श्री गणेश दर्शन

श्री गणेश दर्शन: भाग 1 — प्राकट्य मीमांसा

 

लेख एवं शोध : कुलदीप कुमार ठुसू – “पम्पोष” 

प्रस्तावना

ईश्वर वह परम सत्य हैं, जिसे जानने और समझने की खोज सनातन परम्परा के मूल में रही है।

सत्य को जानना मनुष्य का कर्तव्य भी है और उसकी स्वाभाविक जिज्ञासा भी।

लेकिन परम सत्य अनन्त है—उसे पूरी तरह समझ लेना शायद मनुष्य की सीमित बुद्धि के लिए संभव न हो।

फिर भी कठिन होने के कारण सत्य की खोज छोड़ी तो नहीं जाती।

जितना हम उसे जानने का प्रयास करते हैं, उतना ही अपने अस्तित्व, इस सृष्टि और उस ईश्वरीय सत्ता को समझने की दिशा में और आगे बढ़ते हैं।

यह एक निरंतर यात्रा है।

इस यात्रा का लक्ष्य उस परम सत्य को समझना है, जो इस समूची सृष्टि का आधार है। लेकिन उस सत्य को जानने का कोई एक निश्चित मार्ग नहीं है।

ऋग्वेद कहता है—

“एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति”
सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से कहते हैं।

उस परम सत्य को जानने के मार्ग और दृष्टियाँ अनेक हैं।

कभी-कभी वे एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न, यहाँ तक कि विरोधी भी दिखाई देती हैं; लेकिन उनकी खोज अंततः उसी एक परम सत्य की है।

सनातन परम्परा में विभिन्न देवी-देवताओं के स्वरूप भी उसी परम सत्य को जानने और समझने के अलग-अलग मार्ग खोलते हैं।

शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश—हर दैवी स्वरूप उस अनन्त ईश्वरीय सत्ता को एक अलग दृष्टि से देखने और समझने का अवसर देता है।

इन्हीं दैवी स्वरूपों में प्रथम पूज्य भगवान गणेश को थोड़ा और जानने और समझने का एक विनम्र प्रयास है — ‘श्री गणेश दर्शन’।

यह भगवान गणेश को पूरी तरह जान लेने का दावा नहीं, बल्कि शास्त्रों के सहारे उनसे जुड़े उन प्रसंगों, रहस्यों और अर्थों को जानने-समझने का प्रयास है, जो अक्सर हमारी दृष्टि से छूट जाते हैं।

‘श्री गणेश दर्शन’ की इस बहुभागीय यात्रा का पहला पड़ाव है— प्राकट्य मीमांसा


 

श्री गणेश दर्शन — प्राकट्य मीमांसा

भगवान गणेश जी का नाम सुनते ही, या उनके बारे में सोचते ही, एक अत्यंत मनमोहक किन्तु विलक्षण छवि उभर आती है—

गजमुख, बड़े-बड़े कान, छोटी-छोटी आँखें, लंबी-सी सूँड़, एक पूरा और एक टूटा दाँत, बड़ा-सा उदर, विशाल काया—किन्तु वाहन, एक छोटा-सा मूषक।

गणेश जी का यह आकर्षक स्वरूप सहज ही विस्मित करता है।

फिर भी गणेश जी सनातन परम्परा के सबसे लोकप्रिय और सर्वाधिक पूजित देवताओं में से एक हैं। किसी भी शुभ कार्य का आरम्भ उनके स्मरण के बिना नहीं होता।

उन्हें प्रथम पूज्य, विघ्नहर्ता और बुद्धि-विवेक के देवता के रूप में जाना जाता है।

गणेश जी का स्वरूप जितना विलक्षण है, उनके प्राकट्य से जुड़े प्रसंग भी उतने ही विलक्षण हैं।

ऐसा शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसने गणेश जी का यह प्रसंग न सुना हो—

माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक का निर्माण किया।

उसे अपने द्वार पर पहरा देने के लिए नियुक्त किया। भगवान शिव वहाँ पहुँचे, लेकिन बालक ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया।

बात बढ़ी, संघर्ष हुआ और अंततः भगवान शिव ने उसका मस्तक काट दिया।

बाद में हाथी का मस्तक लगाकर उसे पुनर्जीवित किया गया और वही बालक आगे चलकर भगवान गणेश कहलाया।

पढ़ने-सुनने में यह प्रसंग जितना सरल लगता है, उतना है नहीं।

यह अपने भीतर कई गंभीर प्रश्न छिपाए हुए है। जैसे –

  • क्या माता पार्वती ने वास्तव में केवल एक द्वारपाल बनाने के लिए गणेश जी की रचना की थी?

  • यदि उन्हें केवल पहरेदार चाहिए था, तो नंदी और शिवगण पहले से उपस्थित थे। फिर एक नए द्वारपाल की आवश्यकता क्यों पड़ी?

  • क्या माता पार्वती केवल एक सेवक चाहती थीं, या वे पुत्र की कामना कर रही थीं?

  • यदि पुत्र चाहिए था, तो उसे द्वारपाल क्यों बनाया?

  • वह बालक इतना शक्तिशाली कैसे था कि शिवगण ही नहीं, देवताओं तक के लिए उसका सामना करना कठिन हो गया?

  • उस बालक ने भगवान शिव को क्यों नहीं पहचाना?

 

और इससे भी बड़ा प्रश्न—

 

  • क्या भगवान शिव भी उस बालक को नहीं पहचान पाए थे?

  • क्या भगवान शिव ने सचमुच गणेश जी का मस्तक काटा था?

  • यदि उनका मस्तक काटा गया था, तो उनका अपना मस्तक वापस क्यों नहीं लगाया गया?

  • हाथी का मस्तक ही क्यों?

  • और गणेश जी के उस मूल मस्तक का आखिर हुआ क्या? वह कहाँ गया?

  • गजमुख, बड़ा सा उदर और विशाल काया।  क्या ये रूप किसी “शाप” का परिणाम है? 

  • गणेश जी तो विघ्नों को हरने  वाले विघनहर्ता हैं। तो क्या वे विघ्नों को उत्पन्न करने वाले “विघ्नकर्ता” भी हैं ?  
  • क्या गणेश जी का भगवान कृष्ण के साथ कोई संबंध है?

  • और क्या कृष्ण ही गणेश हैं?

इन सभी प्रश्नों के उत्तर किसी एक पुराण या किसी एक धर्मग्रंथ में नहीं मिलते।

इसके लिए हमें अलग-अलग शास्त्रीय परम्पराओं में वर्णित गणेश-प्राकट्य के प्रसंगों को साथ रखकर देखना होगा।

और ऐसा करते ही एक अत्यंत रोचक तथ्य सामने आता है, कि  – 

गणेश प्राकट्य की कोई एक कथा नहीं — बल्कि अनेक शास्त्रीय परम्पराएँ हैं

ऐसा नहीं है कि समय बीतने के साथ गणेश जी के प्राकट्य की अलग-अलग कथाएँ बनती चली गईं।

अपितु उनके प्राकट्य के भिन्न-भिन्न वर्णन स्वयं प्राचीन धर्मग्रंथों में मिलते हैं।

इतना ही नहीं, शिव पुराण स्वयं इस बात को स्वीकार करता है कि गणेश जी के प्राकट्य का वर्णन अलग-अलग कल्पों में अलग-अलग प्रकार से मिलता है।

रुद्रसंहिता के कुमारखण्ड में ब्रह्मा जी नारद को गणेश-प्राकट्य के कल्पभेद की बात बताते हैं और फिर श्वेतकल्प के उस प्रसंग का वर्णन करते हैं जिसमें माता पार्वती द्वारा निर्मित बालक और भगवान शिव के बीच संघर्ष होता है।

इसलिए गणेश जी के प्राकट्य की अलग-अलग कथाएँ होना कोई बाद में पैदा हुई उलझन भर नहीं है।

शास्त्रीय परम्परा के भीतर ही उनके प्राकट्य के एक से अधिक वर्णन मिलते हैं।

इसका अर्थ यह भी नहीं कि हमें किसी एक कथा को सही और दूसरी को गलत सिद्ध करना है।

हमारी पड़ताल इस बात की है कि अलग-अलग शास्त्रीय परम्पराएँ वास्तव में कहती क्या हैं?

आइए, एक-एक करके इन्हें देखते हैं।


1. शिव पुराण

  • पार्वती द्वारा अपने पुत्र की रचना। 
  • माता की आज्ञा पर द्वार की रक्षा। 
  • शिवगणों और देवताओं से संघर्ष। 
  • भगवान शिव द्वारा मस्तक-विच्छेदन। 
  • गज-मस्तक से पुनर्जीवन और गणाधिपति के रूप में प्रतिष्ठा।

 

{स्रोत: शिव पुराण, रुद्रसंहिता, कुमारखण्ड, गणेश-प्राकट्य प्रसंग।}

यह गणेश-प्राकट्य का सबसे प्रसिद्ध वर्णन है।

लेकिन पूरी कथा पढ़ने पर पता चलता है कि गणेश जी की रचना केवल द्वार पर पहरा देने के लिए नहीं हुई थी। इसके पीछे एक प्रसंग पहले से ही चल रहा था।

माता पार्वती की सखियाँ जया और विजया उनसे कहती हैं कि भगवान शिव के पास नंदी, भृंगी और असंख्य गण हैं।

वे पार्वती का सम्मान अवश्य करते हैं, लेकिन अंततः वे शिव के गण हैं और उन्हीं की आज्ञा को सर्वोपरि मानते हैं।

पार्वती का अपना ऐसा कौन है, जो केवल उनकी आज्ञा का पालन करे?

