लेखक: कुलदीप ठुसू ‘पम्पोष’
पारा 40 के पार… और चरमरा गई पूरी व्यवस्था!
सड़कें पिघलीं, शहर झुलसे, नदियाँ सूखीं—
यूरोपीय महाद्वीप पर भीषण गर्मी के कहर का पूरा विश्लेषण।
“भारत के कई हिस्सों में 45°C से 48°C तक का तापमान हर साल सामान्य माना जाता है। फिर वही गर्मी यूरोप के लिए इतना बड़ा संकट क्यों बन गई? इस बार बढ़ता पारा केवल मौसम का एक आँकड़ा नहीं रहा। उसने सड़कों, रेल, हवाई अड्डों, नदियों, बिजली व्यवस्था और लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी—सबको प्रभावित किया। यह केवल एक हीटवेव नहीं है, बल्कि मौसम, भूगोल, इंजीनियरिंग और बदलती जलवायु के ऐसे मेल का परिणाम है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।”
क्या सचमुच 40°C इतनी बड़ी बात है?
भारत में 40°C का तापमान, शायद किसी को भी हैरान नहीं करेगा। हमारे यहाँ दिल्ली, राजस्थान, विदर्भ, बुंदेलखंड या उत्तर भारत के कई इलाकों में 45°C से 48°C तक तापमान पहुँचना कोई नई बात नहीं है। गर्मी परेशान ज़रूर करती है, लेकिन ज़िंदगी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ती रहती है। बाज़ार खुले रहते हैं, सड़कों पर ट्रैफिक चलता रहता है और लोग अपने अपने कामों में व्यस्त रहते हैं।
लेकिन इसी तापमान ने इस साल, यूरोप की तस्वीर ही बदल दी।
यूरोप को ठंडे क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। यहाँ पूरे साल का औसत तापमान, 9°C से 12°C के बीच रहता है। लेकिन इस साल, मई -जून के महीनों में, अचानक से ही भीषण गर्मी पड़ने लगी।
स्पेन, फ्रांस, इटली, पुर्तगाल और बाल्कन क्षेत्र के कई हिस्सों में तापमान, लगभग 44°C तक पहुँच गया। यह यूरोप जैसे ठंडे प्रदेश के लिए सामान्य घटना नहीं थी।
यूरोप के कई देशों ने Red Heat Alert जारी किया। स्कूलों का समय बदला गया, कुछ रेल सेवाएँ प्रभावित हुईं, जंगलों में आग लगी, अस्पतालों में गर्मी से बीमार लोगों की संख्या बढ़ गई और प्रशासन लोगों से दोपहर के समय घरों से बाहर न निकलने की अपील करने लगा।
सोशल मीडिया पर सड़कों और गाड़ियों के टायर पिघलने की तस्वीरें वाइरल होने लगीं । कई लोगों ने धूप में खाना पकाने जैसे वीडियो भी बनाए। इनमें से कुछ तो वास्तविक थे,लेकिन कुछ बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए।
लेकिन इस Heat Wave के कारण, जून महीने के अंत तक लगभग 1300 लोगों की मौत हो गई। यह सरकारी आंकड़ा है।
इस से एक बात तो साफ़ होगाई —
यूरोप ऐसी गर्मी के लिए तैयार नहीं था।
आखिर यूरोप में इतनी भीषण गर्मी क्यों पड़ी ?
इस प्रश्न का उत्तर जानने से पहले हमको यह समझना होगा कि तापमान क्या है? तापमान को कैसे मापा जाता है?
इस के बाद ही हम, इस भीषण गर्मी के रहस्य को समझ पाएंगे।
तापमान केवल एक संख्या नहीं है
हम अक्सर मौसम ऐप खोलकर सिर्फ़ एक आँकड़ा देखते हैं—40°C… 42°C… 45°C।
लेकिन वैज्ञानिक केवल यह आँकड़े नहीं देखते।
वे यह भी देखते हैं कि —
- हवा में नमी (Humidity) कितनी है?
