जी. डी. नायडू – ‘भारत के एडीसन’

इतिहास के हाशिए पर…

लेखन: कुलदीप ठुसू ‘पम्पोष’ 

जी. डी. नायडू – ‘भारत के एडीसन’

हम भारत की इस बहुमुखी प्रतिभा को क्यों भूल गए?

गोपालस्वामी दोराईस्वामी नायडू ( जी. डी. नायडू )

 

  • क्या आपने कभी केरोसीन (मिट्टी के तेल), से चलने वाले पंखे के बारे में सुना है?
  • क्या आपको पता है कि भारत का पहला जूसर (Juicer) किसने बनाया?
  • देश का पहला इलेक्ट्रिक रेज़र?
  • मैकेनिकल कैलकुलेटर?
  • वोट रिकॉर्डिंग मशीन?
  • नहीं?

अच्छा, यह बताइए…

  • देश की पहली स्वदेशी इलेक्ट्रिक मोटर?
  • देश की पहली बड़ी परिवहन क्रांति?
  • तकनीकी शिक्षा को नई दिशा देने वाला पॉलिटेक्निक संस्थान?
  • अधिक उपज देने वाली फसलों पर शुरुआती सफल प्रयोग?
  • हाइब्रिड बीज ?

नहीं?

और अगर मैं कहूँ कि यह सब एक तीसरी-पास, साधारण किसान के बेटे ने कर दिखाया था?

वह भी आज नहीं…

लगभग एक सदी पहले।

“एक ऐसा व्यक्ति जिसने सौ से अधिक अनूठे आविष्कार किए, अनेक मशीनों में सुधार किए, उद्योग खड़े किए, खेती में प्रयोग किए और तकनीकी शिक्षा को नई दिशा देने का प्रयास किया।”

जिसकी प्रतिभा की प्रशंसा नोबेल पुरस्कार विजेता, वैज्ञानिक डॉ. सी. वी. रमन ने भी की।

फिर सवाल यह है…

  • अगर यह सब सच है, तो आज हममें से अधिकांश लोग जी. डी. नायडू का नाम क्यों नहीं जानते?
  • क्यों उनका उल्लेख हमारी पाठ्यपुस्तकों में न के बराबर मिलता है?
  • क्यों उनकी कहानी इतिहास की मुख्य धारा से निकलकर इतिहास के हाशिए पर सिमट गई?

और सबसे बड़ा प्रश्न…

  • क्या हमने एक महान आविष्कारक को भुला दिया, या हमने उन्हें कभी ठीक से जाना ही नहीं?

एक  बहुमुखी प्रतिभा का जन्म – 

सन 1893 – 

तमिलनाडु के कोयंबटूर के पास स्थित कालंगल गाँव में एक साधारण किसान परिवार में एक बालक का जन्म हुआ—

नाम रखा गया – “गोपालस्वामी दोराईस्वामी नायडू।”

तब किसने सोचा होगा कि यही बालक एक दिन भारत के सबसे विलक्षण स्व-शिक्षित आविष्कारकों में गिना जाएगा।

बचपन में उनका पढ़ाई में विशेष मन नहीं लगा। आर्थिक और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उनकी औपचारिक शिक्षा तीसरी कक्षा से आगे नहीं बढ़ सकी।

लेकिन शायद प्रकृति ने उनके लिए कोई दूसरी पाठशाला चुन रखी थी।

 


एक मोटरसाइकिल… जिसने एक ‘आविष्कारक’ को जन्म दिया

आज से लगभग सौ वर्ष पहले, न तो इंटरनेट था, न ऑनलाइन कोर्स और न ही हर शहर में इंजीनियरिंग कॉलेज।

लेकिन जी. डी. नायडू के पास एक ऐसी चीज़ थी, जो इन सबसे कहीं अधिक मूल्यवान थी—असीम जिज्ञासा।

लगभग सोलह वर्ष की आयु में उन्होंने पहली बार एक ब्रिटिश अधिकारी की मोटरसाइकिल देखी। 

वह केवल एक वाहन नहीं थी, बल्कि एक ऐसा रहस्य थी, जिसे वे समझना चाहते थे।

लेकिन समस्या थी—मोटरसाइकिल खरीदने के लिए पैसे कहाँ से आते?