यह बात पार्वती मन में बैठ जाती है।

कुछ समय बाद एक घटना उन्हें अपनी सखियों की कही बात फिर याद दिलाती है।

माता पार्वती स्नान कर रही होती हैं। भगवान शिव भीतर प्रवेश करते हैं और द्वार पर उपस्थित शिवगण उन्हें रोक नहीं पाते। स्पष्ट सी बात है कि शिवगणों में शिव को रोकने का साहस नहीं है। 

पार्वती को यह अनुभव और स्पष्ट हो जाता है कि शिव के गण, पार्वती का सम्मान तो करते हैं, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर उनकी आज्ञा को शिव की आज्ञा से ऊपर नहीं रख सकते।

तब वे अपना एक ऐसा गण बनाने का निश्चय करती हैं जो उनका अपना हो और उनकी आज्ञा का पालन करे।

वे अपने शरीर के उबटन से एक सुंदर, तेजस्वी और अत्यंत बलशाली बालक की रचना करती हैं।

उसे वस्त्र और आभूषण देती हैं।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है—

पार्वती उस बालक को केवल अपना सेवक नहीं बनातीं।

वे उसे अपना पुत्र स्वीकार करती हैं।

बालक भी उन्हें माता के रूप में स्वीकार करता है और पूछता है कि उसके लिए क्या आज्ञा है।

तब माता पार्वती उसके हाथ में एक दण्ड देती हैं और उसे द्वार पर नियुक्त करती हैं।

आदेश स्पष्ट है—

उनकी अनुमति के बिना किसी को भीतर प्रवेश नहीं करने देना है।

कुछ समय बाद भगवान शिव वहाँ आते हैं।

बालक उन्हें रोक देता है।

शिव के लिए वह एक अपरिचित बालक है, जो उनके ही निवास के द्वार पर खड़ा होकर उनका रास्ता रोक रहा है।

और बालक के लिए शिव ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें उसकी माता ने भीतर आने की अनुमति नहीं दी है।

बालक अपनी माता की आज्ञा से पीछे नहीं हटता।

शिवगण उसे समझाने का प्रयास करते हैं। वह नहीं मानता।

बात संघर्ष तक पहुँचती है।

लेकिन जिसे वे एक साधारण बालक समझ रहे थे, वह असाधारण शक्ति का परिचय देता है।

वह शिवगणों का सामना करता है और उन्हें परास्त करता है। संघर्ष बढ़ने पर देवताओं को भी हस्तक्षेप करना पड़ता है। भगवान विष्णु भी युद्ध में आते हैं।

फिर भी बालक द्वार छोड़ने को तैयार नहीं होता।

अंततः स्वयं भगवान शिव युद्ध में उतरते हैं।

संघर्ष के दौरान शिव अपने त्रिशूल से बालक का मस्तक काट देते हैं।

जब माता पार्वती को अपने पुत्र की मृत्यु का पता चलता है, वे अत्यंत क्रोधित होती हैं। उनके क्रोध से प्रकट शक्तियाँ ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देती हैं कि देवताओं को सृष्टि के विनाश का भय होने लगता है।

तब सभी देवगण पार्वती को शांत करने का प्रयास करते हैं। 

पार्वती अपनी शर्त रखती हैं—

उनके पुत्र को पुनर्जीवित किया जाए और उसे देवताओं के बीच सर्वोच्च सम्मान दिया जाए।

इसके बाद भगवान शिव अपने गणों को आदेश देते हैं कि वे उत्तर दिशा की ओर जाएँ और जो पहला जीव मिले, उसका मस्तक लेकर आएँ।

गण उत्तर दिशा की ओर जाते हैं और उन्हें एक हाथी मिलता है।

उसका मस्तक लेकर वे वापस आते हैं।

गज-मस्तक बालक के शरीर से जोड़ा जाता है और देवताओं के सहयोग तथा शिव की कृपा से बालक पुनः जीवित होता है।

अब वह गजानन है।

माता पार्वती अपने पुत्र को पुनः प्राप्त करती हैं और भगवान शिव भी उसे अपना पुत्र स्वीकार करते हैं।

इसके बाद गणेश को गणों का अधिपति—गणपति—घोषित किया जाता है और उन्हें देवपूजा तथा शुभ कार्यों में प्रथम पूजा का अधिकार प्राप्त होता है।

इस प्रकार वही बालक, जिसे कुछ समय पहले शिवगण एक अपरिचित द्वारपाल समझ रहे थे, अंततः गणाधिपति और प्रथम पूज्य के रूप में प्रतिष्ठित होता है।

बाल गणेश दण्ड से शिवगणों और देवताओं से युद्ध करते हुए, पीछे भगवान शिव और विष्णु — शिव पुराण गणेश प्राकट्य प्रसंग
शिव पुराण: माता पार्वती की आज्ञा का पालन करते हुए बाल गणेश ने शिवगणों और देवताओं का सामना किया।

 

यहाँ ध्यान देने वाली बात – 

इस कथा में पार्वती बालक को द्वार पर भेजने से पहले ही अपना पुत्र स्वीकार कर चुकी हैं।

इसलिए द्वारपाल होना उसकी मूल पहचान नहीं है—यह उसकी माता द्वारा दिया गया दायित्व है।

और इसी संदर्भ में उसके हाथ में दिया गया दण्ड भी ध्यान देने योग्य है।

कथा में माता केवल उसे द्वार पर खड़ा नहीं करतीं; उसे दण्ड देकर अपनी आज्ञा की रक्षा करने का दायित्व और अधिकार दोनों देती हैं।

इसलिए इस प्रसंग के स्तर पर दण्ड को कर्तव्य और उस कर्तव्य को निभाने के अधिकार के चिह्न के रूप में भी देखा जा सकता है।

यही बात आगे होने वाले संघर्ष को भी अलग अर्थ देती है।

वह बालक भगवान शिव को चुनौती देने के उद्देश्य से द्वार पर नहीं खड़ा है।

वह उस दायित्व से पीछे हटने को तैयार नहीं है, जो उसकी माता ने उसे सौंपा है।

एक प्रश्न फिर भी बचता है—उत्तर दिशा ही क्यों?

शिव पुराण इस स्थान पर इसका कोई स्पष्ट कारण नहीं बताता। लेकिन इसी प्रश्न का एक रोचक उत्तर हमें एक दूसरी शास्त्रीय परम्परा में मिलता है।


2. बृहद्धर्म पुराण

  • पार्वती की पुत्र-कामना।
  • शिव द्वारा दिया गया वस्त्र और उसका बालक बन जाना।
  • बालक का मस्तक स्वयं अलग होना।
  • उसी मस्तक को पुनः लगाने का प्रयास।
  • उत्तरमुखी जीव की आवश्यकता।
  • ऐरावत का मस्तक और गजानन रूप में पुनर्जीवन।

 

{स्रोत: बृहद्धर्म पुराण, अध्याय 54}

 

बृहद्धर्म पुराण की कथा बिल्कुल अलग स्थान से शुरू होती है।

यहाँ किसी द्वारपाल की आवश्यकता नहीं है।

माता पार्वती भगवान शिव से स्पष्ट रूप से कहती हैं कि वे माता बनना चाहती हैं।

वे ऐसा पुत्र चाहती हैं जिसे गोद में उठा सकें, स्नेह कर सकें और मातृत्व का अनुभव कर सकें।

भगवान शिव प्रारम्भ में पार्वती की इस इच्छा से सहमत नहीं होते। वे कहते हैं कि वे एक योगी हैं और उनके लिए संतान की आवश्यकता नहीं है।

लेकिन माता पार्वती की पुत्र पाने की इच्छा बनी रहती है। 

फिर शिव, पार्वती के वस्त्र का एक भाग लेकर उनकी गोद में रख देते हैं और उसे उनका पुत्र कह देते हैं।

पार्वती समझती हैं कि शिव उनसे परिहास कर रहे हैं।

फिर भी वे उस वस्त्र को पुत्र की तरह गोद में लेकर स्नेह करने लगती हैं।

तभी वह वस्त्र उनकी गोद से गिरता है और एक जीवित बालक में परिवर्तित हो जाता है।

बालक रोने लगता है।

पार्वती उसे उठा लेती हैं, स्तनपान कराती हैं और मातृस्नेह से अपने पास रखती हैं।

इसके बाद वे शिव से कहती हैं कि वे भी अपने पुत्र को गोद में लें।

भगवान शिव बालक को अपनी गोद में लेते हैं और उसे ध्यान से देखते हैं।

वे बालक पर अशुभ ग्रह-प्रभाव देखते हैं और उसकी अल्पायु की बात कहते हैं।

उस समय बालक का मुख उत्तर दिशा की ओर होता है।

तभी उसका मस्तक अपने-आप शरीर से अलग होकर गिर जाता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर है—