- धूप कितनी तीखी है?
- हवा चल रही है या नहीं?
- रात में तापमान कितना नीचे जाता है?
- शहर गर्मी को कितनी देर तक अपने भीतर रोककर रखता है?
यानी…
अगर दो अलग अलग स्थानों पर तापमान एक जैसा भी हो, तब भी, इन दोनों स्थानों पर इसका असर बिल्कुल अलग अलग भी हो सकता है।
इस बात को एक उदाहरण से समझते हैं।
43°C का तापमान मानव शरीर के लिए कहीं भी गंभीर होता है।
लेकिन शरीर उस गर्मी को कितना सह पाएगा, यह आसपास के वातावरण पर निर्भर करता है।
हमारा शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए पसीना निकालता है।
जब पसीना त्वचा से उड़ता है, तो वह शरीर की अतिरिक्त गर्मी भी साथ ले जाता है। इसी वजह से हमें राहत मिलती है।
लेकिन यदि हवा में पहले से ही नमी (Humidity) बहुत अधिक हो, तो पसीना आसानी से नहीं सूखता। ऐसे में शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती।
इसी कारण कई बार 35°C का उमस भरा मौसम, 43°C की सूखी गर्मी से भी ज़्यादा परेशान कर सकता है।
यानी…
गर्मी का असर केवल थर्मामीटर नहीं, बल्कि पूरा वातावरण तय करता है।
क्या सड़कें सचमुच पिघल गई थीं?
यह इस हीटवेव का सबसे चर्चित सवाल था।
उत्तर है—
हाँ… लेकिन पूरी बात इतनी सरल नहीं है।
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि सड़कें मोम की तरह पिघलकर बहने नहीं लगतीं।
ज़्यादा गर्मी पड़ने से, सड़कों की, ऊपरी सतह मुलायम पड़ गई। भारी वाहनों का दबाव पड़ने पर उस पर निशान बनने लगे, और कुछ जगहों पर सड़कें, चिपचिपी महसूस होने लगीं।
तो क्या यूरोप की सड़कें, भारत की सड़कों से कमजोर हैं?
नहीं। ऐसा नहीं है।
असल में भारत और यूरोप की सड़कें अलग-अलग मौसम को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं।
भारत में गर्मी को ध्यान में रखते हुए, सड़कें बनाने के लिय, बिटुमेन ग्रेड का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें अधिक गर्मी और तापमान को सहन की क्षमता होती है।
वहीं, यूरोप के अधिकांश हिस्सों में बर्फ, जमाव और शून्य से नीचे चला जाने वाला तापमान रहता है। इसलिए वहाँ कई जगह अपेक्षाकृत अधिक लचीले बिटुमेन मिश्रण का उपयोग किया जाता है, ताकि सड़कें ठंड में चटकें नहीं।
यानी…
भारत की सड़कें, जिस प्रकार से बनाई जाती हैं, वो अगर उत्तरी यूरोप की कड़ाके की ठंड वाले क्षेत्रों में बिछा दी जाए, तो उसके टूटने का खतरा बढ़ सकता है।
और वहीं …
यूरोप की सड़कें यदि राजस्थान जैसी जलवायु की चपेट में आगाईं, तो उनके मुलायम पड़ने, या पिघलने की संभावना बढ़ सकती है।
इसलिए यह सड़कों की कमजोरी नहीं है।
बल्कि, यह दो अलग-अलग जलवायु के लिए अपनाई गई दो अलग-अलग तरह की तकनीक है।
बिटुमेन और एस्फाल्ट में क्या अंतर है?
