नवरात्रि विशेष – 5

नवदुर्गा: पाँचवाँ दर्शन –  माँ स्कन्दमाता

मातृवात्सल्य, दिव्य अनुग्रह और ज्ञान का वह स्वरूप, जिसकी गोद में स्वयं देवसेनापति और योगीश्वर स्कन्द विराजमान हैं।

लेखक: कुलदीप ठुसू “पम्पोष”


नवरात्रि के प्रथम चार दर्शनों में हमने भगवती के शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा और कूष्माण्डा स्वरूपों का परिचय प्राप्त किया।

अब पाँचवाँ दर्शन है — माँ स्कन्दमाता।

श्रीदुर्गासप्तशती के देवी कवच में नवदुर्गा के नामों का वर्णन करते हुए कहा गया है—

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥ ४॥

अर्थ: भगवती का पाँचवाँ स्वरूप स्कन्दमाता, छठा कात्यायनी, सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ महागौरी कहलाता है।

स्कन्द भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र हैं।

उन्हें कार्तिकेय, कुमार, गुह, षण्मुख और दक्षिण भारत में मुरुगन जैसे नामों से भी जाना जाता है।

इस प्रकार स्कन्दमाता का सामान्य अर्थ हुआ — भगवान स्कन्द की माता।

लेकिन माता पार्वती के इस स्वरूप को समझने के लिए हमें भगवान स्कन्द के प्राकट्य से जुड़े एक विलक्षण पुराणिक प्रसंग की ओर चलना होगा।


तारकासुर का संकट और शिवपुत्र का प्राकट्य

माता ब्रह्मचारिणी के दर्शन में हम जान चुके हैं कि हिमालयपुत्री पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए अत्यन्त कठोर तपस्या की थी।

अन्ततः भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ।

उस समय देवता भी इस विवाह से बड़ी आशा लगाए हुए थे।

तारकासुर नामक महाबली असुर के अत्याचारों से तीनों लोक व्याकुल थे। उसे प्राप्त वरदान के कारण उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही सम्भव था।

इसलिए देवताओं को शिवपुत्र के प्राकट्य की प्रतीक्षा थी।

शिवमहापुराण के अनुसार, विवाह के पश्चात् भगवान शिव और माता पार्वती अपने दाम्पत्य जीवन के एकान्त में थे।

किन्तु तारकासुर से पीड़ित देवताओं की व्याकुलता बढ़ रही थी।

उन्होंने भगवान शिव की प्रार्थना की और उनके एकान्त में हस्तक्षेप हुआ। इससे शिव-पार्वती का एकान्त भंग हो गया।

भगवान शिव का वह अमोघ तेज, जिससे दिव्य पुत्र का जन्म होना था, माता पार्वती के गर्भ में स्थापित नहीं हो सका।

इस घटना से भगवती अत्यन्त कुपित हुईं। शिवपुराण में उनके द्वारा देवताओं को शाप देने का भी वर्णन मिलता है।

स्रोत: शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, कुमारखण्ड, अध्याय 2

भगवान शिव का वह दिव्य तेज विभिन्न माध्यमों से होता हुआ अन्ततः गंगाजी के प्रवाह द्वारा सरकण्डों के एक वन में पहुँचा।

इसी स्थान को शरवण कहा गया है।

वहाँ उस तेज से एक अत्यन्त सुन्दर और तेजस्वी बालक प्रकट हुआ।

शिवपुराण इस प्राकट्य का समय मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि बताता है।

लेकिन जिस समय शरवण में बालक का प्राकट्य हुआ, उसी समय माता पार्वती के साथ भी एक अद्भुत घटना घटी।

भगवती उस बालक से दूर थीं। उन्होंने अभी उसे देखा तक नहीं था।

फिर भी उनके स्तनों से स्वतः दूध प्रवाहित होने लगा।

शिवाकुचाभ्यां सुस्राव पय आनन्दसम्भवम्।
तत्र गत्वा च सर्वेषां सुखमासीन्मुनेऽधिकम्॥ ७०॥

अर्थ: उस समय भगवती पार्वती के स्तनों से आनन्द के कारण स्वतः दूध प्रवाहित होने लगा।

स्रोत: शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, कुमारखण्ड, अध्याय 2, श्लोक 70

बालक शरवण में प्रकट हुआ था और माता पार्वती उससे दूर थीं।

लेकिन उसके प्राकट्य के साथ ही भगवती में मातृत्व का यह विलक्षण अनुभव हुआ।


छह कृत्तिकाएँ — जिन्होंने बालक का पालन-पोषण किया

शिवपुराण में आगे वर्णन मिलता है कि छह कृत्तिकाएँ उस स्थान पर पहुँचीं जहाँ वह दिव्य बालक उपस्थित था।

लेकिन ये कृत्तिकाएँ कौन थीं?

भारतीय ज्योतिष में 27 नक्षत्र माने गए हैं। कृत्तिका इन्हीं में से एक है।

आकाश में इसकी पहचान तारों के एक समूह से होती है, जिसे आधुनिक खगोल-विज्ञान में Pleiades कहते हैं।

इसके लगभग छह चमकीले तारे सामान्यतः बिना दूरबीन के दिखाई देते हैं।

पौराणिक परम्परा में कृत्तिकाओं का वर्णन छह मातृदेवियों के रूप में मिलता है।

शिवपुराण में इन कृत्तिकाओं को ज्ञानसम्पन्न योगिनियाँ और प्रकृति की कलाएँ भी कहा गया है।

जब उन्होंने उस तेजस्वी बालक को देखा, तो सभी के हृदय में उसके प्रति अपार स्नेह उत्पन्न हो गया।

