नवरात्रि विशेष – 3

नवदुर्गा: तीसरा दर्शन—माँ चंद्रघंटा

लेखक: कुलदीप ठुसू “पम्पोष”


शिव की विलक्षण बारात,  जतुकासुर की प्रचलित कथा और दुर्गा सप्तशती में महालक्ष्मी तथा चंद्रघंटा के स्वरूप का शास्त्रीय अध्ययन

हमारी नवदुर्गा दर्शन यात्रा के पिछले दो पड़ावों में हमने भगवती पार्वती के जीवन के दो महत्वपूर्ण प्रसंगों को समझा।

पहले दर्शन में माँ शैलपुत्री के रूप में जाना कि किस प्रकार भगवती सती ने हिमालय और मेना के घर पुत्री रूप में जन्म लिया।

दूसरे दर्शन में माँ ब्रह्मचारिणी की उस कठोर तपस्या का वर्णन किया, जिसे उन्होंने भगवान शिव को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए किया था।

वर्षों की कठिन साधना और अनेक परीक्षाओं के बावजूद भगवती अपने संकल्प से विचलित नहीं हुईं।

अंततः भगवान शिव ने उनकी तपस्या स्वीकार कर ली और उनसे विवाह करने के लिए सहमत हो गए।

अब हिमालय के भवन में विवाह की तैयारियाँ आरम्भ हो गई थीं।

लेकिन शिव-पार्वती का विवाह कोई साधारण विवाह नहीं था।

जहां इस अवसर पर समस्त देवता, ऋषि और दिव्य शक्तियाँ उपस्थित थीं, वहीं इस विवाह में माता मेना अपने भावी दामाद का स्वरूप देखकर इतनी व्याकुल हो गईं कि उन्होंने विवाह का विरोध कर दिया।

अंततः भगवान विष्णु को हस्तक्षेप करना पड़ा और भगवान शिव ने अपना दिव्य, सौम्य रूप धारण किया।

शिवमहापुराण में वर्णित इसी विवाह से नवदुर्गा के तीसरे स्वरूप—माँ चंद्रघंटा—की एक प्रचलित कथा भी जुड़ी हुई है।

लेकिन यह कथा उनके प्राकट्य का एकमात्र प्रचलित वर्णन नहीं है।

जतुकासुर नामक असुर के साथ उनके युद्ध की एक दूसरी कथा भी मिलती है।

और जब हम देवी के नाम तथा स्वरूप का मूल शास्त्रीय आधार खोजते हैं, तब दुर्गा सप्तशती में महिषासुरमर्दिनी महालक्ष्मी तथा भगवान विष्णु की पत्नी श्रीलक्ष्मी के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है।

आइए, सबसे पहले उस विलक्षण बारात की ओर चलते हैं, जिसका वर्णन शिवमहापुराण में किया गया है।


शिव जी की बारात — जिसमें देवता भी थे और भूत-प्रेत भी

शिवमहापुराण के रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय 40 में भगवान शिव की बारात का विस्तृत वर्णन मिलता है।

कैलास से भगवान शिव की बारात हिमालय के भवन की ओर चली।

इसमें भगवान विष्णु, ब्रह्मा, देवराज इंद्र, अनेक ऋषि-मुनि, सिद्ध, गंधर्व, किन्नर तथा अन्य दिव्य शक्तियाँ सम्मिलित थीं।

गंधर्व संगीत प्रस्तुत कर रहे थे। किन्नर वाद्य बजा रहे थे।

विभिन्न देवता अपने-अपने वाहनों और गणों के साथ इस मंगल उत्सव में भाग ले रहे थे।

लेकिन बारात में एक और विशाल समूह था—भगवान शिव के गणों का।

उनमें भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल, ब्रह्मराक्षस और विचित्र स्वरूप वाले अनेक प्राणी भी सम्मिलित थे।

शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड 40. (50–51)

शाकिन्यो यातुधानाश्च वेताला ब्रह्मराक्षसाः।
भूतप्रेतपिशाचाश्च तथान्ये प्रमथादयः॥५०॥

तुम्बुरुर्नारदो हाहा हूहूश्चेत्यादयो वराः।
गन्धर्वाः किन्नरा जग्मुर्वाद्यानाध्माय हर्षिताः॥५१॥

अर्थात् शिव की बारात में शाकिनियाँ, यातुधान, वेताल, ब्रह्मराक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच तथा प्रमथ आदि शिवगण उपस्थित थे।

उनके साथ तुम्बुरु, नारद, हाहा, हूहू आदि गंधर्व और किन्नर भी प्रसन्नतापूर्वक वाद्य बजाते हुए चल रहे थे।

इस बारात की एक विशेषता थी।

महादेव के साथ चलने का अधिकार केवल देवताओं और ऋषियों तक सीमित नहीं था।

संसार जिन्हें विचित्र अथवा भयावह समझ सकता था, वे भी भगवान शिव के अपने थे।

उनकी बारात में देवताओं का वैभव भी था और भूत-प्रेतों की उपस्थिति भी।

इस प्रसंग में महादेव के सर्वस्वीकारी स्वभाव का एक सुंदर दर्शन होता है।

लेकिन महादेव के लिए जो स्वाभाविक था, वह हिमालय के नगरवासियों के लिए अत्यंत असामान्य दृश्य था।

मध्य में भस्म रमाए, सर्पों की मालाएँ धारण किए भगवान शिव, आगे ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवता, तथा पीछे उग्र रूप वाले शिवगण, भूत-प्रेत, विचित्र मुख वाले बाराती नाचते-गाते दिखाई दे रहे हैं।
भगवान शिव की अलौकिक बारात — आगे ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता, बीच में औघड़ शिव, और पीछे हुल्लड़ मचाते शिवगण, भूत-प्रेत तथा अद्भुत बाराती।

जब माता मेना ने भगवान शिव को पहली बार देखा

बारात हिमालय के नगर में पहुँची।

चारों ओर उत्सव का वातावरण था।

माता मेना अपनी पुत्री के भावी पति को देखने के लिए अत्यंत उत्सुक थीं।

वे नारदजी के साथ भवन के ऊपरी भाग में खड़ी होकर बारात देख रही थीं।

सबसे पहले उन्हें अनेक सुंदर और तेजस्वी देवता दिखाई दिए।

उन्होंने एक देवता की ओर संकेत करके नारदजी से पूछा कि क्या यही भगवान शिव हैं।

नारदजी ने बताया कि वे तो बाराती हैं।

इसके बाद अन्य देवता सामने आए। मेना उनके सौंदर्य और दिव्य तेज को देखकर बार-बार यही प्रश्न करती रहीं।

लेकिन हर बार नारदजी बताते कि वास्तविक वर तो अभी आने वाले हैं।

यहाँ तक कि भगवान विष्णु के दिव्य स्वरूप को देखकर भी मेना को लगा कि शायद वही शिव होंगे।

जब नारदजी ने बताया कि ये भगवान विष्णु हैं, तो मेना की उत्सुकता और बढ़ गई।

वे सोच रही थीं कि यदि बाराती इतने रूपवान हैं, तो दूल्हे, यानी स्वयं भगवान शिव का सौंदर्य कितना अद्भुत होगा!