भगवान शिव बालक का मस्तक नहीं काटते।

शिव गिरे हुए मस्तक को उठाते हैं और उसी सिर को वापस बालक के शरीर से जोड़ने का प्रयास करते हैं।

लेकिन वह जुड़ नहीं पाता।

तभी आकाशवाणी होती है।

बताया जाता है कि बालक का मूल मस्तक अशुभ प्रभाव से प्रभावित हो चुका है, इसलिए उसे पुनः शरीर से नहीं जोड़ा जा सकता। उसके स्थान पर दूसरा मस्तक लगाना होगा।

और चूँकि बालक का मस्तक अलग होते समय उसका मुख उत्तर दिशा की ओर था, इसलिए उत्तर की ओर सिर किए हुए किसी जीव का मस्तक लाया जाए।

अब भगवान शिव अपने प्रमुख गण नंदी को ऐसा मस्तक लाने के लिए भेजते हैं।

नंदी खोज करते हुए अंततः अमरावती—इन्द्रलोक पहुँचते हैं।

वहाँ इन्द्र का दिव्य हाथी ऐरावत उत्तर दिशा की ओर सिर करके विश्राम कर रहा होता है।

नंदी ऐरावत का मस्तक लेने आगे बढ़ते हैं।

इन्द्र इसका विरोध करते हैं।

नंदी उन्हें बताते हैं कि वे भगवान शिव की आज्ञा से आए हैं और पार्वती के पुत्र को पुनर्जीवित करने के लिए उत्तरमुखी जीव का मस्तक आवश्यक है।

लेकिन इन्द्र ऐरावत का मस्तक देने को तैयार नहीं होते।

परिणामस्वरूप संघर्ष होता है।

इन्द्र अपने वज्र के साथ ऐरावत पर सवार होकर नंदी से युद्ध करते हैं और अन्य देवता भी उनकी सहायता करते हैं।

परन्तु वे सब नंदी के सामने असहाय दिखते हैं।  अंततः नंदी ऐरावत का मस्तक काट लेते हैं और उसे लेकर कैलाश लौटते आते  हैं।

भगवान शिव नंदी से प्रसन्न होते हैं और स्वयं ऐरावत का मस्तक बालक के शरीर से जोड़ते हैं।

मस्तक जुड़ते ही बालक पुनः जीवित हो उठता है।

अब वह चार भुजाओं वाला गजानन है।

देवता उसके दर्शन के लिए आते हैं और उसे गणों का अधिपति बनाया जाता है। ब्रह्मा उसे लम्बोदर नाम देते हैं और उसे देवताओं में सबसे पहले पूजे जाने का सम्मान प्राप्त होता है।

विभिन्न देवता उसे उपहार भी देते हैं—सरस्वती लेखनी, ब्रह्मा जपमाला, बृहस्पति यज्ञोपवीत और पृथ्वी मूषक वाहन प्रदान करती हैं।

लेकिन यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न बचता है—

ऐरावत का क्या हुआ?

बृहद्धर्म पुराण इसका उत्तर भी देता है।

इन्द्र भगवान शिव से अपने हाथी के विषय में बात करते हैं और नंदी से युद्ध करने के लिए क्षमा माँगते हैं।

तब शिव उन्हें निर्देश देते हैं कि ऐरावत के शरीर को उस समुद्र में डाल दें जहाँ से उसकी उत्पत्ति हुई थी।

ऐसा करने पर ऐरावत अपना मस्तक और जीवन पुनः प्राप्त कर लेता है।

भगवान शिव बाल गणेश के शरीर पर हाथी का मस्तक स्थापित करते हुए, पास में माता पार्वती और शिवगण — गणेश प्राकट्य प्रसंग
बालक को पुनर्जीवन देने के लिए भगवान शिव द्वारा उसके शरीर पर गज-मस्तक स्थापित करने का प्रसंग।

 

यहाँ ध्यान देने वाली बात –

यह कथा हमारी परिचित कथा के कई प्रश्नों का बिल्कुल अलग उत्तर देती है।

गणेश जी का प्राकट्य यहाँ द्वारपाल बनाने के लिए नहीं, बल्कि पार्वती की स्पष्ट पुत्र-कामना की पूर्ति के रूप में होता है।

उनका मस्तक भगवान शिव नहीं काटते।

और सबसे महत्वपूर्ण—

उनका अपना मस्तक वापस लगाने का प्रयास किया जाता है।

वह क्यों नहीं लगाया जा सका, कथा इसका कारण भी बताती है।

यहीं उत्तरमुखी जीव की आवश्यकता का कारण भी सामने आता है—बालक स्वयं उत्तरमुखी था जब उसका मस्तक अलग हुआ।

और जिस ऐरावत का मस्तक गणेश जी को दिया गया, कथा उसे भी स्थायी रूप से मृत नहीं छोड़ती।


3. ब्रह्मवैवर्त पुराण

  • पार्वती द्वारा श्रीकृष्ण की आराधना।
  • श्रीकृष्ण का गणेशरूप में पुत्र बनकर प्रकट होना।
  • शनि की दृष्टि से बालक का मस्तक अलग होना।
  • मूल मस्तक का गोलोक जाकर श्रीकृष्ण में विलीन होना।
  • विष्णु द्वारा गज-मस्तक लाना और गजानन स्वरूप।

{स्रोत: ब्रह्मवैवर्त पुराण, गणपति खण्ड।}

 

अब तक हमने दो अलग-अलग कथाएँ देखीं।

लेकिन ब्रह्मवैवर्त पुराण का वर्णन गणेश-प्राकट्य के प्रश्न को एक बिल्कुल दूसरी दिशा में ले जाता है।

यहाँ भी माता पार्वती की पुत्र-कामना है।

लेकिन पुत्र-प्राप्ति के लिए उनकी आराधना श्रीकृष्ण से जुड़ती है।

पार्वती पुत्र-प्राप्ति के लिए पुण्यक व्रत करती हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के गणपति खण्ड में इस व्रत का विस्तार से विधान मिलता है। 

व्रत के प्रसंग में पार्वती श्रीकृष्ण का स्तवन करती हैं और श्रीकृष्ण उन्हें अपना दुर्लभ दिव्य स्वरूप दिखाते हैं।

ग्रंथ स्पष्ट रूप से कहता है कि पार्वती का मन कृष्ण में लगा हुआ था। 

इसके बाद एक अत्यंत वृद्ध ब्राह्मण अतिथि के रूप में आता है।

वह पार्वती से संवाद करता है और अंततः एक ऐसी बात कहता है जो गणेश और श्रीकृष्ण के संबंध को बिल्कुल नई रोशनी में रख देती है। वे कहते हैं –

गणेशरूपः श्रीकृष्णः कल्पे कल्पे तवात्मजः ।
त्वत्क्रोडमागतः क्षिप्रमित्युक्त्वाऽन्तरधीयत ॥

भावार्थ—

“श्रीकृष्ण गणेशरूप में कल्प-कल्प में तुम्हारे पुत्र होते हैं। वे शीघ्र ही तुम्हारी गोद में आएँगे।” 

इतना कहकर वह वृद्ध ब्राह्मण अंतर्धान हो गया।

{गणपति खण्ड, अध्याय 8, श्लोक 82}

लेकिन इसके ठीक अगले श्लोक में जो लिखा है, वह इस कथन को और महत्वपूर्ण बना देता है—

कृत्वाऽन्तर्धानमीशश्च बालरूपं विधाय सः ।
जगाम पार्वतीतल्पं मन्दिराभ्यन्तरस्थितम् ॥

भावार्थ—

“वह ईश्वर अंतर्धान होकर बालरूप धारण करता है और भवन के भीतर पार्वती के शय्या-स्थान पर पहुँचता है।”

अर्थात् यहाँ केवल भविष्यवाणी करके कोई ब्राह्मण चला नहीं जाता।

वह यह कहकर अंतर्धान होता है कि श्रीकृष्ण गणेशरूप में पार्वती के पुत्र होंगे, उसी प्रसंग की अगली पंक्ति में ईश्वरीय सत्ता बालरूप धारण करती है।

और यहीं लेख के आरंभ में पूछा गया हमारा वह असामान्य प्रश्न पहली बार अर्थ लेने लगता है—

क्या भगवान कृष्ण और गणेश जी के बीच भी कोई संबंध है?

और—

क्या कृष्ण ही गणेश हैं?