प्रत्येक कृत्तिका चाहती थी कि वह बालक को अपनी गोद में लेकर अपना दूध पिलाए।

किन्तु बालक को स्तनपान कराने के विषय में उन छहों के बीच विवाद होने लगा।

तब उस दिव्य बालक ने स्वयं छह मुख धारण कर लिए।

तद्वादशमनार्थं स षण्मुखानि चकार ह।
पपौ दुग्धं च सर्वासां तुष्टास्ता अभवन्मुने॥ ३१॥

स्रोत: शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, कुमारखण्ड, अध्याय 3, श्लोक 31

अर्थ: उन कृत्तिकाओं के बीच विवाद शान्त करने के लिए बालक ने छह मुख धारण किए और सभी का दूध पान किया। इससे सभी कृत्तिकाएँ सन्तुष्ट हो गईं।

इसके बाद कृत्तिकाएँ उस बालक को अपने साथ ले गईं।

उन्होंने बड़े प्रेम से उसका पालन-पोषण किया, उसे सुन्दर वस्त्र और आभूषण पहनाए तथा अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय माना।

इन्हीं कृत्तिकाओं के स्नेह और संरक्षण में पलने के कारण बालक का नाम कार्तिकेय प्रसिद्ध हुआ।

शरवण वन में छह मुखों वाले बालक कार्तिकेय के चारों ओर छह कृत्तिका माताएँ प्रेमपूर्वक बैठी हैं और उन्हें स्नेह से दुलार रही हैं।
शरवण में भगवान कार्तिकेय का षण्मुख स्वरूप। छह कृत्तिकाओं के मातृस्नेह को स्वीकार करने के लिए बालक स्कन्द ने छह मुख धारण किए, ताकि सभी माताएँ उन्हें स्तनपान करा सकें।

माता पार्वती को अपने पुत्र का समाचार कैसे मिला ?

शिवपुराण के कुमारखण्ड, अध्याय 4 में वर्णन है कि कुछ समय पश्चात् भगवती पार्वती ने भगवान शिव से उनके उस अमोघ तेज के विषय में पूछा, जिससे पुत्र का प्राकट्य होना था।

माता जानना चाहती थीं कि वह तेज कहाँ गया और क्या उससे कहीं किसी बालक का जन्म हुआ है।

उन्होंने भगवान शिव से कहा—

कथं मत्स्वामिनो वीर्यममोघं ते महेश्वर।
मोघं यातं च किं किं वा शिशुर्जातश्च कुत्रचित्॥ ७॥

स्रोत: शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, कुमारखण्ड, अध्याय 4, श्लोक 7

अर्थ: हे महेश्वर! आपका अमोघ तेज व्यर्थ कैसे जा सकता है? क्या वह निष्फल हो गया अथवा उससे कहीं किसी शिशु का जन्म हुआ है?

भगवती के इस प्रश्न पर भगवान शिव ने देवताओं को बुलाया।

एक-एक करके सभी से उस दिव्य तेज के विषय में जानकारी ली गई।

अन्ततः ज्ञात हुआ कि भगवान शिव के तेज से प्रकट हुआ बालक छह कृत्तिकाओं के संरक्षण में पल रहा है।

पुत्र का समाचार सुनकर माता पार्वती अत्यन्त प्रसन्न हुईं।

शिवपुराण के अनुसार, इस आनन्द में भगवती ने ब्राह्मणों को धन और रत्न दान किए।

इसके बाद भगवान शिव ने अपने गणों को कार्तिकेय को कैलास लाने के लिए भेजा।

किन्तु जब कृत्तिकाओं को ज्ञात हुआ कि बालक उनसे दूर जाने वाला है, तो वे अत्यन्त दुःखी हो गईं।

जिस बालक को उन्होंने अपने दूध से पाला था, उससे अलग होना उनके लिए सहज नहीं था।

स्वयं कार्तिकेय ने उन्हें समझाया और उनके मातृत्व का सम्मान किया।

शिवपुराण में वे नन्दीश्वर से कहते हैं—

न मद्भवो हे शैलेन्द्रकन्यया नन्दिकेश्वर।
सा च मे धर्मतो माता यथेमाः सर्वसम्मताः॥ ६५॥

स्रोत: शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, कुमारखण्ड, अध्याय 4, श्लोक 65

अर्थ: हे नन्दीश्वर! यद्यपि मेरा जन्म हिमालयपुत्री पार्वती के गर्भ से नहीं हुआ, तथापि वे धर्मतः मेरी माता हैं, जैसे ये कृत्तिकाएँ मेरी माता मानी जाती हैं।

कार्तिकेय ने माता पार्वती के मातृत्व को स्वीकार करते हुए अपनी छह पालनकर्ता माताओं के स्नेह और अधिकार को भी सम्मान दिया।

इसके बाद वे कैलास की ओर प्रस्थान कर गए।


कैलास पर माता पार्वती और पुत्र का मिलन

शिवपुराण के कुमारखण्ड, अध्याय 5 में कार्तिकेय के कैलास आगमन का सुन्दर वर्णन मिलता है।

माता पार्वती ने पुत्र को लाने के लिए विश्वकर्मा द्वारा निर्मित एक दिव्य रथ भेजा।

कैलास में उनके स्वागत की तैयारियाँ की गईं।

मार्गों को सुशोभित किया गया। देवियाँ, ऋषि और शिवगण स्वागत के लिए उपस्थित हुए। अप्सराएँ गायन और नृत्य करने लगीं।

