नवदुर्गा: चौथा दर्शन— माँ कूष्माण्डा
लेखक: कुलदीप ठुसू “पम्पोष”
सम्पूर्ण सृष्टि की जननी —माँ कूष्माण्डा
जगज्जननी महामाया ने स्वयं हिमालय के घर शैलपुत्री के रूप में जन्म लिया।
फिर आगे चल कर देवी ने ब्रह्मचारिणी स्वरूप में भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की।
और फिर चन्द्रघण्टा स्वरूप में अपनी अपार दिव्य शक्ति को प्रकट किया।
अब नवदुर्गा के चौथे दर्शन में हम उन्हीं भगवती के एक और व्यापक स्वरूप से परिचित होंगे।
माँ कूष्माण्डा — जिन्हें कालिकापुराण में ‘जगतां प्रसूः’, अर्थात् सम्पूर्ण जगत को जन्म देने वाली माता कहा गया है।
अब तक हमारी यात्रा मुख्यतः सती, पार्वती, भगवान शिव तथा उनसे जुड़े पौराणिक प्रसंगों पर केंद्रित रही है।
किन्तु माँ कूष्माण्डा के स्वरूप को समझने के लिए हमें अपनी दृष्टि को और व्यापक करना होगा।
क्योंकि यहाँ भगवती केवल हिमालय की पुत्री या भगवान शिव की अर्धांगिनी नहीं हैं।
वे उस सम्पूर्ण सृष्टि की जननी हैं, जिसमें हिमालय भी है, पृथ्वी भी है, सूर्य और चन्द्रमा भी हैं तथा समस्त चराचर जगत भी।
यहाँ भगवती के मातृत्व का अर्थ केवल जन्म देना नहीं है। इसमें सृष्टि की उत्पत्ति, उसका धारण, पालन और अन्ततः उसका लय भी समाहित है।
अब शास्त्रों के आधार पर भगवती के इसी विराट जगज्जननी स्वरूप को समझने का प्रयास करते हैं।
एक ही महामाया — अनेक दिव्य स्वरूप
माँ कूष्माण्डा के इस व्यापक स्वरूप को समझने से पहले कालिकापुराण में वर्णित एक महत्वपूर्ण सिद्धांत जानना आवश्यक है।
कालिकापुराण, अध्याय 58, श्लोक 48–51
मूलमूर्तिर्महामाया योगनिन्द्रा जगन्मयी।
तस्यास्तु वैष्णवीतन्त्रं मन्त्रं प्राक् प्रतिपादितम्॥ ४८॥अन्या या मूर्तयः प्रोक्ता शैलपुत्र्यादयोऽपराः।
तस्या एव विभागास्तास्तच्छरीरविनिर्गताः॥ ४९॥निःसरन्ति यथा नित्यं सूर्यबिम्बान्मरीचयः।
देव्यास्तथोग्रचण्डाद्या महामायाशरीरतः॥ ५०॥तासामेवाङ्गरूपाणि वक्तव्यानि मया तव।
एकैव तु महामाया कार्यार्थं भिन्नतां गता॥ ५१॥
इन श्लोकों में महामाया को मूलमूर्ति, योगनिद्रा और जगन्मयी कहा गया है।
शैलपुत्री आदि देवी-स्वरूपों को उन्हीं का विस्तार बताते हुए ग्रंथ में एक सुंदर उदाहरण दिया गया है।
जिस प्रकार सूर्य से उसकी किरणें निकलती हैं, उसी प्रकार मूल महामाया से उनके विभिन्न शक्तिरूप प्रकट होते हैं।
अन्तिम श्लोक में स्पष्ट कहा गया है—
‘एकैव तु महामाया कार्यार्थं भिन्नतां गता।’
अर्थात् एक ही महामाया विभिन्न कार्यों के लिए अनेक स्वरूप धारण करती हैं।
इस प्रकार भगवती के विविध स्वरूपों का मूल एक ही सनातन परमशक्ति है।
इसी शास्त्रीय पृष्ठभूमि में अब हम माँ कूष्माण्डा के उस स्वरूप की ओर बढ़ते हैं, जिसका संबंध सम्पूर्ण सृष्टि से है।
माँ कूष्माण्डा — ‘जगतां प्रसूः’
कालिकापुराण, अध्याय 56, श्लोक 16
चन्द्रघण्टा पातु याम्यां यमभीतिविवर्धिनी।
नैर्ऋत्ये त्वथ कूष्माण्डी पातु मां जगतां प्रसूः॥ १६॥
इस श्लोक में दक्षिण दिशा में माँ चन्द्रघण्टा तथा नैर्ऋत्य दिशा में माँ कूष्माण्डी से रक्षा की प्रार्थना की गई है।
लेकिन यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य है भगवती कूष्माण्डी के लिए प्रयुक्त संबोधन—
‘जगतां प्रसूः’ — समस्त जगत को जन्म देने वाली माता।
यही संबोधन माँ कूष्माण्डा के स्वरूप को समझने का महत्वपूर्ण शास्त्रीय आधार प्रदान करता है।
हम माता के रूप में सामान्यतः उस शक्ति का दर्शन करते हैं, जो जीवन को जन्म देती है, उसका पालन करती है और उसकी रक्षा करती है।
लेकिन यहाँ मातृत्व का विस्तार केवल मनुष्य या अन्य प्राणियों तक सीमित नहीं है। इसमें सम्पूर्ण चराचर सृष्टि का समावेश है।
पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, पर्वत, नदियाँ, वनस्पतियाँ और सभी प्राणी—समस्त जगत।
किन्तु यदि भगवती सम्पूर्ण सृष्टि की जननी हैं, तो एक बात समझना आवश्यक हो जाता है।
जब इस जगत का अस्तित्व ही नहीं था, तब उस मूल शक्ति का स्वरूप क्या था?