लेकिन तभी शिवगणों की विशाल टोली सामने आई।

कोई अनेक मुखों वाला था, तो कोई बिना किसी मुख के, किसी के विचित्र अंग थे तो कोई अंगहीन। 

किसी की अनेक भुजाएँ थीं, तो किसी का शरीर असाधारण आकार का था।

कोई भस्म से विभूषित था, कोई कपाल धारण किए हुए था।

अनेक गण विचित्र ध्वनियाँ निकाल रहे थे और अपने-अपने ढंग से उत्सव मना रहे थे।

और फिर उनके बीच स्वयं भगवान शिव दिखाई दिए।

वे वृषभ पर आरूढ़ थे। शरीर पर भस्म, गले में सर्प, मस्तक पर जटाएँ और चंद्रमा तथा हाथों में विलक्षण आयुध उनके स्वरूप को सुशोभित कर रहे थे।

नारदजी ने बताया कि यही भगवान शिव हैं, जिनके लिए पार्वती ने इतने वर्षों तक तपस्या की थी।

यह दृश्य देखकर माता मेना इतनी भयभीत और व्याकुल हुईं कि मूर्च्छित होकर गिर पड़ीं।

होश आने पर उनका भय क्रोध और शोक में बदल गया।

वे अपनी पुत्री के विवाह का विरोध करने लगीं।

उन्हें यह स्वीकार नहीं था कि जिस पुत्री का पालन-पोषण उन्होंने इतने स्नेह से किया, उसका विवाह ऐसे वर के साथ हो, जिसका स्वरूप और रहन-सहन सामान्य गृहस्थ जीवन से इतना भिन्न था।

उन्होंने नारदजी और अन्य ऋषियों को कठोर वचन कहे।

देवताओं ने उन्हें समझाने का प्रयास किया।

स्वयं पार्वती ने भी अपनी माता को भगवान शिव की महिमा समझाई और स्पष्ट किया कि वे मन, वचन और कर्म से महादेव को अपना पति स्वीकार कर चुकी हैं।

लेकिन माता मेना का विरोध समाप्त नहीं हुआ।

शिवमहापुराण, पार्वतीखण्ड, अध्याय 43–44 में इस पूरे प्रसंग का विस्तृत वर्णन मिलता है।


भगवान विष्णु ने नारदजी को शिव के पास भेजा

जब माता मेना किसी प्रकार मानने को तैयार नहीं हुईं, तब भगवान विष्णु ने स्वयं उन्हें समझाने का प्रयास किया।

उन्होंने महादेव की महिमा बताई और समझाया कि शिव का वास्तविक स्वरूप केवल उनके बाहरी रूप से नहीं जाना जा सकता।

लेकिन माता मेना की आशंकाएँ पूरी तरह दूर नहीं हुईं।

तब भगवान विष्णु की प्रेरणा से नारदजी भगवान शिव के समीप गए।

शिवमहापुराण, पार्वतीखण्ड 45. (1–3) में वर्णन है कि नारदजी ने भगवान शिव की स्तुति की और देवकार्य की सिद्धि के लिए उन्हें अपना सौम्य स्वरूप प्रकट करने का अनुरोध किया।

तीसरे श्लोक में कहा गया है—

श्रुत्वा त्वद्वचनं प्रीत्या शम्भुना धृतमद्भुतम्।
स्वरूपमुत्तमं दिव्यं कृपालुत्वं च दर्शितम्॥३॥

अर्थात् नारदजी की बात सुनकर भगवान शिव ने प्रसन्नतापूर्वक अपना अद्भुत, उत्तम और दिव्य स्वरूप धारण किया तथा अपनी कृपालुता प्रकट की।

भगवान शिव का यह स्वरूप अत्यंत मनोहर था।

उनके अंग दिव्य आभूषणों से सुशोभित थे।

उनके मस्तक पर चंद्ररेखा थी।

उनका सौंदर्य इतना अद्भुत था कि नारदजी भी उन्हें देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए।

वे तुरंत माता मेना के पास पहुँचे और उनसे भगवान शिव के इस दिव्य स्वरूप का दर्शन करने के लिए कहा।

सुंदर, सौम्य और युवा रूप में अलंकृत भगवान शिव, पुष्पमालाओं और राजसी आभूषणों से सुसज्जित, उनके चारों ओर प्रसन्न देवता, शिवगण, नगरवासी तथा मेना और हिमवान आनंदित भाव से निहारते हुए।
औघड़ रूप त्यागकर मनोहर, सौम्य और दिव्य वररूप में प्रकट भगवान शिव — जिनके दर्शन से देव, शिवगण, नगरवासी, मेना और हिमवान हर्ष और संतोष से भर उठे।

माता मेना की महादेव से क्षमा याचना 

माता मेना ने जब भगवान शिव के सौम्य स्वरूप को देखा, तो वे विस्मित रह गईं।

उनका सौंदर्य, दिव्य तेज और आभूषण अत्यंत मनोहर थे।

भगवान विष्णु सहित सभी देवता उनकी सेवा में उपस्थित थे।

गंधर्व मंगलगान कर रहे थे और दिव्य शक्तियाँ उनकी महिमा का गुणगान कर रही थीं।

यह सब देखकर मेना को अपनी पुत्री की तपस्या का वास्तविक महत्व समझ में आया।

जिस वर के स्वरूप से वे कुछ समय पहले भयभीत हो गई थीं, उसी भगवान शिव की महिमा अब उनके सामने प्रकट थी।

तब उन्होंने कहा—

शिवमहापुराण, पार्वतीखण्ड 45.22–23

धन्या पुत्री मदीया च यया तप्तं महत्तपः।
यत्प्रभावान्महेशान त्वं प्राप्त इह मद्गृहे॥२२॥

मया कृता पुरा या वै शिवनिन्दा दुरत्यया।
तां क्षमस्व शिवास्वामिन्सुप्रसन्नो भवाधुना॥२३॥

अर्थात् मेरी पुत्री धन्य है, जिसने इतनी महान तपस्या की और जिसके प्रभाव से आप मेरे घर पधारे।

हे पार्वती के स्वामी! मैंने पहले आपके विषय में जो अनुचित और कठोर वचन कहे थे, कृपया उन्हें क्षमा करें और मुझ पर प्रसन्न हों।

इस प्रकार माता मेना ने हाथ जोड़कर महादेव को प्रणाम किया।

उनके मन से विवाह को लेकर उत्पन्न विरोध समाप्त हो गया।


शिव और पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ

माता मेना के प्रसन्न होने के बाद विवाह की तैयारियाँ पुनः आगे बढ़ीं।

हिमालय ने भगवान शिव का आदरपूर्वक स्वागत किया।

विवाह-मण्डप में देवता और ऋषि उपस्थित हुए। विधिपूर्वक वैदिक मंत्रों के साथ विवाह-संस्कार आरम्भ हुए।

शिवमहापुराण, पार्वतीखण्ड, अध्याय 48, श्लोक 38

इमां कन्यां तुभ्यमहं ददामि परमेश्वर।
भार्यार्थं परिगृह्णीष्व प्रसीद सकलेश्वर॥३८॥

अर्थात् हे परमेश्वर! मैं अपनी पुत्री आपको प्रदान करता हूँ। आप इसे पत्नी के रूप में स्वीकार करें और प्रसन्न हों।

इसके अगले श्लोक में बताया गया है कि हिमालय ने अपनी पुत्री पार्वती का विधिपूर्वक कन्यादान किया।

वेदमंत्रों के साथ विवाह-संस्कार सम्पन्न हुए।

देवताओं ने जयघोष किया। गंधर्वों ने मंगलगान किया और समस्त उत्सव आनंद से भर उठा।

जिस विवाह को लेकर कुछ समय पहले माता मेना इतनी व्याकुल थीं, वह अब मंगलमय वातावरण में सम्पन्न हो चुका था।

यह शिवमहापुराण में वर्णित शिव-पार्वती विवाह का मूल प्रसंग है।

लेकिन इसी विवाह से जुड़ा माँ चंद्रघंटा का एक अन्य प्रचलित वर्णन भी मिलता है, जिसमें भगवती पार्वती की भूमिका कुछ भिन्न रूप में सामने आती है।