माता पार्वती ने स्वयं अपने पुत्र के स्वागत के लिए मंगलमय आयोजन किया।

जब कार्तिकेय कैलास पहुँचे, तो उन्होंने भगवान शिव और माता पार्वती को प्रणाम किया।

भगवान शिव ने पुत्र को स्नेहपूर्वक आलिंगन में लिया और उसके मस्तक को चूमा।

इसके बाद माता पार्वती ने उसे अपने हृदय से लगा लिया।

शिवपुराण में कहा गया है—

उपगुह्य गुहं तत्र पार्वती जातसम्भ्रमा।
प्रस्नुतं पाययामास स्तनं स्नेहपरिप्लुता॥ २९॥

स्रोत: शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, कुमारखण्ड, अध्याय 5, श्लोक 29

अर्थ: माता पार्वती ने अत्यन्त उत्कण्ठा और स्नेह से गुह अर्थात् कार्तिकेय को आलिंगन में लिया तथा अपने स्तनों से प्रवाहित दूध का पान कराया।

जिस बालक के प्राकट्य के समय भगवती के स्तनों से स्वतः दूध प्रवाहित हुआ था, अब वही पुत्र उनकी गोद में था।

भगवती के लिए यह उनके मातृत्व की अभिलाषा पूर्ण होने का अत्यन्त आनन्दमय क्षण था।


तमिल कन्दपुराणम् —

जब माता के आलिंगन से छह बालक एक हुए

भगवान कार्तिकेय की उपासना दक्षिण भारत में अत्यन्त व्यापक है।

विशेषकर तमिलनाडु में वे मुरुगन, कन्दन और आरुमुगन के नाम से पूजित हैं।

तमिल शैव साहित्य के प्रसिद्ध ग्रंथ कन्दपुराणम् में, जिसकी रचना कच्चियप्प शिवाचार्य से सम्बन्धित है, भगवती उमा की एक अद्भुत लीला का वर्णन मिलता है।

इस ग्रंथ के उत्पत्तिकाण्ड में स्कन्द के प्राकट्य का वर्णन शिवपुराण से कुछ भिन्न है।

इस तमिल परम्परा के अनुसार, भगवान शिव से प्रकट दिव्य तेज शरवण में छह बालकों के रूप में स्थित हुआ।

छह कृत्तिकाओं ने उन बालकों का पालन-पोषण किया।

जब भगवान शिव और भगवती उमा वहाँ पहुँचे, तब महादेव ने माता से अपने पुत्र को गोद में लेने के लिए कहा।

भगवती उमा आगे बढ़ीं।

उन्होंने अत्यन्त प्रेम से छहों बालकों को अपनी दोनों भुजाओं में समेटकर हृदय से लगा लिया।

माता के उस आलिंगन से छहों बालरूप एक ही दिव्य शरीर में संयुक्त हो गए।

उस एक शरीर के छह मुख और बारह भुजाएँ थीं।

स्रोत: तमिल कन्दपुराणम्, उत्पत्तिकाण्ड, पद्य 1034–1035 (1.13.20–21)

आगे वर्णन है कि भगवती ने पुत्र के प्रत्येक मुख को स्नेहपूर्वक चूमा। उनके स्तनों से दूध प्रवाहित होने लगा और उन्होंने अपने पुत्र को वह दूध पिलाया।

स्रोत: तमिल कन्दपुराणम्, उत्पत्तिकाण्ड, पद्य 1036–1037 (1.13.22–23)

इस तमिल वर्णन में एक और विशेष बात है।

भगवती के दूध का वर्णन केवल शिशु के पोषण के साधन के रूप में नहीं हुआ है। उसमें परम ज्ञान और दिव्य अनुग्रह की महिमा भी व्यक्त की गई है।

अब दोनों ग्रंथों के वर्णनों में एक महत्वपूर्ण अन्तर सामने आता है।

शिवपुराण में बालक छह कृत्तिकाओं का दूध पीने के लिए स्वयं छह मुख धारण करता है।

जबकि तमिल कन्दपुराणम् में छह अलग-अलग बालरूपों को एक दिव्य षण्मुख स्वरूप में संयुक्त करने की लीला भगवती उमा के आलिंगन से सम्पन्न होती है।

यहाँ माता पार्वती का मातृत्व उनके दिव्य सामर्थ्य के साथ प्रकट होता है।

हिमालय पर माँ पार्वती छह शिशुओं को गले लगा रही हैं जो प्रकाश में एक छह मुख बारह भुजा वाले बालक में मिल रहे हैं, पास में हाथ जोड़े खड़ी छह कृतिकाएँ
वात्सल्य का दिव्य क्षण — माँ पार्वती के आलिंगन से छह बालक एक षण्मुख द्वादश-भुज स्वरूप में एक हुए, छहों कृतिकाएँ भाव-विह्वल होकर इस लीला को निहार रही हैं।

सोमास्कन्द — माता, पिता और पुत्र का संयुक्त स्वरूप

दक्षिण भारतीय शैव परम्परा में भगवान शिव, माता उमा और बालक स्कन्द के संयुक्त स्वरूप को सोमास्कन्द कहा जाता है।

इस स्वरूप में भगवान शिव और भगवती उमा के साथ बालक स्कन्द विराजमान रहते हैं।

पल्लव तथा चोलकालीन मंदिरों और प्रतिमाओं में इस संयुक्त स्वरूप के अनेक उदाहरण मिलते हैं।

यह प्रतिमा-परम्परा दक्षिण भारत की शैव उपासना में माता उमा और उनके पुत्र स्कन्द के सम्बन्ध की प्राचीन प्रतिष्ठा का महत्वपूर्ण प्रमाण है।

सोमास्कन्द स्वरूप में भगवान शिव और माता पार्वती के मध्य छह मुखों वाले बालक कार्तिकेय विराजमान हैं। समीप नन्दी और मयूर दिखाई दे रहे हैं।
सोमास्कन्द — शिव, उमा और स्कन्द का दिव्य संयुक्त स्वरूप। दक्षिण भारतीय शैव परम्परा में प्रतिष्ठित यह स्वरूप भगवान शिव, माता पार्वती और उनके पुत्र स्कन्द के पवित्र पारिवारिक सम्बन्ध को दर्शाता है।