सड़क बनाने में दो तरह के मटेरियल्स का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होता है —
Bitumen (बिटुमेन) और Asphalt (एस्फाल्ट)।
बिटुमेन पेट्रोलियम से मिलने वाला काला, चिपचिपा पदार्थ है। इसका काम सड़क में मौजूद गिट्टी और रेत को मजबूती से बाँधकर रखना होता है। इसे सड़क का Binder (बंधनकारी पदार्थ) कहा जाता है।
वहीं एस्फाल्ट वह तैयार मिश्रण है जिससे सड़क बनाई जाती है। इसमें बिटुमेन के साथ गिट्टी, रेत और दूसरे खनिज मिलाए जाते हैं।
इसे एक आसान उदाहरण से समझिए।
सीमेंट अकेले मकान नहीं बनाता।
सीमेंट, रेत और बजरी मिलकर कंक्रीट बनाते हैं।
ठीक उसी तरह—
बिटुमेन सड़क का “सीमेंट” है।
और
एस्फाल्ट सड़क का “कंक्रीट”।
यानी जब सड़क की ऊपरी सतह मुलायम पड़ती है, तो वास्तव में एस्फाल्ट में मौजूद बिटुमेन अधिक गर्म होकर अपनी कठोरता खोने लगता है। यहाँ फिर से बता दूँ, कि भारत की सड़कें, ऐस्फॉल्ट से बनतीं हैं, और वहीं दूसरी और, यूरोप की सड़कों के निर्माण में, बिटूमेन की मात्र, ज़्यादा होती है।

क्या टायर भी पिघलने लगे थे?
सोशल मीडिया पर ऐसे कई दावे किए गए।
लेकिन उपलब्ध तथ्यों के अनुसार यह कहना सही नहीं होगा कि कारों के टायर गर्मी से पिघल गए थे।
ज़्यादातर मामलों में हुआ यह कि मुलायम पड़ा एस्फाल्ट टायरों से चिपकने लगा। कुछ जगह अत्यधिक गर्म सतह के कारण टायरों का घिसाव बढ़ा, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में 40–45°C की हवा रबर के टायरों को पिघला नहीं देती।
यानी…
पिघलती सड़क और पिघलता टायर—दो अलग बातें हैं।
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आखिर यूरोप में इतनी गर्मी पड़ी ही क्यों – इसका विज्ञान समझते हैं।
इसके एक नहीं, बल्कि कई कारण हैं —-
पहले यूरोप का भूगोल समझिए
भारत और यूरोप की तुलना केवल तापमान से नहीं की जा सकती, क्योंकि दोनों की भौगोलिक परिस्थितियाँ बिल्कुल अलग हैं।
भारत का बड़ा हिस्सा उष्णकटिबंधीय (Tropical) क्षेत्र में आता है। यहाँ गर्मियाँ हमेशा से मौसम का हिस्सा रही हैं। इसलिए हमारे शहर, सड़कें, घर और यहाँ तक कि लोगों की दिनचर्या भी काफी हद तक गर्मी के अनुसार ढल चुकी है।
यूरोप की स्थिति अलग है।
यह महाद्वीप तीन ओर से समुद्रों से घिरा है। पश्चिम में अटलांटिक महासागर, दक्षिण में भूमध्यसागर और उत्तर में आर्कटिक क्षेत्र।
सामान्य परिस्थितियों में ये समुद्र, प्राकृतिक एयर कंडीशनर की तरह काम करते हैं और तापमान को संतुलित रखते हैं।
लेकिन इस बार प्रकृति ने अपना सामान्य नियम बदल दिया।
जेट स्ट्रीम… आसमान की अदृश्य हाईवे
पृथ्वी से लगभग 8 से 12 किलोमीटर ऊपर बहुत तेज़ गति से हवा बहती है। इसे Jet Stream (जेट स्ट्रीम) कहते हैं।
इसे आप आसमान की एक्सप्रेस-वे समझ सकते हैं।
यही तेज़ हवाएँ मौसम को आगे बढ़ाती रहती हैं। एक जगह की गर्म हवा दूसरी जगह चली जाती है, बादल बनते हैं, बारिश होती है और मौसम बदलता रहता है।
यानी…
जेट स्ट्रीम मौसम को रुकने नहीं देती।
लेकिन इस बार यही व्यवस्था कुछ दिनों के लिए धीमी पड़ गई।
और यहीं से शुरू हुआ असली संकट – ओमेगा ब्लॉक।
Omega Block आखिर है क्या?
