नवरात्रि विशेष – 9

नवदुर्गा:  नौवाँ दर्शन — माँ सिद्धिदात्री 

जिनकी कृपा से देवताओं को भी प्राप्त होती हैं दिव्य शक्तियाँ

लेखक: कुलदीप ठुसू “पम्पोष”


नवदुर्गा के आठ दिव्य स्वरूपों के दर्शन के बाद अब हमारी यात्रा अपने नौवें और अंतिम पड़ाव पर पहुँच गई है। माँ शैलपुत्री से आरम्भ हुई इस यात्रा में हमने भगवती की तपस्या, सृजनशक्ति, मातृत्व, पराक्रम और उनके सौम्य तथा प्रचण्ड स्वरूपों की महिमा जानी। अब नवदुर्गा का नौवाँ स्वरूप, माँ सिद्धिदात्री, हमें आदिशक्ति की उस दिव्य महिमा से परिचित कराता है, जिनकी कृपा से स्वयं देवताओं को भी सामर्थ्य प्राप्त होता है।

माँ सिद्धिदात्री की कथा हमें एक अद्भुत पौराणिक प्रसंग तक ले जाती है, जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश परम भगवती के दिव्य धाम में पहुँचते हैं और उनके चरणों में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के दर्शन करते हैं।

आखिर सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा, पालनकर्ता भगवान विष्णु और संहारकर्ता महादेव — इन तीनों देवताओं को अपनी-अपनी शक्तियाँ कहाँ से प्राप्त हुईं ?


 

माँ सिद्धिदात्री — नवदुर्गा का नौवाँ स्वरूप

श्रीदुर्गासप्तशती के पाठाङ्ग देवीकवच में ब्रह्माजी नवदुर्गाओं के नौ नाम बताते हैं।

माँ महागौरी के पश्चात् नौवीं देवी का नाम सिद्धिदात्री बताया गया है।

मूल श्लोक —

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥ ५॥

स्रोत: देवीकवच, श्लोक 5, श्रीदुर्गासप्तशती पाठाङ्ग।

अर्थ: नौवाँ स्वरूप सिद्धिदात्री है। इस प्रकार ये नौ देवियाँ नवदुर्गा कहलाती हैं। इनके नाम महात्मा ब्रह्माजी द्वारा बताए गए हैं।

सिद्धिदात्री अर्थात् सिद्धियाँ प्रदान करने वाली देवी।

किन्तु यहाँ सिद्धि का अर्थ केवल असाधारण योगशक्तियाँ नहीं है।

यह किसी कार्य की सफलता, साधना की पूर्णता और विशेष सामर्थ्य की प्राप्ति के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है।


मूलप्रकृति के पाँच दिव्य स्वरूप — और उनमें सिद्धिदात्री की महिमा

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, नवम स्कन्ध, अध्याय 1

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण में मूलप्रकृति की महिमा का वर्णन करते हुए भगवान नारायण देवर्षि नारद को बताते हैं कि सृष्टि के विभिन्न कार्यों के लिए परम प्रकृति पाँच प्रमुख स्वरूपों में प्रकट होती हैं।

गणेशजननी दुर्गा राधा लक्ष्मीः सरस्वती।
सावित्री च सृष्टिविधौ प्रकृतिः पञ्चधा स्मृता॥ १॥

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत, नवम स्कन्ध, अध्याय 1, श्लोक 1

अर्थ: सृष्टि के विधान में मूलप्रकृति पाँच स्वरूपों में वर्णित हैं — गणेशजननी दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री।

देवर्षि नारद यह जानने की इच्छा प्रकट करते हैं कि मूलप्रकृति कौन हैं, उनका प्राकट्य किस प्रकार होता है और वे पाँच स्वरूपों में क्यों प्रकट होती हैं।