माँ चंद्रघंटा के प्राकट्य की प्रचलित विवाह-कथा

इस प्रचलित कथा के अनुसार, जब भगवान शिव की बारात हिमालय के नगर में पहुँची, तो शिवगणों का उन्मुक्त व्यवहार देखकर नगरवासी अत्यंत भयभीत हो उठे।

कोई गण विचित्र ध्वनियाँ निकाल रहा था, तो कोई अत्यंत उग्र ढंग से नृत्य कर रहा था।

कुछ अपने विलक्षण रूपों और आयुधों के साथ उत्सव में मग्न थे।

महादेव के लिए वे सभी अपने प्रिय गण थे, लेकिन उनका व्यवहार नगरवासियों और पार्वती के परिजनों की चिंता बढ़ा रहा था।

माता मेना भी भगवान शिव के विलक्षण स्वरूप को देखकर मूर्च्छित हो गई थीं।

भगवती पार्वती यह सब देख रही थीं।

वे भगवान शिव के वास्तविक स्वरूप को समझती थीं और यह भी जानती थीं कि शिवगण महादेव के अपने हैं।

लेकिन अपनी माता और अन्य परिजनों की व्याकुलता देखकर उन्होंने स्थिति को शांत करने का निश्चय किया।

कथा के अनुसार, भगवती ने उसी समय अपना दिव्य शक्तिरूप प्रकट किया।

वे दस भुजाओं से युक्त, विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित और सिंह पर आरूढ़ देवी के रूप में प्रकट हुईं।

उनके मस्तक पर घंटा के आकार का अर्धचंद्र चमक रहा था।

उनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और प्रभावशाली था।

देवी का यह प्रचंड स्वरूप देखकर शिवगणों की उग्रता शांत होने लगी।

जो गण कुछ समय पहले अत्यंत उन्मुक्त ढंग से उत्सव मना रहे थे, हुड़दंग मचा रहे थे, वे भगवती के प्रभाव से संयत हो गए।

यहाँ देवी ने उन गणों पर क्रोध नहीं किया और न ही उन्हें महादेव से दूर किया।

देवी की इस दिव्य अलौकिक स्वरूप को देखकर ही वे हतप्रभ होगये 

उनके दिव्य स्वरूप का प्रभाव उत्सव में उत्पन्न भय और अशांति को दूर करने के रूप में प्रकट हुआ।

इसके बाद भगवती पार्वती ने भगवान शिव से अनुरोध किया कि वे विवाह के इस मंगल अवसर पर अपना सौम्य और मनोहर रूप धारण करें, जिससे माता मेना तथा अन्य परिजनों का भय दूर हो सके।

भगवान शिव ने उनका अनुरोध स्वीकार किया।

उन्होंने अपना सुंदर, दिव्य और अलंकारों से सुशोभित स्वरूप प्रकट किया।

उसे देखकर माता मेना प्रसन्न हो उठीं और विवाह का उत्सव आनंदपूर्वक सम्पन्न हुआ।

भगवती पार्वती का यही दशभुजा, सिंहवाहिनी और घंटाकार अर्धचंद्र से सुशोभित स्वरूप माँ चंद्रघंटा कहलाया।

शिव-पार्वती विवाह के अवसर पर दशभुजा माँ चंद्रघंटा का दिव्य प्राकट्य। सिंह के साथ प्रकट हुई देवी के समक्ष भगवान शिव के गण और बाराती शांत होकर नतमस्तक हैं।
माँ चंद्रघंटा का दिव्य प्राकट्य — जिनके तेज और सौम्य स्वरूप के सामने शिव बारात का समस्त कोलाहल शांत हो गया।

शास्त्र और प्रचलित कथा में क्या अंतर है?

इस स्थान पर एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है।

शिवमहापुराण में भगवान शिव द्वारा सौम्य स्वरूप धारण करने का प्रसंग स्पष्ट रूप से मिलता है।

लेकिन वहाँ भगवान विष्णु की प्रेरणा से नारदजी महादेव के पास जाते हैं।

जबकि चंद्रघंटा की प्रचलित कथा में भगवती पार्वती स्वयं अपना शक्तिरूप धारण करती हैं, शिवगणों की उग्रता शांत करती हैं और भगवान शिव से सौम्य रूप धारण करने का अनुरोध करती हैं।

अर्थात् मूल घटना समान है, लेकिन उसकी व्याख्या और उसमें पार्वती की भूमिका दोनों विवरणों में अलग है।

एक और महत्वपूर्ण प्रमाण स्कन्दपुराण में मिलता है।

स्कन्दपुराण में शिवगणों को शांत करने का प्रसंग

स्कन्दपुराण, माहेश्वरखण्ड, केदारखण्ड, अध्याय 26, श्लोक 40–44 में शिव-पार्वती विवाह के उत्सव का एक विशेष वर्णन है।

विवाह के अवसर पर शिवगण, भूत, वेताल और अन्य प्राणी अत्यंत उन्मुक्त होकर उत्सव मना रहे थे।

उनका कोलाहल देखकर भगवान विष्णु ने शिव से आग्रह किया कि वे अपने उग्र और उन्मत्त गणों को शांत करें, जिससे विवाह का मंगलकार्य व्यवस्थित रूप से सम्पन्न हो सके।

भगवान शिव ने वीरभद्र को ऐसा करने का आदेश दिया।

स्कन्दपुराण, केदारखण्ड 26.43–44

वारयस्व प्रमत्तांश्च क्षीबांश्चैव विशेषतः।
तेनोक्तो वीरभद्रश्च शम्भुना परमेष्ठिना॥४३॥

आज्ञापिताः प्रमत्ताश्च वीरभद्रेण धीमता।
प्रमथा वारितास्तेन तूष्णीमाश्रित्य ते स्थिताः॥४४॥

अर्थात् भगवान शिव ने वीरभद्र को उन्मत्त और विशेष रूप से मदोन्मत्त गणों को रोकने का आदेश दिया। वीरभद्र के हस्तक्षेप से वे गण शांत हो गए।

यह विवरण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

तो स्कन्दपुराण के अनुसार, वीरभद्र शिवगणों के उग्र व्यवहार को शांत करते हैं। 

लेकिन चंद्रघंटा की प्रचलित कथा में यह भूमिका भगवती पार्वती की है।

अब माँ चंद्रघंटा से जुड़ी दूसरी कथा, जिसमें भगवती कैलास की रक्षा के लिए एक असुर का संहार करती हैं।


जतुकासुर का आक्रमण — माँ चंद्रघंटा की दूसरी प्रचलित कथा

शिव और पार्वती का विवाह सम्पन्न हो चुका था।

भगवती पार्वती भगवान शिव के साथ कैलास में निवास करने लगी थीं।

उस समय असुरराज तारकासुर को शिव-पार्वती के मिलन से चिंता होने लगी।

तारकासुर से जुड़ी पुराणिक मान्यता थी कि भगवान शिव से उत्पन्न होने वाला पुत्र उसके विनाश का कारण बनेगा।

इसलिए वह शिव और पार्वती के जीवन में विघ्न उत्पन्न करना चाहता था।

तारकासुर ने जतुकासुर नामक एक शक्तिशाली असुर को कैलास पर आक्रमण करने के लिए भेजा।

जतुकासुर की सेना अत्यंत विचित्र थी।

उसके साथ असंख्य चमगादड़ों की एक विशाल सेना थी।

यहाँ आपको ये बता दें कि चमगादड़ को संस्कृत में जुतका कहते हैं। 

जब जतुकासुर कैलास के समीप पहुँचा, तो चमगादड़ों ने आकाश को ढक लिया।

उनकी संख्या इतनी अधिक थी कि सूर्य का प्रकाश भी धरती तक नहीं पहुँच पा रहा था।

चारों ओर अंधकार छा गया।

जतुकासुर और उसकी सेना ने कैलास में उत्पात मचाना आरम्भ कर दिया।

शिवगणों ने उनका प्रतिकार करने का प्रयास किया, लेकिन चमगादड़ों की विशाल सेना के कारण वे बार-बार पीछे हटने लगे।

