वरदान 

कालिकापुराण, अध्याय 60 के अनुसार रम्भ नामक असुर ने भगवान शिव की कठोर आराधना की।

उसकी इच्छा थी कि उसे एक असाधारण शक्तिशाली पुत्र प्राप्त हो।

भगवान शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए।

रम्भ ने भगवान शिव से स्वयं अपने पुत्र के रूप में जन्म लेने की प्रार्थना की।

महादेव ने उसका वर स्वीकार कर लिया।

इसके बाद रम्भ का एक महिषी से संयोग हुआ और उससे महिषासुर उत्पन्न हुआ।

लेकिन यह कोई साधारण असुर नहीं था।

उसके भीतर स्वयं भगवान शिव का अंश विद्यमान था।

कालिकापुराण में आगे बताया गया है कि तीन जन्मों में भगवान शिव रम्भ के पुत्र बने और तीन सृष्टियों में यह घटनाक्रम दोहराया गया।

कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 154–157 के प्रसंग में

त्रिषु जन्मसु पुत्रोऽभूद्रम्भस्य भगवान् हरः।

सृष्टित्रये स रम्भोऽपि रम्भ एव व्यजायत॥

अर्थ: तीन जन्मों में भगवान शिव रम्भ के पुत्र बने। तीन सृष्टियों में रम्भ भी उसी रूप में उत्पन्न हुआ।

लेकिन शिवांश से उत्पन्न होने के बावजूद महिषासुर ने अपनी शक्ति का उपयोग देवताओं के विरुद्ध किया।

उसने देवताओं को पराजित करके उनके अधिकार छीन लिए और स्वर्ग पर आधिपत्य स्थापित कर लिया।


महर्षि कात्यायन का शाप

कालिकापुराण में महिषासुर के जीवन की एक और महत्त्वपूर्ण घटना का उल्लेख मिलता है।

हिमालय के समीप महर्षि कात्यायन के शिष्य रौद्राश्व तपस्या कर रहे थे।

महिषासुर ने कौतुकवश एक अत्यंत सुन्दर स्त्री का रूप धारण किया और अपनी माया से रौद्राश्व को मोहित कर दिया।

इससे उनकी तपस्या भंग हो गई।

महर्षि कात्यायन ने जब यह जाना, तो वे अत्यंत क्रोधित हुए। और महिषासुर को शाप दे दिया। 

कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 99

यस्मात् त्वया मे शिष्योऽयं मोहितस्तपसश्च्युतः।

कृतस्त्वया स्त्रीरूपेण तत् त्वां स्त्री निहनिष्यति॥

अर्थ: तुमने स्त्री का रूप धारण करके मेरे शिष्य को मोहित किया और उसकी तपस्या भंग की है। इसलिए एक स्त्री ही तुम्हारा संहार करेगी।

महिषासुर के अंत की दिशा अब निश्चित हो चुकी थी।

महिषासुर का काल अब स्त्री के रूप में ही आने वाला था। 

कालिकापुराण के अनुसार यह प्रसंग तीन सृष्टियों में घटित होता है।

रम्भ पुनः जन्म लेता है, भगवान शिव उसके पुत्र के रूप में प्रकट होते हैं और महिषासुर फिर महर्षि कात्यायन के शाप का भागी बनता है।

और तीनों सृष्टियों में महिषासुर का अंत आदिशक्ति महामाया ही करतीं हैं। 

लेकिन तीनों सृष्टियों में उसका संहार करने वाली आदिशक्ति का स्वरूप अलग-अलग होता है।


तीन सृष्टियाँ और आदिशक्ति के तीन स्वरूप

कालिकापुराण में महिषासुर के संहार से संबंधित आदिशक्ति के तीन स्वरूपों का वर्णन है।

प्रथम सृष्टि — माँ उग्रचण्डा

पहली सृष्टि में महिषासुर ने अपने पराक्रम से देवताओं को पराजित कर दिया।

देवताओं की रक्षा के लिए जगज्जननी माँ उग्रचण्डा के रूप में प्रकट हुईं।

कालिकापुराण में माँ उग्रचण्डा का अठारह भुजाओं वाला सिंहवाहिनी स्वरूप वर्णित है।

उनके हाथों में विभिन्न दिव्य आयुध सुशोभित हैं।

माँ उग्रचण्डा ने महिषासुर से युद्ध किया और उसका संहार करके देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्त किया।

द्वितीय सृष्टि — माँ भद्रकाली

दूसरी सृष्टि में रम्भ पुनः उत्पन्न हुआ।

भगवान शिव के वरदान के अनुसार महिषासुर भी उसके पुत्र के रूप में जन्मा।

उसने फिर देवताओं से युद्ध किया और स्वर्ग पर अधिकार कर लिया।

महर्षि कात्यायन के शाप के कारण उसका अंत इस बार भी देवी के हाथों होना था।

जगज्जननी ने माँ भद्रकाली का स्वरूप धारण किया।

कालिकापुराण में उनका सोलह भुजाओं वाला सिंहवाहिनी स्वरूप वर्णित है।

माँ भद्रकाली ने महिषासुर का संहार कर दिया।

देवताओं ने प्रसन्न होकर भगवती की स्तुति की।

लेकिन इसके बाद देवी ने उन्हें एक ऐसा निर्देश दिया, जिसका कारण उस समय किसी को समझ नहीं आया।

भगवती ने सभी देवताओं को महर्षि कात्यायन के आश्रम जाने को कहा। 


 

माँ भद्रकाली ने देवताओं को कात्यायन के आश्रम क्यों भेजा ?