तब भगवान नारायण उन्हें इन पाँचों देवियों की महिमा बताते हैं।

भगवती दुर्गा को समस्त शक्तियों की अधिष्ठात्री, भगवान शिव की प्रिया और भक्तों के कष्ट दूर करने वाली परमेश्वरी कहा गया है।

महालक्ष्मी को सम्पत्ति, ऐश्वर्य, शोभा और समृद्धि की अधिष्ठात्री बताया गया है।

महासरस्वती को विद्या, बुद्धि, ज्ञान, वाणी, स्मृति और प्रतिभा का स्वरूप कहा गया है।

सावित्री को वेदों, वेदाङ्गों, मंत्रों और वैदिक संस्कारों की अधिष्ठात्री बताया गया है।

भगवती राधा को परम प्रेम, आनंद और श्रीकृष्ण की रासलीला की अधिष्ठात्री के रूप में वर्णित किया गया है।

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत, नवम स्कन्ध, अध्याय 1, श्लोक 14–57

इस प्रसंग की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भगवान नारायण जब पहले स्वरूप, भगवती दुर्गा, की महिमा बताते हैं, तब उन्हें सीधे सिद्धेश्वरी, सिद्धिरूपा और सिद्धिदा कहते हैं।

सर्वशक्तिस्वरूपा च शक्तिरीशस्य सन्ततम्।
सिद्धेश्वरी सिद्धिरूपा सिद्धिदा सिद्धिरीश्वरी॥ १८॥

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत, नवम स्कन्ध, अध्याय 1, श्लोक 18

अर्थ: भगवती समस्त शक्तियों की स्वरूपा, ईश्वर की सनातन शक्ति, सिद्धियों की अधिष्ठात्री, स्वयं सिद्धिस्वरूपा तथा सिद्धियाँ प्रदान करने वाली हैं।

इस प्रकार देवीभागवत में भगवती दुर्गा के सिद्धिदायिनी स्वरूप का स्पष्ट वर्णन मिलता है।

अर्थात् भगवती न केवल सिद्धियाँ प्रदान करती हैं, बल्कि स्वयं समस्त सिद्धियों का स्वरूप भी हैं।

उनकी इसी महिमा का एक विशेष प्रसंग स्वयंभुव मनु की कथा में मिलता है।


स्वयंभुव मनु को माँ सिद्धिदात्री ने दिया सृष्टि-विस्तार का वरदान

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, अष्टम स्कन्ध, अध्याय 1, श्लोक 19–45

सृष्टि का आरम्भिक काल था।

ब्रह्माजी के पुत्र स्वयंभुव मनु को प्रजा के विस्तार का महान दायित्व सौंपा गया था।

मनु के सामने प्रश्न था कि इतने महत्वपूर्ण कार्य को वे किस प्रकार सफलतापूर्वक सम्पन्न करें।

उन्होंने अपने पिता ब्रह्माजी की शरण ली।

ब्रह्माजी ने उन्हें एक विशेष निर्देश दिया—

पुत्र पुत्र त्वया कार्यं देव्याराधनमुत्तमम्।
तत्प्रसादेन ते तात प्रजासर्गः प्रसिद्ध्यति॥ २१॥

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत, अष्टम स्कन्ध, अध्याय 1, श्लोक 21

अर्थ: हे पुत्र! तुम परम भगवती की उत्तम आराधना करो। उनकी कृपा से तुम्हारा प्रजासृष्टि का कार्य सफल होगा।

पिता के वचनों को सुनकर स्वयंभुव मनु ने आदिशक्ति की तपस्या आरम्भ की।

वे एकाग्रचित्त होकर उन जगदम्बा की स्तुति करने लगे, जो समस्त शक्तियों की अधिष्ठात्री और सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति का मूल कारण हैं।

अपनी स्तुति में मनु ने भगवती को अनेक दिव्य नामों से संबोधित किया — कमला, गिरिजा, सती, दाक्षायणी और वेदगर्भा।