उस समय भगवान शिव गहन साधना में लीन थे।

भगवती पार्वती को जब इस संकट की सूचना मिली, तो उन्होंने नंदी को खोजने का प्रयास किया, लेकिन वे वहाँ उपस्थित नहीं थे।

इसी बीच पराजित हो रहे शिवगण देवी के पास पहुँचे और उनसे रक्षा की प्रार्थना करने लगे।

भगवती पार्वती भगवान शिव की साधना में विघ्न नहीं डालना चाहती थी। 

इसलिए भगवती ने स्वयं उस असुर का सामना करने का निश्चय किया।

वे युद्धभूमि की ओर बढ़ीं।

लेकिन सामने एक बड़ी कठिनाई थी।

चारों ओर गहरा अंधकार था।

चमगादड़ों की विशाल सेना आकाश में मंडरा रही थी। उन्होंने चंद्रमा के प्रकाश को मानो ग्रहण लगा लिया था। 

इस कारण शत्रु की स्थिति देख पाना भी कठिन था।

तब भगवती ने चंद्रदेव का आह्वान किया।

चंद्रदेव उनकी सहायता के लिए उपस्थित हुए और अर्धचंद्र के रूप में देवी के मस्तक पर विराजमान हो गए।

उनके प्रकाश से युद्धभूमि प्रकाशित होने लगी।

अब भगवती जतुकासुर और उसकी सेना को आराम से देख पा रही थी। 

इसी समय हिमालय के भेड़ियों का एक विशाल समूह भी भगवती की सहायता के लिए आ पहुँचा।

वे जतुकासुर और उसकी सेना के विरुद्ध युद्ध में उतर गए।

लेकिन चमगादड़ों की सेना अभी भी आकाश में मंडरा रही थी।

भगवती ने देखा कि जतुकासुर की शक्ति का संबंध इस चमगादड़-सेना से है।

जब तक वह सेना आकाश पर छाई रहेगी, तब तक असुर को परास्त करना कठिन होगा।

तब भगवती ने एक विशाल घंटा धारण किया।

उन्होंने उसे अत्यंत प्रचंड वेग से बजाया।

घंटा का नाद समस्त दिशाओं में गूँज उठा।

उसकी तीव्र ध्वनि से चमगादड़ों की सेना विचलित हो गई।

वे इधर-उधर उड़ने लगे और आकाश का अंधकार धीरे-धीरे छँटने लगा।

अब जतुकासुर की शक्ति भी क्षीण होने लगी।

उसी समय देवी की सहायता के लिए आए भेड़ियों ने असुर पर आक्रमण कर दिया।

इस बीच भगवती ने अपने विशाल घंटा से जतुकासुर के मस्तक पर प्रहार किया और उसका वध कर दिया।

इस प्रकार कैलास जतुकासुर के आतंक से मुक्त हो गया।

प्रचलित कथा में वर्णन मिलता है कि इस विजय के बाद ब्रह्माजी ने भगवती के इस विशेष स्वरूप को चंद्रघंटा नाम से संबोधित किया।

मस्तक पर चंद्रमा और हाथ में घंटा—ये दोनों उनके इस नाम के प्रमुख आधार बताए गए।

जतुकासुर से युद्ध करतीं दशभुजा माँ चंद्रघंटा। सिंह के साथ रणभूमि में देवी अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्रों सहित असुर का संहार करती हुई दिखाई दे रही हैं।
माँ चंद्रघंटा का रौद्ररूप — जतुकासुर के संहार से जुड़े प्रचलित आख्यान का दिव्य चित्रण।

भेड़िए और सियार — देवी की उग्र शक्तियों का शास्त्रीय संदर्भ

जतुकासुर की इस प्रचलित कथा में हिमालय के भेड़ियों की भूमिका विशेष ध्यान आकर्षित करती है।

सनातन ग्रंथों में देवी की उग्र शक्तियों के संदर्भ में कुछ अन्य वन्य प्राणियों का भी उल्लेख मिलता है।

विशेष रूप से सियारों का।

दुर्गा सप्तशती के आठवें अध्याय में शुम्भ-निशुम्भ के साथ युद्ध के दौरान चण्डिका के शरीर से एक अत्यंत उग्र शक्ति के प्रकट होने का वर्णन है।

दुर्गा सप्तशती, अध्याय 8, श्लोक 23

ततो देवीशरीरात्तु विनिष्क्रान्तातिभीषणा।
चण्डिकाशक्तिरत्युग्रा शिवाशतनिनादिनी॥२३॥

अर्थात् देवी के शरीर से चण्डिका की एक अत्यंत भयंकर और उग्र शक्ति प्रकट हुई, जिसकी ध्वनि सैकड़ों सियारों के नाद के समान थी।

इस शक्ति को आगे शिवदूती कहा गया है।

इसी प्रसंग में देवी असुरों को चेतावनी देती हैं—

दुर्गा सप्तशती, अध्याय 8, श्लोक 27

बलावलेपादथ चेद्भवन्तो युद्धकाङ्क्षिणः।
तदागच्छत तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः॥२७॥

अर्थात् यदि अपनी शक्ति के अभिमान में तुम युद्ध करना चाहते हो, तो आओ। मेरे सियार तुम्हारे मांस से तृप्त हों।

यहाँ प्रयुक्त ‘शिवाः’ शब्द का अर्थ सियारों से है।

इस संबंध में कालिका पुराण का एक अन्य श्लोक और भी महत्वपूर्ण है।

कालिका पुराण, अध्याय 61, श्लोक 108

वामपादं शृगालस्य पृष्ठे फेरुशतैर्वृतम्।
ईदृशीं शिवदूत्यास्तु मूर्तिं ध्यायेद् विभूतये॥१०८॥

इस श्लोक में शिवदूती के ध्यानस्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है कि उनका बायाँ चरण सियार की पीठ पर है और वे सैकड़ों सियारों से घिरी हुई हैं।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण शास्त्रीय प्रमाण है।

इससे स्पष्ट होता है कि देवी के उग्र शक्ति-स्वरूपों के वर्णन में सियारों की उपस्थिति केवल किसी आधुनिक कथा तक सीमित नहीं है।

लेकिन यहाँ एक अंतर आवश्यक है।

दुर्गा सप्तशती तथा कालिका पुराण के ये श्लोक शिवदूती से संबंधित हैं, जबकि जटुकासुर की प्रचलित कथा में भेड़ियों का वर्णन है।

इसलिए इन दोनों को एक ही घटना नहीं मानना चाहिए।

हाँ, इससे इतना अवश्य समझा जा सकता है कि देवी की उग्र युद्धशक्तियों के वर्णन में वन्य प्राणियों का भी एक विशिष्ट स्थान रहा है।


देवी कवच में माँ चंद्रघंटा का उल्लेख

नवदुर्गा के नौ स्वरूपों का एक प्रमुख शास्त्रीय प्रमाण देवी कवच में मिलता है, जिसका पाठ दुर्गा सप्तशती के साथ किया जाता है।

देवी कवच, श्लोक 3

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥३॥

अर्थात् नवदुर्गा में पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघंटा और चौथी कूष्माण्डा हैं।

