नवदुर्गा: दूसरा दर्शन — माँ ब्रह्मचारिणी
लेखक – कुलदीप ठुसू “पम्पोष”
माता ब्रह्मचारिणी — पार्वती का तपस्विनी स्वरूप
नवरात्रि के प्रथम दिन माता के शैलपुत्री स्वरूप की उपासना की जाती है।
दक्षकन्या सती ने देहत्याग के पश्चात् पर्वतराज हिमवान् और माता मेना के यहाँ पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया।
पर्वतराज की पुत्री होने के कारण वे शैलपुत्री कहलायीं।
नवदुर्गा के क्रम में माता का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी है।
देवीकवच में कहा गया है—
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥
— (देवीकवच, श्लोक 3)
अर्थात: नवदुर्गा में प्रथम शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चन्द्रघण्टा और चौथी कूष्माण्डा हैं।
देवीकवच यहाँ ब्रह्मचारिणी का नाम और नवदुर्गा में उनका स्थान तो बताता है, किन्तु उनकी स्वतंत्र कथा नहीं देता।
उनके स्वरूप को समझने के लिए हमें, पार्वती के तप से सम्बन्धित दूसरे पुराणिक प्रसंगों को जानना होगा।
स्कन्दपुराण के अम्बिकाखण्ड में देवी की स्तुति करते हुए एक अत्यन्त महत्वपूर्ण श्लोक मिलता है—
उल्का सती गिरेः पुत्री मैत्रेयी ब्रह्मचारिणी ।
तापसी रेवती षष्ठी वरावरसहस्रदा ॥
अर्थात: देवी उल्का हैं, सती हैं, पर्वतराज की पुत्री हैं, मैत्रेयी हैं, ब्रह्मचारिणी हैं, तपस्विनी हैं, रेवती हैं, षष्ठी हैं और अनेक प्रकार के वर प्रदान करने वाली हैं।
(स्रोत — स्कन्दपुराण, अम्बिकाखण्ड, अध्याय 60 ‘दैत्योद्योगः’, श्लोक 42; संदर्भ 8.60.42)
इस श्लोक का विशेष महत्व है। एक ही क्रम में देवी को ‘गिरेः पुत्री’—पर्वतराज की पुत्री, फिर ‘ब्रह्मचारिणी’, और उसी के साथ ‘तापसी’ कहा गया है।
इससे ब्रह्मचारिणी को पार्वती से अलग किसी अन्य देवी के रूप में देखने की आवश्यकता नहीं रहती।
पुराणिक पाठ स्वयं पर्वतराज की पुत्री को ब्रह्मचारिणी और तपस्विनी दोनों कह रहा है।
शिवमहापुराण इसी पर्वतराज-पुत्री पार्वती की तपस्या का विस्तृत वृत्तान्त देता है।
शिव की सेवा से कठोर तप की ओर —
पार्वती का भगवान शिव से सम्बन्ध उनके तप आरम्भ करने से पहले ही निर्धारित हो चुका था।
देवऋषी नारद ने इसकी भविष्यवाणी पहले ही कर रखी थी।
पार्वती भी शिव को पति रूप में प्राप्त करना चाहती थीं।
इस बीच भगवान शिव, हिमालय क्षेत्र में अपनी तपस्या में लीन थे।
शिव को प्रसन्न करने के लिए पार्वती, तप में लीन भगवान शिव की सेवा करने लगी।
उधर देवताओं के सामने तारकासुर का संकट था।
ब्रह्मा के वर के कारण उसका वध सामान्य देवताओं के लिए सम्भव नहीं था।
शिवमहापुराण में ब्रह्मा देवताओं से स्पष्ट कहते हैं—
न मया तारको वध्यो हरिणापि हरेण च ।
नान्येनापि सुरैर्वापि मद्वरात्सत्यमुच्यते ॥
शिववीर्यसमुत्पन्नो यदि स्यात्तनयः सुराः ।
स एव तारकाख्यस्य हन्ता दैत्यस्य नापरः ॥
अर्थात: मेरे दिए हुए वर के कारण तारक का वध न मेरे द्वारा, न विष्णु द्वारा, न शिव द्वारा और न किसी अन्य देवता द्वारा होना है। यदि भगवान शिव से पुत्र उत्पन्न हो, तो वही तारक नामक दैत्य का वध कर सकेगा।
स्रोत — शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय 16 ‘देवसान्त्वनवर्णनम्’, श्लोक 25–26
इसी कारण देवताओं की दृष्टि में शिव और पार्वती का मिलन केवल व्यक्तिगत विवाह का विषय नहीं था; उससे एक व्यापक देवकार्य भी जुड़ा हुआ था।
देवताओं ने कामदेव को भगवान शिव की समाधि भंग करने के लिए भेजा।
देवताओं को लगा कि ऐसा करने से शायद शिव, पार्वती के प्रति अकृषित होंगे, जिस से शिव-पुत्र का जन्म लेना संभव होगा।
लेकिन कामदेव के प्रयास पर भगवान शिव का तीसरा नेत्र खुला, और कामदेव भस्म हो गए।
इसके पश्चात् भगवान शिव वहाँ से अन्तर्धान हो गए और पार्वती अपनी सखियों के साथ पिता के घर लौट आईं।
शिवमहापुराण पार्वती की उस अवस्था का वर्णन करता है जिसमें उनका मन निरन्तर शिव में ही लगा हुआ था।
वे शिव-वियोग से व्याकुल थीं और सामान्य राजसी जीवन में उन्हें कोई सुख नहीं मिल रहा था।
इसी समय देवर्षि नारद पुनः उनके पास आए।
नारद का उपदेश — केवल सेवा नहीं, अब तप करना होगा
नारद का उपदेश ब्रह्मचारिणी स्वरूप को समझने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक है।
वे पार्वती से कहते हैं—
सेवितश्च महादेवस्त्वयेह तपसा विना ।
गर्ववत्या यदध्वंसीद्दीनानुग्रहकारकः ॥
विरक्तश्च स ते स्वामी महायोगी महेश्वरः ।
विसृष्टवान्स्मरं दग्ध्वा त्वां शिवे भक्तवत्सलः ॥
तस्मात्त्वं सुतपोयुक्ता चिरमाराधयेश्वरम् ।