कालिकापुराण के इसी अध्याय में एक अत्यंत रोचक घटनाक्रम मिलता है।

माँ भद्रकाली ने महिषासुर का संहार कर दिया था।

देवताओं ने देवी के उस स्वरूप का दर्शन किया और उन्हें प्रणाम किया।

तभी भगवती ने उन्हें हिमालय के समीप स्थित महर्षि कात्यायन के आश्रम जाने का निर्देश दिया।

कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 65–66

गच्छन्तु भोः सुरगणा जम्बुद्वीपान्तरं प्रति।

हिमवत् पर्वतासन्ने वरं कात्यायनाश्रमम्॥

तत्रैव भवतां साध्यं भविष्यति न संशयः॥

अर्थ: हे देवगण! तुम जम्बूद्वीप में हिमालय के समीप स्थित महर्षि कात्यायन के श्रेष्ठ आश्रम में जाओ। निश्चय ही वहीं तुम्हारा प्रयोजन सिद्ध होगा।

देवता उनके निर्देश के अनुसार चल पड़े।

लेकिन वे आश्चर्य में थे। महिषासुर का संहार हो चुका था, फिर देवी ने उन्हें कात्यायन के आश्रम जाने के लिए क्यों कहा?

आश्रम पहुँचकर वे वहाँ ठहर गए।

इसी बीच रुद्रगणों ने आकर सूचना दी कि महिषासुर ने फिर देवलोक पर अधिकार कर लिया है।

यह सुन कर सब देवता स्तब्ध रह गए।

जिस महिषासुर का देवी ने संहार कर दिया था, वह फिर कैसे आ गया?

कालिकापुराण में स्वयं देवताओं के इस आश्चर्य का वर्णन है।

क्या दो सृष्टियों के घटनाक्रम समानान्तर चल रहे थे?

यहाँ कालिकापुराण के वर्णन में एक विशेष उलझन सामने आती है।

माँ भद्रकाली द्वारा महिषासुर का संहार, देवताओं का कात्यायन के आश्रम पहुँचना और फिर महिषासुर के आक्रमण का समाचार मिलना—ये घटनाएँ कथा में लगभग निरंतर घटती दिखाई देती हैं।

इससे ऐसा आभास हो सकता है, मानो दो सृष्टियों के घटनाक्रम समानान्तर चल रहे हों।

लेकिन आगे महर्षि और्व, राजा सगर को तीन सृष्टियों में महिषासुर के जन्म का विवरण देते हैं।

पुराण यह स्पष्ट नहीं करता कि ये सृष्टियाँ एक ही समय में विद्यमान थीं या अलग-अलग कालों में।

इसलिए समानान्तर सृष्टियों की कल्पना को यहाँ एक सम्भावित व्याख्या से अधिक नहीं माना जा सकता।

शास्त्रीय रूप से इतना स्पष्ट है कि महिषासुर के तीन जन्मों और देवी के तीन स्वरूपों का वर्णन किया गया है।


तीसरी सृष्टि — माँ कात्यायनी का प्राकट्य — देवताओं का तेज और महर्षि की आराधना

महिषासुर के पुनः आक्रमण का समाचार सुनकर देवता अत्यंत क्रोधित हुए।

ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा अन्य देवताओं के शरीरों से दिव्य तेज प्रकट होने लगे।

ये सभी तेज एकत्र होकर एक महान् शक्तिरूप में परिवर्तित हुए।

महर्षि कात्यायन ने उस तेज को उद्दीप्त किया और देवी की आराधना की।

इसी कारण वे कात्यायनी नाम से प्रसिद्ध हुईं।

कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 75–76

इति प्रकुप्यतां तेषां शरीरेभ्यः पृथक् पृथक्।

निश्चक्रमुश्च तेजांसि शक्तिरूपाणि तत्क्षणात्॥

तत्तेजोभिर्धृतवपुर्देवी कात्यायनेन वै।

सन्धुक्षिता पूजिता च तेन कात्यायनी स्मृता॥

अर्थ: क्रोधित देवताओं के शरीरों से अलग-अलग शक्तिरूप तेज प्रकट हुए। उन तेजों से देवी ने स्वरूप धारण किया। महर्षि कात्यायन ने उस तेज को उद्दीप्त किया और देवी की आराधना की। इसी कारण वे कात्यायनी नाम से प्रसिद्ध हुईं।

अब माँ भद्रकाली द्वारा देवताओं को कात्यायन के आश्रम भेजने का उद्देश्य स्पष्ट होता है।

उसी आश्रम में देवताओं के संयुक्त तेज से आदिशक्ति का प्राकट्य होना था। 

हिमालय के समीप महर्षि कात्यायन के आश्रम में भगवान शिव, विष्णु, ब्रह्मा और अन्य देवताओं के शरीरों से निकलता दिव्य तेज एकत्र हो रहा है। महर्षि कात्यायन की आराधना के बीच सिंहवाहिनी दशभुजा माँ कात्यायनी प्रकट हो रही हैं।
देवताओं के संयुक्त तेज से आदिशक्ति का प्राकट्य हुआ। महर्षि कात्यायन ने उस तेज को उद्दीप्त कर देवी की आराधना की, जिससे वे ‘माँ कात्यायनी’ नाम से प्रसिद्ध हुईं।