यहाँ माँ चंद्रघंटा का नाम स्पष्ट रूप से मिलता है।

लेकिन देवी कवच इस स्थान पर उनके प्राकट्य, नामकरण अथवा किसी विशिष्ट असुर के साथ युद्ध का विवरण नहीं देता।

उनके स्वरूप का अधिक विस्तृत वर्णन प्रचलित नवदुर्गा ध्यान-स्तुतियों में मिलता है।


माँ चंद्रघंटा का दिव्य स्वरूप

नवदुर्गा के प्रचलित ध्यान-पाठ में माँ चंद्रघंटा का स्मरण इस प्रकार किया गया है—

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढां दशभुजां चन्द्रघण्टां यशस्विनीम्॥

अर्थात् मनोवांछित फल प्रदान करने वाली, मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करने वाली, सिंह पर आरूढ़, दस भुजाओं से युक्त यशस्विनी माँ चंद्रघंटा को प्रणाम है।

इस ध्यान-परंपरा में भगवती को त्रिनेत्रा, तेजस्विनी तथा विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों से सुशोभित बताया जाता है।

उनके हाथों में खड्ग, गदा, त्रिशूल, धनुष-बाण, कमल, कमण्डलु, जपमाला और घंटा आदि आयुध दर्शाए जाते हैं।

वरद तथा अभय मुद्रा भी उनके प्रचलित स्वरूप में सम्मिलित हैं।

विभिन्न मूर्ति-वर्णनों में इन आयुधों की व्यवस्था में कुछ अंतर मिलता है।

लेकिन उनके स्वरूप की तीन विशेषताएँ प्रमुख हैं—

मस्तक पर अर्धचंद्र, दस भुजाओं में आयुध और सिंहवाहिनी रूप।

उनके चेहरे पर सौम्यता है, लेकिन उनकी भुजाएँ युद्ध के लिए सुसज्जित हैं।

यहाँ एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि यह स्वरूप-वर्णन प्रचलित नवदुर्गा ध्यान-परंपरा से मिलता है।

इसे किसी विशेष पुराण का श्लोक मानने के लिए उस ग्रंथ में उसका मूल स्थान प्रमाणित होना आवश्यक है।

अब इस स्वरूप का सबसे विशिष्ट तत्व है—उनके नाम में उपस्थित घंटा।

क्या दुर्गा सप्तशती में देवी के इस आयुध के संबंध में कोई स्पष्ट वर्णन मिलता है?

इसका उत्तर अत्यंत महत्वपूर्ण है।


देवी को घंटा किसने प्रदान किया ?

दुर्गा सप्तशती के दूसरे अध्याय में महिषासुर के अत्याचारों और उसके संहार के लिए देवी के प्राकट्य का वर्णन मिलता है।

महिषासुर ने देवताओं को पराजित करके स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था।

पराजित देवता ब्रह्माजी के साथ भगवान विष्णु और शिव के समीप पहुँचे।

उनकी व्यथा सुनकर भगवान विष्णु और शिव अत्यंत क्रोधित हुए।

उनके शरीरों से प्रचंड तेज प्रकट हुआ। अन्य देवताओं के शरीरों से भी महान तेज निकलने लगा।

यह समस्त तेज एक स्थान पर एकत्रित होकर भगवती के रूप में प्रकट हुआ।

दुर्गा सप्तशती, अध्याय 2, श्लोक 13

अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम्।
एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा॥१३॥

अर्थात् समस्त देवताओं के शरीरों से उत्पन्न वह अतुलनीय तेज एक स्थान पर एकत्र होकर देवी के रूप में प्रकट हुआ, जिनकी प्रभा से तीनों लोक प्रकाशित हो उठे।

इसके बाद देवताओं ने भगवती को अपने-अपने आयुध प्रदान किए।

भगवान शिव ने त्रिशूल दिया। विष्णु ने चक्र, वरुण ने शंख, अग्नि ने शक्ति तथा वायु ने धनुष-बाण प्रदान किए।

देवराज इंद्र ने उन्हें वज्र और घंटा दिया।

दुर्गा सप्तशती, अध्याय 2, श्लोक 22

वज्रमिन्द्रः समुत्पाट्य कुलिशादमराधिपः।
ददौ तस्यै सहस्राक्षो घण्टामैरावताद्गजात्॥२२॥

अर्थात् देवराज इंद्र ने अपने वज्र से एक वज्र उत्पन्न करके देवी को प्रदान किया और अपने ऐरावत हाथी का घंटा भी उन्हें दिया।

यहाँ घंटा के संबंध में एक महत्वपूर्ण तथ्य मिलता है।

महिषासुरमर्दिनी देवी को घंटा स्वयं देवराज इंद्र ने ऐरावत से लेकर प्रदान किया था।

लेकिन इसी प्रसंग में एक और आभूषण का उल्लेख है।

दुर्गा सप्तशती, अध्याय 2, श्लोक 26

अर्धचन्द्रं तथा शुभ्रं केयूरान् सर्वबाहुषु।
नूपुरौ विमलौ तद्वद् ग्रैवेयकमनुत्तमम्॥२६॥

इस श्लोक में देवी को दिए गए शुभ्र अर्धचंद्र आभूषण, बाजूबन्द, नूपुर तथा उत्तम कण्ठाभूषणों का वर्णन है।

अर्थात् महिषासुरमर्दिनी देवी के प्राकट्य में घंटा और अर्धचंद्र दोनों का उल्लेख मिलता है।


दुर्गा सप्तशती में घंटानाद की महिमा

महिषासुर की विशाल सेना के साथ युद्ध के समय भगवती ने अनेक आयुधों का प्रयोग किया।

इसी युद्ध में उनके घंटानाद का प्रभाव भी प्रकट हुआ।

दुर्गा सप्तशती, अध्याय 2, श्लोक 56

खड्गादिभिश्च शतशो निजघान महासुरान्।
पातयामास चैवान्यान् घण्टास्वनविमोहितान्॥५६॥

अर्थात् देवी ने खड्ग आदि शस्त्रों से सैकड़ों असुरों का संहार किया और घंटानाद से मोहित हुए अन्य असुरों को भी धराशायी कर दिया।

इससे स्पष्ट होता है कि देवी के युद्ध में घंटा केवल एक सामान्य वाद्य नहीं था।

उसका नाद असुरों को मोहित और विचलित करने वाला था।

लेकिन दुर्गा सप्तशती में घंटा की महिमा यहीं समाप्त नहीं होती।

एकादश अध्याय में देवता देवी की स्तुति करते हुए उसी घंटा से अपनी रक्षा की प्रार्थना करते हैं।

दुर्गा सप्तशती, अध्याय 11, श्लोक 27

हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्यो नः सुतानिव॥२७॥

अर्थात् हे देवी! आपका वह घंटा, जो अपनी ध्वनि से संपूर्ण जगत को व्याप्त करके दैत्यों के तेज का नाश करता है, हमारी भी पापों से उसी प्रकार रक्षा करे, जैसे माता अपने पुत्रों की रक्षा करती है।

यह श्लोक अत्यंत सुंदर है।

एक ओर देवी के घंटा का नाद दैत्यों के तेज का नाश करता है।

दूसरी ओर उसी घंटा से भक्तों की मातृवत् रक्षा की प्रार्थना की जाती है।

अर्थात् देवी का घंटा केवल संहार का आयुध नहीं, उनकी रक्षक शक्ति का भी एक महत्वपूर्ण अंग है।

लेकिन अब यहाँ एक और प्रश्न सामने आता है।

दुर्गा सप्तशती में महिषासुर से युद्ध करने वाली जिस देवी को घंटा और अर्धचंद्र प्रदान किए गए थे, उस देवी का नाम क्या था?

