क्या तर्जनी पापी है? दोषी है?

लेखक – कुलदीप ठुसू ‘पम्पोष’

तर्जनी — वही, अंगूठे के ठीक बगल वाली उँगली, जिसे Index Finger कहते हैं। उसी उंगली की बात कर रहा हूँ।
क्या वह दोषी है? शापित है? आखिर पूजा और अन्य धार्मिक कार्यों में, इस उंगली को दूर क्यों रखा जाता है?
हमें बचपन से यही सिखाया गया है कि पूजा करते समय इस उंगली, यानि तर्जनी का प्रयोग मत करो।
इस उंगली से,
तिलक नहीं लगाया जाता,
माला नहीं फेरी जाती, और
यहाँ तक कि पूजा सामग्री भी इस उंगली से नहीं उठाई जाती।
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किसी भी सभ्यता की पहचान केवल उसके बड़े ग्रंथों से नहीं होती।
कई बार उसकी पहचान उन छोटे-छोटे नियमों से भी होती है, जिन्हें लोग रोज़ निभाते हैं।
पूजा में तर्जनी का प्रयोग न करना भी ऐसा ही एक नियम है।
पहली नज़र में यह केवल एक धार्मिक अनुशासन दिखाई देता है।
थोड़ा गहराई में जाएँ, तो यह प्रतीकों की दुनिया खोल देता है।
जहाँ एक ही उँगली अलग-अलग परंपराओं में अलग-अलग अर्थ धारण कर लेती है।

किसी के अनुसार तर्जनी अहंकार का प्रतीक है।
तो कोई इसे अशुभ और अपवित्र मानते हैं।
कुछ कहते हैं कि शास्त्रों में इसका निषेध है।
जबकि कुछ विद्वान इसे गुरु, ज्ञान, जीवात्मा, और साक्षी होने का प्रतीक मानते हैं।
एक ही प्रश्न के इतने अलग अलग उत्तर, यह संकेत देते हैं कि विषय उतना सरल नहीं है, जितना सामान्यतः समझ लिया जाता है।

इसलिए इस लेख का उद्देश्य किसी एक मत को सही या गलत सिद्ध करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि इस परंपरा के पीछे कौन-कौन से विचार हैं, उनका आधार क्या है और उनमें से कौन-सी बातें शास्त्रों से आती हैं, कौन-सी आचार परंपरा से हैं, और कौन-सी बातें बाद की व्याख्याओं का परिणाम हैं।
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यदि इस विषय पर उपलब्ध प्राचीन ग्रंथों और पूजा-विधियों का अध्ययन किया जाए, तो एक रोचक बात सामने आती है।
अधिकांश स्थानों पर यह नहीं कहा गया कि तर्जनी स्वयं अशुभ है।
बल्कि यह बताया गया है कि किसी विशेष धार्मिक कर्म के लिए किस उँगली का प्रयोग करना चाहिए।
हाथ की पांचों उंगलियों के लिए अलग अलग नियम बनाए गए हैं।

धर्म ग्रंथों और पूजा पद्धति में हाथ की पांचों उंगलियां पंचमहाभूतों (पांच तत्वों) का प्रतिनिधित्व करती हैं। जैसे-

अंगूठा (Thumb): अग्नि तत्व।
तर्जनी (Index Finger): वायु तत्व।
मध्यमा (Middle Finger): आकाश तत्व।
अनामिका (Ring Finger): पृथ्वी तत्व।
कनिष्ठिका (Little Finger): जल तत्व।
इन्ही तत्वों के आधार पर, अलग अलग उंगलियों के अलग अलग नियम बनाए गए हैं।

अनामिका:
इस उंगली से तिलक लगाने से मानसिक शांति, समृद्धि और विजय प्राप्त होती है। देवताओं और स्वयं को इसी उंगली से तिलक लगाया जाता है।

मध्यमा:
इस उंगली से तिलक लगाने से आयु लंबी होती है। इसे पितरों या बुजुर्गों के सम्मान में उपयोग किया जाता है।

अंगूठा:
अंगूठे से तिलक लगाने से ज्ञान और मुक्ति मिलती है। अतिथि या युद्ध पर जाने वाले को इससे तिलक लगाते हैं।

तर्जनी:
इस उंगली से जीवित व्यक्ति को तिलक लगाना वर्जित है। यह केवल मृत व्यक्ति या मोक्ष प्राप्ति की साधना में उपयोग होती है।