यहाँ ब्रह्मवैवर्त पुराण में श्रीकृष्ण और गणेश जी के बीच अत्यंत गहरा और सीधा दैवी संबंध स्थापित किया गया है।

और आगे होने वाली घटना इसे और गहरा करती है।

बालक के प्राकट्य के बाद देवता उसके दर्शन के लिए आते हैं।

शनि भी वहाँ आते हैं।

लेकिन वे बालक की ओर देखने से बचते हैं।

माता पार्वती उनसे कारण पूछती हैं।

शनि बताते हैं कि उन्हें प्राप्त शाप के कारण उनकी दृष्टि अनिष्टकारी सिद्ध हो सकती है। इसलिए वे बालक की ओर सीधे देखने से बच रहे हैं।

माता पार्वती उनसे अपने पुत्र को देखने का आग्रह करती हैं। क्योंकि पार्वती को विश्वास होता है की उनके पुत्र को कुछ नहीं होगा। 

अंततः शनि बालक की ओर दृष्टि डालते हैं।

और उसी क्षण—

बालक का मस्तक शरीर से अलग हो जाता है।

यहाँ न शिव-गणेश युद्ध है।

न द्वारपाल का प्रसंग।

और न भगवान शिव बालक का मस्तक काटते हैं।

इसके बाद भगवान विष्णु बालक को पुनर्जीवित करने के लिए आगे आते हैं।

वे गरुड़ पर आरूढ़ होकर जाते हैं, गज-मस्तक लेकर लौटते हैं और उसे बालक के शरीर से जोड़ा जाता है।

बालक पुनः जीवित होता है और गजानन स्वरूप प्राप्त करता है।

 

लेकिन अब एक ऐसा प्रश्न, जिसका उत्तर सामान्यतः सुनाई जाने वाली गणेश-कथा में नहीं मिलता —

गणेश जी के मूल मस्तक का क्या हुआ?

ब्रह्मवैवर्त पुराण इसे अनुत्तरित नहीं छोड़ता।

बालक का मूल मस्तक, ऊपर की ओर उठता है और गोलोक की तरफ प्रस्थान करता है और भगवान श्रीकृष्ण में विलीन हो जाता है।

अब इस घटना को कथा के आरम्भ से फिर से जोड़ कर देखिए —

पहले कहा गया—

“गणेशरूपः श्रीकृष्णः…”

फिर ईश्वरीय सत्ता बालरूप में आती है।

और आगे उसी बालक का मूल मस्तक गोलोक जाकर श्रीकृष्ण में ही विलीन हो जाता है।

ये भगवान श्री कृष्ण और गणेश जी के बीच दैवी संबंध को पुनः स्थापित करता है। 

माता पार्वती को आशीर्वाद देते भगवान श्रीकृष्ण और उनकी गोद में दिव्य बालक का प्राकट्य — ब्रह्मवैवर्त पुराण गणेश जन्म प्रसंग
ब्रह्मवैवर्त पुराण: माता पार्वती की श्रीकृष्ण आराधना और श्रीकृष्ण का उनके पुत्र रूप में प्रकट होने का प्रसंग।

 

यहाँ ध्यान देने वाली बात –

यह कथा शायद गणेश-प्राकट्य के बारे में बनी हमारी सबसे सामान्य धारणा को ही बदल देती है।

प्रचलित कथा को संक्षेप में सुनने पर ऐसा लग सकता है कि पहले एक बालक था, उसका सिर बदला और उसके बाद वह भगवान गणेश बना।

लेकिन ब्रह्मवैवर्त पुराण में ऐसा नहीं है।

गजमुख प्राप्त होने से पहले ही उसकी दैवी पहचान स्थापित है।

ग्रंथ स्वयं श्रीकृष्ण को “गणेशरूप” कहता है और उसी संदर्भ में उनके पार्वती के पुत्र बनने की बात करता है।

इसलिए यहाँ हाथी का मस्तक गणेश जी का देवत्व उत्पन्न नहीं करता।

दैवी सत्ता पहले है—गजानन स्वरूप बाद में आता है।

और जब उसी बालक का मूल मस्तक गोलोक जाकर श्रीकृष्ण में विलीन होता है, तो कृष्ण और गणेश का संबंध इस कथा का कोई छोटा-सा प्रसंग नहीं रह जाता।

यहीं गणेश-प्राकट्य का प्रश्न एक और गहरी दिशा में खुलता है—

यदि गणेश जी गजमुख होने से पहले भी गणेश हैं, तो फिर गजमुख उनके स्वरूप का इतना अनिवार्य अंग क्यों बन जाता है?

इस प्रश्न का उत्तर हमें आगे की दूसरी शास्त्रीय परम्पराओं में तलाशना होगा।


4. लिंग पुराण

  • असुरों के निर्विघ्न कर्मों से देवताओं की चिंता।
  • देवताओं की प्रार्थना पर गणेश्वर का प्राकट्य।
  • जन्म से ही गजानन स्वरूप।
  • विघ्न उत्पन्न करने और विघ्न दूर करने—दोनों का अधिकार।
  • और प्रथम पूजा का विधान।

 

{ स्रोत: लिंग पुराण, अध्याय 105 — विनायक-प्राकट्य प्रसंग। }

लिंग पुराण में गणेश प्राकट्य का आधार ही अलग है।

यहाँ न माता पार्वती उबटन से किसी मानव-मुखी बालक की रचना करती हैं, न शिव उसका मस्तक काटते हैं और न बाद में हाथी का मस्तक लगाया जाता है।

यहाँ प्रश्न है—

विघ्नों को नियंत्रित कौन करेगा?

असुर, राक्षस और देवताओं को हानि पहुँचाने वाली अन्य शक्तियाँ भी यज्ञ, दान और आराधना द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न करती थीं और अपने कार्यों की निर्विघ्न सिद्धि चाहती थीं।

हमारे शास्त्रीय साहित्य में भी ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं, जहाँ असुर कठोर तपस्या और आराधना द्वारा वरदान तथा असाधारण शक्तियाँ प्राप्त करते हैं।

देवताओं की चिंता यही थी—यदि देव-विरोधी अथवा अनुचित उद्देश्य से किए जाने वाले कर्म भी निर्विघ्न पूरे होते रहें, तो उन्हें रोकने की व्यवस्था क्या होगी?

देवताओं की ओर से बृहस्पति भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं कि ऐसी शक्ति की व्यवस्था हो जो देवताओं को हानि पहुँचाने वालों के कार्यों में आवश्यक विघ्न उत्पन्न कर सके।

लिंग पुराण के अध्याय 105 में यह प्रार्थना स्पष्ट रूप से आती है।

भगवान शिव उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हैं और गणेश्वर के दिव्य स्वरूप की रचना करते हैं। 

कथा में वर्णन आता है कि पहले भगवान शिव ने गणेश्वर के शरीर—वपु—की सृष्टि की। फिर अम्बिका उस गजानन बालक को पुत्ररूप में स्वीकार करती हैं। 

कुछ ही श्लोक आगे उसी बालक को शिव और अम्बिका—दोनों से प्रकट हुआ बताया जाता है।

दोनों बातें पहली दृष्टि में अलग लग सकती हैं।

इसे समझने में एक प्राचीन वैदिक अवधारणा सहायक हो सकती है—जिसमें पिता की सत्ता माता के माध्यम से पुत्ररूप में पुनः प्रकट होती है।

लिंग पुराण के इस प्रसंग की व्याख्या में भी इस अवधारणा की ओर संकेत किया गया है। और गणेश के प्राकट्य को शिव और अम्बिका दोनों से जोड़ता है।

और एक बड़ा अंतर—

यह गणेश पहले मानव-मुखी बालक नहीं हैं।

अम्बिका जिस बालक का स्वागत करती हैं, वह पहले से गजानन है।

सिद्ध और ऋषि पुष्पवर्षा करते हैं। बालक माता-पिता को प्रणाम करता है।

भगवान शिव स्वयं उसके जन्मोत्तर संस्कार करते हैं, उसे गोद में लेते हैं और स्नेहपूर्वक उसका मस्तक चूमते हैं।

इसके बाद शिव अपने पुत्र को उसके प्राकट्य का उद्देश्य बताते हैं।

उसे विघ्नों के नियमन का अधिकार मिलता है।

गणेश जी को, विधि और वेद विरुद्ध आचरण, और अपने निर्धारित धर्म और कर्तव्य से विचलित कर्मों में विघ्न उत्पन्न करने का अधिकार दिया जाता है। 

लेकिन साथ ही में यह भी निर्धारित किया जाता है कि यही गणेश अपने भक्तों की रक्षा भी करेंगे।

फिर भगवान शिव एक असाधारण घोषणा करते हैं—

ब्रह्मा, विष्णु अथवा स्वयं शिव की पूजा हो; यज्ञ, श्रौत-स्मार्त संस्कार अथवा कोई लौकिक शुभ कार्य हो—

सबसे पहले गणेश जी की पूजा होगी।

उनकी पूजा के बिना आरम्भ किया गया शुभ कार्य अशुभ हो सकता है।

यह अधिकार इतना व्यापक बताया गया है कि फल की इच्छा से कार्य करने वाले ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अन्य देवता—यहाँ तक कि स्वयं शिव—यदि गणेश की प्रथम पूजा न करें, तो गणेश उनके कार्यों में भी विघ्न डाल सकते हैं।

