दुर्योधन की मनोदशा
एक श्लोक, दो शब्द और दुर्योधन का अंतर्मन

भूमिका –
“एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।” — ऋग्वेद (1.164.46)
सत्य एक है, किंतु ज्ञानी उसे अनेक प्रकार से व्यक्त करते हैं।
भारतीय ज्ञान परंपरा की यही विशेषता है कि वह किसी विषय को केवल एक दृष्टि से देखने तक सीमित नहीं रहती। एक ही सत्य को अनेक कोणों से समझने, परखने और व्याख्यायित करने की परंपरा हमारे शास्त्रों में सदियों से रही है।श्रीमद्भगवद्गीता भी इसका अपवाद नहीं है। युगों से अनेक आचार्यों, दार्शनिकों और विद्वानों ने गीता के श्लोकों की अपनी-अपनी दृष्टि से व्याख्या की है। प्रत्येक व्याख्या हमें उसी सत्य का एक नया आयाम दिखाती है।इस लेख में लेखिका, श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के 10वें श्लोक को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने का प्रयास कर रही हैं। वे केवल एक श्लोक के दो शब्दों से दुर्योधन की मनोदशा की पड़ताल कर रही हैं। यह उनकी व्यक्तिगत विवेचना है, जिसका उद्देश्य पाठक को एक वैकल्पिक दृष्टि से विचार करने के लिए प्रेरित करना है।
श्रीमद्भगवद्गीता, भारतीय धर्मशास्त्र, दर्शन और संस्कृति का एक महान ग्रंथ है। इसका उल्लेख, महाभारत के भीष्म पर्व में, भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच के संवाद के रूप में उदित हुआ।
श्रीमद्भगवद्गीता, भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच, प्रश्नों व उत्तरों की एक निरंतर कडी है। जिसे महर्षि वेदव्यास जी ने अध्याय- बद्ध किया है।
युद्ध भूमि में दिया गया ये अलौकिक ज्ञान, आज भी उतना ही शाश्वत और प्रासंगिक है, जितना हजारों वर्ष पहले था।
गीता जी 18 अध्यायों का एक संग्रह है, और इस में 700 श्लोक हैं।
इन श्लोकों में जीवन के हर पहलू पर विस्तृत विवेचना हुई है।
इसमें ज्ञान, भक्ति, कर्म और ध्यान योग जैसे विषयों पर चर्चा हुई है।
श्रीमद्भगवद्गीता का पहला अध्याय “अर्जुन विषाद योग” के नाम से जाना जाता है।
इस अध्याय के प्रारंभ में सभी प्रमुख योद्धाओं का परिचय तथा अर्जुन का युद्ध क्षेत्र में अपने परिजनों को देख कर विषाद होना है।
गीता केवल अध्यात्म का ही नहीं, बल्कि मानव मन को समझने का भी एक विलक्षण ग्रंथ है।
इसमें भय, मोह, क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, निर्णय, कर्तव्यबोध और मानसिक द्वंद्व जैसी अनेक मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं पर गहन चर्चा मिलती है।
अर्जुन का विषाद (मानसिक द्वंद्व) ही गीता ज्ञान का मूल कारण बना।
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को इस मानसिक द्वंद्व से बाहर निकालने के लिए केवल उपदेश नहीं देते, बल्कि उसकी मनःस्थिति के अनुरूप विभिन्न मनोवैज्ञानिक तरीकों का सहारा लेते हैं।
वे कभी प्रेम से समझाते हैं, कभी स्नेह और लाड़ से उसका मनोबल बढ़ाते हैं, तो कभी उसके गुणों की बार-बार प्रशंसा कर उसमें आत्मविश्वास जगाते हैं।
आवश्यकता पड़ने पर वे उसके कर्तव्य का स्मरण कराते हैं, कभी कठोर शब्दों से उसे झकझोरते हैं, तो कभी व्यंग्य के माध्यम से उसकी भ्रमित सोच को चुनौती देते हैं।
