नवरात्रि विशेष – 1

नवदुर्गा: पहला दर्शन — माँ शैलपुत्री

लेखक: कुलदीप ठुसू “पम्पोष”


आज से शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व आरम्भ हो रहा है।

अगले नौ दिनों तक हम जगज्जननी भगवती की उपासना, उनके नौ विशिष्ट स्वरूपों — नवदुर्गा — के रूप में करेंगे।

इस क्रम की प्रथम देवी हैं — माँ शैलपुत्री।

लेकिन इस यात्रा को आरम्भ करने से पहले एक बात स्पष्ट कर लेना आवश्यक है —

” नवदुर्गा नौ अलग-अलग देवियाँ नहीं हैं — ये उसी एक आदिशक्ति जगज्जननी महामाया के ही विशिष्ठ नौ स्वरूप हैं।”

ऐसा भी नहीं है कि भगवती के केवल नौ ही स्वरूप हैं।

शास्त्रों में उनके अनेक नाम और अनेक रूप मिलते हैं। जगतकल्याण के लिए समय समय पर वही शक्ति अलग-अलग स्वरूपों में प्रकट होती है।

कालिका पुराण शैलपुत्री का नाम लेते हुए इस सिद्धान्त को बहुत स्पष्ट रूप से समझाता है—

अन्या या मूर्तयः प्रोक्ताः शैलपुत्र्यादयोऽपराः ।
तस्या एव विभागास्तास्तच्छरीरविनिर्गताः ॥ ४९ ॥

निःसरन्ति यथा नित्यं सूर्यबिम्बान्मरीचयः ।
देव्यास्तथोग्रचण्डाद्या महामायाशरीरतः ॥ ५० ॥

तासामेवाङ्गरूपाणि वक्तव्यानि मया तव ।
एकैव तु महामाया कार्यार्थं भिन्नतां गता ॥ ५१ ॥

— कालिका पुराण 58. (49–51)

अर्थात: शैलपुत्री आदि देवी-स्वरूप उसी महामाया के विभाग हैं और उन्हीं से प्रकट होते हैं। जिस प्रकार एक ही सूर्य से अनेक किरणें निकलती हैं, उसी प्रकार महामाया से उनके अनेक रूप प्रकट होते हैं।

यानी महामाया एक ही हैं; अलग-अलग कार्यों के लिए वे भिन्न-भिन्न रूप धारण करती हैं।

इसी एक महामाया के नवदुर्गा स्वरूपों का क्रम देवीकवच में इस प्रकार मिलता है—

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥ ३ ॥

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च ।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ॥ ४ ॥

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ॥ ५ ॥

— देवीकवच 3–5

अर्थात: प्रथम शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चन्द्रघण्टा, चौथी कूष्माण्डा, पाँचवीं स्कन्दमाता, छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी और नौवीं सिद्धिदात्री हैं।

इन्हें नवदुर्गा कहा गया है।

इस क्रम की शुरुआत होती है—माँ शैलपुत्री से।


सती से हिमालय-पुत्री पार्वती तक —

सती अग्निकुंड में ध्यानमग्न बैठी हैं, चारों ओर यज्ञस्थल पर लोग भयभीत दिखाई दे रहे हैं, और पृष्ठभूमि में वीरभद्र का क्रोध, विराट रूप प्रकट है।
दक्ष-यज्ञ का निर्णायक क्षण — सती का देह-त्याग और पृष्ठभूमि में प्रकट होता वीरभद्र का प्रचंड रूप।

माँ शैलपुत्री के प्राकट्य की कथा दक्ष प्रजापति की पुत्री सती से जुड़ी है।

सती भगवान शिव की पत्नी थीं। दक्ष-यज्ञ के प्रसंग में भगवान शिव के प्रति हुए अपमान से व्यथित होकर उन्होंने अपने शरीर का त्याग कर दिया।

देहत्याग के समय सती ने मन में निश्चय किया कि वे आगे पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लेंगी।

शिवपुराण कहता है—

तस्यामहं सुता स्यामित्यवधार्य सती हृदा ।
त्यक्तदेहा मनो दध्रे भवितुं हिमवत्सुता ॥ ८ ॥