हम प्रायः उन्हें दुर्गा या महिषासुरमर्दिनी कहते हैं।

जबकि स्वयं दुर्गा सप्तशती के रहस्यग्रंथ में उन्हें महालक्ष्मी कहा गया है।

यह महालक्ष्मी कौन हैं?

और क्या ये वही श्रीलक्ष्मी हैं, जो समुद्र-मंथन से प्रकट हुई थीं और भगवान विष्णु की पत्नी हैं?


महिषासुर का वध दुर्गा ने किया या महालक्ष्मी ने ?

दुर्गा सप्तशती के तीन चरित्र हैं।

प्रथम चरित्र की अधिष्ठात्री महाकाली, मध्यम चरित्र की महालक्ष्मी तथा उत्तम चरित्र की महासरस्वती हैं।

मध्यम चरित्र में दूसरे, तीसरे और चौथे अध्याय सम्मिलित हैं, जिनमें महिषासुर के साथ युद्ध और उसके वध का वर्णन है।

लेकिन महिषासुरमर्दिनी को महालक्ष्मी कहना केवल विनियोग तक सीमित नहीं है।

दुर्गा सप्तशती के साथ प्राप्त वैकृतिक रहस्य में भी उन्हें स्पष्ट रूप से महालक्ष्मी कहा गया है।

वैकृतिक रहस्य, श्लोक 7

सर्वदेवशरीरेभ्यो याऽऽविर्भूताऽमितप्रभा।
त्रिगुणा सा महालक्ष्मीः साक्षान्महिषमर्दिनी॥७॥

अर्थात् समस्त देवताओं के शरीरों से जो अमित प्रभा वाली त्रिगुणमयी देवी प्रकट हुईं, वे महालक्ष्मी ही साक्षात् महिषासुरमर्दिनी हैं।

इस श्लोक से स्पष्ट होता है कि महिषासुर का वध करने वाली भगवती को महालक्ष्मी कहा गया है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि दुर्गा और महालक्ष्मी दो स्वतंत्र देवियाँ हैं।

दुर्गा, चण्डिका, भगवती और महालक्ष्मी—ये विभिन्न संदर्भों में उसी देवीशक्ति के नाम हैं।

वैकृतिक रहस्य में महिषासुरमर्दिनी का अठारह भुजाओं वाला स्वरूप भी वर्णित है।

वैकृतिक रहस्य, श्लोक 11

अक्षमाला च कमलं बाणोऽसिः कुलिशं गदा।
चक्रं त्रिशूलं परशुः शङ्खो घण्टा च पाशकः॥११॥

यहाँ महालक्ष्मी के आयुधों में घंटा का भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

इसी रहस्य के श्लोक 24 में कहा गया है—

अवतारत्रयार्चायां स्तोत्रमन्त्रास्तदाश्रयाः।
अष्टादशभुजा चैषा पूज्या महिषमर्दिनी॥२४॥

अर्थात् तीनों अवतारों की आराधना में उनसे संबंधित स्तोत्र-मंत्रों का प्रयोग किया जाना चाहिए और अठारह भुजाओं वाली महिषासुरमर्दिनी की पूजा करनी चाहिए।

लेकिन यह विवरण हमारे सामने एक और जिज्ञासा उत्पन्न करता है।

यदि महिषासुरमर्दिनी महालक्ष्मी हैं, तो समुद्र-मंथन से प्रकट हुई भगवान विष्णु की पत्नी श्रीलक्ष्मी कौन हैं?

इसका उत्तर स्वयं दुर्गा सप्तशती के दो रहस्यग्रंथों में मिलता है।


आद्य महालक्ष्मी, महिषासुरमर्दिनी महालक्ष्मी और श्रीलक्ष्मी — तीन अलग शास्त्रीय संदर्भ

इस विषय को समझने के लिए सबसे पहले प्राधानिक रहस्य को पढ़ना आवश्यक है।

1. आद्य महालक्ष्मी — समस्त सृष्टि की मूल परमेश्वरी

प्राधानिक रहस्य, श्लोक 4

सर्वस्याद्या महालक्ष्मीस्त्रिगुणा परमेश्वरी।
लक्ष्यालक्ष्यस्वरूपा सा व्याप्य कृत्स्नं व्यवस्थिता॥४॥

अर्थात् महालक्ष्मी समस्त सृष्टि की आदि, त्रिगुणमयी परमेश्वरी हैं। वे दृश्य तथा अदृश्य रूपों में संपूर्ण जगत में व्याप्त हैं।

यहाँ महालक्ष्मी किसी एक असुर से युद्ध करने वाली देवी मात्र नहीं हैं।

वे समस्त सृष्टि की मूल परमशक्ति हैं।

इसी प्राधानिक रहस्य में उनके द्वारा विभिन्न शक्तियों और देवताओं के प्राकट्य का वर्णन मिलता है।

लेकिन आगे एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही गई है।

2. श्रीलक्ष्मी — जिन्हें आद्य महालक्ष्मी ने नाम दिया

प्राधानिक रहस्य के श्लोक 17 में बताया गया है कि आद्य महालक्ष्मी ने एक स्त्री और एक पुरुष का युगल उत्पन्न किया।

अगले श्लोक में वे उन्हें नाम प्रदान करती हैं।

प्राधानिक रहस्य, श्लोक 18

ब्रह्मन्विधे विरञ्चेति धातरित्याह तं नरम्।
श्रीः पद्मे कमले लक्ष्मीत्याह माता स्त्रियं च ताम्॥१८॥

अर्थात् आद्य महालक्ष्मी ने उस पुरुष को ब्रह्मा, विधि, विरंचि और धाता नाम दिए।

उसी प्रकार स्त्री को श्री, पद्मा, कमला और लक्ष्मी नाम प्रदान किए।

यहाँ ध्यान देने वाली बात है।

आद्य महालक्ष्मी स्वयं एक देवी को उत्पन्न कर रही हैं, जिसे वे श्रीलक्ष्मी नाम देती हैं।

इससे प्राधानिक रहस्य की सृष्टि-व्यवस्था में आद्य महालक्ष्मी और श्रीलक्ष्मी का संदर्भ अलग दिखाई देता है।

लेकिन इस संबंध को ग्रंथ आगे और स्पष्ट करता है।

प्राधानिक रहस्य, श्लोक 25

ब्रह्मणे प्रददौ पत्नीं महालक्ष्मीर्नृप त्रयीम्।
रुद्राय गौरीं वरदां वासुदेवाय च श्रियम्॥२५॥

अर्थात् हे राजन्! महालक्ष्मी ने ब्रह्मा को त्रयीविद्यारूपा सरस्वती, रुद्र को वरदायिनी गौरी और भगवान वासुदेव को श्री प्रदान कीं।

यहाँ आद्य महालक्ष्मी भगवान वासुदेव अर्थात् विष्णु को श्रीलक्ष्मी प्रदान कर रही हैं।

इसलिए प्राधानिक रहस्य के इस प्रसंग में आद्य महालक्ष्मी और विष्णुपत्नी श्रीलक्ष्मी की भूमिकाएँ स्पष्ट रूप से अलग हैं।

यही अंतर वैकृतिक रहस्य के पूजाविधान में भी दिखाई देता है।

वैकृतिक रहस्य, श्लोक 18–19

महालक्ष्मीर्यदा पूज्या महाकाली सरस्वती।
दक्षिणोत्तरयोः पूज्ये पृष्ठतो मिथुनत्रयम्॥१८॥