उन्होंने हार नहीं मानी।

कोयंबटूर के एक होटल में सर्वर (वेटर) के रूप में काम किया, 

एक-एक पैसा बचाया और आखिरकार अपनी पहली मोटरसाइकिल खरीद ली।

अधिकांश लोग नई मोटरसाइकिल खरीदकर उसे सड़क पर दौड़ाते हैं।

जी. डी. नायडू ने ऐसा नहीं किया, बल्कि उसके पुर्जे पुर्जे खोल दिए। 

वे इंजन का हर पुर्जा निकालते, उसे ध्यान से देखते, समझते और फिर वापस जोड़ देते। 

उन्होंने यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई। 

किसी किताब ने उन्हें यह नहीं सिखाया था। 

उन्होंने अपनी जिज्ञासा को अपना मार्गदर्शक बनाया और मशीन को अपना शिक्षक। 

शायद उन्हें तब भी यह एहसास नहीं रहा होगा कि वे केवल मोटरसाइकिल नहीं खोल रहे, बल्कि अपने भीतर छिपे एक इंजीनियर को जन्म दे रहे हैं।

यही उनकी असली यूनिवर्सिटी थी।

न कोई डिग्री।

न कोई प्रयोगशाला।

न कोई प्रोफेसर।

सिर्फ़ एक मशीन… और उसे समझ लेने की ज़िद।

यही ज़िद आगे चलकर उन्हें ऐसे आविष्कार करने की प्रेरणा देने वाली थी, जिनकी उस समय शायद ही किसी ने कल्पना की हो।


जब हर मशीन एक नया सवाल बन गई

मोटरसाइकिल से शुरू हुआ प्रयोग, अब एक ज़िद—एक आदत बन गई। 

जी. डी. नायडू केवल मशीनों की मरम्मत करने वाला व्यक्ति बनकर नहीं रहना चाहते थे। 

उनके मन में  हमेशा यह जिज्ञासा रहती थी कि —

“इन मशीनों को पहले से और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है?”

यही सवाल, यही जिज्ञासा,  उनके अधिकांश आविष्कारों की नींव बनी।

कहा जाता है कि अपने जीवनकाल में उन्होंने सौ से अधिक अनूठे आविष्कार किए और अनेक मशीनों में तकनीकी सुधार किए। 

इनमें से कुछ ऐसे थे, जो अपने समय से कई वर्ष आगे माने जा सकते हैं।

उन्होंने भारत की पहली स्वदेशी इलेक्ट्रिक मोटर के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जब दुनिया में इलेक्ट्रिक उपकरणों का दौर तेज़ी से आगे बढ़ रहा था, तब भारत में भी स्वदेशी तकनीक विकसित करने का उनका प्रयास अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि था।

उन्होंने देश का पहला इलेक्ट्रिक रेज़र विकसित किया, जिसे “Rasant” नाम दिया गया।

यह उस समय का एक अत्याधुनिक उत्पाद माना जाता था।

लेकिन उनकी जिज्ञासा यहीं नहीं रुकी।

उन्होंने केरोसीन, (मिट्टी के तेल) से चलने वाला पंखा बनाया—एक ऐसा विचार, जो आज सुनने में भी आश्चर्यजनक लगता है।

उन्होंने फलों का रस निकालने वाली मशीन (Juicer) बनाई।

मैकेनिकल कैलकुलेटर  विकसित किया।

वोट रिकॉर्डिंग मशीन पर काम किया।

रेडियो, छोटे विद्युत उपकरणों और अनेक यांत्रिक प्रणालियों में भी महत्वपूर्ण सुधार किए।

उनके लिए आविष्कार का अर्थ केवल नई मशीन बनाना नहीं था।

वे ऐसी तकनीक विकसित करना चाहते थे, जो आम लोगों के जीवन को थोड़ा आसान बना सके।

यही कारण था कि उनके अधिकांश आविष्कार किसी प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहे, बल्कि रोज़मर्रा की ज़रूरतों से जुड़े हुए थे।

आज जब हम “Innovation” शब्द का प्रयोग करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान अत्याधुनिक तकनीकों की ओर जाता है।