इसका उत्तर देवीभागवत महापुराण में मिलता है।
जब सृष्टि भी नहीं थी, तब भी भगवती थीं
श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, सप्तम स्कन्ध, अध्याय 32, श्लोक 2
अहमेवास पूर्वं तु नान्यत्किञ्चिन्नगाधिप।
तदात्मरूपं चित्संवित्परब्रह्मैकनामकम्॥ २॥
इस प्रसंग में स्वयं भगवती हिमालय को अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान कराती हैं।
वे कहती हैं—
हे पर्वतराज! आरम्भ में केवल मैं ही थी। मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। मेरा स्वरूप चैतन्यमय है, जिसे परब्रह्म कहा जाता है।
यह कथन भगवती के अस्तित्व को सृष्टि की सीमाओं से भी परे ले जाता है।
यहाँ भगवती किसी विशेष जन्म या अवतार की बात नहीं कर रहीं। वे अपने उस सनातन स्वरूप का परिचय दे रही हैं, जो समस्त सृष्टि का मूल आधार है।
इस शास्त्रीय दृष्टि से एक अत्यंत सुंदर संबंध सामने आता है।
जिन भगवती ने हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया, वही अपने मूल स्वरूप का परिचय देते हुए हिमालय से कहती हैं कि आरम्भ में केवल वे ही विद्यमान थीं।
अर्थात् भगवती का पार्वती रूप एक दिव्य अवतरण है, जबकि उनका मूल स्वरूप जन्म और काल की सीमाओं से परे है।
यही आदिशक्ति का सनातन स्वरूप है।
सृष्टि के आरम्भ में भगवती का तेज
शाक्त ग्रंथों में सृष्टि के आरम्भ का एक महत्वपूर्ण वर्णन प्राधानिक रहस्य में मिलता है।
यह ग्रंथ दुर्गासप्तशती के साथ पढ़े जाने वाले तीन रहस्यात्मक पाठों में से एक है।
प्राधानिक रहस्य, श्लोक 4
सर्वस्याद्या महालक्ष्मीस्त्रिगुणा परमेश्वरी।
लक्ष्यालक्ष्यस्वरूपा सा व्याप्य कृत्स्नं व्यवस्थिता॥ ४॥
अर्थात् सबकी आदिस्वरूपा महालक्ष्मी त्रिगुणमयी परमेश्वरी हैं। वे दृश्य और अदृश्य दोनों स्वरूपों में सम्पूर्ण जगत में व्याप्त हैं।
इसके आगे भगवती के तेज का वर्णन आता है।
प्राधानिक रहस्य, श्लोक 6
तप्तकाञ्चनवर्णाभा तप्तकाञ्चनभूषणा।
शून्यं तदखिलं स्वेन पूरयामास तेजसा॥ ६॥
अर्थात् तपे हुए स्वर्ण के समान कान्ति तथा आभूषणों से सुशोभित भगवती ने उस सम्पूर्ण शून्य जगत को अपने तेज से परिपूर्ण कर दिया।
इस प्रसंग में भगवती को आद्या महालक्ष्मी कहा गया है।
ध्यान देने योग्य है कि यहाँ भगवती स्वयं अपने तेज से उस शून्य अवस्था को परिपूर्ण करती हैं।
इसके अगले श्लोक में बताया गया है कि उस शून्य जगत को देखकर परमेश्वरी ने तमोगुणमय एक अन्य स्वरूप धारण किया।
इस प्रकार ग्रंथ में मूल परमशक्ति से विभिन्न शक्तियों और सृष्टि की अवस्थाओं के विस्तार का वर्णन मिलता है।
यहाँ प्रकाश अथवा तेज किसी बाहरी स्रोत से प्राप्त नहीं हुआ है। वह स्वयं भगवती का तेज है।
इसी शास्त्रीय पृष्ठभूमि में माँ कूष्माण्डा के विषय में प्रचलित उनकी मंद मुस्कान से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की मान्यता विशेष महत्व रखती है।
माँ की मंद मुस्कान से ब्रह्माण्ड की रचना
माँ कूष्माण्डा के विषय में एक अत्यंत प्रसिद्ध मान्यता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था और चारों ओर अंधकार था, तब भगवती ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्माण्ड की रचना की।
इसी कारण उन्हें सृष्टि की आदिस्वरूपा तथा ब्रह्माण्ड की रचयिता के रूप में स्मरण किया जाता है।
इस मान्यता में भगवती की मुस्कान का विशेष महत्व है।
सृष्टि जैसे विराट कार्य को किसी कठिन प्रयास या संघर्ष से नहीं, बल्कि भगवती अपनी एक सहज मुस्कान से करतीं हैं।
यह भाव उनकी असीम सामर्थ्य और सृजनशक्ति को व्यक्त करता है।
शाक्त ग्रंथों में भगवती की मुस्कान और सृष्टि के बीच संबंध का एक सुंदर वर्णन देवीभागवत में भी मिलता है।
देवीभागवत, सप्तम स्कन्ध, अध्याय 33, श्लोक 29
दन्ताः स्नेहकला यस्य हासो माया प्रकीर्तिता।
सर्गस्त्वपाङ्गमोक्षः स्याद् व्रीडोर्ध्वोष्ठो महेशितुः॥ २९॥
इस श्लोक में भगवती के विराट स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है कि स्नेह की कलाएँ उनके दाँत हैं,
उनकी मुस्कान माया है, उनके कटाक्ष से सृष्टि का प्राकट्य होता है और लज्जा उनके ऊपरी होंठ का स्वरूप है।