तपसा संस्कृतां रुद्रस्स द्वितीयां करिष्यति ॥
अर्थात: नारद पार्वती को समझाते हैं कि उन्होंने महादेव की सेवा तो की, किन्तु वह कठोर तप से युक्त नहीं थी; दीनों पर अनुग्रह करने वाले महादेव ने उनके गर्व का भी नाश किया। महेश्वर महान योगी और विरक्त हैं। अतः अब वे श्रेष्ठ तप द्वारा दीर्घकाल तक ईश्वर की आराधना करें। तप से संस्कारित होने पर रुद्र उन्हें अपनी सहधर्मिणी के रूप में स्वीकार करेंगे।
स्रोत — शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय 21 ‘नारदोपदेशः’, श्लोक 26–28
पार्वती इससे पहले भी शिव की सेवा और साधना में लगी हुई थीं।
अब नारद उन्हें उससे कहीं अधिक कठिन, स्वतंत्र और नियमबद्ध तप का मार्ग बताते हैं।
पार्वती उनसे भगवान रुद्र की आराधना के लिए मन्त्र देने की प्रार्थना करती हैं।
नारद उन्हें पंचाक्षर शम्भु-मन्त्र का उपदेश देते हैं—
इति श्रुत्वा वचस्तस्याः पार्वत्या मुनिसत्तमः ।
पञ्चाक्षरं शम्भुमन्त्रं विधिपूर्वमुपादिशत् ॥
अर्थात: पार्वती की बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारद ने उन्हें विधिपूर्वक भगवान शम्भु का पंचाक्षर मन्त्र प्रदान किया।
स्रोत — शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय 21 ‘नारदोपदेशः’, श्लोक 33
नारद अपने उपदेश का सार स्पष्ट करते हुए कहते हैं—
एवं कुरु तपः साध्वि तपस्साध्यो महेश्वरः ।
तपस्येव फलं सर्वैः प्राप्यते नान्यथा क्वचित् ॥
अर्थात: हे साध्वी, इस प्रकार तप करो। महेश्वर तप द्वारा साध्य हैं। तप का फल तप द्वारा ही प्राप्त होता है, अन्य प्रकार से नहीं।
स्रोत — शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय 21 ‘नारदोपदेशः’, श्लोक 39
यहीं से पार्वती के जीवन में कठोर तप का वह चरण आरम्भ होता है जिसे उनके ब्रह्मचारिणी स्वरूप के साथ समझा जा सकता है।
“तप से साध्य हैं हर”
शिवमहापुराण के अगले ही अध्याय का आरम्भ पार्वती के निर्णय से होता है—
त्वयि देवमुने याते पार्वती हृष्टमानसा ।
तपस्साध्यं हरं मेने तपोर्थं मन आदधे ॥
अर्थात: देवर्षि नारद के चले जाने के बाद प्रसन्नचित्त पार्वती ने निश्चय किया कि भगवान हर, तप द्वारा साध्य हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिए उन्होंने तप का संकल्प लिया।
स्रोत — शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय 22 ‘पार्वतीतपोवर्णनम्’, श्लोक 1
अब पार्वती का लक्ष्य और मार्ग—दोनों निश्चित थे।
लक्ष्य थे भगवान शिव।
और मार्ग था तप।
माता-पिता की अनुमति लेकर तपोवन प्रस्थान
पार्वती ने अपनी सखियों जया और विजया के माध्यम से पहले पिता हिमवान् और फिर माता मेना से तप करने की अनुमति माँगी।
हिमवान् ने अपनी सहमति दे दी, किन्तु माता मेना के लिए अपनी कोमल पुत्री को कठोर तप के लिए वन भेजना सहज नहीं था।
पार्वती की सखियाँ मेना से कहती हैं कि उनकी पुत्री “शिवार्थं परमं तपः”—भगवान शिव के लिए परम तप करना चाहती हैं।
वे कहती हैं—
तप्तुकामा तु ते पुत्री शिवार्थं परमं तपः ।
प्राप्तानुज्ञा पितुश्चैव तुभ्यं च परिपृच्छति ॥ १३ ॥
इयं स्वरूपसाफल्यं कर्तुकामा पतिव्रते ।
त्वदाज्ञया यदि जायेत तप्यते च तथा तपः ॥ १४ ॥
अर्थात: हे माता, आपकी पुत्री भगवान शिव के लिए परम तप करना चाहती हैं। उन्हें अपने पिता से अनुमति मिल चुकी है और अब वे आपकी आज्ञा चाहती हैं। हे पतिव्रते, वे अपने जीवन और स्वरूप के उद्देश्य को सफल करना चाहती हैं; यदि आपकी अनुमति मिल जाए तो वे इस तप को आरम्भ करेंगी।
स्रोत — शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय 22 ‘पार्वतीतपोवर्णनम्’, श्लोक 13–14
माता मेना इसके लिए तुरंत तैयार नहीं हुईं।
एक माँ के लिए अपनी पुत्री को वन में जाकर इतना कठिन तप करते देखना स्वाभाविक रूप से चिंता का विषय था।
तब स्वयं पार्वती हाथ जोड़कर माता से निवेदन करती हैं—
मातस्तप्तुं गमिष्यामि प्रातः प्राप्तुं महेश्वरम् ।
अनुजानीहि मां गन्तुं तपसेऽद्य तपोवनम् ॥ १७ ॥
अर्थात: हे माता, मैं महेश्वर को प्राप्त करने के लिए तप करना चाहती हूँ। कृपया मुझे तप करने के लिए तपोवन जाने की अनुमति प्रदान करें।
स्रोत — शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय 22 ‘पार्वतीतपोवर्णनम्’, श्लोक 17
पार्वती को इसी प्रसंग में मिला ‘उमा’ नाम
माता मेना पार्वती के तप के संकल्प से चिंतित थीं।
वे पार्वती को समझाती हैं कि यदि तप ही करना है तो घर पर भी किया जा सकता है।
वे कहती हैं कि घर में देवता और तीर्थ उपस्थित हैं; फिर वन जाने की आवश्यकता क्या है ?