इस पूरे संवाद में श्रीकृष्ण कभी एक सच्चे सखा की तरह दिखाई देते हैं, कभी बड़े भाई की तरह मार्गदर्शन करते हैं, कभी गुरु बनकर ज्ञान देते हैं और अंततः अर्जुन का संशय दूर करने के लिए अपना विराट स्वरूप भी प्रकट करते हैं।
अर्थात्, वे अर्जुन को एक ही उपाय से नहीं, बल्कि उसकी मनःस्थिति के अनुसार अलग-अलग मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर धीरे-धीरे उसके मानसिक संकट से बाहर निकालते हैं।
अर्जुन एक शुद्ध आत्मा, सात्विक, ज्ञानी, योगी, महावीर, नरों में सर्वश्रेष्ठ – पुरुष थे।
वह तो भगवान श्रीकृष्ण के बताए मार्ग पर चले।
किन्तु दुर्योधन का व्यक्तित्व इसके बिल्कुल विपरीत था ।
भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के प्रारंभिक श्लोकों में ही दुर्योधन की मनोदशा का परिचय मिलता है।
यह तो सर्व विदित है कि कौरव और पाण्डव आपस में चचेरे भाई थे।
कौरवों ने पाण्डवों के राज्य पर अवैध व अनैतिक नियंत्रण कर रखा था। अपने अधिकारों व न्याय के लिए पांडवों को धर्म-युद्ध लडना पडा।
दुर्योधन पाण्डवों से, विशेषकर भीम से, बहुत अधिक शत्रुतापूर्ण भाव रखता था।
बाल्यकाल से ही दुर्योधन ने पांडवों को मारने के लिए कई प्रकार के प्रयास किए।
पांडवों में, विशेषकर भीम से, उसकी घोर शत्रुता रही।
दुर्योधन, भीम को हमेशा अपने प्रतिद्वंदी के रूप में देखता रहा।
भीम साहस और बल में दुर्योधन से कहीं अधिक बलशाली था।
लेकिन गदा-युद्ध की तकनीक और कौशल में दुर्योधन भीम से अधिक प्रशिक्षित था। इसलिए खुद को सदैव भीम से अधिक शक्तिशाली मानता रहा।
इस कारण उस के मन में भीम के प्रति अत्यन्त की घोर शत्रुता, द्वेष, घृणा व ईर्ष्या का भाव, पनपता रहा।
दुर्योधन की इस मनोदशा का आंकलन हमें भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के 10वें श्लोक से होता है।
युद्धभूमि में दोनों सेनाओं को देखकर दुर्योधन अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाता है और दोनों पक्षों की सेना का तुलनात्मक आकलन प्रस्तुत करता है। इसी क्रम में वह
अपनी सेना की तुलना पाण्डवों की सेना से करता है।
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ।।
(अध्याय 1, श्लोक 10)
शब्दार्थ:
अपर्याप्तम् — अपरिमेय, असीमित;
तत् — वह
अस्माकम् — हमारी
बलम् — शक्ति
भीष्माभिरक्षितम् — भीष्म पितामह द्वारा भलीभाँति संरक्षित
पर्याप्तम् — सीमित
तु — लेकिन
इदम् — यह
एतेषाम् — इन (पाण्डवों) की
बलम् — शक्ति
भीमाभिरक्षितम् — भीम द्वारा भलीभाँति संरक्षित
अर्थ: –
“हमारी शक्ति अपरिमेय है और हम सब पितामह द्वारा भलीभाँति संरक्षित हैं, जबकि पाण्डवों की शक्ति भीम द्वारा भलीभाँति संरक्षित होकर भी सीमित है।”
इस श्लोक में “अपर्याप्तम्” और “पर्याप्तम्”, तथा “भीष्माभिरक्षितम्” और “भीमाभिरक्षितम्” जैसे शब्दों का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है।
विशेष रूप से “अपर्याप्तम्” और “पर्याप्तम्” शब्द इस श्लोक की गहराई को समझने की कुंजी हैं।
संस्कृत भाषा की एक विशेषता यह है कि कई शब्द संदर्भ के अनुसार अलग-अलग अर्थ ग्रहण करते हैं।