लेकिन जी. डी. नायडू की सोच कुछ अलग थी।

वे मानते थे कि “सबसे बड़ा आविष्कार वही है, जो आम आदमी के जीवन में वास्तविक बदलाव ला सके।”

और शायद यही कारण है कि उनकी प्रयोगशाला में कभी केवल एक ही क्षेत्र पर काम नहीं हुआ।

मशीनें…

कृषि…

परिवहन…

शिक्षा…

जहाँ उन्हें समस्या दिखाई देती, वहीं उनका अगला प्रयोग शुरू हो जाता।

यही बेचैनी उन्हें एक आविष्कारक से बढ़ाकर एक दूरदर्शी नवप्रवर्तक बना रही थी।


एक बस… जिसने केवल यात्रियों को नहीं, पूरे शहर को आगे बढ़ाया-

आज जब हम किसी बस में सफ़र करते हैं, तो शायद ही कभी सोचते हैं कि समय पर चलने वाली, व्यवस्थित और भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था अपने आप नहीं बन जाती।

इसके पीछे किसी न किसी की दूरदृष्टि होती है।

जी. डी. नायडू के लिए परिवहन केवल लोगों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने का व्यवसाय नहीं था।

वे इसे विकास का आधार मानते थे।

साल 1920 में, जी. डी. नायडू ने केवल एक बस खरीदकर अपना परिवहन व्यवसाय शुरू किया। 

देखने वालों के लिए वह केवल एक वाहन था, लेकिन जी. डी. नायडू के मन में, कुछ और ही विचार था। 

उन्होंने, इस एक बस से, भारत की परिवहन व्यवस्था को बदलने का सपना देखा। 

कुछ वर्षों बाद,  जी. डी. नायडू ने, यूनिवर्सल मोटर सर्विस (UMS) की नींव रखी। 

जल्दी ही, यूनिवर्सल मोटर सर्विस (UMS) को देश के सबसे संगठित परिवहन नेटवर्क में गिना जाने लगा।

लेकिन उनकी सफलता का कारण केवल बसों की संख्या नहीं थी।

वे हर छोटी-छोटी बात पर ध्यान देते थे।

बस समय पर क्यों नहीं पहुँची?

ईंधन की खपत कैसे कम हो सकती है?

वाहनों का रखरखाव कैसे बेहतर हो?

यात्रियों को अधिक सुरक्षित और बेहतर सेवा कैसे मिले?

उनके लिए ये केवल प्रबंधन के प्रश्न नहीं थे, बल्कि इंजीनियरिंग की समस्याएँ थीं, जिनका समाधान खोजा जा सकता था।

यही सोच उन्हें एक साधारण व्यवसायी से अलग बनाती है।

उन्होंने परिवहन व्यवस्था में अनुशासन, रखरखाव और दक्षता को इतना महत्व दिया कि UMS उस दौर में प्रबंधन का एक उदाहरण बन गया।

कई इतिहासकार मानते हैं कि दक्षिण भारत में आधुनिक सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के विकास में जी. डी. नायडू की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।

लेकिन उनकी दृष्टि बसों तक सीमित नहीं थी।

उन्होंने समझ लिया था कि यदि किसी शहर को आगे बढ़ाना है, तो केवल सड़कें नहीं, उद्योग भी चाहिए।

केवल उद्योग नहीं, कुशल लोग भी चाहिए।

और केवल कुशल लोग नहीं, नई सोच भी चाहिए।

यही सोच आगे चलकर कोयंबटूर को भारत के प्रमुख औद्योगिक नगरों में बदलने की आधारशिला बनी।

आज कोयंबटूर को देश के महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्रों में गिना जाता है। इसके पीछे अनेक उद्योगपतियों, इंजीनियरों और उद्यमियों का योगदान है। जी. डी. नायडू उन अग्रदूतों में थे, जिन्होंने इस औद्योगिक परिवर्तन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसी योगदान के कारण उन्हें, “कोयंबटूर का धन निर्माता” (Wealth Creator of Coimbatore) भी कहा गया।

लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि उद्योग खड़ा करने वाला यह व्यक्ति केवल कारखानों तक सीमित नहीं रहा।

जब अधिकांश लोग मशीनों में भविष्य देख रहे थे…

जी. डी. नायडू खेतों की ओर मुड़ गए।

और वहाँ भी उन्होंने वही किया, जो वे हमेशा करते थे—

समस्या देखी… और प्रयोग शुरू। 


खेती की प्रयोगशाला –

जिस व्यक्ति ने मशीनों के भीतर संभावनाएँ देखीं, उसी ने खेतों में भी भविष्य देखने की कोशिश की।

उस दौर में भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी—कम कृषि उत्पादन।

जी. डी. नायडू ने सोचा, अगर मशीनों को बेहतर बनाया जा सकता है, तो फसलों को क्यों नहीं?