माता मेना पार्वती के कोमल शरीर और तप की कठोरता को लेकर भी चिंता व्यक्त करती हैं।
शिवमहापुराण में मेना के वचन हैं—
कर्तव्यो न हठः पुत्रि गन्तव्यं न बहिः क्वचित् ।
साधितं किं त्वया पूर्वं पुनः किं साधयिष्यसि ॥ २१ ॥
शरीरं कोमलं वत्से तपस्तु कठिनं महत् ।
एवस्मात्तु त्वया कार्यं तपोऽत्र न बहिर्व्रज ॥ २२ ॥
स्त्रीणां तपोवनगतिर्न श्रुता कामनार्थिनी ।
तस्मात्त्वं पुत्रि मा कार्षीस्तपोर्थं गमनं प्रति ॥ २३ ॥
अर्थात: हे पुत्री, ऐसा हठ मत करो और बाहर कहीं मत जाओ। तुम पहले भी साधना कर चुकी हो, अब फिर क्या सिद्ध करना चाहती हो? तुम्हारा शरीर कोमल है और तप अत्यन्त कठिन। यदि तप करना ही है तो यहीं करो, बाहर मत जाओ। इसलिए हे पुत्री, तप के लिए वन जाने का विचार मत करो।
पार्वती फिर भी भगवान महेश्वर की आराधना के अपने संकल्प से पीछे नहीं हटीं।
इसी प्रसंग के तुरंत बाद शिवमहापुराण उनके ‘उमा’ नाम की उत्पत्ति बताता है—
तपोनिषिद्धा तपसे वनं गन्तुं च मेनया ।
हेतुना तेन सोमेति नाम प्राप शिवा तदा ॥ २५ ॥
यहाँ “सोमेति” का पद-विभाजन है—“सा उमा इति”।
—”उ मा “— अर्थात — ओ! (तपस्या) मत करो ।
माता मेना द्वारा तप करने के लिए वन जाने से रोके जाने के कारण उस समय देवी ने ‘उमा’ नाम प्राप्त किया।
स्रोत — शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय 22 ‘पार्वतीतपोवर्णनम्’, श्लोक 21–25
यह प्रसंग इसलिए भी रोचक है क्योंकि ‘उमा’ पार्वती का अत्यन्त प्राचीन और प्रसिद्ध नाम है, और शिवमहापुराण यहाँ इसे सीधे उनकी माता मेना द्वारा तपोवन जाने से रोकने की घटना से जोड़ता है।
अन्ततः मेना समझ जाती हैं कि पुत्री का संकल्प बदलने वाला नहीं है और वे उन्हें तप की अनुमति दे देती हैं—
अथ तां दुःखितां ज्ञात्वा मेना शैलप्रिया शिवाम् ।
निदेशं सा ददौ तस्याः पार्वत्यास्तपसे मुने ॥ २६ ॥
मातुराज्ञां च सम्प्राप्य सुव्रता मुनिसत्तम ।
ततः स्वान्ते सुखं लेभे पार्वती स्मृतशङ्करा ॥ २७ ॥
अर्थात: पार्वती को दुःखी देखकर माता मेना ने अंततः उन्हें तप करने की अनुमति दे दी। माता की आज्ञा प्राप्त होते ही शंकर का स्मरण करती हुई पार्वती के मन को संतोष मिला।
स्रोत — शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय 22 ‘पार्वतीतपोवर्णनम्’, श्लोक 26–27
इसके बाद पार्वती माता-पिता को प्रणाम करके राजसी वस्त्र त्यागती हैं और तपस्विनी-वेश में गङ्गावतरण की ओर प्रस्थान करती हैं।
इस प्रसंग में पार्वती के संकल्प के साथ उनकी मर्यादा भी स्पष्ट दिखाई देती है।
वे अपने निर्णय पर दृढ़ हैं, फिर भी माता-पिता की अनुमति प्राप्त किए बिना तपोवन के लिए प्रस्थान नहीं करतीं।

राजकुमारी से तपस्विनी –
शिवमहापुराण कहता है—
मातरं पितरं साथ प्रणिपत्य मुदा शिवा ।
सखीभ्यां च शिवं स्मृत्वा तपस्तप्तुं समुद्गता ॥ २८ ॥
हित्वा मतान्यनेकानि वस्त्राणि विविधानि च ।
वल्कलानि धृतान्याशु मौञ्जीं बद्ध्वा तु शोभनाम् ॥ २९ ॥
हित्वा हारं तथा चर्म मृगस्य परमं धृतम् ।
जगाम तपसे तत्र गङ्गावतरणं प्रति ॥ ३० ॥
अर्थात: माता-पिता को प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम करके पार्वती ने अपनी दोनों सखियों के साथ भगवान शिव का स्मरण किया और तप करने के लिए प्रस्थान किया। उन्होंने अपने विविध उत्तम वस्त्रों और राजसी जीवन से जुड़े आभूषणों का त्याग किया, वृक्ष की छाल से बने वल्कल वस्त्र धारण किए और कमर में मुंज घास की मेखला बाँधी। हार उतारकर उन्होंने मृगचर्म धारण किया और तप करने के लिए गङ्गावतरण नामक हिमालयी प्रदेश की ओर चली गईं।
स्रोत — शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय 22 ‘पार्वतीतपोवर्णनम्’, श्लोक 28–30
यह परिवर्तन केवल वस्त्रों का परिवर्तन नहीं था।
पार्वती ने उस जीवन-पद्धति को त्याग दिया जो पर्वतराज की पुत्री के रूप में उन्हें सहज रूप से प्राप्त थी और अब स्वयं को तपस्विनी जीवन के अनुरूप ढाल लिया।
उनका गन्तव्य भी सामान्य वन-प्रदेश नहीं था। अगले श्लोक में शिवमहापुराण उस स्थान की पहचान स्पष्ट करता है—
शम्भुना कुर्वता ध्यानं यत्र दग्धो मनोभवः ।
गङ्गावतरणो नाम प्रस्थो हिमवतः स च ॥ ३१ ॥
अर्थात: हिमालय का वह प्रदेश गङ्गावतरण कहलाता था, जहाँ भगवान शम्भु ध्यान में स्थित थे और जहाँ कामदेव का दहन हुआ था।
स्रोत — शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय 22 ‘पार्वतीतपोवर्णनम्’, श्लोक 31