समयं प्राप्य सा देवी सर्वदेवस्तुता पुनः ।
सती त्यक्ततनुः प्रीत्या मेनकातनयाभवत् ॥ ९ ॥

नाम्ना सा पार्वती देवी तपः कृत्वा सुदुस्सहम् ।
नारदस्योपदेशाद्वै पतिं प्राप शिवं पुनः ॥ १० ॥

— शिवपुराण, रुद्रसंहिता, पार्वतीखण्ड 1. (8–10)

अर्थात: सती ने हृदय में निश्चय किया कि वे मेनका (मेना) की पुत्री और हिमालय की कन्या के रूप में जन्म लेंगी।

समय आने पर वही सती मेना की पुत्री हुईं, पार्वती नाम से प्रसिद्ध हुईं और आगे कठोर तपस्या करके पुनः भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया।

कालिका पुराण इसी प्राकट्य को और विस्तार से वर्णित करता है।

मेना की दीर्घ साधना —

इधर पर्वतराज हिमालय की पत्नी मेना संतान-प्राप्ति की कामना से भगवती की दीर्घ आराधना कर रही थीं।

कालिका पुराण उनकी उपास्य देवी को महामाया, जगद्धात्री और सनातनी योगनिद्रा कहता है—

यदा दाक्षायणी प्राणान् दक्षकोपाज्जहौ पुरा ।
तदैव मेनका देवी आरिराधयिषुः शिवाम् ॥ ७ ॥

महामायां जगद्धात्रीं योगनिद्रां सनातनीम् ।
मोहिनीं सर्वभूतानां शरणं सर्वनाकिनाम् ॥ ८ ॥

अष्टम्यामुपवासं तु कृत्वा सा नवमीतिथौ ।
मोदकैर्बलिभिः पिष्टैः पायसैर्गन्धपुष्पकैः ॥ ९ ॥

चैत्रे मासि समारभ्य सप्तविंशतिवत्सरान् ।
यावत् सम्पूजयामास पुत्रार्थिन्यन्वहं शुचिः ॥ १० ॥

गङ्गायामोषधिप्रस्थे कृत्वा मूर्तिं महीमयीम् ।
कदाचित् सा निराहारा कदाचित् सा धृतव्रता ॥ ११ ॥

शिवाविन्यस्तमनसा सप्तविंशतिवत्सरान् ।
निनाय मेनका देवी परमां भूतिमिच्छती ॥ १२ ॥

— कालिका पुराण 41. (7–12)

अर्थात: मेना ने शिवा भगवती — महामाया जगद्धात्री सनातनी योगनिद्रा — की आराधना की।

मेना अष्टमी को उपवास करतीं और नवमी को मोदक, पायस, गन्ध और पुष्प आदि से देवी का पूजन करतीं।

चैत्र मास से आरम्भ हुई यह साधना सत्ताईस वर्षों तक चली। कभी निराहार रहकर, कभी व्रतपूर्वक, भगवती में मन लगाए उन्होंने यह दीर्घ तप पूरा किया।


योगनिद्रा कौन हैं ?

यहाँ योगनिद्रा नाम महत्वपूर्ण है।

यह वही देवी-शक्ति हैं जिनसे भगवान विष्णु की योगनिद्रा का संबंध देवीमाहात्म्य में वर्णित है।

कल्पांत में जब समस्त जगत जलमय था, भगवान विष्णु शेषनाग पर योगनिद्रा में स्थित थे —

योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते ॥ १.६६ ॥

आस्तीर्य शेषमभजत् कल्पान्ते भगवान् प्रभुः ।
तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ ॥ १.६७ ॥

विष्णुकर्णमलोद्भूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ ।
स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः ॥ १.६८ ॥

दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम् ।
तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयः स्थितः ॥ १.६९ ॥

— देवीमाहात्म्य 1. (66–69)