इसके बाद एक और रोचक बात आती है।

गणपति स्वयं ‘विघ्नगणों’ की रचना करते हैं।

लिंग पुराण इन विघ्नगणों के अलग-अलग नाम अथवा स्वरूप यहाँ नहीं बताता।

इतना अवश्य कहता है कि गणपति विघ्नगणों की रचना करके अपने गणों सहित शिव के सामने उपस्थित होते हैं और इसके बाद गणेश्वर दैत्यों के कर्मों में विघ्न उत्पन्न करने लगते हैं।

भगवान शिव से दिव्य गजानन बालक का प्राकट्य, माता पार्वती और देवताओं व शिवगणों की उपस्थिति में
भगवान शिव से दिव्य गजानन बालक के प्राकट्य का शास्त्रीय प्रसंग—देवताओं और शिवगणों की उपस्थिति में गणेश जी का अलौकिक स्वरूप।

यहाँ ध्यान देने वाली बात –

हम भगवान गणेश को विघ्नों को दूर करने वाले ‘विघ्नहर्ता’ के रूप में जानते हैं।

लेकिन लिंग पुराण उनके स्वरूप का एक दूसरा पक्ष भी सामने रखता है—

वे विघ्न उत्पन्न करने वाले ‘विघ्नकर्ता’ भी हैं।

पहली दृष्टि में दोनों बातें विपरीत लग सकती हैं।

लेकिन शायद इनके बीच विरोध नहीं है।

मूल अधिकार एक ही है—विघ्नों पर नियंत्रण।

कहाँ विघ्न दूर होना चाहिए और कहाँ विघ्न आवश्यक है—दोनों उसी अधिकार के दो पक्ष दिखाई देते हैं।

इस दृष्टि से गणेश जी की प्रथम पूजा का भाव भी कुछ व्यापक हो जाता है। यह केवल—

“मेरे मार्ग की बाधाएँ दूर कीजिए”

की प्रार्थना नहीं रह जाती।

इसके भीतर एक भाव यह भी है—

“मेरा कार्य उचित हो, विधिसम्मत हो और ऐसा हो जिसमें विघ्न उत्पन्न होने का कारण ही न रहे।”

शिव पुराण में गणेश माता पार्वती के द्वार की रक्षा करते हैं।

लिंग पुराण में मानो वही दायित्व कहीं बड़ा हो जाता है—

यहाँ वे केवल एक द्वार के रक्षक नहीं, कर्म और विधि के भी द्वारपाल दिखाई देते हैं।


 

5. वराह पुराण

  • देवताओं को विघ्नकारी शक्ति की आवश्यकता।
  • शिव के दिव्य हास्य से तेजस्वी कुमार का प्राकट्य।
  • उमा की दृष्टि और शिव का शाप।
  • कुमार का गजमुख होना।
  • अनेक प्रचण्ड गजमुख विनायकों का प्राकट्य।
  • ब्रह्मा का हस्तक्षेप।
  • उसी प्रथम कुमार का सभी विनायकों का अधिपति और प्रथम पूज्य बनना।

 

{स्रोत: वराह पुराण, अध्याय 23; विशेषतः श्लोक 13–32}

 

वराह पुराण की कथा भी विघ्न के प्रश्न से आरम्भ होती है।

देवताओं को ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जो अनुचित कर्मों की सिद्धि में आवश्यक बाधा उत्पन्न कर सके।

वे भगवान रुद्र के पास पहुँचते हैं।

देवताओं की बात सुनकर शिव उमा की ओर देखते हैं। उनके मन में विचार आता है—

पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु का कोई न कोई अनुभव अथवा मूर्त स्वरूप है, लेकिन आकाश का मूर्त स्वरूप क्या है?

इसी चिंतन के बीच भगवान शिव हँसते हैं।

उनके दिव्य हास्य से एक अत्यंत तेजस्वी और सुंदर कुमार प्रकट होता है।

यह कुमार अभी गजमुख नहीं है।

उसका सौन्दर्य ऐसा मनमोहक होता है कि देवताओं की स्त्रियाँ उसे देखने लगती हैं। माता उमा भी उसे एक टक  निहारने लगती हैं। 

भगवान शिव यह देखते हैं और क्रोधित होकर उस कुमार को शाप देते हैं—

‘उसका मुख हाथी के समान होगा, उदर विशाल होगा और सर्प उसका यज्ञोपवीत बनेगा।’

तो क्या गणेश ‘शापित’ हैं?

वराह पुराण की इस कथा के स्तर पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि उन्हें गजमुख स्वरूप शिव के शाप से प्राप्त हुआ है।

लेकिन इससे गणेश जी को समग्र रूप से “शापित देवता” कहना गलत होगा।

 

शिव का क्रोध भी अभी शांत नहीं हुआ है।

वे अपने शरीर को झकझोरते हैं। उनके शरीर के रोमों और स्वेद (पसीने) से अनेक विचित्र गजमुख सत्ताएँ प्रकट होती हैं।

जिन्हें विनायक कहा जाता है। 

ये विनायक सौम्य नहीं हैं।

उनका वर्ण तमाल और काजल जैसा गहरा है, उनके हाथों में विभिन्न अस्त्र हैं और वे प्रचण्ड स्वरूप में प्रकट होते हैं। वराह पुराण में उन्हें आगे क्रूर दृष्टि वाले और प्रचण्ड भी कहा गया है।  उनके कारण देवता व्याकुल हो जाते हैं और पृथ्वी तक क्षुब्ध हो उठती है।

तभी ब्रह्मा हस्तक्षेप करते हैं।

वे भगवान शिव से कहते हैं कि उनके मुख से सबसे पहले प्रकट हुआ वह कुमार इन सभी विनायकों का अधिपति बने और ये विनायक उसके अनुचर हों।

इसके बाद उसी प्रथम कुमार को विशेष पहचान मिलती है— विनायक। विघ्नकर्ता। गजास्य। और गणेश।

अन्य प्रचण्ड विनायक उसके अधीन कर दिए जाते हैं। देवता स्वर्णकलशों के जल से उसका अभिषेक करते हैं और वह सभी विनायकों के नायक के रूप में प्रतिष्ठित होता है।

क्रोधित भगवान शिव के शरीर से अनेक प्रचंड गजमुख विनायकों का प्राकट्य, पास में माता पार्वती और भयभीत देवता व शिवगण
भगवान शिव के शरीर से अनेक प्रचंड गजमुख विनायकों के प्रकट होने का शास्त्रीय प्रसंग।

 

यहाँ ध्यान देने वाली बात — ‘विनायक’ कौन हैं?

आज विनायक सुनते ही हमारे मन में भगवान गणेश आते हैं।

लेकिन इस शब्द का शास्त्रीय इतिहास अधिक पुराना और जटिल है।

माणव गृह्यसूत्र 2.14 में एक नहीं, चार विनायकों का उल्लेख मिलता है—

शालकटंकट, कूष्माण्डराजपुत्र, उस्मित और देवयजन।

इनका संबंध बाधा और अनिष्ट से है। इनके प्रभाव से मनुष्य के कार्यों में रुकावट और कठिनाइयों का वर्णन मिलता है और उनसे मुक्ति के लिए शान्ति-विधान भी बताया गया है।

बाद के ग्रंथों में यह चित्र बदलता हुआ दिखाई देता है और “विनायक” धीरे-धीरे उस एक अधिपति से जुड़ता है जिसे हम गणेश के रूप में पहचानते हैं।

और अब वराह पुराण की कथा को फिर देखिए—

पहले अनेक प्रचण्ड विनायक प्रकट होते हैं।
फिर एक विशिष्ट गजमुख कुमार उन सबका अधिपति बनता है।
और वही गणेश कहलाता है।

विघ्न उत्पन्न करने वाले अनेक विनायकों से लेकर विघ्नों के अधिपति विनायक गणेश तक यह अवधारणा कैसे विकसित हुई—यह अपने-आप में एक बड़ी पड़ताल है।

इस पर हम आगे अलग से लौटेंगे।


6. स्कन्द पुराण

  • पार्वती द्वारा लेप से पुत्र की आकृति बनाना।
  • मस्तक बनाने से पहले सामग्री समाप्त होना।
  • स्कन्द को और लेप लाने भेजना।
  • स्कन्द का वास्तविक गज-मस्तक लेकर लौटना।
  • पार्वती की आपत्ति।
  • गज-मस्तक का आकृति से जुड़ना।
  • और पार्वती द्वारा उसमें प्राण-शक्ति का संचार।

{स्रोत: स्कन्द पुराण, प्रभास खण्ड, अर्बुद खण्ड, अध्याय 32 — महाविनायक-प्रादुर्भाव एवं महाविनायकी-शान्ति।}