यहीं से उन्होंने कृषि में प्रयोग करना शुरू कर दिया। 

उन्होंने कपास, मक्का और पपीते जैसी फसलों पर शोध किया और अधिक उपज देने वाली नई किस्में विकसित करने का प्रयास किया। 

उनके द्वारा विकसित कपास को आगे चलकर “नायडू कॉटन” के नाम से भी जाना गया।

यह कोई शौकिया प्रयोग नहीं था।

उनके खेत धीरे-धीरे एक खुली प्रयोगशाला में बदलने लगे, जहाँ बीज, मिट्टी और उत्पादन पर लगातार परीक्षण किए जाते थे।

उनके इन प्रयोगों ने वैज्ञानिकों का भी ध्यान आकर्षित किया। 

नोबेल पुरस्कार विजेता, डॉ. सी. वी. रमन और भारत के महान अभियंता सर एम. विश्वेश्वरैया ने भी उनके कार्यों में रुचि दिखाई और उनके प्रयोगों की खूब सराहना की।

लेकिन जी. डी. नायडू की बेचैनी अभी भी शांत नहीं हुई थी।

वे जानते थे कि केवल नई मशीनें बना देने या नई फसलें विकसित कर देने से देश आगे नहीं बढ़ेगा।

देश को ऐसे युवाओं की ज़रूरत थी, जो केवल किताबें न पढ़ें…

बल्कि अपने हाथों से मशीनें बनाना भी सीखें।

यहीं से उनका अगला सपना जन्म लेता है—

तकनीकी शिक्षा।


“डिग्री नहीं… कौशल चाहिए !”

जी. डी. नायडू का मानना था कि किसी देश का भविष्य केवल मशीनें खरीदने से नहीं बदलता।

उसे बदलते हैं वे लोग, जो उन मशीनों को समझते हैं, बनाते हैं और उनसे बेहतर मशीनें बनाने का साहस रखते हैं।

यही कारण था कि उन्होंने तकनीकी शिक्षा को अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य बना लिया।

लेकिन उनकी शिक्षा की परिभाषा उस समय की पारंपरिक शिक्षा से बिल्कुल अलग थी।

उनका मानना था कि एक अच्छा इंजीनियर केवल किताबें पढ़कर तैयार नहीं हो सकता।

उसे मशीनों के बीच रहना होगा…

उन्हें खोलना होगा…

गलतियाँ करनी होंगी…

और अपने हाथों से सीखना होगा।

इसी सोच के साथ वर्ष 1945 में कोयंबटूर में Arthur Hope Polytechnic की स्थापना में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आगे चलकर यही संस्थान भारत के प्रमुख तकनीकी शिक्षण संस्थानों में गिना जाने लगा।

जी. डी. नायडू स्वयं भी इसके प्रथम प्राचार्य बने।

लेकिन यहाँ भी वे परंपरागत ढर्रे पर चलने वालों में से नहीं थे।

उनका मानना था कि चार वर्ष की इंजीनियरिंग शिक्षा की बजाय, कम समय में अधिक व्यावहारिक प्रशिक्षण देकर भी, एक सक्षम इंजीनियर तैयार किया जा सकता है।

उन्होंने पाठ्यक्रम में व्यापक बदलावों का प्रस्ताव रखा।

वे चाहते थे कि छात्र कक्षा में कम और कार्यशाला में अधिक समय बिताएँ।

उनकी यह सोच उस दौर के लिए बेहद साहसिक थी।

लेकिन हर दूरदर्शी विचार की तरह इसे भी तत्काल स्वीकार नहीं किया गया।

प्रशासन के साथ मतभेद बढ़े और अंततः उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया।