माँ कात्यायनी का दशभुजा स्वरूप

कालिकापुराण में माँ कात्यायनी का दशभुजा स्वरूप वर्णित है।

वे सिंहवाहिनी हैं। उनके हाथों में दिव्य आयुध हैं और उनका प्राकट्य देवताओं की रक्षा तथा महिषासुर के संहार के लिए हुआ है।

लेकिन अंतिम युद्ध से पहले महिषासुर स्वयं जगज्जननी की आराधना करता है।

यहीं से कथा एक अप्रत्याशित दिशा लेती है।


महिषासुर का स्वप्न — जब उसने स्वयं देवी की शरण ली

एक रात महिषासुर ने अत्यंत भयावह स्वप्न देखा।

उसने देखा कि माँ भद्रकाली ने खड्ग से उसका सिर काट दिया है और उसका रक्त पी रही हैं।

स्वप्न से जागने पर वह भयभीत हो उठा।

उसे महर्षि कात्यायन का दिया हुआ शाप स्मरण था।

वह जानता था कि किसी स्त्री के हाथों उसका संहार निश्चित है।

महिषासुर ने माँ भद्रकाली की आराधना आरम्भ कर दी।

लंबे समय तक उसकी उपासना से प्रसन्न होकर भगवती सोलह भुजाओं वाले भद्रकाली स्वरूप में प्रकट हुईं।

महिषासुर ने उन्हें प्रणाम किया।

कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 92

वध्यस्तवाहं नात्रास्ति संशयः परमेश्वरि।

ममापि तत्र नो दुःखं नियतिः केन लङ्घ्यते॥

अर्थ: हे परमेश्वरि! मेरा संहार आपके हाथों होगा, इसमें कोई संशय नहीं। मुझे इसका दुःख भी नहीं है, क्योंकि नियति को कौन टाल सकता है?

जिस असुर ने देवताओं को पराजित करके स्वर्ग पर अधिकार किया था, वह अब स्वयं अपने निश्चित अंत को स्वीकार कर रहा था।

लेकिन उसकी एक इच्छा अभी शेष थी।

उसने देवी से यज्ञों में अपना भाग और उनके चरणों की निरंतर सेवा का वरदान माँगा।

कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 104–105

यज्ञभागमहं भोक्तुमिच्छामि त्वत्प्रसादतः।

यथा मखेषु सर्वेषु पूज्योऽहं स्यां तथा कुरु॥

त्वत्पादसेवां न त्यक्ष्ये यावत्सूर्यः प्रवर्तते।

एवं वरद्वयं देहि यदि देयो वरो मम॥

अर्थ: हे देवी! आपकी कृपा से मैं यज्ञों में अपना भाग प्राप्त करना चाहता हूँ और आपकी पूजा के साथ मेरा भी स्मरण हो। जब तक सूर्य विद्यमान है, मैं आपके चरणों की सेवा से अलग न होऊँ। यदि आप वरदान देना चाहती हैं, तो मुझे ये दोनों वर प्रदान कीजिए।

देवी ने बताया कि देवताओं के यज्ञभाग पहले से निर्धारित हैं। उनके अतिरिक्त नया भाग देना सम्भव नहीं है।

लेकिन उन्होंने महिषासुर को आश्वासन दिया कि युद्ध में उनके हाथों मारे जाने के बाद वह उनके चरणों से अलग नहीं होगा।

जहाँ-जहाँ देवी की पूजा होगी, वहाँ उनके साथ महिषासुर के उस स्वरूप का भी स्मरण किया जाएगा।


जगज्जननी का महिषासुर को अपने तीन स्वरूपों का रहस्य बताना 

इसके बाद महिषासुर ने देवी से पूछा कि उन्हें किन-किन स्वरूपों के साथ उसका स्थान प्राप्त होगा।

जगज्जननी ने उसे बताया कि उग्रचण्डा, भद्रकाली और दुर्गा उनके ही स्वरूप हैं।

फिर देवी ने उसके पूर्व जन्मों के विषय में स्पष्ट किया—

कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 115–116

आदिसृष्टावुग्रचण्डामूर्त्या त्वं निहतः पुरा।

द्वितीयसृष्टौ तु भवान् भद्रकाल्या मया हतः॥

दुर्गारूपेणाधुना त्वां हनिष्यामि सहानुगम्।

किन्तु पूर्वं न गृहीतस्त्वं मया पादयोस्तले॥

अर्थ: पहली सृष्टि में मैंने उग्रचण्डा रूप से तुम्हारा संहार किया था। दूसरी सृष्टि में भद्रकाली रूप से तुम्हें मारा था। अब दुर्गा रूप में तुम्हारा और तुम्हारे अनुयायियों का संहार करूँगी। लेकिन पहले तुम्हें अपने चरणों के नीचे स्थान नहीं दिया था।

 

कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 113

उग्रचण्डेति या मूर्तिर्भद्रकाली ह्यहं पुनः।

यया मूर्त्या त्वां हनिष्ये सा दुर्गेति प्रकीर्तिता॥

अर्थ: मेरा जो स्वरूप उग्रचण्डा कहलाता है, वही मैं भद्रकाली भी हूँ। जिस स्वरूप से मैं तुम्हारा संहार करूँगी, वह दुर्गा नाम से प्रसिद्ध है।

 

इस प्रकार उग्रचण्डा, भद्रकाली और दुर्गा तीन अलग-अलग मूल शक्तियाँ नहीं, बल्कि उसी आदिशक्ति के स्वरूप हैं।

इसके बाद देवी ने उसे उग्रचण्डा और भद्रकाली के स्वरूपों का दर्शन कराया।

महिषासुर ने अपने पूर्व महिषरूप की वह दशा भी देखी, जिसमें उसका शरीर त्रिशूल से विदीर्ण और सिरविहीन था।

वह भयभीत और व्याकुल हो उठा।

कुछ समय बाद स्वयं को सँभालकर उसने पुनः देवी को प्रणाम किया।

अब उसकी प्रार्थना बदल चुकी थी।

माँ भद्रकाली के सामने भयभीत महिषासुर हाथ जोड़कर पुनर्जन्म से मुक्ति की प्रार्थना कर रहा है। देवी उसे तीन दिव्य दृश्यों में माँ उग्रचण्डा, माँ भद्रकाली और माँ कात्यायनी द्वारा तीन सृष्टियों में हुए उसके संहार का दर्शन करा रही हैं।
तीन सृष्टियाँ, तीन बार संहार। अपने पूर्व जन्मों की दुर्गति जानकर महिषासुर ने जगज्जननी से प्रार्थना की कि उसे फिर जन्म लेकर देवताओं से वैर न करना पड़े।

तीन जन्मों की दुर्गति के बाद — अब पुनर्जन्म नहीं चाहिए

महिषासुर के सामने उसके अस्तित्व का एक विचित्र सत्य प्रकट हो चुका था।

वह तीन सृष्टियों में उत्पन्न हुआ। देवताओं से वैर किया। अपनी शक्ति के अभिमान में स्वर्ग पर अधिकार किया।

लेकिन हर बार उसका अंत उसी जगज्जननी के हाथों हुआ।

पहले उग्रचण्डा, फिर भद्रकाली और अब दुर्गा।

वह समझ चुका था कि शक्ति, राज्य और विजय का उसका अभिमान उसे बार-बार उसी अंत की ओर ले जा रहा है।

तब उसने देवी से ऐसी प्रार्थना की, जो उसके पहले माँगे गए वरदानों से भिन्न थी।

कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 128

यथाहं न सुरैः सार्धं करिष्ये वैरमद्भुतम्।

तथा मां कुरु भो देवि न जन्म प्रलभे यथा॥

अर्थ: हे देवी! ऐसी व्यवस्था कीजिए कि मुझे फिर जन्म लेकर देवताओं से वैर न करना पड़े। मुझे पुनः जन्म प्राप्त न हो।

अब वह स्वर्ग का राज्य नहीं माँग रहा था।

वह किसी नए युद्ध के लिए शक्ति भी नहीं माँग रहा था।

वह उस जन्म और वैर के क्रम से छुटकारा चाहता था, जिसमें बार-बार उसका अंत विनाश और पराजय से होता था।

जगज्जननी ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की।

कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 133

कल्पकोटिसहस्राणि त्रिंशत् त्वं महिषासुर।

शतानि चाष्टावन्यानि जन्म ते न भविष्यति॥

अर्थ: हे महिषासुर! अत्यंत दीर्घ कल्पावधि तक तुम्हारा पुनर्जन्म नहीं होगा।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर है।

महिषासुर को दीर्घकाल तक पुनर्जन्म न होने का वरदान मिलता है। ना कि मोक्ष का। 

लेकिन इतना स्पष्ट है कि महिषासुर ने स्वयं देवी से पुनर्जन्म के क्रम को समाप्त करने की प्रार्थना की और भगवती ने उसे स्वीकार किया।

इसके बाद देवी अंतर्धान हो गईं।

महिषासुर अपने स्थान पर लौट गया, लेकिन कालिकापुराण बताता है कि वह फिर माया के प्रभाव से अपने पूर्व आसुरी स्वभाव में प्रवृत्त हो गया।

इस प्रकार उसका अंतिम संहार अभी शेष था।


भगवान शिव की प्रार्थना — मेरे महिषरूप का संहार आपके ही हाथों हो

यहाँ राजा सगर के मन में भी एक प्रश्न उठा।

जगज्जननी ने अनेक असुरों का संहार किया था।

लेकिन महिषासुर को विशेष वरदान देकर अपने चरणों में क्यों स्वीकार किया ?