कनिष्ठिका:
कुछ प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, ऋषियों से जुड़े कार्यों या ऋषि तर्पण व पूजन के लिए कनिष्ठिका उंगली का महत्व माना गया है।
कुछ विशेष गुप्त तांत्रिक पद्धतियों या विशिष्ट ज्योतिषीय अनुष्ठानों में, ग्रहों, (विशेषकर बुध ग्रह, जिसका प्रतिनिधित्व कनिष्ठिका करती है), को शांत या संतुलित करने के लिए इस उंगली से तिलक लगाने का विधान है।
कुछ पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, जो बुजुर्ग १०० वर्ष से अधिक की आयु पूरी कर चुके होते हैं, उन्हें सम्मान देने के लिए बहुत ही हल्के दबाव के साथ कनिष्ठिका उंगली से तिलक लगाने की बात कही जाती है।
सामान्य पूजा विधि मे, कनिष्ठिका का प्रयोग, वर्जित माना जाता है। कनिष्ठिका उंगली जल तत्व और बुध ग्रह से संबंधित है। पूजा पद्धति में इसे सबसे कमजोर और संवेदनशीलता की उंगली माना जाता है, इसलिए ऊर्जा के सही प्रवाह और आज्ञा चक्र को जागृत करने के लिए इसे मुख्य पूजा कार्यों (जैसे देवताओं या स्वयं को तिलक करने) से दूर रखा जाता है
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अनामिका और मध्यमा:
माला फेरते समय मनके को हमेशा मध्यमा उंगली पर रखा जाता है, और अंगूठे से आगे बढ़ाया जाता है।
इस कार्य में, अनामिका उंगली का सहारा भी लिया जा सकता है।
मगर माल जप मे, तर्जनी का प्रयोग निषेध माना गया है।

आचमन और तर्पणदेव कार्य:
देवताओं को जल अर्पित करते समय या आचमन करते समय जल उंगलियों के अग्रभाग (देवतीर्थ) से गिराया जाता है।

पितृ कार्य:
पितरों को तर्पण देते समय जल अंगूठे और तर्जनी के बीच के भाग (पितृतीर्थ) से गिराया जाता है।

तांत्रिक क्रिया:
कुछ तांत्रिक क्रियाओं में, जैसे मारण, मोहन, उच्चाटन आदि में, केवल तर्जनी उंगली का उपयोग किया जाता है।

विशेष मंत्र जाप:
शत्रु नाश के मंत्रों का जाप करते समय भी इसी उंगली से माला घुमाई जाती है।
इसके अलावा, विशेष तांत्रिक हवनों में, जहां नकारात्मक ऊर्जा को शांत करना हो, आहुति देते समय तर्जनी का उपयोग किया जाता है।
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इस दृष्टि से देखा जाए तो तर्जनी का प्रश्न किसी एक उँगली का नहीं, बल्कि पूरी पूजा-पद्धति का एक हिस्सा है।
यह केवल एक उँगली की कहानी नहीं, बल्कि उस विचार-परंपरा की कहानी है, जो हर नियम के पीछे एक अर्थ खोजती है।
अर्थात् परंपरा ने केवल यह नहीं बताया कि तर्जनी से क्या न करें, बल्कि यह भी बताया कि किस कार्य के लिए कौन-सी उँगली अधिक उपयुक्त मानी गई है।
यानि शास्त्र हमें यह बताते हैं कि क्या करना है।
बाद में समाज ने उसका एक और अर्थ निकाला—क्या नहीं करना है।
यहीं से लोकमान्यता और शास्त्रीय विधान के बीच का अंतर दिखाई देता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि लोकमान्यता गलत है।
बल्कि यह कि उसका आधार और उसका विस्तार, दोनों अलग-अलग बातों को समझे बिना निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
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अब फिर से पहले वाले प्रश्न पर आते हैं। शस्त्रों ने तो अलग अलग उंगलियों के नियम बताए, फिर लोक परंपरा में, केवल तर्जनी के प्रति ही इतना भेदभाव क्यों?
इस प्रश्न के कई उत्तर हैं।

तर्जनी अहंकार का प्रतीक-
सबसे लोकप्रिय व्याख्या यह है कि तर्जनी अहंकार का प्रतीक है।
यह धारणा केवल धार्मिक कल्पना नहीं लगती, बल्कि हमारे व्यवहार से भी जुड़ी हुई दिखाई देती है।
हम जब किसी को आदेश देते हैं…
किसी पर आरोप लगाते हैं…
किसी को चेतावनी देते हैं…
या किसी दिशा की ओर संकेत करते हैं…
तो प्रायः तर्जनी का ही प्रयोग करते हैं।
संभव है कि इसी कारण समय के साथ, यह उँगली, ‘मैं’, अहंकार, अधिकार और निर्देश का प्रतीक बन गई हो।