समय बीतता गया…

लेकिन विडंबना देखिए।

आज पूरी दुनिया Skill-Based Learning, Hands-on Training, Experiential Learning और Learning by Doing जैसी अवधारणाओं की बात कर रही है।

यानी जिस सोच को जी. डी. नायडू लगभग आठ दशक पहले भारत में स्थापित करना चाहते थे…

दुनिया आज उसी दिशा में आगे बढ़ रही है।

शायद इसी कारण उन्हें केवल एक आविष्कारक कहना पर्याप्त नहीं होगा।

वे अपने समय से काफी आगे सोचने वाले एक दूरदर्शी व्यक्ति थे।


दुनिया देखी… और भारत के लिए सपने भी बड़े हो गए

जी. डी. नायडू की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे सीखने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। 

नई बात, या नया ज्ञान सीखने के लिए, वह केवल किसी एक जगह, एक किताब या एक व्यवस्था पर निर्भर नहीं रहे।

उन्होंने मशीनों से सीखा।

कामगारों से सीखा।

बाज़ार से सीखा।

और जब अवसर मिला, तो दुनिया से भी सीखा।

वे विदेशों की यात्रा पर गए। यूरोप और अमेरिका में उन्होंने कारखाने देखे, मशीनें देखीं, नई तकनीकें देखीं और यह समझने की कोशिश की कि औद्योगिक राष्ट्र अपने विकास की नींव कैसे रखते हैं।

उन यात्राओं ने उनकी सोच को और बड़ा कर  दिया।

उन्होंने देखा कि किसी देश की ताकत केवल बड़े-बड़े भाषणों से नहीं बनती। वह बनती है कारखानों से, प्रयोगशालाओं से, कुशल कामगारों से, समय की पाबंदी से और उस व्यवस्था से, जो नए विचारों को आगे बढ़ने का अवसर देती है।

शायद यही कारण था कि भारत लौटकर उन्होंने केवल मशीनें बनाने पर ध्यान नहीं दिया।

उन्होंने उद्योग खड़े किए।

तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा दिया।

परिवहन व्यवस्था को संगठित किया।

कृषि में प्रयोग किए।

और बार-बार यह सिद्ध करने की कोशिश की, कि भारत केवल तकनीक खरीदने वाला देश नहीं, तकनीक बनाने वाला देश भी बन सकता है।


विश्वास करना मुश्किल है… लेकिन यह सब भी जी. डी. नायडू ने किया था !

सस्ती कार का सपना…

साल 1952 – उस दौर में कार खरीदना आम भारतीय के लिए लगभग असंभव था। लेकिन जी. डी. नायडू ने लगभग ₹2,000 की लागत वाली दो-सीटर कार का प्रोटोटाइप तैयार कर लिया था। उनका सपना था कि कार केवल अमीरों की नहीं, आम लोगों की भी सवारी बने। लेकिन यह परियोजना बड़े पैमाने पर उत्पादन तक नहीं पहुँच सकी।

अगर उनका यह सपना पूरा होता, तो शायद आज भारत की ऑटोमोबाइल कहानी कुछ अलग होती। 

 

सिर्फ़ 11 घंटे में एक पक्का मकान –

जी. डी. नायडू केवल मशीनों तक सीमित नहीं थे।

उन्होंने एक बार सुबह नींव रखी और लगभग 11 घंटे के भीतर कम लागत वाला कंक्रीट का मकान तैयार करके दिखा दिया।

उनका उद्देश्य रिकॉर्ड बनाना नहीं, बल्कि यह साबित करना था कि सही तकनीक से तेज़, सस्ता और मज़बूत निर्माण संभव है।

 

आम आदमी के लिए रेडियो  

आज रेडियो एक साधारण वस्तु लगता है।

लेकिन एक समय ऐसा था जब इसे खरीदना हर किसी के बस की बात नहीं थी।

रेडियो विलासता का प्रतीक था।

1941 में एक अच्छा रेडियो लगभग ₹175 का आता था, जो उस समय आम आदमी की पहुँच से बाहर था।

जी. डी. नायडू चाहते थे कि तकनीक आम आदमी की पहुँच में आए।

जी. डी. नायडू ने घोषणा की कि वे पाँच-वाल्व वाला रेडियो केवल ₹70 में बना सकते हैं।