यानी पार्वती ने अपने तप के लिए उसी स्थान को चुना जहाँ कुछ समय पूर्व भगवान शिव तप में स्थित थे और जहाँ कामदेव-दहन की घटना घटी थी।
तप की कठोरता —
पार्वती की तपस्या केवल उपवास अथवा आहार-त्याग तक सीमित नहीं थी।
शिवमहापुराण उनके तप का क्रम ऋतुओं के अनुसार भी बताता है।
सबसे पहले वे अपने मन और इन्द्रियों को संयमित करती हैं और उसके बाद शरीर को प्रकृति की कठिनतम परिस्थितियों के बीच रखकर साधना करती हैं।
शिवमहापुराण कहता है—
विगृह्य मनसा सर्वाणीन्द्रियाणि सहाशु सा ।
समुपस्थानिके तत्र चकार परमं तपः ॥ ३९ ॥
अर्थात: पार्वती ने मन के द्वारा अपनी समस्त इन्द्रियों को संयमित किया और उस स्थान पर परम तप करना आरम्भ किया।
इसके बाद ग्रीष्म ऋतु की साधना का वर्णन है—
ग्रीष्मे च परितो वह्निं प्रज्वलन्तं दिवानिशम् ।
कृत्वा तस्थौ च तन्मध्ये सततं जपती मनुम् ॥ ४० ॥
अर्थात: ग्रीष्म ऋतु में पार्वती ने अपने चारों ओर दिन-रात प्रज्वलित अग्नि रखी और उसके मध्य स्थित होकर निरन्तर मन्त्र-जप करती रहीं।
वर्षा ऋतु में भी उनके तप का क्रम नहीं टूटा—
सततं चैव वर्षासु स्थण्डिले सुस्थिरासना ।
शिलापृष्ठे च संसिक्ता बभूव जलधारया ॥ ४१ ॥
अर्थात: वर्षा ऋतु में वे खुले स्थान पर भूमि अथवा शिला पर स्थिर आसन में बैठी रहतीं और निरन्तर गिरती वर्षा की धाराओं से भीगती रहतीं।
शीत ऋतु में तप और कठोर हो गया—
शीते जलान्तरे शश्वत्तस्थौ सा भक्तितत्परा ।
अनाहारातपत्तत्र नीहारे निशासु च ॥ ४२ ॥
अर्थात: शीतकाल में भक्तिपूर्वक साधना में स्थित पार्वती निरन्तर जल के भीतर खड़ी रहतीं। वे निराहार होकर हिम और अत्यन्त ठंडी रात्रियों में भी तप करती रहीं।
इन समस्त कठिन परिस्थितियों के बीच उनकी साधना का केन्द्र एक ही रहा—भगवान शिव का ध्यान और पंचाक्षर मन्त्र का जप—
एवं तपः प्रकुर्वाणा पञ्चाक्षरजपे रता ।
दध्यौ शिवं शिवा तत्र सर्वकामफलप्रदम् ॥ ४३ ॥
अर्थात: इस प्रकार तप करती हुई देवी पार्वती पंचाक्षर मन्त्र के जप में निरन्तर लगी रहीं और वहाँ समस्त कामनाओं का फल प्रदान करने वाले भगवान शिव का ध्यान करती रहीं।
स्रोत — शिवमहापुराण, द्वितीया रुद्रसंहिता, तृतीय पार्वतीखण्ड, अध्याय 22 ‘पार्वतीतपोवर्णनम्’, श्लोक 39–43
इन श्लोकों में तप का क्रम ध्यान देने योग्य है।
पहले इन्द्रिय-संयम, फिर शरीर को ग्रीष्म, वर्षा और शीत की कठिनताओं के बीच रखना, और इन सबके केन्द्र में निरन्तर मन्त्र-जप और शिव-ध्यान।
इसलिए पार्वती का तप केवल शारीरिक कष्ट सहने का अभ्यास नहीं था। उसका मूल आधार मन और इन्द्रियों का संयम तथा लक्ष्य के प्रति अखण्ड एकाग्रता थी।
इसके अगले ही श्लोक में शिवमहापुराण एक और महत्वपूर्ण पक्ष बताता है—इतने कठिन तप के बीच भी पार्वती अपने लगाए हुए वृक्षों को सींचती थीं और अतिथियों का सत्कार करती थीं।
अर्थात् तप के कारण सेवा और कर्तव्य का त्याग नहीं हुआ।

फलाहार से ‘अपर्णा’ तक—
समय के साथ पार्वती ने आहार को क्रमशः कम किया।
पहले वे फल ग्रहण करती थीं। उसके बाद पत्तों पर निर्वाह किया। फिर पत्तों का भी त्याग कर दिया।
शिवमहापुराण कहता है—
ततः पर्णान्यपि शिवा निरस्य हिमवत्सुता ।
निराहाराभवद्देवी तपश्चरणसंरता ॥
आहारे त्यक्तपर्णाभूद्यस्माद्धिमवतः सुता ।
तेन देवैरपर्णेति कथिता नामतः शिवा ॥
एका पादस्थिता सासीच्छिवं संस्मृत्य पार्वती ।
पञ्चाक्षरं जपन्ती च मनुं तेपे तपो महत् ॥
अर्थात: हिमवान् की पुत्री पार्वती ने पत्तों का सेवन भी छोड़ दिया और निराहार रहकर तप में स्थित हो गईं। आहार में पत्ते तक का त्याग करने के कारण देवताओं ने उन्हें अपर्णा कहा। इसके बाद वे एक पैर पर खड़ी होकर भगवान शिव का स्मरण और पंचाक्षर मन्त्र का जप करते हुए महान तप करती रहीं।
स्रोत — शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय 22 ‘पार्वतीतपोवर्णनम्’, श्लोक 48–50
‘पर्ण’ का अर्थ पत्ता है। इसलिए अपर्णा—जिसने पत्ता तक ग्रहण नहीं किया—नाम की व्युत्पत्ति स्वयं शिवमहापुराण देता है।
इसके आगे ग्रंथ पार्वती को चीर-वल्कल और जटाओं से युक्त, शिव-चिन्तन में पूर्णतः स्थित बताता है। उनके तप की अवधि के लिए तीन हजार वर्ष का उल्लेख भी मिलता है।
स्रोत — शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय 22 ‘पार्वतीतपोवर्णनम्’, श्लोक 51–52