अर्थात् भगवती की मुस्कान को उनकी मायाशक्ति तथा उनके कटाक्ष को सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति से जोड़ा गया है।
यहाँ ‘हासो माया’ का अर्थ है—उनकी मुस्कान माया है।
और ‘सर्गस्त्वपाङ्गमोक्षः’ का अर्थ है—उनके कटाक्ष से सृष्टि का प्राकट्य।
यह भेद महत्वपूर्ण है, क्योंकि माँ कूष्माण्डा की प्रचलित मान्यता में उनकी मंद मुस्कान से ब्रह्माण्ड की रचना का वर्णन मिलता है,
जबकि इस श्लोक में मुस्कान और सृष्टि को अलग-अलग अभिव्यक्तियों से जोड़ा गया है।
इस प्रकार शाक्त ग्रंथों में भगवती की दिव्य अभिव्यक्ति, माया और सृष्टि के प्राकट्य के बीच एक गहरा संबंध दिखाई देता है।
माँ कूष्माण्डा की मंद मुस्कान से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की प्रचलित मान्यता इसी व्यापक सृष्टिजननी भाव का एक सुंदर रूप प्रस्तुत करती है।
किन्तु सृष्टि की रचना के बाद उसके अस्तित्व और जीवन को बनाए रखने का विषय भी सामने आता है।
यहीं माँ कूष्माण्डा का सूर्य से जुड़ा स्वरूप विशेष महत्वपूर्ण हो जाता है।

माँ कूष्माण्डा और सूर्य — प्रकाश एवं ऊर्जा की मूल शक्ति
माँ कूष्माण्डा के विषय में प्रचलित मान्यता है कि उनका निवास सूर्य-मण्डल के भीतर है।
उन्हें सूर्य के तेज, उसके प्रकाश और उसकी शक्ति का मूल स्रोत माना जाता है।
अर्थात् इस उपासना-परंपरा में सूर्य जिस प्रकाश और ऊर्जा से जगत को प्रकाशित करता है, उसकी मूल दिव्य शक्ति भगवती ही हैं।
माँ की कान्ति भी सूर्य के समान प्रकाशमान बताई जाती है।
इस संबंध का महत्व समझने के लिए सूर्य की भूमिका पर ध्यान देना उपयोगी होगा।
हमारी पृथ्वी पर अधिकांश जीवन के लिए सूर्य अत्यंत आवश्यक है।
सूर्य से पृथ्वी को प्रकाश और ऊष्मा प्राप्त होती है। सूर्य के प्रकाश की सहायता से पौधे अपना भोजन बनाते हैं। यही पौधे अनेक जीवों के भोजन का आधार बनते हैं।
पृथ्वी पर जलचक्र, तापमान और मौसम की अनेक प्रक्रियाएँ भी सूर्य की ऊर्जा से संचालित होती हैं।
इस प्रकार सूर्य पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने वाली अनेक प्रक्रियाओं का प्रमुख ऊर्जा-स्रोत है।
और माँ कूष्माण्डा की उपासना-परंपरा में इसी सूर्य के तेज और शक्ति का मूल स्रोत भगवती को माना गया है।
इस संबंध में देवीभागवत के दो श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
देवीभागवत महापुराण, सप्तम स्कन्ध, अध्याय 33, श्लोक 14
सूर्योऽहं तारकाश्चाहं तारकेशस्तथास्म्यहम्।
पशुपक्षिस्वरूपाहं चाण्डालोऽहं च तस्करः॥ १४॥
इस श्लोक में भगवती स्वयं कहती हैं—
मैं ही सूर्य हूँ, मैं ही तारे हूँ और मैं ही चन्द्रमा हूँ। पशु-पक्षियों तथा अन्य जीवों के स्वरूप में भी मैं ही विद्यमान हूँ।
यह श्लोक भगवती की सर्वव्यापकता का वर्णन करता है।
लेकिन देवीभागवत में सूर्य की उत्पत्ति को भगवती से जोड़ने वाला एक और महत्वपूर्ण प्रमाण मिलता है।
उसी अध्याय में, भगवती के विराट स्वरूप का दर्शन करने के बाद देवता उनकी स्तुति करते हैं।
देवीभागवत, सप्तम स्कन्ध, अध्याय 33, श्लोक 46
यस्मादग्निः समुत्पन्नो यस्मात्सूर्यश्च चन्द्रमाः।
यस्मादोषधयः सर्वास्तस्मै सर्वात्मने नमः॥ ४६॥
अर्थात् जिससे अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा और समस्त औषधियाँ उत्पन्न हुई हैं, उस सर्वात्मस्वरूप परमशक्ति को नमस्कार है।
यह श्लोक विशेष महत्वपूर्ण है।
यहाँ केवल सूर्य में भगवती की उपस्थिति नहीं, बल्कि सूर्य की उत्पत्ति को भी उसी मूल परमशक्ति से जोड़ा गया है।
इस प्रकार माँ कूष्माण्डा का सूर्य से संबंध शाक्त दर्शन की उस व्यापक अवधारणा से जुड़ता है,
जिसमें सूर्य भी भगवती से उत्पन्न सृष्टि का एक अंग है और उसका तेज भी उन्हीं की दिव्य शक्ति पर आश्रित माना जाता है।
इस दृष्टि से सूर्य केवल प्रकाश प्रदान करने वाला खगोलीय पिण्ड नहीं, बल्कि भगवती की सृष्टिजननी शक्ति का स्मरण कराने वाला माध्यम भी है।
सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार — एक ही मूल शक्ति
अब तक हमने सृष्टि के आरम्भ, भगवती के तेज और सूर्य से उनके संबंध को समझा।