उनका सपना साफ़ था—तकनीक अमीरों की सुविधा नहीं, आम लोगों की पहुँच में होनी चाहिए।

कैमरे के पीछे भी वही जिज्ञासु मन – 

बहुत कम लोग जानते हैं कि जी. डी. नायडू एक उत्कृष्ट फ़ोटोग्राफ़र और फ़िल्म निर्माता भी थे।

उन्होंने विदेश यात्राओं के दौरान अनेक ऐतिहासिक घटनाओं का फिल्मांकन किया और कई राष्ट्रीय नेताओं की दुर्लभ तस्वीरें भी अपने कैमरे में कैद कीं।

उन्होंने लंदन में राजा जॉर्ज पंचम के अंतिम संस्कार का फिल्मांकन किया। उनके कैमरे ने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, और सुभाष चंद्र बोस  जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को भी कैद किया।  

उनके लिए कैमरा भी उतना ही महत्वपूर्ण उपकरण था, जितना कोई इंजन या मशीन।

उन्होंने कैमरे के लेंस की फोकस दूरी को अधिक तेज़ और सटीक ढंग से समायोजित करने के लिए एक विशेष डिस्टेंस एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म विकसित किया।

यह उनके व्यक्तित्व की एक खास पहचान थी—वे हर तकनीक को इस नज़र से देखते थे कि उसे और बेहतर, अधिक सरल तथा अधिक उपयोगी कैसे बनाया जा सकता है।

 

विदेश गए… लेकिन केवल घूमने नहीं

जी. डी. नायडू जब यूरोप और अमेरिका गए, तो उनका उद्देश्य पर्यटन नहीं था।

वे कारखानों में जाते, नई मशीनों को देखते, इंजीनियरों से बात करते और समझते कि विकसित देश आगे कैसे बढ़ रहे हैं।

भारत लौटने के बाद वे उन विचारों को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढालने का प्रयास करते।

वे मशीनें नहीं, सोच लेकर लौटे

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि वे विदेशी तकनीक की नकल नहीं करते थे।

वे उसे समझते थे, उसकी कमियाँ पहचानते थे और फिर भारतीय ज़रूरतों के अनुसार उसे सरल, सस्ता और उपयोगी बनाने का प्रयास करते थे।

शायद इसी कारण उनके अधिकांश आविष्कार सीधे आम लोगों की ज़िंदगी से जुड़े हुए थे।

आज जिसे हम “फ्रूगल इनोवेशन” या “Make in India” की भावना कहते हैं, उसकी झलक उनके काम में दशकों पहले दिखाई देती है। 

 

एक ब्लेड… जिसने विदेशों में भी पहचान बनाई

सिर्फ़ इलेक्ट्रिक रेज़र ही नहीं, जी. डी. नायडू ने बेहद पतले शेविंग ब्लेड भी विकसित किए।

उनके ब्लेड को 1936 में जर्मनी के Leipzig Trade Fair में पुरस्कार भी मिला।

यह उस दौर में भारतीय इंजीनियरिंग के लिए बड़ी उपलब्धि थी।


एक प्रयोगशाला… जिसका कोई एक विषय नहीं था

GD Naidu kisi ek vishay se judhe nahi rahe. unhone har kshetr me khud ko aazmaya. Jo bhi vastu ya vishay un ko ba jaata, usi par kaam karte, usi ko apni pryogshala banate.

किसी दिन वे मोटर पर काम करते थे।

अगले दिन रेडियो पर।

फिर कैमरे पर।

फिर खेती पर।

फिर भवन निर्माण पर।

जी. डी. नायडू के लिए विज्ञान अलग-अलग विषयों में बँटा हुआ नहीं था। उनके लिए हर समस्या एक नई प्रयोगशाला थी और हर प्रयोग एक नए समाधान की शुरुआत।

यह तो केवल कुछ उदाहरण हैं।

जी. डी. नायडू के नाम सौ से अधिक आविष्कार, तकनीकी सुधार और प्रयोग दर्ज हैं। शायद यही कारण है कि उन्हें कई लोग “भारत का एडिसन” और “मिरेकल मैन” कहकर याद करते हैं।