पुराणों में आने वाली ऐसी विशाल कालावधियों को आधुनिक कैलेंडर में बदलकर देखने के बजाय कथा में तप की असाधारण दीर्घता और तीव्रता के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है।
तप का प्रभाव आश्रम पर भी हुआ –
शिवमहापुराण केवल पार्वती के शरीर और आहार की कठिनाई का वर्णन करके नहीं रुकता।
आगे श्लोक 66–71 में कहा गया है कि उनके आश्रम में स्वभावतः परस्पर विरोध रखने वाले जीव भी शांत हो गए।
सिंह और गौ एक-दूसरे को हानि नहीं पहुँचाते थे; बिल्ली और चूहे जैसे प्राकृतिक विरोधी जीवों का वैर भी वहाँ समाप्त हो गया था।
वृक्ष फलने लगे और विविध पुष्प खिलने लगे।
शिवमहापुराण इसे पार्वती के तप के प्रभाव के रूप में प्रस्तुत करता है।
यह विवरण ब्रह्मचारिणी के तप को केवल आत्मपीड़ा की कथा नहीं रहने देता।
यह दिखाता है कि कैसे साधना का प्रभाव, साधक के भीतर से उसके परिवेश तक फैल जाता है।
‘ब्रह्मचारिणी’ नाम का शास्त्रीय आधार —
‘ब्रह्मचारिणी’ नाम को सामान्यतः तप और ब्रह्मचर्य से जोड़कर समझाया जाता है।
माता पार्वती की तपस्या को देखते हुए यह भाव स्वाभाविक भी है, किन्तु देवीपुराण इस नाम की अपनी निरुक्ति देता है।
देवीपुराण में कहा गया है—
वेदेषु चरते यस्मात् तेन सा ब्रह्मचारिणी ।
अपर्णा सा निराहारा एकाशी एकरंगका ॥ २६ ॥
अर्थात: वेदों में विचरण करने के कारण देवी ब्रह्मचारिणी कहलाती हैं। वे अपर्णा हैं, निराहारा हैं और अत्यन्त संयमित तथा एकनिष्ठ साधना में स्थित हैं।
स्रोत — देवीपुराण, अध्याय 45, श्लोक 26
यहाँ ध्यान देने वाली बात है — वे वेदों में विचरण करती हैं, इसलिए वे ब्रह्मचारिणी कहलाती हैं।
यह श्लोक हमारे प्रसंग में विशेष महत्व रखता है।
यहाँ ‘ब्रह्मचारिणी’, ‘अपर्णा’ और ‘निराहारा’ एक ही श्लोक में आए हैं।
शिवमहापुराण पार्वती की उस तपस्या का विस्तार से वर्णन करता है जिसमें वे क्रमशः फल, फिर पत्तों का आहार छोड़कर निराहार तप करती हैं और ‘अपर्णा’ कहलाती हैं।
देवीपुराण उसी देवी के लिए ब्रह्मचारिणी और अपर्णा—दोनों नाम एक साथ रखता है।
इसलिए देवी के नाम को केवल ‘अविवाहित कन्या’ के अर्थ तक सीमित कर देना उचित नहीं होगा।
ब्रह्मचर्य भारतीय साधना-परम्परा में नियम, इन्द्रिय-संयम, अध्ययन, जप, तप और एक लक्ष्य के प्रति अनुशासित जीवन का व्यापक भाव रखता है।
पार्वती के इस स्वरूप में ये सभी तत्व स्पष्ट दिखाई देते हैं।
तप का प्रभाव और उसका फल
पार्वती की कठोर साधना का प्रभाव केवल उनके शरीर अथवा तपोवन तक सीमित नहीं रहा।
शिवमहापुराण के अनुसार उनके तप का तेज सम्पूर्ण चराचर सहित तीनों लोकों में व्याप्त होने लगा।
देवता भगवान शिव के पास पहुँचे और उनसे पार्वती की तपस्या स्वीकार करने की प्रार्थना की—
नारदस्य निदेशात्सा करोति कठिनं तपः ।
तत्तेजसाखिलं व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ५३ ॥
वरं दातुं शिवायै हि गच्छ त्वं परमेश्वर ।
देवदुःखं जहि स्वामिन्नस्माकं सुखमावह ॥ ५४ ॥
अर्थात: देवर्षि नारद के निर्देश पर पार्वती अत्यन्त कठिन तप कर रही हैं। उनके तप का तेज सम्पूर्ण चराचर सहित तीनों लोकों में व्याप्त हो गया है। हे परमेश्वर, आप पार्वती को वर प्रदान करें और देवताओं के दुःख का निवारण करें।
इसके बाद भगवान शिव देवताओं को आश्वस्त करते हैं। वे कहते हैं—
नास्ति यद्यपि मे काचिद्विवाहकरणे रुचिः ।
विवाहयिष्ये गिरिजां पुत्रोत्पादनहेतवे ॥ ७५ ॥
गच्छत स्वगृहाण्येव निर्भयाः सकलाः सुराः ।
कार्यं वः साधयिष्यामि नात्र कार्या विचारणा ॥ ७६ ॥
अर्थात: यद्यपि मेरी विवाह करने में कोई रुचि नहीं है, फिर भी पुत्रोत्पत्ति के उद्देश्य से मैं गिरिजा से विवाह करूँगा। तुम सभी देवता निर्भय होकर अपने स्थानों पर लौट जाओ; मैं तुम्हारा कार्य सिद्ध करूँगा।
स्रोत — शिवमहापुराण, द्वितीया रुद्रसंहिता, तृतीय पार्वतीखण्ड, अध्याय 24 ‘पार्वतीविवाहस्वीकारः’, श्लोक 53–54 तथा 75–76
यहाँ पार्वती की साधना अपने निर्णायक चरण तक पहुँचती है।
जिस शिव को प्राप्त करने के लिए उन्होंने राजसी जीवन त्यागकर इतना कठोर तप किया था, उन्हीं शिव ने अब विवाह के लिए अपनी सहमति दे दी।
किन्तु अभी एक अंतिम परीक्षा शेष थी।
सप्तर्षियों द्वारा पार्वती के संकल्प की परीक्षा —
पार्वती की कठोर तपस्या से भगवान शिव विवाह के लिए सहमत तो हो गए, किन्तु इसके बाद भी उनके संकल्प की एक परीक्षा शेष थी।
भगवान शिव ने सप्तर्षियों को पार्वती के पास भेजा।