लेकिन सृष्टि की उत्पत्ति और उसका पालन दो अलग-अलग कार्य हैं।
माँ के जगज्जननी स्वरूप की व्यापकता का एक महत्वपूर्ण प्रमाण दुर्गासप्तशती में मिलता है।
प्रथम अध्याय में, जब मधु और कैटभ नामक असुरों के कारण ब्रह्माजी संकट में पड़े, तब उन्होंने भगवान विष्णु को योगनिद्रा से जाग्रत करने के लिए भगवती की स्तुति की।
उस स्तुति में ब्रह्माजी कहते हैं—
दुर्गासप्तशती, प्रथम अध्याय, श्लोक 75–77
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा।
त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत्॥ ७५॥त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा।
विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने॥ ७६॥तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये।
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः॥ ७७॥
इन श्लोकों में भगवती को परम जननी बताते हुए कहा गया है कि उन्हीं के द्वारा जगत की उत्पत्ति, उसका धारण और पालन होता है तथा अन्ततः उसका संहार भी उन्हीं के द्वारा होता है।
यही तीन प्रमुख कार्य हैं—
सृष्टि, स्थिति और संहार।
अर्थात् उत्पत्ति, पालन और लय।
दुर्गासप्तशती के ग्यारहवें अध्याय में देवताओं की नारायणी स्तुति में इसी सिद्धांत की पुनः पुष्टि होती है।
अध्याय 11, श्लोक 11
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥ ११॥
अर्थात् हे सनातनी नारायणी! आप सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और विनाश की मूल शक्ति हैं। आपको नमस्कार है।
यहीं जगज्जननी शब्द का वास्तविक विस्तार सामने आता है।
भगवती केवल संसार को जन्म नहीं देतीं, बल्कि उसी संसार का धारण और पालन भी करती हैं।
और जब सृष्टि के लय का समय आता है, तब उसी मूल शक्ति में उसका समावेश हो जाता है।
माँ कूष्माण्डा के नाम की एक महत्वपूर्ण शास्त्रीय व्याख्या इसी व्यापक सिद्धांत से संबंधित है।
‘कूष्माण्डा’ नाम का वास्तविक अर्थ क्या है?
माँ के इस स्वरूप की चर्चा में उनका नाम स्वयं विशेष महत्व रखता है।
सामान्यतः कूष्माण्डा शब्द को ‘कु’, ‘ऊष्मा’ और ‘अण्ड’ से जोड़कर समझाया जाता है।
इसकी लोकप्रिय व्याख्या में ‘कु’ का अर्थ अल्प, ‘ऊष्मा’ का अर्थ ताप अथवा ऊर्जा और ‘अण्ड’ का संबंध ब्रह्माण्ड से बताया जाता है।
इसी आधार पर माँ को अल्प ऊर्जा अथवा अपनी मंद मुस्कान से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना करने वाली देवी कहा जाता है।
किन्तु देवीकवच की टीका-परंपरा में इस नाम की एक अन्य महत्वपूर्ण व्याख्या भी मिलती है।
त्रिविध तापों से युक्त संसार को अपने भीतर समाहित करने वाली भगवती
देवीकवच, श्लोक 3
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥ ३॥
इस श्लोक में कूष्माण्डा को नवदुर्गा का चौथा स्वरूप बताया गया है।
इसी श्लोक के ‘कूष्माण्डेति’ शब्द की व्याख्या के संदर्भ में ‘गुप्तवती’ टीका के नाम से एक संस्कृत विवेचन उद्धृत मिलता है—
कूष्माण्डेति — कुत्सितः ऊष्मा तापत्रयरूपो यस्मिन् संसारे स संसारो अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्याः, त्रिविधतापरूपसंसारभक्षणकर्त्रीत्यर्थः।
इस व्याख्या में ‘कुत्सित ऊष्मा’ को संसार के तीन प्रकार के तापों से जोड़ा गया है।
सनातन दर्शन में इन्हें त्रिविध ताप कहा जाता है।
आध्यात्मिक ताप — शरीर और मन से उत्पन्न होने वाले कष्ट।
आधिभौतिक ताप — अन्य जीवों अथवा बाहरी भौतिक कारणों से उत्पन्न होने वाले कष्ट।
आधिदैविक ताप — प्राकृतिक अथवा दैवी कारणों से उत्पन्न होने वाले कष्ट।
इन तीनों तापों से युक्त संसार को इस व्याख्या में ‘कूष्मा’ से संबंधित बताया गया है।
आगे ‘अण्ड’ का संबंध भगवती के उदर से जोड़ते हुए कहा गया है कि त्रिविध तापों से युक्त यह संसार जिन भगवती के उदर में समाहित हो जाता है, वे कूष्माण्डा कहलाती हैं।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है।
इस व्याख्या में केवल संसार को धारण करने का ही नहीं, बल्कि उसके अन्तिम लय का भी भाव है।