महर्षि और्व ने इसका उत्तर भगवान शिव और रम्भ के प्रसंग से दिया।

रम्भ ने भगवान शिव से तीन जन्मों तक अपना पुत्र बनने का वरदान माँगा था।

महादेव ने उसे स्वीकार किया और महिषासुर के रूप में अपने अंश से उत्पन्न हुए।

लेकिन महर्षि कात्यायन के शाप के बाद भगवान शिव ने स्वयं भगवती से प्रार्थना की थी।

कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 151

मदीयो माहिषः कायो देवि कार्यस्त्वया त्वयि।

हन्तव्यः सततं योगयुक्तः पूर्वे परेऽपि च॥

अर्थ: हे देवी! मेरा यह महिषरूप शरीर आपसे संबद्ध है। इसका पूर्व की भाँति आगे भी आपके ही द्वारा संहार होना चाहिए।

यह श्लोक तीन सृष्टियों की कथा का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सूत्र है।

महिषासुर के भीतर शिवांश था और स्वयं महादेव चाहते थे कि उनका यह महिषरूप आदिशक्ति के हाथों संहार को प्राप्त हो।

अर्थात् महिषासुर का संहार केवल महर्षि कात्यायन के शाप का परिणाम नहीं था।

उसके पीछे भगवान शिव की अपनी प्रार्थना भी थी।

लेकिन महादेव ने केवल संहार की प्रार्थना नहीं की थी।

उन्होंने भगवती से अपने महिषरूप को स्वीकार करने की बात भी कही।

कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 152

हरिर्हरिस्वरूपेण न त्वां वोढुं क्षमोऽधुना।

ममायं माहिषः कायस्तव वोढा भविष्यति॥

अर्थ: भगवान विष्णु अब सिंहरूप में आपको वहन करने में समर्थ नहीं हैं। इसलिए मेरा यह महिषरूप शरीर आपका वाहन बनेगा।

इसके बाद महर्षि और्व बताते हैं—

कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 153

इति पूर्वं महादेवो देवीं प्रार्थितवान् पुरा।

तेन देवी महादेवं जग्राह महिषासुरम्॥

अर्थ: इस प्रकार महादेव ने पहले ही देवी से प्रार्थना की थी। इसी कारण देवी ने महिषासुर के रूप में विद्यमान महादेव के अंश को स्वीकार किया।

यहीं महिषासुर की कथा एक अत्यंत भावपूर्ण परिणति तक पहुँचती है।

जिस महिषासुर ने तीन सृष्टियों में देवताओं से वैर किया, उसके भीतर भगवान शिव का अंश विद्यमान था।

भगवान शिव स्वयं चाहते थे कि उनके इस महिषरूप का संहार जगज्जननी के हाथों हो और वह भगवती द्वारा स्वीकार किया जाए।

इससे यह भाव भी उभरता है कि माँ भगवती ने महिषासुर को अपने चरणों में स्थान केवल उसकी प्रार्थना के कारण नहीं दिया।

वे जानती थीं कि उसके भीतर भगवान शिव का अंश विद्यमान है।

सम्भवतः यही कारण था कि उसका संहार करने के बाद भी जगज्जननी ने उसे अपने चरणों से अलग नहीं किया।

यह हमारी मीमांसा है, पुराण का शब्दशः कथन नहीं।

लेकिन कालिकापुराण में महिषासुर को देवी के चरणों में स्थान मिलने की बात स्पष्ट रूप से कही गई है।

कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 160

तेन देवीपादतले तिष्ठत्येषोऽसुरोऽधुना।

नोत्पत्तिरपि तस्याथ संवर्तान्तादभून्नृप॥

अर्थ: हे राजन्! इसी कारण यह असुर अब देवी के चरणों के नीचे स्थित है और प्रलय के अंत तक उसका पुनर्जन्म नहीं होगा।

इसके अगले श्लोक में महिषासुर को महादेव के अंश से उत्पन्न बताकर देवी की कृपा से उसकी श्रेष्ठ गति का उल्लेख किया गया है।

कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 161

एवं देवीप्रसादेन महादेवांशसम्भवः।

परामवाप सततं प्रतिपत्तिं महासुरः॥

अर्थ: इस प्रकार महादेव के अंश से उत्पन्न महिषासुर ने देवी की कृपा से श्रेष्ठ स्थिति प्राप्त की।

जिस देवी के हाथों उसका संहार निश्चित था, उन्हीं देवी के चरण अंततः उसका आश्रय बने।

माँ कात्यायनी के प्रसंग में यह संहार और अनुग्रह का अद्भुत संगम है।

जगज्जननी ने महिषासुर के अधर्म का अंत किया, लेकिन उसकी शरणागत प्रार्थना को अस्वीकार भी नहीं किया।


वामनपुराण — महर्षि कात्यायन की तपशक्ति से प्रकट हुईं देवी

कालिकापुराण के अतिरिक्त वामनपुराण में भी माँ कात्यायनी के प्राकट्य और महिषासुर-वध का विस्तृत वर्णन मिलता है।

यह एक स्वतंत्र पुराणिक परम्परा है।

वामनपुराण के अनुसार महिषासुर ने देवताओं को पराजित करके स्वर्ग पर अधिकार कर लिया।

पीड़ित देवता ब्रह्मा को आगे करके भगवान विष्णु और शिव के पास पहुँचे।

देवताओं की दुर्दशा सुनकर उनके भीतर प्रचण्ड क्रोध उत्पन्न हुआ और उनके शरीरों से दिव्य तेज प्रकट होने लगा।