अर्थात: कल्पांत में भगवान विष्णु शेषनाग पर योगनिद्रा में स्थित थे। उसी समय मधु और कैटभ उत्पन्न हुए। ब्रह्मा ने विष्णु को निद्रा में देखकर उन्हें जगाने के लिए उसी योगनिद्रा देवी की स्तुति की।

देवीमाहात्म्य उन्हें स्पष्ट रूप से हरि की महामाया भी कहता है—

महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणा ।
तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः ॥ १.५४ ॥

महामाया हरेश्चैषा तया सम्मोह्यते जगत् ।
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ॥ १.५५ ॥

— देवीमाहात्म्य 1. (54–55)

अर्थात: वे जगत्पति की योगनिद्रा और हरि की महामाया हैं। उन्हीं महामाया से यह संसार मोहित होता है।

अर्थात मेना जिन महामाया–योगनिद्रा की आराधना कर रही थीं, वही शक्ति देवीमाहात्म्य में भगवान विष्णु की योगनिद्रा के रूप में वर्णित है।


सौ पुत्र और एक गुणवती कन्या —

सत्ताईस वर्षों की साधना के बाद भगवती महामाया -योगनिद्रा,  मेना के सामने प्रकट हुईं और उन्हें वर माँगने को कहा।

मेना ने सौ वीर और दीर्घायु पुत्रों की कामना की और उसके बाद एक ऐसी गुणवती कन्या माँगी जो दोनों कुलों को आनन्द देने वाली और तीनों लोकों में दुर्लभ हो।

ततः सा प्रथमं पुत्रशतं वव्रे यशस्विनी ।
वीर्यवच्चायुषा युक्तमृद्धिसिद्धिसमन्वितम् ॥ ३० ॥

पश्चात् तथैकां तनयां सुरूपां गुणशालिनीम् ।
कुलद्वयानन्दकरीं भुवनत्रयदुर्लभाम् ॥ ३१ ॥

ततो भगवती प्राह मेनकां मुनिसन्निभाम् ।
स्मितपूर्वं तदा तस्याः पूरयन्ती मनोरथम् ॥ ३२ ॥

शतं पुत्राः सम्भवन्तु भवत्या वीर्यसंयुताः ।
तत्रैको बलवान्मुख्यः प्रथमं सम्भविष्यति ॥ ३३ ॥

सुता च तव देवानां मानुषाणां च रक्षसाम् ।
हिताय सर्वजगतां भविष्याम्यहमेव ते ॥ ३४ ॥

— कालिका पुराण 41. (30–34)

अर्थात: देवी ने मेना की कामना स्वीकार करते हुए कहा—तुम्हें सौ वीर पुत्र प्राप्त होंगे और देवताओं, मनुष्यों तथा राक्षसों सहित समस्त जगत के हित के लिए मैं स्वयं तुम्हारी पुत्री बनूँगी।

यहाँ देवी स्वयं अपने इस प्राकट्य को “हिताय सर्वजगताम्”—समस्त जगत के हित के लिए बताती हैं।


योगनिद्रा का मेना के यहाँ प्राकट्य —

समय आने पर वही देवी मेना के यहाँ जन्म लेने आती हैं—

ततः सा कालिका देवी योगनिद्रा जगन्मयी ।
पूर्वत्यक्तसतीरूपा जन्मार्थं मेनकां ययौ ॥ ३९ ॥

समयस्यानुरूपेण मेनका जठरे शिवा ।
समुद्भूय समुत्पन्ना सा लक्ष्मीरिव सागरात् ॥ ४० ॥

वसन्तसमये देवी नवम्यामृक्षयोगतः ।
अर्धरात्रे समुत्पन्ना गङ्गेव शशिमण्डलात् ॥ ४१ ॥

— कालिका पुराण 41. (39–41)

अर्थात: वही कालिका देवी—योगनिद्रा और जगन्मयी—जिन्होंने पूर्व में सती-रूप का त्याग किया था, मेना के यहाँ जन्म लेने आईं।

समय आने पर वे मेना के गर्भ से प्रकट हुईं। उनका जन्म वसन्त ऋतु में नवमी तिथि की अर्धरात्रि में हुआ।