अर्थात् जब प्रलय का समय आता है, तब सम्पूर्ण चराचर जगत उसी मूल शक्ति में समाहित हो जाता है।
इस प्रकार माँ के नाम की यह व्याख्या उनके प्रलयकालीन स्वरूप को भी सामने लाती है।
इसके व्यापक अर्थ को दुर्गासप्तशती में वर्णित सृष्टि, स्थिति और संहार के सिद्धांत के साथ समझा जा सकता है।
जिस मूल शक्ति से जगत उत्पन्न होता है, उसी से उसका पालन होता है और अन्ततः उसी में वह समाहित हो जाता है।
माँ कूष्माण्डा के नाम की यह व्याख्या उनके जगज्जननी स्वरूप को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है।

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही जिनका विराट स्वरूप है
भगवती के व्यापक अस्तित्व का एक अत्यंत सुंदर वर्णन देवीभागवत महापुराण के सप्तम स्कन्ध में मिलता है।
जब हिमालय भगवती से उनके दिव्य स्वरूप का दर्शन कराने की प्रार्थना करते हैं, तब माता अपना विराट रूप प्रकट करती हैं।
देवीभागवत, सप्तम स्कन्ध, अध्याय 33, श्लोक 23
अपश्यंस्ते महादेव्या विराड्रूपं परात्परम्।
द्यौर्मस्तकं भवेद्यस्य चन्द्रसूर्यौ च चक्षुषी॥ २३॥
इस वर्णन में द्युलोक भगवती का मस्तक और सूर्य तथा चन्द्रमा उनके नेत्र बताए गए हैं।
इसके अगले श्लोक में दिशाओं को उनके कान, वायु को उनके प्राण तथा सम्पूर्ण विश्व को उनका हृदय कहा गया है।
इस विराट स्वरूप का वर्णन आगे भी चलता है।
अध्याय 33, श्लोक 31
कुक्षिः समुद्रा गिरयोऽस्थीनि देव्या महेशितुः।
नद्यो नाड्यः समाख्याता वृक्षाः केशाः प्रकीर्तिताः॥ ३१॥
अर्थात् समुद्र भगवती का उदर, पर्वत उनकी अस्थियाँ, नदियाँ उनकी नाड़ियाँ और वृक्ष उनके केशों के रूप में वर्णित हैं।
यहाँ सम्पूर्ण प्रकृति भगवती के विराट स्वरूप का अंग बन जाती है।
पृथ्वी, आकाश, पर्वत, समुद्र, नदियाँ और समस्त जीव-जगत—सब कुछ उसी परमशक्ति से संबंधित है।
यह वर्णन भगवती के किसी सामान्य साकार शरीर तक सीमित नहीं है।
यहाँ समस्त अस्तित्व को उनके विराट स्वरूप के रूप में देखा गया है।
देवीभागवत के इसी अध्याय में भगवती स्वयं कहती हैं—
अध्याय 33, श्लोक 3
साहं सर्वं जगत्सृष्ट्वा तदन्तः प्रविशाम्यहम्।
मायाकर्मादिसहिता गिरे प्राणपुरःसरा॥ ३॥
अर्थात् मैं सम्पूर्ण जगत की रचना करके उसके भीतर भी प्रवेश करती हूँ।
यह कथन भगवती की सर्वव्यापकता का महत्वपूर्ण आधार है।
वे केवल सृष्टि की उत्पत्ति करने वाली नहीं, बल्कि उसी सृष्टि के भीतर भी विद्यमान हैं।
इसी अध्याय के श्लोक 16 में भगवती कहती हैं कि जो कुछ भी कहीं दिखाई देता अथवा सुनाई देता है, उसके भीतर और बाहर वे सदा व्याप्त हैं।
इस प्रकार माँ के जगज्जननी स्वरूप में सम्पूर्ण सृष्टि समाहित दिखाई देती है।
किन्तु उन्हीं भगवती का यह विराट अस्तित्व अपने भक्तों की रक्षा के लिए साकार रूप भी धारण करता है।
इसका एक महत्वपूर्ण पौराणिक प्रसंग काशी से जुड़ा हुआ है।

जब भगवती अपने भक्त की रक्षा के लिए प्रकट हुईं
देवीभागवत महापुराण के तृतीय स्कन्ध में काशी के राजा सुबाहु, उनकी पुत्री शशिकला और राजकुमार सुदर्शन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग मिलता है।
राजा सुबाहु, शशिकला और सुदर्शन की कथा
काशी के राजा सुबाहु की पुत्री शशिकला ने राजकुमार सुदर्शन को अपने पति के रूप में चुना था।
लेकिन सुदर्शन का जीवन उस समय राजसत्ता और पारिवारिक संघर्षों से घिरा हुआ था।
उनके पिता राजा ध्रुवसन्धि के निधन के बाद उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष उत्पन्न हुआ था।
सुदर्शन की माता मनोरमा अपने पुत्र को लेकर वन में चली गई थीं, जहाँ उन्हें महर्षि भारद्वाज के आश्रम में आश्रय मिला।
दूसरी ओर राजा युधाजित् सुदर्शन के विरोध में था।
इसी बीच काशी की राजकुमारी शशिकला ने सुदर्शन को अपने पति के रूप में स्वीकार करने का निश्चय किया।
उनके विवाह के लिए अनेक राजा काशी पहुँचे, किन्तु शशिकला का संकल्प अटल रहा।
राजा सुबाहु ने अपनी पुत्री का विवाह सुदर्शन के साथ सम्पन्न कराया।
लेकिन जब सुदर्शन अपनी पत्नी को लेकर आगे बढ़े, तब युधाजित् और शत्रुजित् ने उनका मार्ग रोक लिया।
एक भीषण युद्ध आरम्भ हो गया।