माता पार्वती का दिव्य अनुग्रह — परम ऐश्वर्य और चिरंजीवित्व

शिवपुराण के कुमारखण्ड, अध्याय 5 में कार्तिकेय के अभिषेक का वर्णन मिलता है।

इस अवसर पर भगवान शिव, विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र और अन्य देवताओं ने उन्हें विभिन्न दिव्य आयुध तथा उपहार प्रदान किए।

इसी क्रम में माता पार्वती का भी उल्लेख आता है—

पार्वती सस्मिता हृष्टा परमैश्वर्यमुत्तमम्।
ददौ तस्मै महाप्रीत्या चिरञ्जीवित्वमेव च॥ ५०॥

स्रोत: शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, कुमारखण्ड, अध्याय 5, श्लोक 50

अर्थ: भगवती पार्वती ने प्रसन्न होकर, मुस्कुराते हुए, अत्यन्त प्रेम से अपने पुत्र को परम ऐश्वर्य और चिरंजीवित्व प्रदान किया।

इस श्लोक के दो शब्द विशेष ध्यान देने योग्य हैं।

परमैश्वर्यम् — परम ऐश्वर्य, अर्थात् अत्यन्त उच्च दिव्य प्रभुत्व और सामर्थ्य।

चिरञ्जीवित्वम् — चिरकाल तक जीवित रहने का वरदान।

अन्य देवता कार्तिकेय को अपने-अपने दिव्य आयुध, आभूषण अथवा उपहार प्रदान कर रहे थे।

किन्तु भगवती पार्वती उन्हें परम ऐश्वर्य और चिरंजीवित्व प्रदान करती हैं।

यहाँ माता के वात्सल्य के साथ उनका वरदायिनी परमेश्वरी स्वरूप भी प्रकट होता है।


स्कन्दपुराण में माता पार्वती का एक और विशेष वरदान

स्कन्दपुराण के माहेश्वरखण्ड, कौमारिकाखण्ड, अध्याय 29 में भी भगवान स्कन्द और उनके माता-पिता के मिलन का वर्णन मिलता है।

भगवान शिव और भगवती पार्वती अपने पुत्र को आलिंगन में लेकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उसे आशीर्वाद दिया।

इसके बाद दोनों ने उसे अलग-अलग आध्यात्मिक अनुग्रह प्रदान किए।

चिरं जहृषतुश्चोभौ पार्वतीपरमेश्वरौ।
सिद्धसारस्य तत्त्वं च ददौ तुष्टोऽस्य शंकरः॥ २०२॥

देवी प्रकृतिमोक्षं च तुष्टा हर्षपरिप्लुता।
एतस्मिन्नेव काले तु षड्देव्यस्तं समागमन्॥ २०३॥

स्रोत: स्कन्दपुराण, माहेश्वरखण्ड, कौमारिकाखण्ड, अध्याय 29, श्लोक 202–203

अर्थ: भगवान शिव और भगवती पार्वती अपने पुत्र से मिलकर अत्यन्त आनन्दित हुए। प्रसन्न होकर भगवान शिव ने स्कन्द को सिद्धसार का तत्त्व प्रदान किया, जबकि भगवती पार्वती ने उन्हें प्रकृतिमोक्ष प्रदान किया।

यहाँ दो विशेष पद हैं — सिद्धसारस्य तत्त्वम् और प्रकृतिमोक्ष।

सिद्धसार का तत्त्व—

‘सिद्धसार’ शब्द का सामान्य अर्थ सिद्धि अथवा सिद्ध अवस्था से सम्बन्धित किसी सारभूत तत्त्व की ओर संकेत करता है।

किन्तु इस प्रसंग में स्कन्दपुराण यह स्पष्ट नहीं करता कि सिद्धसार किसी विशेष विद्या, साधना अथवा दार्शनिक सिद्धान्त का नाम है।

इसलिए इसका निश्चित अर्थ बताने के स्थान पर मूल ग्रंथ में प्रयुक्त पद को ही सुरक्षित रखना उचित है।

प्रकृतिमोक्ष—

अब भगवती पार्वती द्वारा प्रदान किए गए अनुग्रह पर ध्यान दें।

भारतीय दर्शन में प्रकृति का अर्थ केवल पेड़-पौधे, पर्वत अथवा प्राकृतिक संसार नहीं है।

सांख्य आदि दार्शनिक परम्पराओं में प्रकृति उस मूल सत्ता को भी कहा जाता है, जिससे परिवर्तनशील जगत् और उसके विभिन्न तत्त्वों का विकास माना जाता है।

इस सन्दर्भ में प्रकृतिमोक्ष का सामान्य अर्थ है — प्रकृति के बन्धन से मुक्ति।

यह एक गम्भीर आध्यात्मिक अवधारणा है, जिसका सम्बन्ध सांसारिक बन्धनों से परे मुक्ति की अवस्था से समझा जा सकता है।

यद्यपि स्कन्दपुराण के इस प्रसंग में प्रकृतिमोक्ष की विस्तृत दार्शनिक व्याख्या नहीं की गई है, लेकिन भगवती द्वारा इसे प्रदान करने का स्पष्ट उल्लेख है।

यहाँ माता पार्वती अपने पुत्र को केवल सांसारिक ऐश्वर्य अथवा दीर्घायु ही प्रदान नहीं करतीं, बल्कि उनके अनुग्रह का सम्बन्ध आध्यात्मिक मुक्ति के तत्त्व से भी जुड़ता है।