ये सभी तेज एकत्र होकर महर्षि कात्यायन के आश्रम में पहुँचे।

महर्षि ने अपनी तपशक्ति से उस तेज को और अधिक प्रबल किया।

उसी संयुक्त तेज से एक अनुपम देवी का प्राकट्य हुआ।

महर्षि कात्यायन से संबंध होने के कारण वे कात्यायनी नाम से प्रसिद्ध हुईं।


माँ कात्यायनी का अठारह भुजाओं वाला स्वरूप

वामनपुराण में देवी के विभिन्न अंगों की उत्पत्ति अलग-अलग देवताओं के तेज से बताई गई है।

वामनपुराण, अध्याय 18, श्लोक 9

माहेश्वराद् वक्त्रमथो बभूव नेत्रत्रयं पावकतेजसा च।

याम्येन केशा हरितेजसा च भुजास्तथाष्टादश संप्रजज्ञिरे॥

अर्थ: भगवान शिव के तेज से देवी का मुख, अग्नि के तेज से तीन नेत्र, यम के तेज से केश और भगवान विष्णु के तेज से अठारह भुजाएँ उत्पन्न हुईं।

देवताओं ने उन्हें अपने-अपने दिव्य आयुध प्रदान किए।

देवी ने सिंह पर आरूढ़ होकर विन्ध्य पर्वत की ओर प्रस्थान किया।


महिषासुर का विवाह-प्रस्ताव

वामनपुराण की कथा में चण्ड और मुण्ड नामक असुर देवी को देखते हैं।

वे उनके सौन्दर्य और तेज से प्रभावित होकर महिषासुर के पास पहुँचते हैं।

महिषासुर देवी से विवाह करने की इच्छा व्यक्त करता है और अपना प्रस्ताव भेजता है।

लेकिन माँ कात्यायनी उसका प्रस्ताव स्वीकार नहीं करतीं।

वे उसे युद्ध की चुनौती देती हैं।

इसके बाद महिषासुर अपनी विशाल सेना के साथ युद्ध करने पहुँचता है।

माँ कात्यायनी उसके सेनापतियों और योद्धाओं का संहार करती हैं।

महिषासुर भी अपनी असाधारण शक्ति और रूप-परिवर्तन की क्षमता से उनका सामना करता है।

युद्ध में देवी अनेक दिव्य आयुधों का प्रयोग करती हैं।

लेकिन महिषासुर अत्यंत बलशाली था। वह उनके कई आयुधों का प्रतिकार करता रहा।

अंततः देवी ने उसे अपने चरणों से दबाकर परास्त किया।

वामन पुराण के अनुसार माँ कात्यायनी का अठारह भुजाओं वाला स्वरूप
वामन पुराण के अनुसार माँ कात्यायनी का अठारह भुजाओं वाला स्वरूप

नारद का प्रश्न — अस्त्र-शस्त्र होते हुए भी देवी ने चरणों से क्यों दबाया ?

वामनपुराण में देवर्षि नारद ने महर्षि पुलस्त्य से एक विशेष प्रश्न किया।

वामनपुराण, अध्याय 21, श्लोक 2

एतच्च संशयं ब्रह्मन् हृदि मे परिवर्तते।

विद्यमानेषु शस्त्रेषु यत्पद्भ्यां तममर्दयत्॥

अर्थ: हे ब्रह्मन्! मेरे हृदय में यह संशय है कि इतने शस्त्र उपलब्ध होते हुए भी देवी ने महिषासुर को अपने चरणों से क्यों दबाया?

महर्षि पुलस्त्य ने उत्तर में उस युद्ध का विस्तार से वर्णन किया।

महिषासुर ने अपने बल से देवी के अनेक आयुधों का प्रतिकार किया।

उसने वरुण के पाश को हटा दिया, यम के दण्ड को खण्डित कर दिया और अन्य आयुधों को भी निष्फल किया।

वामनपुराण, अध्याय 21, श्लोक 45

जलेशपाशोऽपि महासुरेण विषाणतुण्डाग्रखुरप्रणुन्नः।

निरस्य तत्कोपितया च मुक्तो दण्डस्तु याम्यो बहुखण्डतां गतः॥

अर्थ: महिषासुर ने अपने सींग, मुख और खुरों से वरुण के पाश को हटा दिया। क्रोध में छोड़ा गया यम का दण्ड भी अनेक टुकड़ों में टूट गया।

इसके बाद देवी अपने सिंह से उतरकर महिषासुर की पीठ पर आरूढ़ हुईं।

महिषासुर उन्हें गिराने के लिए उछलने लगा, लेकिन देवी ने अपने चरणों से उसे दबा दिया।

वामनपुराण, अध्याय 21, श्लोक 47

पृष्ठस्थितायां महिषासुरोऽपि पोप्लूयते वीर्यमदान्मृडान्याम्।

सा चापि पद्भ्यां मृदुकोमलाभ्यां ममर्द तं क्लिन्नमिवाजिनं हि॥

अर्थ: जब देवी उसकी पीठ पर आरूढ़ हुईं, तब महिषासुर अपने बल के अभिमान में उन्हें गिराने के लिए उछलने लगा। लेकिन भगवती ने अपने कोमल चरणों से उसे इस प्रकार दबाया, जैसे भीगी हुई चमड़ी को दबाया जाता है।