उद्देश्य यह जानना था कि शिव को पति रूप में प्राप्त करने का उनका निश्चय वास्तव में कितना दृढ़ है।
शिव सप्तर्षियों से कहते हैं—
तपश्चरति देवेशी पार्वती गिरिजाधुना ।
गौरीशिखरसंज्ञे हि पर्वते दृढमानसा ॥ १४ ॥
मां पतिं प्राप्तुकामा हि सा सखीसेविता द्विजाः ।
सर्वान्कामान्विहायान्यान्परं निश्चयमागता ॥ १५ ॥
तत्र गच्छत यूयं मच्छासनान्मुनिसत्तमाः ।
परीक्षां दृढतायास्तत्कुरुत प्रेमचेतसः ॥ १६ ॥
अर्थात: पार्वती गौरीशिखर पर दृढ़ मन से तप कर रही हैं। अन्य सभी कामनाओं को छोड़कर वे मुझे ही पति रूप में प्राप्त करने के निश्चय पर स्थित हैं। अतः तुम वहाँ जाओ और उनकी इस दृढ़ता की परीक्षा लो।
इसके अगले श्लोक में शिव उन्हें यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि परीक्षा के लिए उन्हें सीधे-साधे वचन नहीं बोलने हैं—
सर्वथा छलसंयुक्तं वचनीयं वचश्च वः ।
न संशयः प्रकर्तव्यः शासनान्मम सुव्रताः ॥ १७ ॥
अर्थात: पार्वती की परीक्षा के लिए तुम छलयुक्त वचन कहना; मेरे इस आदेश के पालन में किसी प्रकार का संकोच मत करना।
स्रोत — शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय 25 ‘सप्तर्षिकृता पार्वतीपरीक्षा’, श्लोक 14–17
आगे सप्तर्षि जानबूझकर पार्वती के सामने ऐसे तर्क रखते हैं जो पार्वती को उनके संकल्प से विचलित कर सकें।

पहले गुरु नारद पर प्रश्न
सप्तर्षि पार्वती के पास पहुँचे और उनके तप का कारण पूछा।
जब पार्वती ने बताया कि देवर्षि नारद के उपदेश से वे भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए तप कर रही हैं, तो सप्तर्षियों ने सबसे पहले नारद के उपदेश पर ही प्रश्न खड़ा किया।
वे कहते हैं—
न ज्ञातं तस्य चरितं वृथापण्डितमानिनः ।
देवर्षेः क्रूरमनसः सुज्ञा भूत्वाप्यगात्मजे ॥ २९ ॥
नारदः कूटवादी च परचित्तप्रमन्थकः ।
तस्य वार्ताश्रवणतो हानिर्भवति सर्वथा ॥ ३० ॥
अर्थात: हे पर्वतराज की पुत्री, बुद्धिमती होते हुए भी तुमने देवर्षि नारद के स्वभाव को ठीक प्रकार नहीं समझा। सप्तर्षि उन्हें कूट वचन बोलने वाला और दूसरों के मन को विचलित करने वाला बताकर पार्वती के मन में उनके उपदेश के प्रति संशय उत्पन्न करने का प्रयास करते हैं।
स्रोत — वही, श्लोक 29–30
परीक्षा की शुरुआत यहीं से होती है।
पहले गुरु के प्रति विश्वास को डिगाने का प्रयास किया गया, ताकि उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर भी संशय उत्पन्न हो।
किन्तु पार्वती विचलित नहीं हुईं।
फिर शिव के स्वरूप को ही विवाह के विरुद्ध तर्क बनाया
जब नारद के विषय में कही गई बातों से पार्वती का निश्चय नहीं बदला, तो सप्तर्षियों ने सीधे भगवान शिव के स्वरूप को सामने रखा।
वे कहते हैं—
लब्ध्वा तदुपदेशं हि त्वमपि प्राज्ञसम्मता ।
वृथैव मूर्खीभूता त्वं तपश्चरसि दुष्करम् ॥ ४४ ॥
यदर्थमीदृशं बाले करोषि विपुलं तपः ।
सोदासीनो निर्विकारो मदनारिर्न संशयः ॥ ४५ ॥
अर्थात: नारद का उपदेश पाकर तुम, जो बुद्धिमती मानी जाती हो, व्यर्थ ही इतना कठिन तप कर रही हो। हे बाले, जिसके लिए तुम इतना महान तप कर रही हो, वह शिव तो उदासीन, निर्विकार और कामदेव का नाश करने वाला है।
फिर वे शिव के बाहरी स्वरूप को और भी तीखे शब्दों में प्रस्तुत करते हैं—
अमङ्गलवपुर्धारी निर्लज्जोऽसदनोऽकुली ।
कुवेषी प्रेतभूतादिसङ्गी नग्नो हि शूलभृत् ॥ ४६ ॥
अर्थात: वे शिव को ऐसा वर बताकर पार्वती को विचलित करने का प्रयास करते हैं जो सामान्य सांसारिक दृष्टि से विचित्र वेश धारण करते हैं, किसी गृह और कुल-वैभव से बँधे नहीं हैं, प्रेत-भूतादि के साथ रहते हैं, दिगम्बर स्वरूप हैं और हाथ में त्रिशूल धारण करते हैं।
स्रोत — वही, श्लोक 44–46
ध्यान देने योग्य है कि सप्तर्षि शिव के उन्हीं गुणों को विवाह के विरुद्ध तर्क बना रहे थे जो उनके वैरागी और योगी स्वरूप की पहचान हैं।
पार्वती पर्वतराज की पुत्री थीं—राजसी परिवेश में पली-बढ़ी।
और उनके सामने जिस वर का चित्र खींचा जा रहा था, वह था—गृह और सांसारिक वैभव से विरक्त, असामान्य वेशधारी, भूतगणों से घिरा, त्रिशूलधारी योगी।
सप्तर्षि आगे उनके वैराग्य को भी गृहस्थ जीवन के विरुद्ध तर्क बनाते हैं—
एकलः परनिर्वाणो ह्यसङ्गोऽद्वय एव च ।
तेन नार्याः कथं देवि निर्वाहः सम्भविष्यति ॥ ५१ ॥
अर्थात: शिव एकाकी, परम निर्वाण में स्थित और आसक्ति से रहित हैं; हे देवी, ऐसे व्यक्ति के साथ किसी स्त्री का गृहस्थ जीवन कैसे चलेगा?