यदि पूजा का उद्देश्य समर्पण है, तो ईश्वर के सामने इस उँगली को अलग रखना एक प्रतीकात्मक संदेश भी हो सकता है—क्योंकि पूजा में अहंकार का कोई स्थान नहीं, शायद इसीलिए तर्जनी को वर्जित किया गया।

यह व्याख्या सुनने में सुंदर लगती है।
लेकिन क्या यही अंतिम कारण है?
शायद नहीं।
क्योंकि भारतीय परंपरा, तर्जनी को केवल अहंकार से जोड़कर नहीं देखती।
भारतीय परंपरा में कई स्थानों पर, इसी तर्जनी को गुरु का प्रतीक भी माना गया है।

तर्जनी: गुरु का प्रतीक –
हस्तसमुद्रिका में तर्जनी के नीचे स्थित भाग को ‘गुरु पर्वत’ कहा गया है। ज्योतिष में इसका संबंध देवगुरु बृहस्पति से जोड़ा जाता है और इसी कारण पुखराज धारण करने का विधान भी सामान्यतः इसी उँगली में मिलता है।

इसके अतिरिक्त, गुरु जब ज्ञान देते हैं, तो इसी उंगली को उठाकर शिष्य को संबोधित कर मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए इस उंगली को, गुरु और ज्ञान का प्रतीक भी माना गया है।
यानी एक ओर वही तर्जनी पूजा के कुछ कर्मों में अलग रखी जाती है, तो दूसरी ओर वही ज्ञान, धर्म, नेतृत्व और गुरु का प्रतीक भी बन जाती है।

तर्जनी का ‘साक्षी’ होने का प्रतीक –
इतना ही नहीं, तर्जनी को ‘साक्षी’ भी कहा जाता है।
कुछ दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपराएँ एक अलग व्याख्या भी प्रस्तुत करती हैं।
उनके अनुसार तर्जनी को पूजा से इसलिए अलग रखा जाता है क्योंकि वह ‘कर्ता’ नहीं, बल्कि ‘साक्षी’ का प्रतीक है।
वेदान्त में ‘साक्षी भाव’ का अर्थ है—कर्म करते हुए भी भीतर से केवल दृष्टा बने रहना।
यद्यपि इस विचार को सीधे तर्जनी से जोड़ने वाले स्पष्ट शास्त्रीय प्रमाण सीमित हैं, फिर भी कई आचार्य इसे प्रतीकात्मक व्याख्या के रूप में स्वीकार करते हैं।

यह दृष्टिकोण हमें एक महत्वपूर्ण बात सिखाता है।
सनातन परंपरा में हर नियम केवल कर्मकाण्ड नहीं होता।
कई बार वही नियम मनुष्य की भीतरी अवस्था का भी संकेत बन जाता है।
इसलिए, यदि तर्जनी केवल अहंकार का ही प्रतीक होती, तो भारतीय परंपरा उसे इतना सम्मान शायद कभी न देती।

तर्जनी जीवात्मा का प्रतीक –
ज्ञान मुद्रा कुछ अलग ही संकेत देती है –
योग और वेदान्त की परंपरा में एक अत्यंत प्रसिद्ध मुद्रा है—ज्ञान मुद्रा।
इसमें अंगूठे और तर्जनी के अग्रभाग को मिलाया जाता है, जबकि शेष तीन उँगलियाँ सीधी रहती हैं।
इस मुद्रा की दार्शनिक व्याख्या यह है कि अंगूठा परमात्मा का और तर्जनी जीवात्मा का प्रतीक है। दोनों का मिलन आत्मज्ञान का संकेत माना जाता है।

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि वही तर्जनी, जिसे सामान्य पूजा में अलग रखा जाता है, ज्ञान की सर्वोच्च मुद्रा में परमात्मा से जुड़ती हुई दिखाई देती है।

पहली नज़र में यह विरोधाभास लगता है।
लेकिन सनातन परंपरा प्रतीकों को एक ही अर्थ में नहीं बाँधती। एक ही प्रतीक, अलग संदर्भों में अलग अर्थ ग्रहण कर सकता है।
इसी कारण तर्जनी को केवल अहंकार की उँगली कह देना भी अधूरा होगा, और केवल गुरु की उँगली कह देना भी, अधूरा ही होगा।

तो प्रश्न – क्या तर्जनी पापी है?
इस पूरे अध्ययन के बाद उत्तर है—नहीं।

तर्जनी न तो अपवित्र है और न ही दोषी।
पूजा-पद्धति में अनेकों नियम और मान्यताएं हैं, इस पूरे विषय को इसी दृष्टिकोण से देखना चाहिए।

हम जब वास्तविक अर्थों को भूल जाते हैं, तो धीरे धीरे नई मान्यताएं और परम्पराएं बननी शुरू हो जाती है। समाज में भ्रम फैलता है और कुछ अनावश्यक प्रश्न जन्म लेने लगते है।

जैसे –

“यदि भूल से तर्जनी का प्रयोग हो जाए तो क्या पूजा निष्फल हो जाती है?”