इसी स्तुति में उन्होंने भगवती का एक विशेष नाम लिया — सिद्धिदात्री।

त्वं ह्रीः कीर्तिः स्मृतिः कान्तिः कमला गिरिजा सती।
दाक्षायणी वेदगर्भा सिद्धिदात्री सदाभया॥ ३२॥

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत, अष्टम स्कन्ध, अध्याय 1, श्लोक 32

अर्थ: हे भगवती! आप लज्जा, कीर्ति, स्मृति, कान्ति, कमला, गिरिजा, सती, दाक्षायणी और वेदगर्भा हैं। आप सिद्धियाँ प्रदान करने वाली सिद्धिदात्री तथा सदैव अभय देने वाली हैं।

मनु की इस स्तुति से भगवती प्रसन्न हुईं।

उन्होंने मनु को वरदान माँगने के लिए कहा।

मनु ने अपने लिए किसी व्यक्तिगत सुख अथवा ऐश्वर्य की कामना नहीं की।

उन्होंने निवेदन किया कि जगदम्बा की कृपा से प्रजा के विस्तार का उनका कार्य निर्विघ्न सम्पन्न हो जाए।

भगवती ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।

प्रजासर्गः प्रभवतु ममानुग्रहतः किल।
निर्विघ्नेन च राजेन्द्र वृद्धिश्चाप्युत्तरोत्तरम्॥ ४०॥

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत, अष्टम स्कन्ध, अध्याय 1, श्लोक 40

अर्थ: हे राजेन्द्र! मेरी कृपा से तुम्हारी प्रजासृष्टि निर्विघ्न सम्पन्न होगी और उसकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहेगी।

भगवती ने मनु को अन्य आशीर्वाद भी दिए।

उन्होंने कहा कि जो भक्त मनु द्वारा रचित उनकी इस स्तुति का श्रद्धापूर्वक पाठ करेंगे, उन्हें विद्या, कीर्ति, समृद्धि और विजय जैसे शुभ फल प्राप्त होंगे।

इसके पश्चात् भगवती अन्तर्धान हो गईं।

वरदान प्राप्त करके स्वयंभुव मनु अपने पिता ब्रह्माजी के पास लौटे और प्रजासृष्टि के कार्य के लिए उपयुक्त स्थान प्रदान करने का निवेदन किया।

इस प्रसंग में माँ सिद्धिदात्री की महिमा अत्यंत स्पष्ट रूप से प्रकट होती है।

स्वयंभुव मनु भगवती को सीधे ‘सिद्धिदात्री’ कहकर पुकारते हैं और फिर उन्हीं के अनुग्रह से अपने महान दायित्व को सम्पन्न करने का वरदान प्राप्त करते हैं।

यहाँ भगवती की सिद्धिदायिनी शक्ति केवल योगसिद्धियों तक सीमित नहीं, बल्कि सृष्टि के विस्तार जैसे महान कार्य की सफलता का भी आधार है।


भगवान श्रीकृष्ण द्वारा भगवती की सिद्धिदायिनी महिमा का गुणगान 

स्रोत: ब्रह्मवैवर्त महापुराण, प्रकृतिखण्ड, अध्याय 66 — दुर्गास्तोत्र।

माँ सिद्धिदात्री की महिमा से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण वर्णन ब्रह्मवैवर्त महापुराण में मिलता है।

देवर्षि नारद भगवान नारायण से प्रकृति देवी के स्तोत्र और कवच के विषय में जानना चाहते हैं।

तब भगवान नारायण उन्हें बताते हैं कि प्राचीन काल में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गोलोक में परम प्रकृति भगवती की स्तुति की थी।

नारायण ऋषि यह भी बताते हैं कि मधु-कैटभ के साथ युद्ध के समय भगवान विष्णु ने, संकट के समय ब्रह्माजी ने, त्रिपुरासुर से युद्ध के समय भगवान शिव ने और वृत्रासुर के प्रसंग में इन्द्र सहित देवताओं ने भगवती की आराधना की थी।