इस एक प्रसंग में सती, योगनिद्रा और हिमालय-पुत्री की कड़ी स्वयं जुड़ जाती है।

 

पर्वतराज हिमालय और मेना अपनी गोद में श्यामवर्णा दिव्य कन्या को देखकर प्रसन्न हैं, जबकि समीप आठ भुजाओं वाली योगनिद्रा महामाया का तेजस्वी स्वरूप विराजमान है।
माँ योगनिद्रा की आराधना से प्रसन्न होकर भगवती का मेना के यहाँ श्यामवर्णा कन्या के रूप में प्राकट्य।

काली, पार्वती और कालिका —

इस नवजात कन्या का वर्ण कालिका पुराण नीले कमल की पंखुड़ी के समान श्याम बताता है—

तां तु दृष्ट्वा तथा जातां नीलोत्पलदलानुगाम् ।
श्यामां सा मेनका देवी मुदमापातिहर्षिता ॥ ४५ ॥

— कालिका पुराण 41.45

अर्थात: नवजात कन्या का वर्ण नीलकमल की पंखुड़ी के समान श्याम था और उन्हें देखकर मेना अत्यन्त प्रसन्न हुईं।

इसी श्याम वर्ण के कारण उनके पिता हिमवान ने उनका नाम काली रखा।

यहाँ हिमवान से आशय पर्वतराज हिमालय, अर्थात पार्वती के पिता, से है।

तां तु नीलोत्पलदलश्यामां हिमवतः सुताम् ।
कालीति नाम्ना हिमवानाजुहाव कृतोदने ॥ ४७ ॥

बान्धवैस्तु समस्तैस्तन्नाम्ना सा पार्वतीति च ।
कालिकेति तथा नाम्ना कीर्तिता गिरिनन्दिनी ॥ ४८ ॥

— कालिका पुराण 41. (47–48)

अर्थात: नीलकमल के समान श्यामवर्णा अपनी पुत्री को हिमवान ने काली नाम दिया।

वही गिरिनन्दिनी अपने परिजनों में पार्वती और कालिका नामों से भी प्रसिद्ध हुईं।

इस प्रकार मेना-हिमालय की इस पुत्री के लिए यहाँ काली, पार्वती और कालिका—तीनों नाम प्रयुक्त होते हैं।


“शैलपुत्री”

देवर्षि नारद पर्वतराज हिमालय और मेना के सामने श्यामवर्णा बालिका का भविष्य बताते हुए, जिन्हें आगे शैलपुत्री के रूप में संबोधित किया गया।
देवर्षि नारद द्वारा हिमालय-पुत्री के भविष्य का वर्णन — यही श्यामवर्णा कन्या आगे शैलपुत्री और गौरी रूप में प्रतिष्ठित होती हैं।

समय बीतने पर देवर्षि नारद हिमालय के यहाँ आए और इस कन्या का भविष्य बताते हुए इसका भगवान शिव से विवाह होने की बात कही। 

हिमालय के मन में संशय था कि भगवान शिव पूर्व में सती को पत्नी रूप में स्वीकार कर चुके थे; फिर उनकी पुत्री शिव की पत्नी कैसे हो सकती है?

नारद ने स्पष्ट किया—

नात्र कार्या त्वया चिन्ता गिरिराज भवत्सुता ।
एषा सती समुत्पन्ना हरायैव न संशयः ॥ ७८ ॥

— कालिका पुराण 41. 78

अर्थात: हे गिरिराज! आपको इस विषय में कोई चिंता नहीं करनी चाहिए। आपकी यह पुत्री वही सती पुनः उत्पन्न हुई हैं और शिव के लिए ही प्रकट हुई हैं—इसमें कोई संदेह नहीं।

इसके कुछ ही श्लोक बाद कालिका पुराण उसी कन्या को स्पष्ट रूप से शैलपुत्रिका नाम से संबोधित करता है—

ततस्तां पुनरेवाह नारदः शैलपुत्रिकाम् ।
हर्षयन् गिरिराजं तु मेनकां तनयैः सह ॥ ८३ ॥