इसलिए विभिन्न भाष्यकारों ने इन शब्दों की अलग-अलग व्याख्या की है। यही कारण है कि इस श्लोक के अर्थ भी केवल एक नहीं, बल्कि अनेक स्तरों पर समझे जा सकते हैं।
यहाँ “अपर्याप्तम्” और “पर्याप्तम्” शब्द श्लेष अलंकार में प्रयुक्त हुए हैं।
श्लेष अलंकार, यानी ऐसा अलंकार जिसमें एक ही शब्द के संदर्भ के अनुसार एक से अधिक अर्थ निकलते हैं।
अपर्याप्तम् —
सामान्यतः “अपर्याप्तम्” का अर्थ असमर्थ या आवश्यकता से कम समझा जाता है।
गीता के इस श्लोक के संदर्भ में “अपर्याप्तम्” का अर्थ असीमित या अपरिमित, यानी संख्या की दृष्टि से अत्यधिक तथा सब प्रकार से अजेय माना गया है।
पर्याप्तम् —
सामान्यतः “पर्याप्तम्” का अर्थ पर्याप्त, समर्थ या आवश्यकता के अनुरूप होता है।
किन्तु इस श्लोक के संदर्भ में इसका अर्थ सीमित, यानी संख्या में कम तथा जीतने में सुगम माना गया है।
इस श्लोक में दुर्योधन योद्धाओं के परिचय को आगे बढ़ाते हुए अपनी सेना को अजेय बताता है।
वह द्रोणाचार्य से कहता है कि हमारी सेना पितामह भीष्म के सेनाधिपत्य में असीमित व अजेय है और भीम द्वारा रक्षित (पाण्डवों की) सेना पर्याप्त अर्थात सीमित संख्या में है, अत: जीतने में सुगम है।
यहां दुर्योधन की मन: स्थिति का पता चलता है।
कौरव सेना के सेनापति भीष्म पितामह थे। फिर भी युद्ध आरंभ होने से पहले दुर्योधन सीधे उनके पास नहीं जाता, बल्कि अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर उनसे संवाद करता है।
ऐसा क्यों?
इसके पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं—
पहला, द्रोणाचार्य उसके गुरु थे। स्वाभाविक था कि युद्ध प्रारंभ होने से पहले वह अपने गुरु से ही संवाद करेगा जिसने उसे युद्ध कला सिखाई हो।
दूसरा, दुर्योधन सबसे पहले द्रोणाचार्य का ध्यान इस ओर आकर्षित करता है कि पाण्डवों की सेना का व्यूह उनके ही शिष्य धृष्टद्युम्न ने बनाया है। अनेक विद्वान इसे द्रोणाचार्य को उनके कर्तव्य का स्मरण कराने और उनका उत्साह बढ़ाने का एक मनोवैज्ञानिक प्रयास भी मानते हैं। यहाँ ये बात जाननी भी जरूरी है कि द्रोणाचार्य धृष्टद्युम्न के भी गुरु ही थे।
तीसरा, भीष्म पितामह सेनापति अवश्य थे, लेकिन उनका स्नेह कौरवों और पाण्डवों—दोनों के प्रति समान था। दुर्योधन स्वयं भी इस बात से परिचित था। और कहीं ना कहीं उसके मन में पितामह भीष्म के प्रति संदेह भी था। संभव है कि इसलिए वह अपनी चिंता और रणनीतिक टिप्पणी पहले द्रोणाचार्य के समक्ष रखना अधिक उचित समझता हो।
चौथा, दुर्योधन का पूरा संवाद द्रोणाचार्य से है, लेकिन तुलना करते समय उसके मुख से भीष्म और भीम के नाम निकलते हैं। यही इस श्लोक का सबसे रोचक पक्ष है।
यहीं से एक नया प्रश्न जन्म लेता है—क्या दुर्योधन केवल अपनी सेना का वर्णन कर रहा था, या उसके शब्द अनजाने में उसके अंतर्मन की भी झलक दे रहे थे?
इसी प्रश्न की पड़ताल इस लेख का मूल विषय है।
ज़रा विचार करें…
पाण्डवों के सेनापति तो धृष्टद्युम्न थे। फिर दुर्योधन ने भीष्म के सामने भीम का नाम क्यों लिया?
वह तो दोनों सेनाओं के सेनाध्यक्षों की तुलना कर रहा है…
तो भीष्म के साथ भीम की तुलना क्यों ??