माँ पार्वती — कुमार की ज्ञानगुरु

भगवती पार्वती के स्वरूप का एक और महत्वपूर्ण पक्ष स्कन्दपुराण के प्रभासखण्ड में मिलता है।

यहाँ ग्रंथ के आरम्भ में उसकी ज्ञान-परम्परा का वर्णन किया गया है।

पुरा कैलासशिखरे ब्रह्मादीनां च सन्निधौ।
स्कान्दं पुराणं कथितं पार्वत्यग्रे पिनाकिना॥ २७॥

पार्वत्या षण्मुखस्याग्रे तेन नन्दिगणाय वै।
नन्दिना तु कुमाराय तेन व्यासाय धीमते॥ २८॥

स्रोत: स्कन्दपुराण, प्रभासखण्ड, प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य, अध्याय 1, श्लोक 27–28

अर्थ: प्राचीन काल में कैलास पर्वत पर भगवान शिव ने ब्रह्मा आदि देवताओं की उपस्थिति में भगवती पार्वती को स्कन्दपुराण सुनाया। इसके बाद माता पार्वती ने इसे अपने पुत्र षण्मुख को सुनाया। षण्मुख ने आगे नन्दीगण को और उनसे यह ज्ञान अन्य ऋषियों तक पहुँचा।

इस ज्ञान-परम्परा का क्रम विशेष महत्व रखता है।

भगवान शिव से भगवती पार्वती ने पुराणज्ञान प्राप्त किया।

इसके बाद उन्होंने स्वयं अपने पुत्र स्कन्द को वही ज्ञान प्रदान किया।

अर्थात् इस ग्रंथ की अपनी परम्परा में माता पार्वती केवल कुमार की जननी नहीं, बल्कि उनकी ज्ञानगुरु भी हैं।

वे भगवान शिव और स्कन्द के बीच ज्ञान की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं।

कैलास पर्वत पर माता पार्वती गुरु के रूप में छह मुखों वाले बालक स्कन्द को ज्ञान प्रदान कर रही हैं। सामने खुला ग्रंथ है और समीप मयूर विराजमान है।
माँ पार्वती — भगवान स्कन्द की ज्ञानगुरु। स्कन्दपुराण की ज्ञान-परम्परा के अनुसार, भगवान शिव से प्राप्त पुराणज्ञान भगवती पार्वती ने स्वयं अपने पुत्र षण्मुख को प्रदान किया।

दक्षिण भारतीय परम्परा में कुमार — स्वयं शिवज्ञान के उपदेशक

भगवान स्कन्द का ज्ञानस्वरूप दक्षिण भारतीय शैव परम्परा में और भी विशेष महत्व रखता है।

तमिलनाडु के प्रसिद्ध स्वामिमलै तीर्थ में भगवान मुरुगन को स्वामिनाथ के रूप में पूजा जाता है।

इस तीर्थ की परम्परा के अनुसार, भगवान कुमार ने स्वयं भगवान शिव को प्रणव अर्थात् ‘ॐ’ का रहस्य समझाया था।

इसी कारण वे स्वामिनाथ — अर्थात् स्वयं स्वामी के गुरु — के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

तमिल संत अरुणगिरिनाथर के प्रसिद्ध ग्रंथ कन्दर अनुभूति में भी भगवान मुरुगन का यह ज्ञानस्वरूप दिखाई देता है।

इसके 41वें पद्य में उन्हें शिवज्ञान उपदेशक कहा गया है।

स्रोत: कन्दर अनुभूति, पद्य 41।

अर्थात् वे शिवज्ञान का उपदेश देने वाले गुरु हैं।

एक ओर स्कन्दपुराण की ज्ञान-परम्परा में माता पार्वती अपने पुत्र को ज्ञान प्रदान करती हैं, तो दूसरी ओर दक्षिण भारतीय शैव उपासना में वही कुमार स्वयं ज्ञान के उपदेशक रूप में प्रतिष्ठित हैं।

दोनों प्रसंग अलग-अलग ग्रंथों और परम्पराओं के हैं, किन्तु भगवान स्कन्द के ज्ञानमय स्वरूप को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।


भगवान कुमार — केवल देवसेनापति नहीं, योगीश्वर भी

भगवान स्कन्द का प्राकट्य जिस उद्देश्य से हुआ था, अब उसके पूर्ण होने का समय आया।

देवताओं ने उन्हें अपनी सेना का सेनापति स्वीकार किया।

भगवान स्कन्द ने युद्धभूमि में तारकासुर का सामना किया और अपने दिव्य शक्ति-अस्त्र से उसका वध कर दिया।

स्रोत: शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, कुमारखण्ड, अध्याय 10

तारकासुर के वध से देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्ति मिली।

भगवान स्कन्द देवसेनापति के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

किन्तु स्कन्दपुराण में कुमार की महिमा केवल उनके युद्ध-कौशल और पराक्रम तक सीमित नहीं है।


महर्षि विश्वामित्र की स्तुति

स्कन्दपुराण के कौमारिकाखण्ड, अध्याय 29 में महर्षि विश्वामित्र द्वारा भगवान स्कन्द की विस्तृत स्तुति मिलती है।

इसमें कुमार को केवल वीर योद्धा अथवा देवताओं की सेना का अधिपति नहीं कहा गया है।

महर्षि उनकी स्तुति करते हुए कहते हैं—

अपारपारो दुर्ज्ञेयः सर्वभूतहिते रतः।
अग्राह्यः कारणं कर्ता परमेष्ठी परं पदम्॥ १४०॥

अचिन्त्यः सर्वभूतात्मा सर्वात्मा त्वं सनातनः।

स्रोत: स्कन्दपुराण, माहेश्वरखण्ड, कौमारिकाखण्ड, अध्याय 29, श्लोक 140 तथा श्लोक 141 का पूर्वार्ध।