राजा सुबाहु भी अपनी सेना लेकर सुदर्शन की सहायता के लिए पहुँचे, किन्तु शत्रुओं की शक्ति अत्यंत प्रबल थी।
सुदर्शन भगवती के परम भक्त थे। संकट के उस समय भी माता की कृपा में उनका विश्वास अटल रहा।
तभी युद्धभूमि में भगवती का अद्भुत स्वरूप प्रकट हुआ।
जगदम्बा दुर्गा स्वयं सिंह पर आरूढ़ होकर अपने भक्त की रक्षा के लिए उपस्थित हुईं।
भगवती के दिव्य तेज और स्वरूप को देखकर वहाँ उपस्थित राजा आश्चर्यचकित रह गए।
सुदर्शन समझ गए कि उनकी आराध्या माता स्वयं उनकी रक्षा के लिए आई हैं।
देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 23 में वर्णित इस प्रसंग में भगवती युधाजित् और शत्रुजित् का वध करती हैं तथा अपने भक्त की रक्षा करती हैं।
यह दृश्य देखकर राजा सुबाहु अत्यंत भावविभोर हो गए।
उन्होंने भगवती की स्तुति की।
माता ने जब उनसे वरदान माँगने को कहा, तब राजा ने न धन माँगा, न राज्य का विस्तार।
उन्होंने केवल यह प्रार्थना की कि भगवती सदैव काशी में निवास करें और उस पवित्र नगरी की रक्षा करती रहें।
देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 24, श्लोक 5
नगरेऽत्र त्वया मातः स्थातव्यं मम सर्वदा।
दुर्गादेवीति नाम्ना वै त्वं शक्तिरिह संस्थिता॥ ५॥
अर्थात् हे माता! आप इस नगरी में सदैव निवास करें और दुर्गादेवी के नाम से यहाँ प्रतिष्ठित रहें।
भगवती ने राजा की प्रार्थना स्वीकार की।
अध्याय 24, श्लोक 11
राजन्सदा निवासो मे मुक्तिपुर्यां भविष्यति।
रक्षार्थं सर्वलोकानां यावत्तिष्ठति मेदिनी॥ ११॥
अर्थात् हे राजन्! जब तक पृथ्वी विद्यमान रहेगी, तब तक सभी लोकों की रक्षा के लिए मेरा निवास इस मुक्तिपुरी काशी में रहेगा।
इसके बाद देवीभागवत के तृतीय स्कन्ध, अध्याय 25, श्लोक 41 में राजा सुबाहु द्वारा काशी में भगवती दुर्गा की प्रतिमा तथा मंदिर स्थापित कराने का वर्णन मिलता है।
सुबाहुरपि काश्यां तु दुर्गायाः प्रतिमां शुभाम्।
कारयित्वा च प्रासादं स्थापयामास भक्तितः॥ ४१॥
अर्थात् राजा सुबाहु ने काशी में भगवती दुर्गा की सुंदर प्रतिमा तथा मंदिर बनवाकर भक्तिपूर्वक उनकी स्थापना की।
काशी के प्रसिद्ध दुर्गाकुण्ड मंदिर में आज भी भगवती की माँ कूष्माण्डा के रूप में उपासना की जाती है।
इस प्रकार देवीभागवत में भगवती दुर्गा के काशी की रक्षिका के रूप में प्रतिष्ठित होने का पौराणिक प्रसंग मिलता है,
जबकि काशी की मंदिर-परंपरा इस उपासना-स्थल को माँ कूष्माण्डा से भी जोड़ती है।
सुदर्शन की स्तुति में भगवती का जगज्जननी स्वरूप
इस कथा में एक श्लोक विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 24, श्लोक 14
त्वं देवि सर्वं सृजसि प्रपञ्चं
श्रुतं मया पालयसि स्वसृष्टम्।
त्वमत्सि संहारपरे च काले
न तेऽत्र चित्रं मम रक्षणं वै॥ १४॥
इसमें सुदर्शन भगवती से कहते हैं—
हे देवी! मैंने सुना है कि आप ही सम्पूर्ण जगत की रचना करती हैं, आप ही अपनी सृष्टि का पालन करती हैं और संहार के समय आप ही उसे अपने भीतर समाहित कर लेती हैं। इसलिए मेरी रक्षा करना आपके लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
इस श्लोक में एक विशेष भाव सामने आता है।
सुदर्शन के लिए भगवती की अपार शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण केवल युद्धभूमि में उनका प्रकट होना नहीं है।
वे जानते हैं कि सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार जिन भगवती की शक्ति से होता है, उनके लिए अपने एक भक्त की रक्षा करना कोई असंभव कार्य नहीं है।
यही भगवती के विराट स्वरूप और उनके भक्तवत्सल मातृभाव का सुंदर समन्वय है।
माँ कूष्माण्डी और कामाख्या की योगिनी-परंपरा
माँ कूष्माण्डा के नाम और उपासना से संबंधित एक अन्य महत्वपूर्ण शास्त्रीय उल्लेख कालिकापुराण में मिलता है।
यह उल्लेख असम के प्रसिद्ध कामाख्या शक्तिपीठ की उपासना-परंपरा से जुड़ा हुआ है।
कामाख्या की शाक्त परंपरा में भगवती के योनिरूप की उपासना का विशेष स्थान है।
कालिकापुराण के बासठवें अध्याय में कामाख्या क्षेत्र के विभिन्न पवित्र स्थानों, शक्तिस्वरूपों, योगिनियों और उनसे संबंधित पीठों का वर्णन मिलता है।