— कालिका पुराण 41.83

अर्थात: इसके बाद नारद ने उस शैलपुत्रिका से पुनः कहा और गिरिराज हिमालय, मेना तथा उनके पुत्रों को प्रसन्न किया।

शैल अर्थात पर्वत और पुत्री अर्थात कन्या।

पर्वतराज हिमालय की पुत्री—शैलपुत्री।


यही शैलपुत्री आगे ‘गौरी’ कहलाई —

नारद इसी प्रसंग में हिमालय-पुत्री के आगे के स्वरूप का भी संकेत देते हैं।

वे बताते हैं कि उनके द्वारा अनेक देवकार्य सम्पन्न होंगे; वे भगवान शिव के अर्धांग में स्थान पाएँगी और तपस्या के पश्चात गौरी नाम से प्रसिद्ध होंगी।

भूतो वा भविता वापि नाधुना च प्रवर्तते ।
अनया सुरकार्याणि कर्तव्यानि बहूनि च ॥ ६५ ॥

अनयैव गिरिश्रेष्ठ अर्धनारीश्वरो हरः ।
भविष्यति च सौहार्दाज्योत्स्नयैवामृतात्मनः ॥ ६६ ॥

शरीरार्धं हरस्यैषा करिष्यति निजास्पदे ।
स्वर्णगौरी सुवर्णाभा तपसा तोषिते हरे ॥ ६७ ॥

विद्युद्गौरी त्वियं काली तव पुत्री भविष्यति ।
गौरीति नाम्ना पश्चात्तु ख्यातिमेषा गमिष्यति ॥ ६८ ॥

— कालिका पुराण 41. (65–68)

अर्थात: हिमालय की इस पुत्री के द्वारा अनेक देवकार्य सम्पन्न होंगे। वे भगवान शिव के अर्धांग में स्थान प्राप्त करेंगी। यही श्यामवर्णा काली तपस्या से शिव को प्रसन्न करके आगे गौरी नाम से प्रसिद्ध होंगी।

यह वही सिद्धान्त है जिससे हमने शुरुआत की थी—मूल महामाया एक हैं, लेकिन अलग प्रसंग और कार्य में उनके नाम और रूप भिन्न हो सकते हैं।


शैलपुत्री के प्राकट्य का उद्देश्य —

हिमालय-पुत्री के रूप में भगवती का यह प्राकट्य केवल भगवान शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त करने तक सीमित नहीं था।

सती देहत्याग से पहले स्वयं अपने अगले प्राकट्य का उद्देश्य कहती हैं—

तथाप्यहं तनुं त्यक्षे समयात् पूर्वयोजितात् ।
हिताय जगतां कुर्यां प्रादुर्भावं पुनर्गिरौ ॥ ४१ ॥

— कालिका पुराण 16.41

अर्थात: मैं इस शरीर का त्याग करूँगी और जगत् के हित के लिए पुनः पर्वत पर प्रकट होऊँगी।

नारद भी हिमालय से कहते हैं—

“…अनया सुरकार्याणि कर्तव्यानि बहूनि च ॥ ६५ ॥

— कालिका पुराण 41.65

अर्थात: उनकी इस पुत्री के द्वारा अनेक देवकार्य सम्पन्न होने हैं।

इन देवकार्यों में एक महत्वपूर्ण कड़ी आगे तारकासुर-वध से जुड़ती है।


तारकासुर-वध से जुड़ा देवकार्य —

तारकासुर के अत्याचार से देवता पीड़ित हुए। ब्रह्मा ने बताया कि उसका वध शिव के तेज से उत्पन्न पुत्र द्वारा ही सम्भव होगा—

तस्य तेजश्च्युतं यच्च तस्माद् यो जायते सुतः ।
स एव तारकाख्यस्य हन्ता नान्यस्तु विद्यते ॥ ८९ ॥

— कालिका पुराण 42.89

अर्थात: शिव के उस तेज से जो पुत्र उत्पन्न होगा, वही तारकासुर का वध करेगा; अन्य कोई नहीं।