नाम थोड़ा कठिन है, लेकिन इसे समझना आसान है।
जेट स्ट्रीम हमेशा सीधी नहीं बहती। वह समुद्र की लहरों की तरह ऊपर-नीचे घूमती रहती है।
कभी-कभी ये लहरें इतनी बड़ी हो जाती हैं कि उनका आकार ग्रीक भाषा के अक्षर Ω (ओमेगा) जैसा दिखाई देता है। और बहती हुई हवा को अपने अंदर थाम लेती है। यानि हवा का प्रवाह लगभग रुक जाता है।
जब ऐसा होता है, तो उसके बीच में एक मजबूत High Pressure System (उच्च-दाब क्षेत्र) बन जाता है।
इसी स्थिति को Omega Block (ओमेगा ब्लॉक) कहा जाता है।
यही इस पूरी हीटवेव का सबसे महत्वपूर्ण कारण था।
इस ओमेगा ब्लॉक के कारण, High Pressure System हवा को ऊपर उठने नहीं देता। इसके बजाय हवा धीरे-धीरे नीचे दबती रहती है।
नीचे आती हुई हवा और अधिक गर्म तथा शुष्क, यानि सूखी होती जाती है।
इसकी वजह से —
- बादल कम बनने लगते हैं।
- बारिश लगभग रुक जाती है।
- ठंडी हवाएँ भीतर नहीं आ पातीं।
- सूरज हर दिन लगातार ज़मीन को गर्म करता रहता है।
यानी…
गर्मी निकल नहीं पाती। गर्मी ब्लॉक हो जाती है। और तापमान हर दिन, बढ़ता चला जाता है।

लेकिन सिर्फ़ Omega Block ही जिम्मेदार नहीं था
अगर केवल Omega Block होता, तो शायद हालात इतने गंभीर भी नहीं होते।
इस बार कई परिस्थितियाँ एक साथ बन गईं।
सहारा से आई तपती हवा
यूरोप के दक्षिण में उत्तर अफ्रीका का Sahara Desert (सहारा मरुस्थल) है।
यह दुनिया के सबसे गर्म इलाकों में से एक है।
इस बार सहारा से आने वाली गर्म और शुष्क हवा दक्षिणी यूरोप तक पहुँच गई।
सामान्य दिनों में यह हवा कुछ समय बाद आगे बढ़ जाती।
लेकिन Omega Block ने उसे कई दिनों तक वहीं रोके रखा ।

भूमध्यसागर भी सामान्य से अधिक गर्म था
आमतौर पर समुद्र, अपने आसपास के इलाकों को ठंडक पहुँचाते हैं।
लेकिन इस बार भूमध्यसागर का पानी भी सामान्य से अधिक गर्म था।
यानी समुद्र, जो आमतौर पर राहत देता है, इस बार उतनी राहत नहीं दे पाया।
सूखी धरती ने आग में घी का काम किया
यह कारण अक्सर खबरों में नहीं बताया जाता।
जब मिट्टी में नमी होती है, तो सूरज की ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा पानी को भाप बनाने में खर्च हो जाता है।
लेकिन जब ज़मीन पहले से सूखी हो, तो वही ऊर्जा सीधे मिट्टी और हवा को गर्म करने लगती है।
यानी…
जितनी सूखी धरती, उतनी तेज़ गर्मी।

क्या आप जानते हैं?