लोगों के मन में अक्सर एक प्रश्न घूमने लगता है, कि अगर भूलवश तर्जनी से तिलक लग जाए, पूजा की सामग्री छू जाए या माला का स्पर्श हो जाए, तो क्या पूजा निष्फल हो जाती है?
सनातन परंपरा में पूजा केवल बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि विधि, श्रद्धा और भाव—तीनों का समन्वय है।
शास्त्रों ने पूजा-विधि के नियम इसलिए बनाए कि साधना अधिक अनुशासित, शुद्ध और एकाग्र हो; न कि इसलिए कि छोटी-सी भूल पर ईश्वर अप्रसन्न हो जाएँ।
यदि अनजाने में कोई त्रुटि हो भी जाए, तो उसके लिए प्रायश्चित्त और क्षमा-प्रार्थना की परंपरा भी इसी कारण विकसित हुई, क्योंकि मनुष्य, संभवतः, त्रुटिहीन नहीं रह सकता।
इसका अर्थ यह भी नहीं हैं कि विधि का महत्व कम है।
यदि नियम ज्ञात हों, तो उनका पालन अवश्य करना चाहिए। किंतु यह मान लेना कि केवल एक उँगली के स्पर्श से पूरी पूजा व्यर्थ हो जाएगी, सनातन दर्शन की व्यापक और करुणामय दृष्टि के अनुरूप प्रतीत नहीं होता।
इसीलिए, सनातन परंपरा मे कहा जाता है कि , “विधि साधना को परिष्कृत करती है, लेकिन श्रद्धा उसे पूर्ण बनाती है।”

मीमांसा –
क्या हम किसी नियम को उसके कारण से अलग कर चुके हैं?
समय के साथ लगभग हर परंपरा के साथ यही होता है।
पहले कारण याद रहता है।
फिर केवल नियम बचता है।
और कुछ पीढ़ियों बाद लोग नियम का पालन तो करते हैं, लेकिन उसका आधार भूल जाते हैं।
संभव है, तर्जनी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ हो।

सनातन परंपरा, सुनियोजित विधियों, नियमों, श्रद्धा और भक्ति के आधार पर काम करती है। सनातन परंपरा में प्रश्न करना, ज्ञान प्राप्त करने की पहली सीढ़ी है। प्रश्नों की इसी सीढ़ी पर चढ़कर, ज्ञान के शिखर पर पहुँच जा सकता है।
समस्या वहाँ से शुरू होती है, जब हम प्रश्न करना छोड़ देते हैं।
समय के साथ हम नियम तो याद रखते हैं, लेकिन उनके पीछे का कारण भूल जाते हैं।
फिर परंपरा केवल “ऐसा ही करना चाहिए”….. “बड़े-बूढ़े , पीढ़ियों से ऐसा ही करते आए हैं ” – जैसी बातों तक सीमित होकर रह जाती है।
इस से परंपरा, केवल “नियम” बन कर जीवित तो रहती है, लेकिन उसके पीछे का संवाद धीरे-धीरे कम होता जाता है।

जबकि सनातन की शक्ति केवल उसके नियमों में नहीं, बल्कि उन नियमों के पीछे छिपे विचारों में है।

अगली बार जब पूजा के समय, तर्जनी स्वतः पीछे रह जाए, तो उसे केवल निषेध के रूप में न देखिए। उसे उस परंपरा के एक छोटे-से प्रतीक के रूप में देखिए, जिसने साधारण-से साधारण आचरण को भी अर्थ, अनुशासन और दर्शन से जोड़ने का प्रयास किया।

क्योंकि अंततः प्रश्न केवल तर्जनी का नहीं है।

प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी परंपराओं का पालन केवल आदत से करते हैं, या उन्हें समझकर भी जीते हैं?

शायद यही प्रश्न, इस पूरे लेख का वास्तविक उत्तर भी है।


~~~~~~~~~~~~~~ विराम ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

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