स्रोत — वही, श्लोक 51
फिर सामने रखा गया दूसरा वर — भगवान विष्णु
सप्तर्षियों ने केवल शिव की कमियाँ गिनाकर बात समाप्त नहीं की।
उन्होंने पार्वती के सामने एक बिल्कुल विपरीत विकल्प भी रखा—
भगवान विष्णु।
त्वद्योग्यो हि वरो विष्णुः सर्वसद्गुणवान्प्रभुः ।
वैकुण्ठवासी लक्ष्मीशो नानाक्रीडाविशारदः ॥ ५३ ॥
तेन ते कारयिष्यामो विवाहं सर्वसौख्यदम् ।
इतीदृशं त्यज हठं सुखिता भव पार्वति ॥ ५४ ॥
अर्थात: तुम्हारे योग्य वर भगवान विष्णु हैं—समस्त सद्गुणों से सम्पन्न, वैकुण्ठवासी और लक्ष्मीपति। हम तुम्हारा विवाह उनसे करा देंगे। इसलिए हे पार्वती, इस प्रकार का हठ छोड़ दो और सुखी हो जाओ।
स्रोत — वही, श्लोक 53–54
अब परीक्षा अपने वास्तविक बिन्दु पर पहुँच चुकी थी।
एक ओर वैकुण्ठवासी लक्ष्मीपति विष्णु का प्रस्ताव था।
दूसरी ओर वैरागी, गृहहीन, विचित्र वेशधारी शिव।
और सप्तर्षि पार्वती से कह रहे थे—यह हठ छोड़ दो।
पार्वती का उत्तर — “मेरा हठ नहीं छूटेगा”
पार्वती उत्तर देती हैं—
सत्यं भवद्भिः कथितं स्वज्ञानेन मुनीश्वराः ।
परन्तु मे हठो नैव मुक्तो भवति हे द्विजाः ॥ ५६ ॥
अर्थात: हे मुनिश्वरो, आपने अपने ज्ञान के अनुसार जो भी कहा है, किन्तु मेरा यह हठ अर्थात् मेरा निश्चय किसी प्रकार छूटने वाला नहीं है।
आगे वे अपने संकल्प को और स्पष्ट कर देती हैं—
चेच्छिवः स हि मे विप्रा विवाहं न करिष्यति ।
अविवाहा सदाहं स्यां सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ६८ ॥
अर्थात: यदि भगवान शिव मुझसे विवाह नहीं भी करेंगे, तो मैं सदा अविवाहित रहूँगी। यह मैं सत्य-सत्य कहती हूँ।
और फिर आता है इस पूरे प्रसंग का सबसे प्रभावशाली कथन—
उदयति यदि भानुः पश्चिमे दिग्विभागे
प्रचलति यदि मेरुः शीततां याति वह्निः ।
विकसति यदि पद्मं पर्वताग्रे शिलायां
न हि चलति हठो मे सत्यमेतद्ब्रवीमि ॥ ६९ ॥
अर्थात: सूर्य पश्चिम दिशा से उदय हो जाए, मेरु पर्वत अपने स्थान से चल पड़े, अग्नि शीतल हो जाए और पर्वत की शिला पर कमल खिल उठे—तब भी मेरा यह निश्चय नहीं बदलेगा। मैं सत्य कहती हूँ।
स्रोत — शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय 25 ‘सप्तर्षिकृता पार्वतीपरीक्षा’, श्लोक 56, 68–69
यही वह क्षण है जहाँ ब्रह्मचारिणी के तप का वास्तविक अर्थ सामने आता है।
तप केवल शरीर की कठिन परीक्षा नहीं था।
वास्तविक परीक्षा तब हुई जब पार्वती के सामने उनके गुरु पर प्रश्न उठाए गए, जिस शिव को वे चाहती थीं उसी को अनुपयुक्त वर बताकर प्रस्तुत किया गया और बदले में एक अन्य श्रेष्ठ वर का प्रस्ताव रखा गया।
फिर भी उनका संकल्प नहीं बदला।
“जब ज़िद पे आई पार्वती……….”
इस पुराणिक प्रसंग को पढ़ने के बाद, सहसा ही आज के एक लोकप्रिय भजन की पंक्तियाँ याद आतीं हैं।
यह भजन महान संत नीम करोली बाबा के जीवन पर आधारित फिल्म हनुमान अंश का है।
ऐसा लगता है कि यह भजन शिवपुराण के इसी प्रसंग से प्रेरित है।
ये भजन की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार से हैं —
जब ज़िद पे आ गई पार्वती —पार्वती, पार्वती
समझाने पहुँचे सप्तऋषि —सप्तऋषि, सप्तऋषि
काय जिद कर-रही, काय खुमर रही
ऐसे वर के लाने —ऐसे वर के लाने
जाके सीस पे गंगा और गले में डाले फिर रहे साँप
इतने सीधे-सादे हैं सब कहते भोलेनाथ, भोलेनाथ
ना खपरा ना छपरा — ना फूस की धरे मड़ैया
का खावे को धरो वहाँ —बस रोवत रहत लड़ैयाँ
भेष धरे अवधूत फिरे —अब तुमसे का का कहे बिन्नूं
डोरा डाँगर ले घूमे —वे बिनकें कछुऐनैयाँ
काय जिद कर-रही —काय खुमर रही —ऐसे वर के लाने……………
मुड़ें पे आधी चंदा और —बेला पे घूमत शंकर
राम नाम के रसिया हैं वे —और उन्हें क्या चाहने
कामदेव के मर्दनहारी —घर-गुहस्थी क्या जानें
काय जिद कर-रही —काय खुमर रही—ऐसे वर के लाने……………
गीत-संदर्भ: पार्वती। फिल्म हनुमान अंश
गीत, संगीत एवं स्वर: साधु एस तिवारी
भजन की भाषा सहज है, लेकिन उसके पीछे खड़ा प्रसंग पौराणिक है।
शिवमहापुराण के सप्तर्षि भी पार्वती के सामने उसी असामान्य शिव-स्वरूप को रख रहे थे—वैरागी, सामान्य गृहस्थ वैभव से दूर, विचित्र वेशधारी, भूतगणों के साथी और त्रिशूलधारी।
और जिस भाव को आज का भजन ‘ज़िद’ कहता है, शिवमहापुराण स्वयं उसके लिए ‘हठ’ शब्द का प्रयोग करता है—
“न हि चलति हठो मे…”
अंतर केवल भाषा का है — भाव वही है।