देवी के चरणों से दबाए जाने पर महिषासुर का बल क्षीण हो गया।

तब भगवती ने उसके कण्ठ को त्रिशूल से विदीर्ण किया। उसके भीतर से खड्गधारी पुरुषरूप प्रकट हुआ, जिसका अंत देवी ने खड्ग से किया।

इस प्रकार नारद के प्रश्न का उत्तर युद्ध के घटनाक्रम में मिलता है।

देवी ने अस्त्र-शस्त्रों का त्याग करके केवल पैरों से महिषासुर को नहीं मारा था।

उनके अनेक आयुधों का प्रतिकार करने के बाद भी जब महिषासुर युद्ध करता रहा, तब भगवती ने अपने चरणों से उसे वश में किया और अंततः त्रिशूल तथा खड्ग से उसका संहार किया।

यहाँ चरणों से दबाना महिषासुर के अंतिम पराभव का निर्णायक क्षण था।


स्कन्दपुराण — कार्तिकेय और देवताओं के तेज से प्रकट हुईं कात्यायनी

स्कन्दपुराण के नागरखण्ड, अध्याय 120 में माँ कात्यायनी के प्राकट्य की एक अन्य परम्परा मिलती है।

महिषासुर के अत्याचारों से पीड़ित देवता उसके संहार का उपाय सोच रहे थे।

उसी समय देवर्षि नारद वहाँ पहुँचे और उन्होंने महिषासुर के अत्याचारों का वर्णन किया।

यह सुनकर देवताओं में प्रचण्ड क्रोध उत्पन्न हुआ।

इसी बीच कुमार कार्तिकेय वहाँ आए।

उन्होंने देवताओं के क्रोध का कारण पूछा। नारद ने उन्हें भी महिषासुर के अत्याचारों की जानकारी दी।

यह सुनकर कार्तिकेय भी क्रोधित हो उठे।

देवताओं के क्रोध में कार्तिकेय का तेज सम्मिलित हुआ और उससे एक दिव्य कन्या प्रकट हुई।

स्कन्दपुराण, नागरखण्ड, अध्याय 120, श्लोक 13

कार्तिकेयस्य कोपेन कोपे मिश्रे दिवौकसाम्।

यस्माज्जातात्र सा कन्या तस्मात्कात्यायनी स्मृता॥

अर्थ: देवताओं के क्रोध में कार्तिकेय का क्रोध सम्मिलित होने से जिस दिव्य कन्या का प्राकट्य हुआ, वह कात्यायनी नाम से प्रसिद्ध हुई।

देवताओं ने उन्हें अपने दिव्य आयुध प्रदान किए।

इन्द्र ने वज्र, कार्तिकेय ने शक्ति, विष्णु ने धनुष, शिव ने त्रिशूल और अन्य देवताओं ने अपने-अपने आयुध दिए।

इन आयुधों को धारण करने के लिए देवी ने बारह भुजाएँ प्रकट कीं।

स्कन्दपुराण, नागरखण्ड, अध्याय 120, श्लोक 18

कात्यायनी ततश्चक्रे भुजद्वादशकं तदा।

जग्राह च द्रुतं तानि सुरास्त्राणि दिवौकसाम्॥

अर्थ: तब माँ कात्यायनी ने बारह भुजाएँ धारण कीं और देवताओं के दिव्य आयुध ग्रहण किए।

इस प्रकार माँ कात्यायनी के स्वरूप में भी पुराणों के अनुसार भिन्नताएँ मिलती हैं।

कालिकापुराण में वे दशभुजा, वामनपुराण में अष्टादशभुजा और स्कन्दपुराण में द्वादशभुजा हैं।

ये वर्णन अपनी-अपनी पुराणिक परम्पराओं से संबंधित हैं। इन्हें मिलाकर एक ही घटनाक्रम बना देना उचित नहीं होगा।

 

स्कन्दपुराण के अनुसार भगवान कार्तिकेय और क्रोधित देवताओं के शरीरों से दिव्य तेज निकलकर एकत्र हो रहा है। उस संयुक्त तेज से सिंहवाहिनी माँ कात्यायनी प्रकट हो रही हैं। समीप कार्तिकेय अपने मयूर वाहन के साथ दिखाई दे रहे हैं।
महिषासुर के अत्याचारों से क्रोधित देवताओं के तेज में भगवान कार्तिकेय का तेज सम्मिलित हुआ। उसी संयुक्त शक्ति से माँ कात्यायनी का प्राकट्य हुआ।

श्रीमद्भागवत — व्रज की कुमारियों की आराध्या माँ कात्यायनी

माँ कात्यायनी का उल्लेख केवल महिषासुर-वध की कथाओं में ही नहीं मिलता।

श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध में व्रज की कुमारियों द्वारा उनकी आराधना का सुन्दर प्रसंग मिलता है।

हेमन्त ऋतु के प्रथम महीने में नन्दव्रज की कुमारियों ने कात्यायनी-व्रत किया।

श्रीमद्भागवत, दशम स्कन्ध, अध्याय 22, श्लोक 1

हेमन्ते प्रथमे मासि नन्दव्रजकुमारिकाः।

चेरुर्हविष्यं भुञ्जानाः कात्यायन्यर्चनव्रतम्॥

अर्थ: हेमन्त ऋतु के प्रथम महीने में नन्दव्रज की कुमारियों ने हविष्यान्न ग्रहण करते हुए माँ कात्यायनी की आराधना का व्रत किया।