यूरोप के कई हिस्सों में हवा का तापमान लगभग 40°C था,
लेकिन दोपहर में काली सड़कों और इमारतों की सतह 60°C से 70°C तक पहुँच गई थी।
यानी…
लोग केवल हवा की गर्मी नहीं, बल्कि ज़मीन से लौटती अतिरिक्त गर्मी भी झेल रहे थे।

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अगर वजह केवल मौसम थी…तो सबसे ज़्यादा परेशानी शहरों में ही क्यों हुई?
यूरोप की इस हीटवेव को और खतरनाक बनाने में एक और बड़ा कारण था—Urban Heat Island Effect (शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव)।
इसे समझना मुश्किल नहीं है।
मान लीजिए, एक तरफ पेड़ों से घिरा गाँव है और दूसरी तरफ कंक्रीट, काँच और डामर से बना आधुनिक शहर।
दोनों पर सूरज की धूप बराबर पड़ती है।
फिर भी शाम होने तक शहर गाँव से कई डिग्री ज़्यादा गर्म रहता है।
क्यों?
क्योंकि शहरों की सड़कें, इमारतें और छतें दिनभर सूरज की गर्मी सोखती रहती हैं। रात में वही गर्मी धीरे-धीरे वापस निकलती है। इसलिए शहर देर रात तक भी पूरी तरह ठंडे नहीं हो पाते।
पेड़ों की कमी, वाहनों की गर्मी और एयर कंडीशनरों से बाहर निकलने वाली गर्म हवा भी इस समस्या को और बढ़ा देती है।
यही Urban Heat Island Effect है।

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यूरोप के घर भी इस मौसम के लिए नहीं बने थे
भारत में घर बनाते समय गर्मी को ध्यान में रखा जाता है। खुली खिड़कियाँ, छज्जे, हवा के आने-जाने की व्यवस्था और अब पंखे तथा AC आम हो चुके हैं।
यूरोप की प्राथमिकता अलग रही है।
वहाँ दशकों तक सबसे बड़ी चुनौती ठंड थी।
इसीलिए घर इस तरह बनाए गए कि सर्दियों में गर्मी बाहर न निकले।
मोटा Insulation (ऊष्मारोधन), डबल-ग्लेज़्ड खिड़कियाँ और सीमित वेंटिलेशन सर्दियों में ऊर्जा बचाते हैं।
लेकिन लंबे समय तक चलने वाली हीटवेव में यही घर गर्मी को भीतर रोकने लगते हैं।
यानी…
जो डिज़ाइन कभी वरदान था, वही बदलती जलवायु में चुनौती बन गया।

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क्या AC की कमी भी एक कारण थी?
हाँ, यह भी एक वजह थी।
AC के ना होने से लोगों को इस गर्मी को झेलना, मुश्किल हो गया।
यूरोप के कई देशों में आज भी बड़ी संख्या में घरों में AC नहीं हैं, क्योंकि, ठंडा प्रदेश होने के कारण, कभी लोगों को इसकी ज़रूरत, पड़ी ही नहीं।
जब लगातार कई दिन तक तापमान ऊँचा रहा, और रात में भी राहत नहीं मिली, घरों के भीतर का तापमान भी खतरनाक स्तर तक पहुँचा, तो लोग त्राहि त्राहि करने लगे।
हालांकि, सरकारों ने, कई शहरों में अस्थायी Cooling Centres बनाए गए, जहाँ जाकर, लोग, कुछ समय के लिए, राहत प सकें।
असर सिर्फ़ लोगों पर नहीं पड़ा
इस हीटवेव का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहा।
ब्रिटेन में कुछ स्थानों पर रेल सेवाओं की रफ्तार कम करनी पड़ी क्योंकि अत्यधिक गर्मी में स्टील की पटरियों के फैलने का खतरा था।
फ्रांस और स्पेन के कई हिस्सों में जंगलों में आग फैल गई, जिससे हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हुआ।
यूरोप की महत्वपूर्ण राइन नदी का जलस्तर कई जगह कम होने लगा। यह नदी यूरोप के व्यापार की प्रमुख धुरी मानी जाती है। जलस्तर घटने से मालवाहक जहाज़ों की आवाजाही प्रभावित हुई, जिसका असर आपूर्ति श्रृंखला और उद्योगों पर भी पड़ा।
कुछ क्षेत्रों में बिजली की माँग बढ़ गई, जबकि गर्म नदियों के कारण कुछ बिजली संयंत्रों को अपनी क्षमता कम करनी पड़ी।
यानी….