इस का मुख्य कारण है दुर्योधन के मन में भीम के प्रति गहरी शत्रुता, द्वेष, ईर्ष्या व घृणा।
मन भी क्या चीज़ है ! —
किसी के प्रति मन में अथाह प्रेम है, समर्पण है अथवा चिंतन है,
तो हर पल, हर क्षण वही व्यक्ति मस्तिष्क में रहता है…।
और यदि किसी के प्रति अत्यधिक शत्रुता है, घृणा है तो वही शत्रु हर दिशा, हर क्षण, हर पल दृष्टिगोचर होता है।
दुर्योधन को भी हर तरफ भीम ही दिखता था।
पितामह भीष्म कौरवों तथा पांडवों – दोनों के ही पितामह थे।
वह सभी पौत्रों से समान रूप से स्नेह करते थे।
वह सब के हितैषी थे।
पांचों पाण्डव उच्च चरित्रवान व सभी सगुणों से परिपूर्ण थे।
अत: पितामह पाण्डवों के प्रति विशेष प्रेम व स्नेह का भाव रखते थे।
कौरव सेना की अध्यक्षता स्वीकार करने के समय ही उन्होंने दुर्योधन से कहा था कि वह युद्ध में पाण्डवों का वध नहीं करेंगें।
भीष्म पितामह की निष्ठा तो हस्तिनापुर की तरफ थी, पर उनका मन पाण्डवों में था।
वह यह भी जानते थे कि पाण्डव धर्म व सत्य का युद्ध लड़ रहे थे।
तथा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उनके साथ थे।
अत: कुरुक्षेत्र के इस धर्म-युद्ध में पाण्डवों की विजय निश्चित है।
दूसरी तरफ शक्तिशाली भीम थे, जिनका एकमात्र लक्ष्य था – कौरवों का अंत।
उसने तो विशेष रूप से दुर्योधन व दु:शासन को मारने का प्रण लिया था।
दुर्योधन व दु:शासन – दोंनों भाई सदा ही पाण्डवों, विशेषकर भीम, से घृणा करते थे और भीम को मारने के नए-नए तरीके अपनाते थे।
अत: भीम तरह -तरह के तापों से तपा हुआ अपने लक्ष्य को साधने के लिए तत्पर था।
लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए तन्मयता से किया हुआ कार्य निश्चित ही सफल होता है।
अधर्म और अन्याय के रास्ते पर होने के कारण दुर्योधन अंदर से डरा हुआ था।
वह बड़ा ही दुष्ट व्यक्ति था।
एक दुष्ट व्यक्ति को अपनी कोई भी वस्तु , अपनी सम्पत्ति आदि सदा ही अपर्याप्त यानि कम लगती है।
और ईर्ष्या के कारण दूसरों की अपर्याप्त वस्तुओं आदि को पर्याप्त आंकता है।
उपरोक्त विश्लेषण को ध्यान में रखते हुए हमारी विवेचना का यह श्लोक —
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ।।
—- इस प्रकार परिलक्षित होता है :
कौरवों की सेना 11 अक्षौहिणी तथा पाण्डवों की सेना 7 अक्षौहिणी की थी।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि एक अक्षौहिणी सेना में लगभग 21,870 रथ, 21,870 हाथी, 65,610 घुड़सवार और 1,09,350 पैदल सैनिक होते थे।
इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि दोनों पक्षों की सेनाएँ कितनी विशाल थीं।
इतनी विशाल सेना होने के बावजूद दुर्योधन अंदर से डरा हुआ था।
उसने अपनी चिंता द्रोणाचार्य से व्यक्त करते हुए कहा कि हमारी सेना उभयपक्षीय पितामह भीष्म के सेनाधिपत्य में असीमित होते हुए भी युद्ध जीतने में असमर्थ है।
दूसरी ओर एकाग्रचित भीम की सेना सीमित संख्या में होते हुए भी युद्ध जीतने में समर्थ है।
उक्त श्लोक में श्लेष अलंकार का उपयोग बहुत ही सुंदर ढ़ंग से हुआ है। केवल दो शब्दों से दुर्योधन का अंतर्मन उजागर होता है।
~~~~~~~~~ विराम ~~~~~~~~~~

गीता पर अनेक भाष्य पढ़े हैं, लेकिन इस श्लोक की यह मनोवैज्ञानिक व्याख्या अलग और विचारणीय लगी। शीला जी ने किसी निष्कर्ष को थोपने के बजाय पाठक के सामने एक नया दृष्टिकोण रखा है, जो इस लेख की सबसे बड़ी विशेषता है। ऐसे लेख बार-बार पढ़ने योग्य होते हैं।