विरञ्चिः स्वरया मध्ये रुद्रो गौर्या च दक्षिणे।
वामे लक्ष्म्या हृषीकेशः पुरतो देवतात्रयम्॥१९॥

इन श्लोकों में महालक्ष्मी के पूजाविधान के साथ तीन दिव्य युगलों की स्थापना का निर्देश मिलता है।

ब्रह्मा के साथ सरस्वती, रुद्र के साथ गौरी और भगवान हृषीकेश के साथ लक्ष्मी।

यहाँ भी महालक्ष्मी के पूजाविधान में विष्णुपत्नी श्रीलक्ष्मी का अलग उल्लेख है।

यह भेद अत्यंत महत्वपूर्ण है।

3. महिषासुरमर्दिनी महालक्ष्मी — देवताओं के तेज से प्रकट देवी

अब महालक्ष्मी के उस स्वरूप को फिर से देखें, जिसका वर्णन वैकृतिक रहस्य में मिलता है।

वहाँ समस्त देवताओं के तेज से प्रकट देवी को महालक्ष्मी कहा गया है।

वे अठारह भुजाओं से युक्त महिषासुरमर्दिनी हैं।

उनके हाथों में चक्र, त्रिशूल, खड्ग, गदा, घंटा तथा अनेक आयुध हैं।

इस प्रकार महालक्ष्मी का यह विशिष्ट वर्णन महिषासुर का संहार करने वाली देवी से संबंधित है।

लेकिन भगवान विष्णु की पत्नी श्रीलक्ष्मी का प्राकट्य एक दूसरे पुराणिक प्रसंग में भी मिलता है।

समुद्र-मंथन से प्रकट हुईं श्रीलक्ष्मी

श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कन्ध में समुद्र-मंथन का विस्तृत वर्णन है।

देवताओं और असुरों द्वारा क्षीरसागर का मंथन किया जा रहा था।

उस मंथन से अनेक दिव्य रत्न और वस्तुएँ प्रकट हुईं।

इसी क्रम में भगवती श्रीरमा का प्राकट्य हुआ।

श्रीमद्भागवत, स्कन्ध 8, अध्याय 8, श्लोक 8

ततश्चाविरभूत्साक्षाच्छ्री रमा भगवत्परा।
रञ्जयन्ती दिशः कान्त्या विद्युत्सौदामनी यथा॥८॥

अर्थात् इसके पश्चात् साक्षात् श्रीरमा प्रकट हुईं, जिनकी कान्ति विद्युत् के समान समस्त दिशाओं को प्रकाशित कर रही थी।

इसके बाद देवताओं ने उनका अभिनंदन किया।

जब श्रीरमा ने अपने लिए वर का चयन किया, तो उन्होंने भगवान मुकुन्द का वरण किया।

श्रीमद्भागवत, स्कन्ध 8, अध्याय 8, श्लोक 23

एवं विमृश्याव्यभिचारिसद्गुणै-
र्वरं निजैकाश्रयतयागुणाश्रयम्।
वव्रे वरं सर्वगुणैरपेक्षितं
रमा मुकुन्दं निरपेक्षमीप्सितम्॥२३॥

अर्थात् विचार करने के पश्चात् श्रीरमा ने समस्त उत्तम गुणों के आश्रय भगवान मुकुन्द को अपने पति के रूप में वरण किया।

इस प्रकार समुद्र-मंथन से प्रकट हुई श्रीरमा भगवान विष्णु की सहधर्मिणी हैं।

प्राधानिक रहस्य में वासुदेव को प्रदान की गई श्री और श्रीमद्भागवत में भगवान मुकुन्द का वरण करने वाली श्रीरमा—दोनों विवरण विष्णुपत्नी श्रीलक्ष्मी से संबंधित हैं।

हालाँकि दोनों ग्रंथ अलग-अलग सृष्टि और प्राकट्य-प्रसंग प्रस्तुत करते हैं। उन्हें एक ही समय में घटी घटनाओं का क्रमबद्ध वर्णन मानना आवश्यक नहीं है।

तो क्या तीन अलग-अलग लक्ष्मियाँ हैं ?

अब तक के शास्त्रीय प्रमाणों से तीन विशिष्ट संदर्भ सामने आते हैं।

आद्य महालक्ष्मी: प्राधानिक रहस्य के अनुसार समस्त सृष्टि की मूल, त्रिगुणमयी परमेश्वरी।

महिषासुरमर्दिनी महालक्ष्मी: वैकृतिक रहस्य के अनुसार समस्त देवताओं के तेज से प्रकट, अठारह भुजाओं वाली देवी, जिन्होंने महिषासुर का संहार किया।

श्रीलक्ष्मी अथवा श्रीरमा: भगवान विष्णु की सहधर्मिणी, जिनके समुद्र-मंथन से प्राकट्य और भगवान मुकुन्द के वरण का वर्णन श्रीमद्भागवत में मिलता है।

लेकिन इसका अर्थ तीन स्वतंत्र और एक-दूसरे से असंबंधित परमशक्तियों का अस्तित्व नहीं है।

ये एक ही परमशक्ति की व्यापक अवधारणा के अंतर्गत अलग-अलग संदर्भ, स्वरूप और कार्य हैं।

इस एकत्व का संकेत वैकृतिक रहस्य स्वयं देता है।

वैकृतिक रहस्य, श्लोक 25

महालक्ष्मीर्महाकाली सैव प्रोक्ता सरस्वती।
ईश्वरी पुण्यपापानां सर्वलोकमहेश्वरी॥२५॥

अर्थात् वही देवी महालक्ष्मी, महाकाली और सरस्वती कहलाती हैं। वे पुण्य-पापों की अधीश्वरी और समस्त लोकों की महेश्वरी हैं।

इस प्रकार शाक्त परंपरा में देवी के विभिन्न स्वरूपों के बीच भेद होते हुए भी उनकी मूल शक्ति का एकत्व स्वीकार किया गया है।

और इसी सिद्धांत को कालिका पुराण अत्यंत सुंदर ढंग से स्पष्ट करता है।

एक ही महामाया के अनेक स्वरूप

कालिका पुराण, अध्याय 58, श्लोक 49–51

अन्या या मूर्तयः प्रोक्ता शैलपुत्र्यादयोऽपराः।
तस्या एव विभागास्तास्तच्छरीरविनिर्गताः॥४९॥

निःसरन्ति यथा नित्यं सूर्यबिम्बान्मरीचयः।
देव्यास्तथोग्रचण्डाद्या महामायाशरीरतः॥५०॥

तासामेवाङ्गरूपाणि वक्तव्यानि मया तव।
एकैव तु महामाया कार्यार्थं भिन्नतां गता॥५१॥

अर्थात् शैलपुत्री आदि जिन अन्य मूर्तियों का वर्णन किया गया है, वे उसी देवी के विभाग हैं और उसी के शरीर से प्रकट हुई हैं।

जिस प्रकार सूर्य से उसकी किरणें निकलती हैं, उसी प्रकार महामाया से विभिन्न देवी-स्वरूप प्रकट होते हैं।

महामाया एक ही हैं, जो विभिन्न कार्यों के लिए भिन्न-भिन्न स्वरूप धारण करती हैं।

यही नवदुर्गा दर्शन की हमारी पूरी यात्रा का मूल आधार है।

शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा तथा आगे आने वाले अन्य स्वरूप—ये अलग-अलग स्वतंत्र परमशक्तियाँ नहीं हैं।

ये उसी एक जगन्माता की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं।

लेकिन यहाँ एक सावधानी आवश्यक है।

मूल शक्ति के एकत्व का अर्थ यह नहीं कि सभी स्वरूपों के अलग-अलग प्राकट्य, आयुध तथा नामकरण से जुड़ी कथाओं को बिना स्पष्ट प्रमाण के एक-दूसरे के साथ जोड़ दिया जाए।

और यही सावधानी माँ चंद्रघंटा तथा महिषासुरमर्दिनी महालक्ष्मी के संबंध में भी रखनी होगी।

क्या महिषासुरमर्दिनी महालक्ष्मी ही माँ चंद्रघंटा हैं ?