अर्थ: आप असीम और सामान्य ज्ञान से परे हैं। आप समस्त प्राणियों के हित में संलग्न, जगत् के कारण, कर्ता और परमपद हैं। आप अचिन्त्य, समस्त प्राणियों की आत्मा, सर्वात्मा और सनातन हैं।

इन शब्दों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

परं पदम्, सर्वभूतात्मा, सर्वात्मा और सनातन।

ये केवल किसी महान् योद्धा की प्रशंसा करने वाले सामान्य विशेषण नहीं हैं।

इनमें भगवान कुमार को परम दिव्य तत्त्व के रूप में स्तुत किया गया है।


योगीश्वर के रूप में अभिषेक

स्कन्दपुराण के इसी अध्याय में आगे सनक आदि महान् योगियों द्वारा भगवान स्कन्द का अभिषेक करने का वर्णन है।

उन्होंने कुमार को समस्त योगियों के अधिपति के रूप में प्रतिष्ठित किया और योगीश्वर कहा।

स्रोत: स्कन्दपुराण, माहेश्वरखण्ड, कौमारिकाखण्ड, अध्याय 29, श्लोक 215–216

अर्थात् भगवान कुमार की महिमा केवल देवताओं का सेनापतित्व प्राप्त करने अथवा तारकासुर का वध करने तक सीमित नहीं है।

वे ज्ञान और योग के अधिष्ठाता तथा परम दिव्य सत्ता के रूप में भी पूजित हैं।

दक्षिण भारतीय कौमार उपासना में भगवान मुरुगन की यही व्यापक प्रतिष्ठा विशेष रूप से दिखाई देती है।

उनका पराक्रम उनकी महिमा का एक पक्ष है, सम्पूर्ण परिचय नहीं।


भगवान शिव का वचन — पुत्र से माता की ख्याति होगी

अब भगवान स्कन्द के इस व्यापक स्वरूप को समझने के बाद स्कन्दपुराण का एक महत्वपूर्ण प्रसंग स्मरण आता है।

भगवान कुमार के प्राकट्य से पहले भगवान शिव ने भगवती पार्वती से एक विशेष वचन कहा था।

पुत्रं दास्यामि येन त्वं ख्यातिमाप्स्यसि शोभने।
ततो रेम हि देव्या स नानाश्चर्यालयो हरः॥ ८१॥

स्रोत: स्कन्दपुराण, माहेश्वरखण्ड, कौमारिकाखण्ड, अध्याय 29, श्लोक 81

अर्थ: हे शोभने! मैं तुम्हें ऐसा पुत्र प्रदान करूँगा, जिसके कारण तुम्हारी ख्याति होगी। इसके बाद भगवान शिव ने भगवती के साथ विहार किया।

इस श्लोक के शब्द विशेष ध्यान देने योग्य हैं—

येन त्वं ख्यातिमाप्स्यसि — जिसके कारण तुम्हें ख्याति प्राप्त होगी।

महादेव ने यह वचन पुत्र के प्राकट्य से पहले दिया था।

अब भगवान कुमार के सम्पूर्ण स्वरूप को सामने रखकर इस वचन को समझें।

वही कुमार देवताओं के सेनापति बने।

उन्होंने तारकासुर का वध किया।

महर्षि विश्वामित्र ने उन्हें सर्वात्मा, परमपद और सनातन कहकर स्तुति की।

सनक आदि योगियों ने उन्हें योगीश्वर के रूप में प्रतिष्ठित किया।

दक्षिण भारतीय परम्परा में वे शिवज्ञान के उपदेशक स्वामिनाथ के रूप में पूजित हैं।

और उनकी माता हैं स्वयं भगवती पार्वती।

वही भगवती, जिन्होंने उन्हें परम ऐश्वर्य और चिरंजीवित्व प्रदान किया, जिन्हें स्कन्दपुराण में प्रकृतिमोक्ष देने वाली कहा गया और जो स्वयं अपने पुत्र को पुराणज्ञान प्रदान करने वाली गुरु के रूप में उपस्थित हैं।

इस दृष्टि से भगवान शिव के उस वचन में वर्णित माता की ख्याति को केवल एक विजयी सेनापति की माता होने से प्राप्त गौरव तक सीमित नहीं देखा जा सकता।

कुमार का स्वरूप ज्ञान, योग, पराक्रम और परम दिव्य महिमा से सम्पन्न है।


वीरमाता और वीरसू — भगवती के गौरवपूर्ण नाम

श्रीभवानीसहस्रनामस्तोत्रम् में भगवती के नामों का वर्णन करते हुए कहा गया है—

वीरभूर्वीरमाता च वीरसूर्वीरनन्दिनी॥ १३३॥

स्रोत: श्रीभवानीसहस्रनामस्तोत्रम्, श्लोक 133 का उत्तरार्ध।

इसमें भगवती के चार नाम विशेष ध्यान आकर्षित करते हैं—

वीरभूः — वीरों की उत्पत्ति का आधार।

वीरमाता — वीर की माता।

वीरसूः — वीर पुत्र की जननी।

वीरनन्दिनी — वीरत्व से सम्बन्धित आनन्दस्वरूपिणी।

भगवान स्कन्द के प्रसंग में विशेष रूप से वीरमाता और वीरसू नाम अत्यन्त सार्थक प्रतीत होते हैं।

कुमार देवताओं के महान् सेनापति और तारकासुर के संहारक तो हैं ही, शास्त्रों में उनका स्वरूप परम ज्ञान और योग की दिव्य महिमा से भी सम्पन्न है।