इसके बाद वे श्रीकृष्ण द्वारा की गई देवीस्तुति सुनाते हैं।

इस स्तुति में भगवान श्रीकृष्ण जगदम्बा को सम्पूर्ण संसार की जननी, मूलप्रकृति और परमेश्वरी कहते हैं।

वे भगवती को समस्त बुद्धि, ज्ञान और शक्तियों का स्वरूप बताते हैं।

इसी क्रम में श्रीकृष्ण कहते हैं—

योगनिद्रा योगरूपा योगदात्री च योगिनाम्।
सिद्धिस्वरूपा सिद्धानां सिद्धिदा सिद्धयोगिनी॥ १८॥

स्रोत: ब्रह्मवैवर्त महापुराण, प्रकृतिखण्ड, अध्याय 66, श्लोक 18। कुछ पाठों में श्लोक 17

अर्थ: हे भगवती! आप योगनिद्रा हैं, योग का स्वरूप हैं और योगियों को योग प्रदान करने वाली हैं। आप सिद्धों की सिद्धिस्वरूपा, सिद्धियाँ प्रदान करने वाली और सिद्धयोगिनी हैं।

भगवान श्रीकृष्ण की इस स्तुति में भगवती की महिमा का वही स्वरूप मिलता है, जिसका वर्णन देवीभागवत में ‘सिद्धेश्वरी, सिद्धिरूपा और सिद्धिदा’ के रूप में हुआ है।

दो अलग-अलग पुराणों में भगवती को केवल सिद्धियाँ देने वाली नहीं, बल्कि सिद्धियों के मूल स्वरूप के रूप में वंदना की गई है।

ब्रह्मवैवर्तपुराण की स्तुति में श्रीकृष्ण आगे उन्हें ब्रह्माणी, माहेश्वरी, विष्णुमाया, वैष्णवी और भद्रकाली जैसे नामों से भी संबोधित करते हैं।

इस प्रकार एक ही जगदम्बा की विविध शक्तियों का वर्णन सामने आता है।


भगवती की सिद्धेश्वरी और सिद्धमाता के रूप में स्तुति

स्रोत: ब्रह्माण्डपुराण, उत्तरभाग, ललितोपाख्यान — श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रम्।

ब्रह्माण्डपुराण की ललितोपाख्यान परम्परा में भगवान हयग्रीव और महर्षि अगस्त्य के संवाद के अंतर्गत श्रीललितासहस्रनाम का वर्णन मिलता है।

इस सहस्रनाम में भगवती ललिता के एक हजार दिव्य नामों का गुणगान किया गया है।

इसी स्तोत्र में भगवती को सिद्धेश्वरी, सिद्धविद्या और सिद्धमाता कहकर वंदना की गई है।

वज्रेश्वरी वामदेवी वयोऽवस्थाविवर्जिता।
सिद्धेश्वरी सिद्धविद्या सिद्धमाता यशस्विनी॥ ९७॥

स्रोत: श्रीललितासहस्रनाम, श्लोक 97

अर्थ: भगवती वज्रेश्वरी, वामदेवी, आयु की अवस्थाओं से परे, सिद्धों की अधिष्ठात्री, सिद्धविद्यास्वरूपा, सिद्धों की माता और परम यशस्विनी हैं।

यहाँ भगवती के तीन नाम विशेष ध्यान देने योग्य हैं।

सिद्धेश्वरी — सिद्धों और सिद्धियों की अधिष्ठात्री।

सिद्धविद्या — सिद्धस्वरूप दिव्य विद्या की अधिष्ठात्री।

सिद्धमाता — सिद्धों की माता।

इसी सहस्रनाम के श्लोक 55 में भगवती को महासिद्धि और महायोगेश्वरेश्वरी भी कहा गया है।