आगे यही शिवपुत्र स्कन्द के रूप में प्रकट होकर तारकासुर का वध करते हैं—

सोऽतिवृद्धः शक्तिधरो महाबलपराक्रमः ।
वर्द्धितः शङ्करेणाशु देवसेनाधिपोऽभवत् ॥ ८९ ॥

ततः सुरारिं सगणं तारकं लोकतारकम् ।
शक्तिहस्तो हरसुतः प्रममाथ महाबलम् ॥ ९० ॥

— कालिका पुराण 46. (89–90)

अर्थात: शिवपुत्र महान बल और पराक्रम से सम्पन्न होकर देवसेना के अधिपति बने और हाथ में शक्ति धारण करके तारकासुर का वध किया।

इस प्रकार हिमालय-पुत्री के रूप में भगवती का प्राकट्य व्यापक जगत्-कल्याण और देवकार्य से जुड़ा हुआ है। 


योगनिद्रा और शैलपुत्री

कालिका पुराण में आगे भगवान शिव अपने तेज के विषय में कहते हैं—

एतत् तेजो दुराधर्षं स्त्रीभिरन्यैः सुरोत्तमाः ।
योगनिद्रामृते देवीं शैलपुत्रीमृतेऽथवा ॥ ६९ ॥

— कालिका पुराण 46.69

अर्थात: हे देवश्रेष्ठो! यह तेज अन्य स्त्रियों के लिए धारण करना अत्यन्त कठिन है—योगनिद्रा देवी अथवा शैलपुत्री के अतिरिक्त।

इसी अध्याय में शिव की पत्नी के विषय में कहा गया है—

जगन्मयी योगनिद्रा विष्णुमाया बलीयसी ।
तस्याभवत् स्वयं जाया तस्मै तुभ्यं नमो नमः ॥ ३३ ॥

— कालिका पुराण 46.33

अर्थात: वह जगन्मयी योगनिद्रा, प्रबल विष्णुमाया, स्वयं उनकी पत्नी हुईं।

इस प्रकार कालिका पुराण सती, योगनिद्रा, पार्वती और शैलपुत्री को एक ही देवी-सत्ता के अलग-अलग प्राकट्य के रूप में जोड़ता है।


माँ शैलपुत्री का स्वरूप

माँ शैलपुत्री का प्रचलित ध्यान इस प्रकार मिलता है—

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् ।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ॥

अर्थात: इच्छित फल प्रदान करने वाली, मस्तक पर अर्धचन्द्र से सुशोभित, वृषभ पर आरूढ़ और शूल धारण करने वाली यशस्विनी शैलपुत्री को मैं प्रणाम करता हूँ।

इस ध्यान में माँ शैलपुत्री वृषभ पर आरूढ़, शूलधारिणी और मस्तक पर अर्धचन्द्र से सुशोभित हैं।

नवदुर्गा की प्रथम देवी

माँ शैलपुत्री का नाम सरल है—पर्वत की पुत्री—लेकिन इस पुत्रीभाव में स्वयं जगज्जननी महामाया का प्राकट्य है।

वही भगवती, जो हरि की योगनिद्रा हैं; वही जो सती रूप में प्रकट हुईं; वही जिन्होंने जगत्-कल्याण के लिए पुनः पर्वत पर जन्म लेने का संकल्प किया; वही मेना की दीर्घ साधना से प्रसन्न होकर उनकी पुत्री बनीं; और वही पर्वतराज हिमालय के घर काली, पार्वती और शैलपुत्री नाम से प्रतिष्ठित हुईं। और आगे तपस्या के पश्चात वही देवी गौरी नाम से भी प्रसिद्ध हुईं।

उनका यह प्राकट्य स्वयं देवी के शब्दों में— “हिताय जगताम्”, अर्थात जगत् के कल्याण के लिए था।

और शैलपुत्री के इस स्वरूप का सबसे सुंदर भाव स्वयं उनके पिता हिमालय के शब्दों में मिलता है।

पुत्री रूप में जगन्माता को अपने घर पाकर वे कहते हैं—

अद्य मे सफलं जन्म तपश्च सफलं मम ।
यत्त्वं त्रिजगतां माता मत्पुत्रीत्वमुपागता ॥ ४५ ॥

धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं मातस्त्वं निजलीलया ।
नित्यापि मद्गृहे जाता पुत्रीभावेन वै यतः ॥ ४६ ॥

— महाभागवत देवीपुराण, अध्याय 15, श्लोक 45–46

अर्थात: “आज मेरा जन्म और मेरी तपस्या सफल हुई, क्योंकि आप तीनों लोकों की माता होकर भी मेरी पुत्री के रूप में प्रकट हुई हैं।

हे माता! मैं धन्य और कृतकृत्य हूँ कि नित्यस्वरूपा होकर भी आपने अपनी लीला से मेरे घर पुत्रीभाव ग्रहण किया।”

हिमालय की पृष्ठभूमि में वृषभ पर विराजमान माँ शैलपुत्री, मस्तक पर अर्धचन्द्र, हाथों में त्रिशूल और कमल तथा अभय और वरद मुद्रा के साथ।

नवरात्रि के प्रथम दिन को हम, उसी त्रिलोकजननी, उसी महामाया, पर्वतराज हिमालय की पुत्री—माँ शैलपुत्री—के रूप में श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हैं।

 

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥



हमारी यात्रा का अगला पड़ाव —

नवदुर्गा-दर्शन की यह यात्रा माँ शैलपुत्री से आरम्भ हुई है। अगले पड़ाव में हम भगवती के दूसरे स्वरूप—माँ ब्रह्मचारिणी—का दर्शन करेंगे।

जानेंगे कि हिमालय-पुत्री पार्वती का यही स्वरूप कठोर तपस्या से कैसे जुड़ता है, उन्हें ‘ब्रह्मचारिणी’ क्यों कहा गया। 

नवदुर्गा: दूसरा दर्शन — माँ ब्रह्मचारिणी



 

4 thoughts on “नवरात्रि विशेष – 1”

  1. Vinay K Pathak

    बहुत बहुत धन्यवाद। काफी विस्तार से आपने पार्वती के जन्म, उनकी मां मेना की तपस्या और शैलपुत्री की जानकारी संदर्भों के साथ दी है। अब दूसरे दर्शन यानी मां ब्रह्मचारिणी की प्रतीक्षा रहेगी।

    1. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने लेख को इतने ध्यान से पढ़ा और उसके संदर्भों को सराहा, यह हमारे लिए बहुत उत्साह देने वाली बात है। प्रयास यही है कि नवदुर्गा के प्रत्येक स्वरूप को केवल प्रचलित कथाओं तक सीमित न रखकर, शास्त्रीय स्रोतों और उनके वास्तविक प्रसंगों के साथ समझा जाए।

      **नवदुर्गा दर्शन की अगली कड़ी — माँ ब्रह्मचारिणी — शीघ्र ही प्रस्तुत है।** आशा है यह यात्रा आगे भी आपको उतनी ही रोचक और उपयोगी लगेगी।

  2. बहुत ही अच्छा लग रहा है तथ्यों के साथ पढ़ कर । यूं तो सोशल मीडिया भरा पडा है पौराणिक कथाओं के नए -नए रूपों के वर्णनों से; ऐसे में प्रमाणिक स्रोत से तथ्य निकाल कर हमारे सामने रखने के लिए आप की मेहनत को प्रणाम । बहुत बहुत आभार।

    माँ शैलपुत्री की जय हो ।

    1. आपका हृदय से बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने इस प्रयास की मूल भावना को बिल्कुल सही पहचाना। आज सचमुच अनेक पौराणिक प्रसंग अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत किए जाते हैं; हमारा प्रयास केवल इतना है कि जहाँ तक संभव हो, मूल ग्रंथों और प्रमाणिक संदर्भों के आधार पर ही बात रखी जाए, और जहाँ प्रमाण न मिले वहाँ उसे स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जाए।

      आपके स्नेह और प्रोत्साहन से इस श्रृंखला को आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिलती है।

      **माँ शैलपुत्री की जय।**

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