========

उनकी सोच अपने समय से काफी आगे की थी। 

उनके सपने बहुत बड़े थे।   

लेकिन यही सपना उन्हें कई बार व्यवस्था से टकराव की ओर भी ले गया।

क्योंकि जो व्यक्ति समय से आगे सोचता है, वह अक्सर अपने समय की सीमाओं से टकराता है।

जी. डी. नायडू के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।


इतिहास के हाशिए पर…

 कैसी विडंबना है, कि —

एक ऐसा व्यक्ति…

जिसने तीसरी कक्षा के बाद स्कूल छोड़ दिया।

जिसने मोटरसाइकिल खोल-खोलकर इंजीनियरिंग सीखी।

जिसने सौ से अधिक आविष्कार किए।

जिसने परिवहन व्यवस्था को नई दिशा दी।

जिसने कृषि में प्रयोग किए।

जिसने तकनीकी शिक्षा को नया दृष्टिकोण देने का प्रयास किया।

आख़िर उसका नाम आज हमारे बीच इतना अपरिचित क्यों है?

इस प्रश्न का उत्तर इतना सरल नहीं है।

कुछ इतिहासकार मानते हैं कि जी. डी. नायडू के कई विचार अपने समय से बहुत आगे थे। उनकी कम लागत वाली कार, तकनीकी शिक्षा में आमूलचूल बदलाव के सुझाव और कई औद्योगिक योजनाएँ उस दौर की नीतियों और व्यवस्था के साथ पूरी तरह मेल नहीं खा सकीं।

दूसरी ओर, यह भी सच है कि उन्होंने अपने अधिकांश कार्य दक्षिण भारत, विशेषकर कोयंबटूर और उसके आसपास केंद्रित होकर किए। राष्ट्रीय स्तर पर उनके योगदान का उतना व्यापक दस्तावेज़ीकरण नहीं हुआ, जितना होना चाहिए था।

समय बीतता गया।

नई पीढ़ियाँ बदलती गईं।

पाठ्यपुस्तकें बदलीं।

विज्ञान और उद्योग की नई कहानियाँ लिखी गईं।

लेकिन उन्हीं पन्नों के बीच कहीं जी. डी. नायडू का नाम धीरे-धीरे छोटा होता गया।

आज स्थिति यह है कि देश के बाहर के कई तकनीकी इतिहासकार उनका उल्लेख तो करते हैं, लेकिन भारत के अधिकांश विद्यार्थियों ने उनका नाम तक नहीं सुना।

क्या यह केवल संयोग है?

या फिर हम अपने उन लोगों को याद रखने में उतने अच्छे नहीं हैं, जिन्होंने शोर कम किया, लेकिन काम ज़्यादा किया?

इस प्रश्न का उत्तर शायद हर पाठक अलग-अलग देगा।

लेकिन एक बात निर्विवाद है—

जी. डी. नायडू का जीवन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि किसी व्यक्ति की महानता केवल उसके सम्मानों से नहीं आँकी जा सकती। कभी-कभी किसी व्यक्ति का वास्तविक योगदान उसके समय से बहुत आगे होता है, और उसका मूल्यांकन आने वाली पीढ़ियाँ करती हैं।

हमारा प्रयास इतिहास के पन्नों में कहीं गुम हुए उन नामों को खोजकर उन्हें उनका यथोचित स्थान और सम्मान दिलाना है, जो कभी मुख्य धारा का हिस्सा थे, लेकिन समय के साथ इतिहास के हाशिए पर चले गए।


 

जी. डी. नायडू की प्रमुख उपलब्धियाँ, आविष्कार और नवाचार

Electrical & Electronics

  • भारत की पहली स्वदेशी इलेक्ट्रिक मोटर
  • Rasant इलेक्ट्रिक रेज़र
  • सुपर-थिन शेविंग ब्लेड
  • पाँच-वाल्व UMS रेडियो
  • इलेक्ट्रॉनिक काउंटिंग डिवाइस
  • Magno-Flex Testing Unit
  • कार्बन रेसिस्टर निर्माण
  • माइका कैपेसिटर निर्माण
  • टेप रिकॉर्डर निर्माण
  • रेडियोग्राम निर्माण
  • घरेलू विद्युत उपकरणों में सुधार
  • छोटे DC मोटरों पर प्रयोग