वे प्रातःकाल यमुना में स्नान करतीं, नदी की बालुका से देवी की प्रतिमा बनातीं और उसका पूजन करती थीं।

उनकी प्रार्थना थी—

श्रीमद्भागवत, दशम स्कन्ध, अध्याय 22, श्लोक 4

कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।

नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥

अर्थ: हे कात्यायनी! हे महामाया! हे महायोगिनी! हे ईश्वरी! नन्दगोप के पुत्र श्रीकृष्ण हमें पति के रूप में प्राप्त हों। आपको नमस्कार है।

यहाँ माँ कात्यायनी का एक अन्य उपासना-स्वरूप सामने आता है।

जिन देवी ने देवताओं की रक्षा के लिए महिषासुर का संहार किया, उन्हीं जगज्जननी की आराधना व्रज की कुमारियाँ श्रीकृष्ण को पति के रूप में प्राप्त करने की अभिलाषा से करती हैं।


दुर्गासप्तशती में माँ कात्यायनी की स्तुति

दुर्गासप्तशती के नारायणी स्तुति प्रसंग में देवता माँ कात्यायनी से प्रार्थना करते हैं—

देवीमाहात्म्य, अध्याय 11, श्लोक 25

एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्।

पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥

अर्थ: हे कात्यायनी! तीन नेत्रों से सुशोभित आपका यह सौम्य मुख हमें सभी प्रकार के भय से बचाए। आपको नमस्कार है।

माँ कात्यायनी के स्वरूप का यह एक और पक्ष है।

वे महिषासुर का संहार करने वाली महाशक्ति हैं, लेकिन उनका सौम्य स्वरूप भक्तों को सभी प्रकार के भय से रक्षा प्रदान करने वाला भी है।


माँ कात्यायनी — संहार भी, अनुग्रह भी

माँ कात्यायनी के प्राकट्य की कथाएँ विभिन्न पुराणों में अलग-अलग रूपों में मिलती हैं।

कालिकापुराण में वे महर्षि कात्यायन के आश्रम में देवताओं के संयुक्त तेज से प्रकट होती हैं।

वामनपुराण में महर्षि कात्यायन की तपशक्ति उनके प्राकट्य से जुड़ी है।

स्कन्दपुराण में कार्तिकेय और देवताओं के संयुक्त तेज से उनका आविर्भाव बताया गया है।

लेकिन कालिकापुराण की तीन सृष्टियों वाली कथा माँ कात्यायनी के स्वरूप का एक विशेष पक्ष सामने रखती है।

महिषासुर ने तीन जन्मों तक अपनी शक्ति का उपयोग देवताओं से वैर करने में किया।

पहली सृष्टि में माँ उग्रचण्डा ने उसका संहार किया। दूसरी में माँ भद्रकाली ने।

तीसरी में माँ दुर्गा-कात्यायनी उसके अंत का कारण बनीं।

फिर भी कथा केवल महिषासुर के संहार पर समाप्त नहीं होती।

जब महिषासुर को अपने पूर्व जन्मों के संहार का ज्ञान हुआ और उसने देवी के उन स्वरूपों का दर्शन किया, तो वह भयभीत होकर उनकी शरण में पहुँचा।

उसने पुनर्जन्म से छुटकारा माँगा।

जगज्जननी ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की।

और जब उसके भीतर विद्यमान शिवांश का रहस्य सामने आया, तो यह भी स्पष्ट हुआ कि भगवान शिव स्वयं चाहते थे कि उनका महिषरूप भगवती द्वारा स्वीकार किया जाए।

अंततः महिषासुर को उन्हीं देवी के चरणों में स्थान मिला, जिनके हाथों उसका संहार हुआ था।

माँ कात्यायनी ने अधर्म का अंत किया, लेकिन शरणागत पर अपनी करुणा नहीं छोड़ी।

यही उनके स्वरूप की विशेषता है।

वे महिषासुरमर्दिनी हैं—देवताओं की रक्षिका और अधर्म का संहार करने वाली महाशक्ति।

और वही जगज्जननी अपने शरणागत को आश्रय प्रदान करने वाली करुणामयी माता भी हैं।

सिंहवाहिनी माँ कात्यायनी का दिव्य दशभुजा स्वरूप, लाल वस्त्रों और स्वर्ण आभूषणों से सुशोभित। देवी अपने चरणों के नीचे महिषासुर को दबाए हुए हैं और त्रिशूल से उसका संहार कर रही हैं।
माँ कात्यायनी का महिषासुरमर्दिनी स्वरूप—जगज्जननी ने महिषासुर के अत्याचारों का अंत किया और उसे अपने चरणों में स्थान प्रदान किया।

नवदुर्गा के छठे दर्शन में माँ कात्यायनी का यही तेजस्वी और करुणामय स्वरूप हमारे सामने आता है।

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

जय माँ कात्यायनी! जय जगदम्बे!

अगले दर्शन में हम नवदुर्गा के सातवें स्वरूप माँ कालरात्रि की शास्त्रीय महिमा को समझने का प्रयास करेंगे। 

 


 

 

 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
Scroll to Top