अब हम अपने अध्ययन के मूल प्रश्न पर लौटते हैं।

देवी कवच चंद्रघंटा को नवदुर्गा का तीसरा स्वरूप बताता है।

प्रचलित ध्यान-स्तुति में उनके मस्तक पर अर्धचंद्र और उनके दशभुजा, सिंहवाहिनी रूप का वर्णन मिलता है।

दूसरी ओर दुर्गा सप्तशती में महिषासुरमर्दिनी देवी को इंद्र द्वारा घंटा प्रदान किए जाने और अर्धचंद्र आभूषण मिलने का उल्लेख है।

वैकृतिक रहस्य उसी महिषासुरमर्दिनी को महालक्ष्मी कहता है।

इन वर्णनों में महत्वपूर्ण समानताएँ अवश्य हैं।

लेकिन कुछ अंतर भी हैं।

चंद्रघंटा की प्रचलित ध्यान-स्तुति उन्हें दशभुजा बताती है, जबकि वैकृतिक रहस्य में महिषासुरमर्दिनी महालक्ष्मी अष्टादशभुजा हैं।

दुर्गा सप्तशती के महिषासुर-वध वाले अध्यायों में चंद्रघंटा नाम का प्रयोग नहीं मिलता।

न ही उपलब्ध श्लोकों में यह कहा गया है कि इंद्र द्वारा प्रदान किया गया घंटा और अर्धचंद्र धारण करने के कारण महालक्ष्मी को चंद्रघंटा नाम प्राप्त हुआ।

इसलिए उपलब्ध प्रमाणों से दोनों देवी-स्वरूपों की विशिष्ट पहचान को पूर्णतः समान सिद्ध करना संभव नहीं है।

हाँ, कालिका पुराण के अनुसार सभी देवी-स्वरूप एक ही महामाया की अभिव्यक्तियाँ हैं।

इस आधार पर माँ चंद्रघंटा और महिषासुरमर्दिनी महालक्ष्मी में मूल आदिशक्ति का एकत्व स्वीकार किया जा सकता है।

लेकिन मूल परमशक्ति का एकत्व और दो विशिष्ट मूर्तिरूपों की पूर्ण समानता—ये दोनों अलग विषय हैं।

शास्त्रीय अध्ययन में इस अंतर को समझना आवश्यक है।

माँ चंद्रघंटा — प्रचंड शक्ति और मातृवत् रक्षा का स्वरूप

माँ चंद्रघंटा के इस तीसरे दर्शन में हमने उनके स्वरूप के अनेक पक्षों को समझा।

शिवमहापुराण में वर्णित विवाह के प्रसंग में भगवान शिव और उनके विलक्षण गणों का स्वरूप सामने आता है।

चंद्रघंटा की प्रचलित विवाह-कथा में भगवती की शक्ति अशांत वातावरण को शांत करने और परिजनों के भय को दूर करने के रूप में प्रकट होती है।

जटुकासुर की प्रचलित कथा में वही भगवती कैलास की रक्षा के लिए युद्ध करती हैं। चंद्रमा का प्रकाश उनके लिए अंधकार दूर करता है और घंटानाद असुर की शक्ति को विचलित कर देता है।

देवी कवच उन्हें नवदुर्गा के तीसरे स्वरूप के रूप में स्मरण करता है।

दुर्गा सप्तशती में देवी के घंटानाद की शास्त्रीय महिमा मिलती है।

और रहस्यग्रंथों में भगवती के विभिन्न नामों, स्वरूपों तथा कार्यों के बीच महत्वपूर्ण संबंध सामने आते हैं।

इन सभी प्रसंगों का अध्ययन करने के बाद माँ चंद्रघंटा के स्वरूप की एक विशेषता उभरती है।

उनके हाथों में अस्त्र-शस्त्र हैं, लेकिन भक्तों के लिए वे अभय प्रदान करने वाली माता हैं।

उनका घंटानाद असुरों के तेज का नाश करता है, लेकिन उसी घंटा से भक्तों की रक्षा की प्रार्थना की जाती है।

दुर्गा सप्तशती का वह सुंदर श्लोक एक बार फिर स्मरण होता है—

हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्यो नः सुतानिव॥

अर्थ: हे देवी! आपका वह घंटा, जो समस्त जगत को अपने नाद से व्याप्त करके दैत्यों के तेज का नाश करता है, हमारी भी उसी प्रकार रक्षा करे, जैसे माता अपने पुत्रों की रक्षा करती है।

यही मातृवत् रक्षा का भाव माँ चंद्रघंटा के दर्शन को विशेष बनाता है।

पहले दर्शन में हमने भगवती शैलपुत्री के प्राकट्य को समझा।

दूसरे दर्शन में माँ ब्रह्मचारिणी की तपस्या, धैर्य और अटूट संकल्प का अनुसरण किया।

और इस तीसरे दर्शन में माँ चंद्रघंटा के रूप में उसी जगन्माता के तेजस्वी, आयुधधारी तथा रक्षक स्वरूप का स्मरण किया।

वे सौम्य भी हैं और प्रचंड भी।

वे भक्तों को अभय प्रदान करती हैं और अधर्म का प्रतिकार भी करती हैं।

सिंह वाहन के साथ विराजमान दशभुजा माँ चंद्रघंटा का दिव्य चित्र। मस्तक पर अर्धचंद्र, हाथों में अस्त्र-शस्त्र और अभय मुद्रा, लाल वस्त्र तथा स्वर्णिम आभामंडल से सुशोभित भगवती।
नवदुर्गा का तृतीय स्वरूप — माँ चंद्रघंटा। मस्तक पर अर्धचंद्र, दस भुजाओं में दिव्य आयुध और सिंह वाहन के साथ विराजमान जगज्जननी का सौम्य एवं शक्तिशाली स्वरूप।

ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः।

माँ चंद्रघंटा के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।


हमारी नवदुर्गा दर्शन यात्रा का अगला पड़ाव

नवदुर्गा की हमारी यह यात्रा अब अपने चौथे पड़ाव की ओर बढ़ रही है।

शैलपुत्री के प्राकट्य, ब्रह्मचारिणी की कठोर तपस्या और चंद्रघंटा के दिव्य स्वरूप-दर्शन के बाद अगली कड़ी में हम भगवती के एक और महत्वपूर्ण स्वरूप का अध्ययन करेंगे।

नवदुर्गा: चौथा दर्शन — माँ कूष्माण्डा।

 

2 thoughts on “नवरात्रि विशेष – 3”

  1. अद्भुत…विलक्षण…। लेखक महोदय, बहुत विस्तार से आपने माँ चंद्रघण्टा के दिव्य स्वरूप का वर्णन और माँ के प्रकट होने का पौराणिक विवरण प्रस्तुत किया है । पढ़कर बहुत आनंद आया ।
    आपका आभार।

    1. आपके इतने आत्मीय और उत्साहवर्धक शब्दों के लिए हृदय से आभार। माँ भगवती की कृपा से शास्त्रों में वर्णित उनके दिव्य स्वरूपों को आप सभी तक पहुँचाने का यह छोटा-सा प्रयास है। आपके स्नेह और प्रोत्साहन से इस प्रयास को और बल मिलता है।

      माँ चन्द्रघण्टा की कृपा हम सभी पर बनी रहे।

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