Mechanical Innovations

  • केरोसीन से चलने वाला पंखा
  • फल का रस निकालने वाली मशीन (Juicer)
  • मैकेनिकल कैलकुलेटर
  • टैम्पर-रेज़िस्टेंट वोट रिकॉर्डिंग मशीन
  • कैमरा लेंस डिस्टेंस एडजस्टर
  • आंतरिक दहन (Four-Stroke IC Engine) पर स्वतंत्र विकास
  • विभिन्न मशीनों के स्पेयर पार्ट्स का स्वदेशी निर्माण
  • मशीनों का तकनीकी पुनःडिज़ाइन (Technical Redesign)

Automobile

  • ₹2000 की दो-सीटर कार का प्रोटोटाइप
  • बस टाइमिंग डिस्प्ले सिस्टम
  • बस रखरखाव की वैज्ञानिक प्रणाली
  • परिवहन प्रबंधन मॉडल
  • स्वदेशी ऑटोमोबाइल स्पेयर पार्ट्स निर्माण
  • बसों के लिए दक्ष सर्विसिंग मॉडल
  • UMS परिवहन नेटवर्क की स्थापना
  • परिवहन में समय-प्रबंधन प्रणाली

Industrial

  • National Electric Works (NEW)
  • UMS Radio Factory
  • UMS Razor Factory
  • अनेक विनिर्माण इकाइयों की स्थापना
  • भारतीय उद्योगों के लिए मशीन निर्माण
  • कम लागत वाले औद्योगिक समाधान
  • उत्पादन प्रक्रियाओं में सुधार

Agriculture

  • Naidu Cotton
  • उच्च उपज वाली कपास
  • उच्च उपज वाली मक्का
  • उच्च उपज वाला पपीता
  • हाइब्रिड खेती पर प्रयोग
  • कृषि को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विकसित करने का प्रयास

Construction

  • लगभग 11 घंटे में कम लागत वाला कंक्रीट मकान
  • तेज़ निर्माण तकनीक का प्रदर्शन

Photography & Film

  • ऐतिहासिक घटनाओं का फिल्मांकन
  • राजा George V के अंतिम संस्कार का फिल्मांकन
  • Mahatma Gandhi की तस्वीरें
  • Jawaharlal Nehru की तस्वीरें
  • Subhas Chandra Bose की तस्वीरें
  • औद्योगिक डॉक्यूमेंट्री फिल्में

Education

  • Arthur Hope Polytechnic की स्थापना में प्रमुख भूमिका
  • व्यावहारिक (Hands-on) तकनीकी शिक्षा का मॉडल
  • “Learning by Doing” की अवधारणा को बढ़ावा
  • इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में सुधार के प्रस्ताव
  • कौशल-आधारित शिक्षा पर ज़ोर

Public Utility & Social Innovation

  • कम लागत की तकनीक विकसित करने का दृष्टिकोण
  • आम जनता के लिए सुलभ तकनीकी समाधान
  • विज्ञान प्रदर्शनी (Science Exhibition) की स्थापना
  • G.D. Science Museum की स्थापना की पहल
  • तकनीकी जागरूकता अभियान
  • कर्मचारियों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ और शोध छात्रवृत्तियाँ

“इतिहास के हाशिए पर…” के बारे में  –

2 thoughts on “जी. डी. नायडू – ‘भारत के एडीसन’”

  1. JYOTI KUMAR

    शानदार प्रस्तुति! जीडी नायडू जी का जीवन हर भारतीय के लिए गर्व और प्रेरणा का स्रोत है। बहुत ही सटीक और शानदार तरीके से लिखा गया लेख।

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद, ज्योति जी। 🙏

      आपकी सराहना मेरे लिए बहुत मायने रखती है। जी. डी. नायडू जैसे असाधारण व्यक्तित्वों को नई पीढ़ी तक पहुँचाना ही इस लेख का उद्देश्य है। यदि इस लेख ने आपको उनके बारे में जानने और सोचने के लिए प्रेरित किया, तो मेरा प्रयास सफल माना जाएगा।

      आपका स्नेह और प्रोत्साहन आगे भी ऐसे ही शोधपरक और रोचक विषयों पर लिखने की प्रेरणा देता रहेगा। हार्दिक आभार। 🌸

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