ऐसे कुमार की माता होने के कारण भगवती का स्कन्दमाता स्वरूप एक विशिष्ट गौरव से जुड़ता है।

यहाँ भगवान शिव का वह वचन पुनः स्मरण आता है—

पुत्रं दास्यामि येन त्वं ख्यातिमाप्स्यसि शोभने।

भगवती पार्वती को ऐसा पुत्र प्राप्त हुआ जिसकी महिमा युद्धभूमि के पराक्रम से आगे ज्ञान, योग और परम तत्त्व तक विस्तृत है।

इन शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर एक महत्वपूर्ण मीमांसा सामने आती है।

स्कन्दमाता नाम केवल पुत्र के नाम से माता का परिचय नहीं कराता, बल्कि उस परम तेजस्वी, ज्ञानस्वरूप और लोककल्याणकारी कुमार की माता होने का गौरव भी व्यक्त करता है।

यद्यपि उपलब्ध श्लोकों में स्कन्दमाता नाम के प्रचलन की कोई अलग नामकरण-घटना नहीं बताई गई है, किन्तु भगवान शिव का ख्याति सम्बन्धी वचन और स्कन्द की व्यापक दिव्य प्रतिष्ठा इस भाव को विशेष आधार प्रदान करते हैं।

और यह गौरव भगवती की अपनी महिमा से अलग भी नहीं है।

क्योंकि वे स्वयं वह परमशक्ति हैं, जिनके दिव्य अनुग्रह और ज्ञान से कुमार के जीवन के अनेक प्रसंग जुड़े हुए हैं।


शाक्त ग्रंथों में स्कन्दमाता की प्रतिष्ठा

भगवती के इस मातृस्वरूप का उल्लेख केवल भगवान स्कन्द से सम्बन्धित कथाओं में ही नहीं मिलता।

शाक्त उपासना के ग्रंथों में भी स्कन्दमाता का नाम प्रतिष्ठित है।

देवी अथर्वशीर्ष में स्कन्दमाता

श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् में भगवती के अनेक स्वरूपों का स्मरण करते हुए कहा गया है—

कालरात्रीं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम्।
सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम्॥ ११॥

स्रोत: श्रीदेव्यथर्वशीर्षम्, मन्त्र 11

अर्थ: हम कालरात्रि, ब्रह्मा द्वारा स्तुत, वैष्णवी, स्कन्दमाता, सरस्वती, अदिति और दक्षपुत्री के रूप में विद्यमान पवित्र, कल्याणमयी भगवती को नमस्कार करते हैं।

यहाँ स्कन्दमाता को भगवती के अन्य दिव्य स्वरूपों के साथ स्मरण किया गया है।


देवीभागवत में स्कन्दमाता — भगवती की 64 दिव्य कलाओं में एक

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के द्वादश स्कन्ध में भगवती के दिव्य धाम मणिद्वीप का वर्णन मिलता है।

इसके अध्याय 11 में पद्मराग मणियों से निर्मित एक विशाल प्राकार अर्थात् परकोटे का वर्णन है।

वहाँ भगवती की 64 दिव्य कलाएँ विराजमान हैं।

ग्रंथ कहता है—

मध्ये भुवि समासीनाश्चतुःषष्टिमिताः कलाः।
नानायुधधरा वीरा रत्नभूषणभूषिताः॥ ३॥

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, द्वादश स्कन्ध, अध्याय 11, श्लोक 3

अर्थ: उस स्थान के मध्य में 64 दिव्य कलाएँ विराजमान हैं। वे वीर, अनेक प्रकार के आयुध धारण करने वाली तथा रत्नाभूषणों से सुशोभित हैं।

इसके बाद उन कलाओं के नाम बताए गए हैं—

त्रिलोकधात्री सावित्री गायत्री त्रिदशेश्वरी।
सुरूपा बहुरूपा च स्कन्दमाताच्युतप्रिया॥ ७॥

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, द्वादश स्कन्ध, अध्याय 11, श्लोक 7

अर्थ: त्रिलोकधात्री, सावित्री, गायत्री, त्रिदशेश्वरी, सुरूपा, बहुरूपा, स्कन्दमाता और अच्युतप्रिया आदि भगवती की दिव्य कलाओं के नाम हैं।

यहाँ स्कन्दमाताच्युतप्रिया में स्कन्दमाता और अच्युतप्रिया दो नाम सन्धि के कारण संयुक्त हुए हैं।

इन 64 कलाओं का वर्णन अत्यन्त शक्तिशाली, आयुधधारिणी देवियों के रूप में हुआ है।

इस अध्याय में स्कन्दमाता की किसी स्वतंत्र युद्ध-लीला अथवा नवदुर्गा के पाँचवें स्वरूप के विशिष्ट प्रतिमा-लक्षणों का वर्णन नहीं मिलता।

किन्तु भगवती की दिव्य कलाओं में स्कन्दमाता नाम का उल्लेख उनके शाक्त स्वरूप की प्रतिष्ठा का महत्वपूर्ण प्रमाण है।


माँ स्कन्दमाता का दिव्य स्वरूप

नवदुर्गा की प्रचलित ध्यान और प्रतिमा-परम्परा में माँ स्कन्दमाता का स्वरूप अत्यन्त सौम्य, तेजस्वी और मातृवात्सल्य से परिपूर्ण है।

भगवती चार भुजाओं से सुशोभित हैं।

उनकी गोद में बालक स्कन्द विराजमान हैं।

दो हाथों में वे कमल-पुष्प धारण करती हैं। एक भुजा से बालक स्कन्द को संभालती हैं तथा एक हाथ अभय मुद्रा में रहता है।

उनका वाहन सिंह माना जाता है।

कुछ प्रतिमाओं में वे कमल के आसन पर भी विराजमान दिखाई देती हैं। इसी कारण उन्हें पद्मासना भी कहा जाता है।