स्कन्द पुराण के प्रभास खण्ड के अर्बुद खण्ड में मिलने वाला यह प्रसंग अब तक की कथाओं से बिल्कुल अलग है।

माता पार्वती अपने शरीर पर लगाए जाने वाले लेप से एक बालक की आकृति बनाती हैं।

लेकिन मस्तक बनाने से पहले लेप समाप्त हो जाता है।

शरीर तैयार है— सिर अभी बना ही नहीं है।

पार्वती स्कन्द—कुमार कार्तिकेय—से और लेप लाने को कहती हैं ताकि उनके पुत्र और स्कन्द के भाई का मस्तक बनाया जा सके।

यह छोटी-सी बात ध्यान देने योग्य है।

बालक के पास अभी न सिर है, न प्राण—लेकिन पार्वती उसे पहले ही अपना पुत्र और स्कन्द का भाई मान चुकी हैं।

स्कन्द सामग्री लेने निकलते हैं।

लेकिन लौटते समय वे लेप लेकर नहीं आते।

वे एक विशाल हाथी का वास्तविक मस्तक लेकर आते हैं। 

पार्वती उसे देखकर आपत्ति करती हैं।

उन्होंने अपने पुत्र का सिर पूरा करने के लिए सामग्री मँगवाई थी—इतना विशाल गज-मस्तक नहीं।

फिर भी अंततः वही गज-मस्तक उस सिर-विहीन शरीर से जुड़ जाता है।

तब माता पार्वती अपनी शक्ति से उसमें प्राण का संचार करती हैं।

बालक जीवित हो उठता है और माता से आज्ञा माँगता है।

पार्वती उसे शिव के सामने ले जाती हैं।

“शिव उसे अपने पुत्र के रूप में स्वीकार करते हैं।

आगे चलकर वही गजानन ‘महाविनायक’ के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं।”

उन्हें गणों का नेतृत्व मिलता है और शुभ कार्यों के आरम्भ में उनका स्मरण करने का विधान होता है। 

स्कन्द उसे कुठार प्रदान करते हैं, गौरी मोदकों का पात्र देती हैं और मूषक उसका वाहन बनता है।

माता पार्वती अपने शरीर के लेप से बालक की आकृति बनाते हुए और कार्तिकेय उसके लिए हाथी का मस्तक लाते हुए
माता पार्वती द्वारा अपने शरीर के लेप से बालक की आकृति बनाने और कार्तिकेय द्वारा उसके लिए गज-मस्तक लाने का शास्त्रीय प्रसंग।

यहाँ ध्यान देने वाली बात –

इस कथा में किसी जीवित मानव-मुखी बालक का मस्तक काटा ही नहीं गया।

क्रम है—

पहले शरीर।
फिर गज-मस्तक।
और उसके बाद प्राण।

अर्थात् इस परम्परा में गजमुख किसी दुर्घटना के बाद मिला स्वरूप नहीं है।

गजानन स्वरूप में ही गणेश पहली बार जीवित होते हैं।

और अब एक प्रश्न धीरे-धीरे और बड़ा होने लगता है—

गजमुख होने का कारण अलग-अलग कथाओं में बदल रहा है।

लेकिन अंतिम स्वरूप बार-बार वही क्यों है?

गजमुख ही क्यों?

“इस प्रश्न पर हम आगे विस्तार से चर्चा करेंगे।”  


7. महाभागवत पुराण

  • पार्वती द्वारा विष्णु की इच्छा का स्मरण कर पुत्र की रचना।
  • बालक का नारायण-स्वरूप होना।
  • शिव का उसे न पहचानना और मस्तक काट देना।
  • उत्तरमुखी हाथी का मस्तक लगाना।
  • शिव द्वारा उसे ‘जनार्दन’ कहना।
  • और द्वापर में कृष्ण से पुनः सामना होने का संकेत।

{स्रोत: महाभागवत पुराण, अध्याय 35 — गणेश-प्राकट्य प्रसंग।}

महाभागवत पुराण की कथा पहली दृष्टि में शिव पुराण जैसी लगती है।

लेकिन इसके भीतर एक बहुत बड़ा अंतर है।

गौरी स्नान की तैयारी करती हैं।

भवन की रक्षा का विचार करते हुए वे विष्णु की इच्छा का स्मरण करती हैं और अपने शरीर पर लगे हल्दी के लेप से एक बालक की आकृति बनाती हैं।

वे उसमें प्राणों का संचार करती हैं और उसे अपना पुत्र कहकर पुकारती हैं। 

यहाँ पुराण में वर्णन मिलता है कि यह कोई साधारण बालक नहीं, अपितु  स्वयं गणेश्वर नारायण है।

पार्वती उसे अपना दूध पिलाती हैं और द्वार की रक्षा का आदेश देती हैं।

कुछ समय बाद भगवान शिव लौटते हैं।

बालक उन्हें भीतर जाने से रोकता है।

शिव उसका मस्तक काट देते हैं।

पार्वती अपने पुत्र को मस्तक-विहीन देखकर शिव से पूछती हैं कि यह किसने किया।

और यहाँ हमारे एक पुराने प्रश्न का सीधा उत्तर मिलता है—

क्या शिव उस बालक को पहचान नहीं पाए थे?

इस परम्परा में—नहीं।

शिव स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे नहीं जानते थे कि वह पार्वती का पुत्र है। उसने उनका मार्ग रोका, इसलिए उन्होंने उसका मस्तक काट दिया।

पार्वती पुत्र को पुनर्जीवित करने के लिए कहती हैं।

शिव स्वयं मस्तक की तलाश में निकलते हैं।

वन में उन्हें उत्तर दिशा में सिर करके सो रहा एक हाथी मिलता है—

शिव उसका मस्तक लेकर आते हैं, उसे बालक के शरीर से जोड़ते हैं और बालक गजानन रूप में पुनर्जीवित होता है।

शिव उसे अपनी गोद में लेते हैं और समझते हैं कि उनका पुत्र वास्तव में विष्णु-स्वरूप है।

वे उसे ‘जनार्दन’ कहकर संबोधित करते हुए स्वीकार करते हैं कि वे उसे पहचान नहीं पाए थे।

फिर शिव भविष्य की एक घटना की ओर संकेत करते हैं।

वे कहते हैं कि द्वापर के अंत में जब यही दैवी सत्ता देवकी और वसुदेव के घर दूसरे रूप में जन्म लेगी, तब वे फिर उससे युद्ध करेंगे।

उस प्रसंग में ‘शोणित’ का उल्लेख आता है।

देवकी और वसुदेव के यहाँ द्वापर में जन्म लेने वाला यह रूप स्पष्टतः श्रीकृष्ण की ओर संकेत करता है।

यहाँ हम आपको बताना चाहते हैं कि – 

कृष्ण-परम्परा में शोणितपुर से जुड़ा एक प्रसिद्ध युद्ध का एक प्रसंग भी मिलता है।

बाणासुर की पुत्री उषा और श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के प्रसंग में अनिरुद्ध को बाणासुर बंदी बना लेता है। कृष्ण उसे छुड़ाने आते हैं। बाणासुर भगवान शिव का परम भक्त है, इसलिए उसकी रक्षा के लिए स्वयं शिव युद्ध में उतरते हैं।

और इस प्रकार शिव और कृष्ण युद्धभूमि में आमने-सामने आते हैं।

अंततः कृष्ण बाणासुर को पराजित करते हैं, लेकिन शिव के अनुरोध पर उसका जीवन छोड़ देते हैं।

महाभागवत पुराण में द्वापर के भविष्य के युद्ध और “शोणित” का उल्लेख इस प्रसिद्ध प्रसंग की याद अवश्य दिलाता है।

परन्तु उपलब्ध महाभागवत पाठ यह स्पष्ट शब्दों में नहीं कहता कि ‘शोणित’ का संकेत निश्चित रूप से बाणासुर के शोणितपुर युद्ध की ओर ही है।

इसलिए समानता दिखाना उचित है।

उसे बिना स्पष्ट प्रमाण के निश्चित निष्कर्ष बना देना उचित नहीं।

भगवान विष्णु का स्मरण करती माता पार्वती और उनकी गोद में दिव्य बालक रूप में विष्णु का प्राकट्य
भगवान विष्णु का स्मरण करती माता पार्वती और उनकी गोद में दिव्य बालक के रूप में उनके प्रकट होने का शास्त्रीय प्रसंग।

यहाँ ध्यान देने वाली बात –

अब ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा याद कीजिए।

वहाँ पार्वती की श्रीकृष्ण-आराधना, कृष्ण का गणेशरूप में पुत्र से संबंध और गणेश जी के मूल मस्तक का गोलोक जाकर श्रीकृष्ण में विलीन होना सामने आया था।

अब महाभागवत पुराण एक दूसरी शास्त्रीय परम्परा से कह रहा है—

बालक नारायण स्वयं है।

और शिव उसे जनार्दन कहकर संबोधित करते हैं।

इसलिए यह हमारे प्रश्न—

क्या भगवान कृष्ण और गणेश जी के बीच भी कोई संबंध है?