इसी प्रसंग में एक महत्वपूर्ण श्लोक आता है।
कालिकापुराण, अध्याय 62, श्लोक 91
तत्राष्टौ योगिनीर्नित्या मूलभूताः सनातनीः।
पूर्वोक्ताः शैलपुत्र्याद्याः स्थिता देव्याः समन्ततः॥ ९१॥
अर्थात् वहाँ पहले वर्णित शैलपुत्री आदि आठ मूलभूत और सनातन योगिनियाँ भगवती के चारों ओर नित्य स्थित रहती हैं।
इसके अगले श्लोकों में इन योगिनियों से संबंधित आठ पीठों के नाम मिलते हैं।
इनमें गुप्तकामा, श्रीकामा, विन्ध्यवासिनी, कोटीश्वरी, वनस्था, पाददुर्गा, दीर्घेश्वरी और भुवनेश्वरी का उल्लेख आता है।
ये नाम कामाख्या क्षेत्र की विशिष्ट शाक्त पीठ-परंपरा का परिचय देते हैं।
अध्याय के आगे चलकर कूष्माण्डी का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
कालिकापुराण, अध्याय 62, श्लोक 109
कामाख्याप्रस्तरप्रान्ते कूष्माण्डी नाम योगिनी।
पीठे कोटीश्वरी नाम्ना योनिरूपेण संस्थिता॥ १०९॥
अर्थात् कामाख्या की पवित्र शिला के समीप कूष्माण्डी नामक योगिनी कोटीश्वरी नामक पीठ में योनिरूप से प्रतिष्ठित हैं।
यह श्लोक कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।
पहली बात—कूष्माण्डी नाम केवल नवदुर्गा के नामक्रम अथवा रक्षा-कवच में ही नहीं, बल्कि कामाख्या की योगिनी-उपासना में भी मिलता है।
दूसरी बात—ग्रंथ में उनकी स्थिति एक विशिष्ट पीठ, कोटीश्वरी, से संबंधित बताई गई है।
तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात—यहाँ उनका स्वरूप ‘योनिरूपेण संस्थिता’ कहा गया है।
कामाख्या की शाक्त उपासना में योनिरूप भगवती की सृजनशक्ति का एक प्रमुख धार्मिक स्वरूप है।
यहाँ योनि का अर्थ केवल भौतिक शरीर का अंग नहीं, बल्कि उस मातृशक्ति से संबंधित उपासना का केंद्र भी है, जिससे जीवन की उत्पत्ति का भाव जुड़ा हुआ है।
इस प्रकार कालिकापुराण में कूष्माण्डी नाम के साथ दो विशेष उल्लेख प्राप्त होते हैं।
अध्याय 56 में उन्हें ‘जगतां प्रसूः’, अर्थात् जगत की जननी कहा गया है।
और अध्याय 62 में कूष्माण्डी नामक योगिनी को कामाख्या क्षेत्र के कोटीश्वरी पीठ में योनिरूप से प्रतिष्ठित बताया गया है।
ये दोनों उल्लेख भगवती के मातृस्वरूप तथा शाक्त उपासना की विभिन्न परंपराओं को समझने में महत्वपूर्ण हैं।
हालाँकि यहाँ वर्णित आठ योगिनियों और देवीकवच की नौ दुर्गाओं के क्रम अपनी-अपनी उपासना-पद्धतियों से संबंधित हैं, इसलिए उनके अलग-अलग विधानों को एक ही नहीं मानना चाहिए।
माँ कूष्माण्डा का स्वरूप — अष्टभुजा भगवती
अब तक हमने माँ कूष्माण्डा के उस विराट स्वरूप का अध्ययन किया, जिसका संबंध सम्पूर्ण सृष्टि से है।
किन्तु भक्तों की उपासना और ध्यान के लिए भगवती का एक साकार स्वरूप भी प्रतिष्ठित है।
नवदुर्गा की प्रचलित ध्यान-परंपरा में माँ कूष्माण्डा को अष्टभुजाधारी, सिंहवाहिनी और सूर्य के समान तेजस्वी बताया गया है।
उनके मस्तक पर अर्धचन्द्र सुशोभित है और ध्यान-वर्णन में उन्हें त्रिनेत्रा भी कहा गया है।
माँ के मुखमण्डल पर सौम्यता तथा मंद मुस्कान का भाव है।
उनकी आठों भुजाओं में विभिन्न आयुध और वस्तुएँ धारण की हुई हैं।
माँ की आठ भुजाओं में कमण्डलु, धनुष, बाण, कमल, सुधाकलश, चक्र, गदा तथा जपमाला का वर्णन मिलता है।
उनका वाहन सिंह है।
इस स्वरूप में एक साथ भगवती के अनेक पक्ष दिखाई देते हैं।
एक ओर उनके हाथों में धनुष, बाण, चक्र और गदा जैसे आयुध हैं, तो दूसरी ओर कमण्डलु, कमल, सुधाकलश तथा जपमाला जैसी उपासना-संबंधी वस्तुएँ भी हैं।
उनका सौम्य मुख और मंद मुस्कान जगज्जननी के मातृभाव का दर्शन कराते हैं, जबकि उनके आयुध उनकी अपार शक्ति को व्यक्त करते हैं।
यही माँ कूष्माण्डा का प्रचलित साकार उपासना-स्वरूप है।
माँ कूष्माण्डा का ध्यानश्लोक
नवदुर्गा की प्रचलित ध्यान-परंपरा में माँ कूष्माण्डा का ध्यान इस प्रकार किया जाता है—
वन्दे वाञ्छितकामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढामष्टभुजां कूष्माण्डां यशस्विनीम्॥भास्वरां भानुनिभामनाहतस्थितां चतुर्थदुर्गां त्रिनेत्राम्।
कमण्डलुचापबाणपद्मसुधाकलशचक्रगदाजपवटीधराम्॥
ध्यानश्लोक का भावार्थ