माँ स्कन्दमाता की प्रचलित प्रार्थना है—

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

अर्थ: सिंहासन पर विराजमान, दोनों हाथों में कमल धारण करने वाली यशस्विनी भगवती स्कन्दमाता सदैव हमारा कल्याण करें।

यह नवदुर्गा की प्रचलित ध्यान-प्रार्थना है।

माता की गोद में बालक स्कन्द का स्वरूप उनके मातृत्व का दर्शन कराता है।

लेकिन अब उस बालक की पहचान भी हमारे सामने है।

वे वही भगवान स्कन्द हैं, जिन्होंने देवताओं की रक्षा की, जिनकी योगीश्वर और परमपद के रूप में स्तुति हुई और जो दक्षिण भारतीय परम्परा में स्वयं शिवज्ञान के उपदेशक माने जाते हैं।

ऐसे दिव्य कुमार को अपनी गोद में धारण किए भगवती का यह स्वरूप मातृवात्सल्य के साथ उनकी महान् आध्यात्मिक प्रतिष्ठा का भी परिचय देता है।

पीली साड़ी में चतुर्भुजी माँ स्कंदमाता सिंह पर विराजमान हैं, गोद में छह मुख वाले बालक षण्मुख स्कंद जी हैं, दोनों हाथों में कमल के फूल लिए हुए
माँ स्कंदमाता का वात्सल्य रूप — गोद में छह मुख वाले षण्मुख कार्तिकेय जी, हाथों में कमल और अभय मुद्रा, वाहन सिंह के साथ। जय माँ स्कंदमाता!

जगज्जननी का पाँचवाँ दर्शन

माँ स्कन्दमाता के इस दर्शन में हमने भगवती पार्वती के मातृत्व के अनेक पक्ष देखे।

शिवपुराण में उनके मातृवात्सल्य और पुत्र से मिलन का वर्णन है।

तमिल कन्दपुराणम् में उनके आलिंगन से छह बालरूपों का एक दिव्य षण्मुख स्वरूप में संयुक्त होना मिलता है।

भगवती अपने पुत्र को परम ऐश्वर्य और चिरंजीवित्व प्रदान करती हैं।

स्कन्दपुराण में वे प्रकृतिमोक्ष का अनुग्रह प्रदान करती हैं और ज्ञान की परम्परा में स्वयं अपने पुत्र की गुरु के रूप में उपस्थित हैं।

भगवान कुमार की असाधारण महिमा को समझने के बाद भगवान शिव का वह वचन भी विशेष अर्थ ग्रहण करता है, जिसमें उन्होंने माता पार्वती से कहा था कि तुम्हें अपने पुत्र के कारण ख्याति प्राप्त होगी।

किन्तु यह मातृत्व केवल भगवान स्कन्द तक सीमित नहीं है।

श्रीदुर्गासप्तशती में देवताओं ने भगवती की स्तुति करते हुए कहा है—

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

स्रोत: श्रीदुर्गासप्तशती, अध्याय 5

अर्थ: जो भगवती समस्त प्राणियों में माता के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बारम्बार नमस्कार है।

यही जगज्जननी भगवती का व्यापक मातृस्वरूप है।

कालिका पुराण में कहा गया है—

तासामेवाङ्गरूपाणि वक्तव्यानि मया तव।
एकैव तु महामाया कार्यार्थं भिन्नतां गता॥ ५१॥

स्रोत: कालिका पुराण, अध्याय 58, श्लोक 51

अर्थ: महामाया एक ही हैं, जो विभिन्न कार्यों के लिए भिन्न-भिन्न स्वरूपों में प्रकट होती हैं।

नवदुर्गा के पाँचवें दर्शन में हम उन्हीं एकमात्र महामाया का माँ स्कन्दमाता के रूप में दर्शन करते हैं।

वे केवल एक महान् पुत्र की माता नहीं, बल्कि स्वयं वह जगज्जननी परमशक्ति हैं, जिनके मातृत्व में वात्सल्य, ज्ञान, अनुग्रह और दिव्य सामर्थ्य एक साथ प्रतिष्ठित हैं।

माँ स्कन्दमाता के श्रीचरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।


नवरात्रि विशेष — अगला दर्शन: माँ कात्यायनी।

4 thoughts on “नवरात्रि विशेष – 5”

  1. Veena K Patil

    It is an honour and a devine feeling to read such a great and detailed article on Ma Skandmata. I haven’t read such a detailed write-up before. Author’s efforts are worth appreciation.

    1. Thank you so much for your heartfelt words and appreciation. It truly means a lot to me. My humble effort is to explore our sacred scriptures and bring their profound wisdom to readers in a simple and meaningful way. Knowing that the article touched you makes all the research and effort worthwhile.

      Your encouragement inspires me to continue this journey.

      May Maa Skandamata bless us all with her divine grace. 🙏

  2. बहुत ही उत्तम लेख है । लेखक महोदय, आप बहुत ही दिव्य कार्य कर रहें है पौराणिक ग्रंथों का ज्ञान हम तक पहुंचा कर । बहुत बहुत धन्यावाद।

    1. आपके इतने आत्मीय शब्दों और स्नेहपूर्ण प्रोत्साहन के लिए हृदय से आभार। यह सब माँ भगवती की कृपा है। मेरा प्रयास बस इतना है कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में समाहित अमूल्य ज्ञान अधिक से अधिक पाठकों तक सरल और प्रामाणिक रूप में पहुँच सके। आप जैसे सुधी पाठकों का स्नेह ही इस प्रयास को सार्थक बनाता है।

      माँ भगवती की कृपा हम सभी पर बनी रहे।

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