—को भी किसी सीमा तक मान्यता देता है। 

और यह अपने-आप में अत्यंत महत्वपूर्ण है।


 

8 . पद्म पुराण

  • पार्वती द्वारा गजमुख आकृति की रचना।
  • आकृति को गंगा में डालना।
  • गंगाजल के स्पर्श से उसका विराट रूप धारण करना।
  • पार्वती और गंगा—दोनों द्वारा पुत्र स्वीकार करना।
  • ‘गांगेय’ के रूप में प्रतिष्ठा। और विनायकों का आधिपत्य।

{स्रोत: पद्म पुराण, सृष्टिखण्ड — गणेश-प्राकट्य प्रसंग।}

 

पद्म पुराण में गणेश जी के प्राकट्य का प्रसंग अब तक देखी गई कथाओं से बिल्कुल अलग रूप में सामने आता है।

एक अवसर पर माता पार्वती अपनी सखियों के साथ कैलाश पर होती हैं। वे अपने शरीर पर सुगंधित तेल और चूर्ण लगाती हैं। शरीर से निकले उस लेप/मैल को वे एकत्र करती हैं और उससे खेलते हुए एक पुरुषाकृति बनाती हैं।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है—

पार्वती द्वारा बनाई गई वह आकृति साधारण मानव-मुखी नहीं, गजमुख है।

अर्थात् इस परम्परा में गणेश जी को हाथी का मुख बाद में किसी घटना के कारण नहीं मिलता। उनके प्राकट्य की प्रक्रिया ही गजमुख स्वरूप से आरम्भ होती है।

पार्वती उस गजमुख आकृति को लेकर गंगा के पास जाती हैं और उसे गंगा के जल में डाल देती हैं।

गंगा के जल में प्रवेश करते ही वह छोटी-सी आकृति बड़ी होने लगती है। और गजानन के रूप लेती है। 

वह बढ़ते-बढ़ते अत्यंत विशाल हो जाता है—इतना विशाल कि उसका विराट शरीर मानो संसार को व्याप्त करने लगता है।

जो अभी तक पार्वती के हाथों से बनी एक छोटी-सी गजमुख आकृति थी, वही गंगाजल के स्पर्श के बाद एक विराट दैवी स्वरूप में सामने आती है।

माता पार्वती इस परिवर्तन को देखती हैं और उस गजमुख स्वरूप को अपना पुत्र कहकर संबोधित करती हैं।

गंगा भी उस गजमुख को अपना पुत्र कह कर पुकारती है। 

इस प्रकार इस परम्परा में गणेश जी के प्राकट्य के साथ दो मातृ-सत्ताएँ जुड़ जाती हैं— पार्वती और गंगा।

पार्वती ने उनकी आकृति की रचना की।

और गंगा के जल में प्रवेश करने के बाद वही आकृति विराट दैवी रूप धारण करती है।

इसी संबंध के कारण गणेश जी को यहाँ ‘गांगेय’ कहा जाता है—अर्थात् गंगा से संबंधित, गंगा-पुत्र।

इसके बाद देवता उस गजानन की स्तुति और पूजा करते हैं।

ब्रह्मा भी वहाँ पहुँचते हैं और उस दैवी गजमुख को विशेष स्थान प्रदान करते हैं।

उन्हें विनायकों का आधिपत्य दिया जाता है।

माता पार्वती और देवी गंगा गंगा के जल से विराट गजमुख बालक को बाहर निकालते हुए — गणेश प्राकट्य प्रसंग
माता पार्वती द्वारा गजमुख आकृति को गंगा में प्रवाहित करने के बाद उसका विराट रूप धारण करना और देवी गंगा के साथ उसे जल से बाहर लाने का शास्त्रीय प्रसंग।

यहाँ ध्यान देने वाली बात

इस कथा में एक नहीं, तीन बातें हमारे अब तक के परिचित गणेश-प्राकट्य से बिल्कुल अलग हैं।

पहली—

गणेश जी को गजमुख बाद में नहीं मिलता।

पार्वती जिस आकृति की रचना करती हैं, वह पहले से गजमुख है।

अर्थात उन्हें किसी घटना से  गजमुख नहीं मिल  — वे गजमुख ही रचे गए थे।

 

दूसरी—

उस आकृति का दैवी परिवर्तन किसी मस्तक-विच्छेदन या पुनर्जीवन से नहीं, बल्कि गंगा के जल में प्रवेश करने के बाद होता है।

एक छोटी-सी आकृति वहीं विराट स्वरूप धारण करती है।

और तीसरी बात —

यहाँ गणेश जी की माता केवल पार्वती नहीं हैं। गंगा भी उन्हें अपना पुत्र स्वीकार करती हैं।


9 . सुप्रभेदागम 

  • शिव और पार्वती का वन में जाना।
  • हाथी-हथिनी के युगल को देखना।
  • दोनों का गज-गजी रूप धारण करना।
  • और उसी दैवी संयोग से गजमुख गणेश का प्राकट्य।

{स्रोत: सुप्रभेदागम — शैव आगम परम्परा}

अब हम पुराणों से बाहर आते हैं।

सुप्रभेदागम शैव आगम परम्परा का एक स्थापित ग्रंथ है। 

इस परम्परा में गणेश जी के गजमुख होने की कथा बिल्कुल अलग है।

भगवान शिव और माता पार्वती हिमालय के वन में विहार कर रहे होते हैं।

वहाँ वे हाथी और हथिनी के एक युगल को देखते हैं।

उस दृश्य के प्रभाव से शिव और पार्वती स्वयं गज और गजी का रूप धारण करते हैं।

और उनके उसी दैवी संयोग से गणेश का प्राकट्य होता है— गजमुख स्वरूप में।

गणेश का गजमुख उनका बदला हुआ स्वरूप नहीं—उनका जन्मजात स्वरूप है।

वन में भगवान शिव और माता पार्वती, पास में प्रेममय गज-युगल और उनके सामने प्रकट गजमुख बाल गणेश
वन में शिव-पार्वती, गज-युगल और गजमुख बालक के प्राकट्य से जुड़ी गणेश जन्म की एक विशिष्ट शास्त्रीय परम्परा।

यहाँ ध्यान देने वाली बात

अब तक हम गजमुख होने के कितने अलग कारण देख चुके हैं—

कहीं मानव-मस्तक कटने के बाद गज-मस्तक लगाया गया।

कहीं शनि की दृष्टि के बाद।

कहीं शिव के शाप से।

कहीं शरीर पहले सिर-विहीन बना और बाद में गज-मस्तक जुड़ा।

लिंग पुराण में गणेश पहले से गजानन प्रकट होते हैं।

और अब सुप्रभेदागम में—

उनका गजमुख सीधे उनके प्राकट्य की प्रक्रिया से जुड़ा है।

यानी “हाथी का सिर गणेश जी को बाद में क्यों लगाया गया?” पूछना भी हर शास्त्रीय परम्परा पर लागू नहीं होता।

कुछ परम्पराओं में—

उन्हें हाथी का सिर मिला ही नहीं था। वे गजमुख ही प्रकट हुए थे।

***स्रोत: सुप्रभेदागम — शैव आगम परम्परा;  गणेश-प्राकट्य का यह वर्णन परम्परागत आगमिक पाठ के आधार पर T. A. Gopinatha Rao जैसे प्राचीन iconographic scholars द्वारा भी उद्धृत किया गया है। सुप्रभेदागम की प्रामाणिक manuscript tradition स्वतंत्र रूप से सुरक्षित है।


10. कश्मीर की शैव परम्परा — हरचरितचिन्तामणि

  • पार्वती से निकले दैहिक द्रव्य का गंगा तक पहुँचना।
  • गजमुखी मालिनी द्वारा उसे ग्रहण करना।
  • मालिनी के माध्यम से गणेश का प्राकट्य। और गणेश-जन्म की एक दुर्लभ कश्मीरी शैव परम्परा।

 

गणेश-प्राकट्य की हमारी पड़ताल में एक और वर्णन विशेष महत्व रखता है—

क्योंकि यह कश्मीर की संस्कृत शैव परम्परा से आता है।

यह स्रोत पुराण या आगम नहीं है। इसलिए इसे उसी श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा।

यह हरचरितचिन्तामणि नामक कश्मीरी शैव धार्मिक कृति से जुड़ी परम्परा है, जिसके रचयिता कश्मीर के शैव विद्वान राजानक जयद्रथ माने जाते हैं।

यहाँ गणेश के प्राकट्य का वर्णन अब तक की सभी कथाओं से अलग है।

माता पार्वती के शरीर से निकला दैहिक द्रव्य जल के साथ गंगा में पहुँचता है।

वहाँ मालिनी नाम की गजमुखी स्त्री उसे ग्रहण करती है।

और उसी के माध्यम से गणेश का प्राकट्य होता है। 

यहाँ एक बात विशेष रूप से समझनी होगी।

इस कथा में भी गणेश जी का गजमुख बाद में लगाया गया कोई replacement नहीं है।

उनके प्राकट्य में ही गजमुखी मालिनी की भूमिका जुड़ी हुई है।

और इसलिए यह परम्परा एक बार फिर उस सामान्य धारणा से अलग खड़ी होती है कि गणेश पहले सामान्य मानव-मुखी बालक थे और बाद में किसी घटना के कारण उनका मुख हाथी का हो गया।