भजन की ‘ज़िद’ और पुराण का ‘हठ’—दोनों के केन्द्र में वही पार्वती हैं, जिनका निर्णय था कि परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, संसार के तर्क बदल सकते हैं, लेकिन शिव के प्रति उनका संकल्प नहीं बदलेगा।
अंततः तप सफल हुआ
सप्तर्षियों की परीक्षा और उसके बाद स्वयं भगवान शिव द्वारा ब्रह्मचारी-वेश में ली गई परीक्षा में भी पार्वती अपने संकल्प से विचलित नहीं हुईं।
जिस उद्देश्य से उन्होंने राजसी जीवन त्यागकर दीर्घ और कठोर तप आरम्भ किया था, अब वह सिद्ध होने का समय आ गया था।
शिवमहापुराण में भगवान शिव स्वयं कहते हैं—
तथा च कर्तुकामोऽहं विवाहं शिवया सह ।
तया वै सुतपस्तप्तं दुष्करं परमर्षिभिः ॥ २८ ॥
तस्यै परं फलं देयमभीष्टं तद्धितावहम् ।
एतादृशः पणो मे हि भक्तानन्दप्रदः स्फुटम् ॥ २९ ॥
अर्थात: भगवान शिव कहते हैं—मैं पार्वती के साथ विवाह करना चाहता हूँ। उन्होंने ऐसा उत्तम और कठिन तप किया है जो महान ऋषियों के लिए भी दुष्कर है। इसलिए अब उन्हें उनके तप का परम और इच्छित फल दिया जाना चाहिए।
स्रोत — शिवमहापुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड, अध्याय 32, श्लोक 28–29
यहीं ब्रह्मचारिणी की तप-कथा अपने स्वाभाविक निष्कर्ष तक पहुँचती है।
पर्वतराज की पुत्री पार्वती ने शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए जो संकल्प लिया था, वह केवल कठोर तप से ही नहीं, बल्कि बार-बार हुई परीक्षाओं के बीच अपनी अटल निष्ठा बनाए रखने से सिद्ध हुआ।
अंततः भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया और आगे शिव-पार्वती विवाह सम्पन्न हुआ।
इस प्रकार शैलपुत्री के रूप में पर्वतराज की पुत्री से आरम्भ हुई यात्रा, ब्रह्मचारिणी के रूप में तप, संयम, जप और अडिग संकल्प से गुजरते हुए अपने लक्ष्य तक पहुँचती है।
ब्रह्मचारिणी और महागौरी — दो अलग तप-प्रसंग
पार्वती ने अपने जीवन में केवल एक बार तप नहीं किया।
ब्रह्मचारिणी से सम्बद्ध यह तप विवाह से पूर्व भगवान शिव की प्राप्ति के लिए है।
शिवमहापुराण में बहुत बाद में, विवाह के पश्चात्, पार्वती की एक दूसरी तपस्या आती है जिसमें वे अपने कृष्ण वर्ण का त्याग करके गौर स्वरूप प्राप्त करती हैं।
वह गौरी से सम्बन्धित स्वतंत्र पुराणिक प्रसंग है।
इसलिए ब्रह्मचारिणी की विवाह-पूर्व तपस्या और गौरी बनने के लिए किया गया विवाहोत्तर तप एक ही घटना नहीं हैं।
नवदुर्गा के क्रम में भी ब्रह्मचारिणी दूसरी देवी हैं और महागौरी आठवीं।
अतः ब्रह्मचारिणी की कथा का केन्द्र पार्वती की शिव-प्राप्ति के लिए की गई विवाह-पूर्व साधना ही है।
माता ब्रह्मचारिणी का स्वरूप —
नवदुर्गा की प्रचलित ध्यान-परम्परा में माता ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यन्त सरल और तपस्विनी का है।
वे द्विभुजा हैं। उनके हाथों में अक्षमाला और कमण्डलु हैं।
नवदुर्गा स्तोत्र में उनका ध्यान इस प्रकार मिलता है—
दधाना करपद्माभ्यामक्षमाला कमण्डलू ।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ॥
अर्थात: अपने दोनों करकमलों में अक्षमाला और कमण्डलु धारण करने वाली अनुपम ब्रह्मचारिणी देवी मुझ पर प्रसन्न हों।
स्रोत — प्रचलित नवदुर्गा स्तोत्र, ब्रह्मचारिणी ध्यान, श्लोक 2

ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः ॥
नवदुर्गा की इस यात्रा में शैलपुत्री के बाद हमने माता ब्रह्मचारिणी के तप, संयम और अटल संकल्प को समझा।
अब हमारी यात्रा आगे बढ़ती है देवी के तीसरे स्वरूप की ओर—जहाँ तपस्विनी पार्वती एक नए रूप में हमारे सामने आती हैं।
हमारी यात्रा का अगला पड़ाव — नवदुर्गा: तृतीय दर्शन — माता चन्द्रघण्टा।

माँ ब्रह्मचारिणी का तप यह बताता है कि अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कैसे कठिन नियमों का पालन करना पडता है ।
मैं आपके लेखों की नियमित पाठिका हूँ । और आपके लेखों का इंतजार रहता है ।
आप authentic sources से सामग्री निकाल कर हमारे लिए सुलभ करते हैं, इसके लिए धन्यवाद।
आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। यह जानकर मन से खुशी हुई कि आप हमारे लेख नियमित रूप से पढ़ती हैं और उनका इंतज़ार करती हैं। माँ ब्रह्मचारिणी की तपस्या सचमुच हमें संकल्प, धैर्य और अनुशासन की शक्ति का एहसास कराती है।
आपका स्नेह और विश्वास ही ऐसे लेख लिखते रहने की सबसे बड़ी प्रेरणा है।