मैं मनोवांछित फल प्रदान करने वाली, मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण करने वाली, सिंह पर आरूढ़ तथा आठ भुजाओं से सुशोभित यशस्विनी माँ कूष्माण्डा की वन्दना करता हूँ।
उनकी कान्ति सूर्य के समान प्रकाशमान है। वे त्रिनेत्रा हैं तथा उपासना-परंपरा में अनाहत चक्र से संबंधित मानी गई हैं।
उनकी आठ भुजाओं में कमण्डलु, धनुष, बाण, कमल, सुधाकलश, चक्र, गदा तथा जपमाला सुशोभित हैं।
ध्यान-पाठ के आगे के अंशों में भगवती को पीताम्बर धारण करने वाली, विभिन्न आभूषणों से सुशोभित तथा मंद मुस्कान वाले प्रसन्न मुखमण्डल से युक्त बताया गया है।
इस प्रकार माँ के ध्यान में उनकी सौम्यता, उनका तेज और उनकी दिव्य शक्ति एक साथ सामने आते हैं।

माँ कूष्माण्डा की प्रार्थना
माँ की एक अन्य प्रसिद्ध प्रार्थना भी प्रचलित है—
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदाऽस्तु मे॥
भावार्थ: सुरा से परिपूर्ण तथा रुधिर से आप्लावित कलश को अपने कर-कमलों में धारण करने वाली भगवती कूष्माण्डा मेरे लिए कल्याणकारी हों।
यह प्रार्थना ध्यानश्लोक से कुछ भिन्न स्वरूप प्रस्तुत करती है।
ध्यानश्लोक में सुधाकलश अर्थात् अमृतपूर्ण कलश का उल्लेख है, जबकि इस प्रार्थना में सुरा और रुधिर का वर्णन आता है।
दोनों पाठ भगवती की उपासना की अलग-अलग वर्णन-परंपराओं का परिचय देते हैं।
नवरात्रि के चौथे दिन माँ कूष्माण्डा की उपासना की जाती है। भक्त उनके इसी साकार स्वरूप का ध्यान करके भगवती की कृपा, रक्षा और कल्याण की प्रार्थना करते हैं।
जगज्जननी माँ कूष्माण्डा
माँ कूष्माण्डा के स्वरूप की यह शास्त्रीय यात्रा हमें भगवती के उस विराट अस्तित्व तक ले जाती है, जो सम्पूर्ण सृष्टि का मूल आधार है।
कालिकापुराण उन्हें ‘जगतां प्रसूः’, अर्थात् जगत की जननी कहता है।
देवीभागवत में भगवती स्वयं बताती हैं कि वे सृष्टि से पहले भी विद्यमान थीं और सम्पूर्ण जगत की रचना करके उसके भीतर भी प्रवेश करती हैं।
दुर्गासप्तशती में उन्हें सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार की मूल शक्ति कहा गया है।
प्राधानिक रहस्य में भगवती द्वारा शून्य जगत को अपने तेज से परिपूर्ण करने का वर्णन है।
माँ कूष्माण्डा की प्रचलित उपासना-परंपरा उसी आदिशक्ति को अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्माण्ड की रचना करने वाली तथा सूर्य के तेज और शक्ति का मूल स्रोत मानती है।
वहीं देवीभागवत में भगवती के विराट स्वरूप का वर्णन सम्पूर्ण प्रकृति और चराचर जगत को उन्हीं की व्यापक सत्ता से जोड़ता है।
उनका अष्टभुजा स्वरूप, सिंहवाहन, आयुध तथा ध्यानश्लोक भक्त के सामने भगवती का साकार रूप प्रस्तुत करते हैं।
इन सबके बीच एक ही मूल भाव दिखाई देता है—
भगवती केवल सृष्टि को जन्म देने वाली माता नहीं हैं। वही उसे धारण करती हैं, उसका पालन करती हैं और अन्ततः उसी में सम्पूर्ण सृष्टि का लय होता है।
नवदुर्गा के पहले तीन दर्शनों में हमने भगवती के पार्वती स्वरूप से संबंधित विभिन्न दिव्य प्रसंगों का अध्ययन किया।
और अब चौथे दर्शन में उन्हीं भगवती की उस विराट सत्ता को समझने का प्रयास किया, जिसमें सम्पूर्ण चराचर जगत समाहित है।
यही माँ कूष्माण्डा का जगज्जननी स्वरूप है।
नवदुर्गास्तुति के कूष्माण्डा स्तोत्र में भगवती की वन्दना इस प्रकार की गई है—
जगन्माता जगत्कर्त्रि जगदाधाररूपिणी।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
भावार्थ: हे सम्पूर्ण जगत की माता! हे जगत की रचयिता! हे सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करने वाली भगवती! हे चराचर जगत की अधीश्वरी माँ कूष्माण्डा! मैं आपको बारम्बार प्रणाम करता हूँ।
माँ कूष्माण्डा के श्रीचरणों में सादर प्रणाम।
नवदुर्गा दर्शन यात्रा में अगला पड़ाव, पाँचवाँ दर्शन — माँ स्कन्दमाता
चौथे दर्शन में हमने भगवती के उस विराट मातृस्वरूप को जाना, जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि समाहित है।
लेकिन जगज्जननी का यही मातृत्व जब एक बालक को अपनी गोद में लिए दिखाई देता है, तब भगवती का एक और विशिष्ट स्वरूप सामने आता है।
माँ स्कन्दमाता।