माता पार्वती का दैहिक द्रव्य गंगा तक पहुँचना, गजमुखी मालिनी द्वारा उसे ग्रहण करना और बाल गणेश का प्राकट्य
पार्वती से निकले दैहिक द्रव्य का गंगा तक पहुँचना, गजमुखी मालिनी द्वारा उसका ग्रहण और मालिनी के माध्यम से गणेश जी के प्राकट्य का विशिष्ट शास्त्रीय प्रसंग।

यहाँ ध्यान देने वाली बात

हरचरितचिन्तामणि में कश्मीर की पुरानी संस्कृत शैव धार्मिक-साहित्यिक परम्परा में सुरक्षित गणेश-प्राकट्य का एक विशिष्ट वर्णन है।

इसलिए इसे शामिल करने का कारण केवल इसका अलग या रोचक होना नहीं है।

इसका महत्व यह है कि गणेश-प्राकट्य की विविधता केवल अलग-अलग पुराणों तक सीमित नहीं रही; शैव आगम और कश्मीर की संस्कृत शैव परम्परा में भी उसके स्वतंत्र रूप मिलते हैं।


उत्तर दिशा ही क्यों?

अब एक बात को अनदेखा करना कठिन हो जाता है।

अलग-अलग गणेश-प्राकट्य कथाओं में उत्तर दिशा बार-बार सामने आती है।

कहीं आदेश मिलता है—

उत्तर दिशा की ओर जाओ।

कहीं उत्तरमुखी जीव का मस्तक लाने की बात आती है।

और महाभागवत पुराण में शिव को उत्तर की ओर सिर करके सोता हुआ हाथी मिलता है।

तो प्रश्न स्वाभाविक है—

उत्तर दिशा ही क्यों?

हमने भी इसका संतोषजनक शास्त्रीय उत्तर खोजने की कोशिश की।

सनातन परम्परा में उत्तर दिशा का अपना महत्त्व अवश्य है। उत्तरायण, देवयान, हिमालय-कैलाश और अन्य अनेक धार्मिक अवधारणाओं से उत्तर दिशा जुड़ी हुई है।

लेकिन इनमें से किसी एक अर्थ को गणेश जी के गज-मस्तक वाले प्रसंग पर लागू कर देना तभी उचित होगा जब संबंधित ग्रंथ स्वयं ऐसा संबंध स्थापित करे।

और ऐसा स्पष्ट शास्त्रीय प्रमाण हमें अभी नहीं मिला।

इसलिए अनुमान प्रस्तुत करने के बजाय इस प्रश्न को फिलहाल प्रश्न ही रहने देना अधिक उचित है।

क्योंकि हमारी पड़ताल का उद्देश्य हर प्रश्न का कोई-न-कोई उत्तर बना देना नहीं है।

जहाँ शास्त्र उत्तर देता है, वहाँ उसे प्रमाण के साथ सामने रखना है।
और जहाँ उत्तर नहीं मिलता, वहाँ उसे स्वीकार करना भी इस पड़ताल का हिस्सा है।


The Deep Dive | मीमांसा

इस पड़ताल की शुरुआत एक बहुत परिचित कथा से हुई थी—माता पार्वती ने एक बालक बनाया, भगवान शिव ने उसका मस्तक काटा और बाद में हाथी का मस्तक लगाकर उसे पुनर्जीवित किया गया।

लेकिन शास्त्रों में उतरते-उतरते यह एक कथा दस अलग-अलग शास्त्रीय और धार्मिक परम्पराओं तक पहुँच गई।

और यहाँ एक बात स्पष्ट करना जरूरी है—

इन दस प्रसंगों को ही इस विषय की अंतिम सूची न माना जाए।

सनातन धर्मग्रंथों का संसार इतना विशाल है कि यह दावा करना कि गणेश जी के प्राकट्य के बस इतने ही वर्णन हैं, उचित नहीं होगा।

संभव है किसी अन्य पुराण, आगम, क्षेत्रीय शास्त्रीय परम्परा या किसी प्राचीन धार्मिक ग्रंथ में कोई और प्रमाणित प्रसंग सुरक्षित हो, जिस तक यह पड़ताल अभी नहीं पहुँच पाई।

मैं जितना इस विशाल शास्त्रीय समुद्र को खंगाल पाया, उसमें मुझे अभी तक ये दस धाराएँ ही मिलीं।

लेकिन इन दस प्रसंगों को सामने रखने के बाद मेरे लिए प्रश्न यह नहीं रह जाता कि—“इनमें से सही कौन-सी है?”

शिव पुराण स्वयं अलग-अलग कल्पों में गणेश-प्राकट्य के अलग-अलग वर्णनों की बात करता है।

अधिक महत्वपूर्ण यह देखना है कि इतनी अलग-अलग कथाएँ आखिर हमें किस ओर ले जा रही हैं। 

 

कथाएँ बदलती हैं, लेकिन गणेश नहीं बदलते।

उनके प्राकट्य का कारण बदलता है।
उनके गजमुख होने का घटनाक्रम बदलता है।
कहीं मस्तक-विच्छेदन है, कहीं है ही नहीं।
कहीं उनका संबंध शिव-शक्ति से खुलता है, कहीं विष्णु-कृष्ण की दैवी सत्ता से।

फिर भी इन अलग-अलग रास्तों के अंत में हमारे सामने वही सत्ता खड़ी होती है—

गणपति। विनायक। विघ्नों के अधिपति। प्रथम पूज्य।

और शायद यही इस पूरी पड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है।

हम गणेश जी के प्राकट्य को खोजने निकले थे, लेकिन इस खोज ने अंततः हमारा ध्यान उनके स्वरूप पर लाकर खड़ा कर दिया।

क्योंकि जब प्राकट्य की इतनी अलग-अलग परम्पराएँ अंततः हमें उसी विलक्षण गजानन स्वरूप तक पहुँचाती हैं, तो अगला प्रश्न अपने-आप पैदा होता है—

  • गजमुख ही क्यों?
  • एकदन्त क्यों?
  • विशाल उदर, बड़े कान और छोटी आँखें क्या कहते हैं?
  • हाथों में पाश और अंकुश क्यों?
  • और इतनी विराट देह के लिए—मूषक ही वाहन क्यों?

क्या ये केवल गणेश जी की पहचान के अलग-अलग चिह्न हैं? या उनके इस परिचित स्वरूप के पीछे अर्थ की ऐसी परतें छिपी हैं, जिन्हें हमने देखा तो हमेशा—लेकिन कभी खोलकर समझने की कोशिश नहीं की?

यही हमारी अगली पड़ताल है—

श्री गणेश दर्शन — भाग 2

स्वरूप मीमांसा

4 thoughts on “श्री गणेश दर्शन”

  1. जय श्रीगणेश
    अद्भुत…विलक्षण…अलौकिक ।
    भगवान श्रीगणेश जी के प्रकट होने से संबंधित कथाऐं पढ़कर बहुत आनंद का अनुभव हुआ और रोंगटे खड़े हुए। आपका परिक्षम प्रशंसा के योग्य है । इतने सारे पुराणों, ग्रंथो आदि का अध्ययन कर पाठकों तक सही व रुचिकर सामग्री पहुंचाना बहुत ही प्रशंसनीय कार्य है । आप का बहुत-बहुत साधुवाद।

    1. Kuldeep Thusu

      जय श्रीगणेश 🙏
      शीला जी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। लेख के पीछे किए गए अध्ययन और प्रयास को आपने जिस आत्मीयता से समझा और सराहा, वह मेरे लिए बहुत उत्साहवर्धक है।
      ‘श्री गणेश दर्शन’ का उद्देश्य भी यही है कि पुराणों और अन्य धर्मग्रंथों में उपलब्ध प्रसंगों को खोजकर सरल और रोचक रूप में पाठकों तक पहुँचाया जाए।
      आपका स्नेह और प्रोत्साहन इस यात्रा को आगे बढ़ाने की प्रेरणा देता है।
      हृदय से आभार।

  2. Shweta Thusoo

    Very Interesting and complicated too. Jitna samjhne ki koshish ki utna h ulajti gayi .😇

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद। शायद यही इस विषय की सबसे रोचक बात भी है—हम जिस कथा को बहुत सरल समझते आए हैं, शास्त्रों में उतरते ही उसकी कई अलग-अलग परतें खुलने लगती हैं। जितना खोजते हैं, कुछ उत्तर मिलते हैं और साथ ही कई नए प्रश्न भी खड़े हो जाते हैं। ‘श्री गणेश दर्शन’ की यह यात्रा शायद इन्हीं उलझी हुई कड़ियों को थोड़ा-थोड़ा समझने का प्रयास है।

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