यह हीटवेव, मौसम के साथ साथ, आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौती भी बन गई।

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हीटवेव जानलेवा क्यों होती है?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस Heat Wave के कारण, जून महीने के अंत तक लगभग 1300 लोगों की मौत हो गई।
ज़्यादा गर्मी, केवल पसीना और थकान नहीं लाती।
जब शरीर लगातार गर्मी से लड़ता रहता है, तो उसकी प्राकृतिक ताप-नियंत्रण प्रणाली पर दबाव बढ़ने लगता है।
इससे—
- Heat Stroke (लू लगना)
- Dehydration (निर्जलीकरण)
- हृदय पर अतिरिक्त दबाव
- गुर्दों पर असर
जैसी समस्याएँ बढ़ जाती हैं।
सबसे अधिक खतरा बुज़ुर्गों, छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और पहले से बीमार लोगों पर होता है।
इसी वजह से आज दुनिया के कई देश हीटवेव को केवल मौसम नहीं, बल्कि Public Health Emergency (सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातस्थिति) भी मानने लगे हैं।
क्या भारत को इससे कुछ सीखना चाहिए?
बिल्कुल।
भारत गर्मी का अभ्यस्त है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम सुरक्षित हैं।
हमारे शहर भी तेज़ी से बदल रहे हैं।
पेड़ कम हो रहे हैं।
कंक्रीट बढ़ रहा है।
झीलें और खुले मैदान घट रहे हैं।
Urban Heat Island का असर दिल्ली, मुंबई, पुणे, अहमदाबाद और कई दूसरे शहरों में पहले से महसूस किया जा रहा है।
यदि आज से ही शहरों की योजना में हरियाली, पानी और गर्मी से बचाव को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो भविष्य में भारत की हीटवेव और चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं।
मीमांसा –
यूरोप की यह हीटवेव हमें एक महत्वपूर्ण बात सिखाती है—
प्रकृति किसी देश की आर्थिक ताकत, आधुनिक तकनीक या विकसित इंफ्रास्ट्रक्चर को देखकर अपने नियम नहीं बदलती।
जिस महाद्वीप ने सदियों तक ठंड से लड़ने के लिए अपने घर, सड़कें और शहर बनाए थे, आज वही गर्मी की नई चुनौती के सामने अपने ढाँचे पर दोबारा विचार करने को मजबूर है।
दरअसल, मौसमीय घटनाएँ और इंसानी गतिविधियाँ, मिलकर यह तय करती हैं, कि कोई प्राकृतिक आपदा, कितनी गंभीर बनेगी।
आज यूरोप इस बदलाव को महसूस कर रहा है।
कल दुनिया का कोई और हिस्सा भी इसी स्थिति में हो सकता है।
इसलिए सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि आज पारा कितने डिग्री तक पहुँचा।
सबसे बड़ा सवाल यह है—
क्या हमारे शहर, हमारे घर और हमारी सोच बदलती जलवायु के लिए तैयार हैं?
क्या हम अगली हीटवेव का इंतज़ार करेंगे… या उससे पहले अपने शहरों, अपने घरों और अपनी सोच को बदलना शुरू करेंगे?
और शायद…
यही इस हीटवेव का सबसे बड़ा संदेश है—
यह केवल यूरोप की अग्निपरीक्षा नहीं, बल्कि इंसानी लापरवाहियों के प्रति, प्रकृति की एक गंभीर चेतावनी भी है।
~~~~~~~~ इस पर विचार कीजिए ~~~~~~~~~