महाबुद्धिर्महासिद्धिर्महायोगेश्वरेश्वरी॥

स्रोत: श्रीललितासहस्रनाम, श्लोक 55 का उत्तरार्ध।

अर्थ: भगवती महान बुद्धि और महान सिद्धि की स्वरूपा तथा महान योगेश्वरों की भी अधिष्ठात्री हैं।

इस प्रकार ब्रह्माण्डपुराण की ललितासहस्रनाम परम्परा में भी भगवती को सिद्धियों की स्वामिनी और स्वयं सिद्धिस्वरूपा के रूप में वंदना की गई है।

यह माँ सिद्धिदात्री की स्वतंत्र प्राकट्य-कथा नहीं, बल्कि परम भगवती की सिद्धिदायिनी महिमा का एक अन्य महत्वपूर्ण शास्त्रीय प्रमाण है।


 ब्रह्मा, विष्णु और महेश की अद्भुत यात्रा

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 3–4

देवीभागवत में परम भगवती की महिमा का एक अत्यंत विलक्षण प्रसंग मिलता है।

ब्रह्माजी स्वयं देवर्षि नारद को यह अनुभव सुनाते हैं।

एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक दिव्य विमान में सवार होकर अनेक लोकों की यात्रा पर निकले।

उनका विमान मन की गति से चल रहा था।

सबसे पहले वे एक ऐसे सुंदर प्रदेश में पहुँचे, जहाँ हरे-भरे वन, सरोवर, नदियाँ और दिव्य भवन थे।

इसके बाद वे स्वर्गलोक की ओर गए।

फिर विमान ब्रह्मलोक पहुँचा।

वहाँ ब्रह्माजी ने एक ऐसा दृश्य देखा, जिसने उन्हें आश्चर्यचकित कर दिया।

ब्रह्मलोक में एक अन्य ब्रह्मा विराजमान थे !

उनके सामने एक दिव्य सभा थी और वे अपने लोक के अधिपति के रूप में प्रतिष्ठित थे।

भगवान विष्णु और महेश भी विस्मित रह गए।

उन्होंने ब्रह्माजी से पूछा कि यदि यहाँ एक अन्य ब्रह्मा हैं, तो फिर वे स्वयं कौन हैं ?

ब्रह्माजी भी इसका उत्तर नहीं दे सके।

विमान आगे बढ़ा और कैलास पहुँचा।

वहाँ उन्होंने एक अन्य भगवान शिव के दर्शन किए, जिनके साथ गणेश, कार्तिकेय, नन्दी और अनेक शिवगण उपस्थित थे।

तीनों देवताओं का आश्चर्य और बढ़ गया।

इसके बाद विमान वैकुण्ठ पहुँचा, जहाँ एक अन्य भगवान विष्णु विराजमान थे।

इन दृश्यों को देखकर तीनों देवता अत्यंत विस्मित थे।

वे जिन लोकों और दिव्य स्वरूपों के दर्शन कर रहे थे, उनकी महिमा उनके लिए भी आश्चर्यजनक थी।

लेकिन उनकी यात्रा का सबसे अद्भुत दृश्य अभी शेष था।

ब्रह्मा, विष्णु और महेश दिव्य विमान में यात्रा करते हुए ब्रह्मलोक में दूसरे ब्रह्मा, वैकुण्ठ में दूसरे विष्णु और कैलास में दूसरे शिव को देखकर आश्चर्यचकित होते हुए।
देवीभागवत में वर्णित त्रिदेव की अद्भुत यात्रा — जब ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने विभिन्न दिव्य लोकों में अपने ही अन्य स्वरूपों के दर्शन किए और आश्चर्यचकित रह गए।

भगवती का दिव्य धाम

भगवती की मंद मुस्कान – और त्रिदेवों का स्त्री रूप

अपनी यात्रा में अंततः विमान एक दिव्य द्वीप में पहुँचा।

वहाँ की शोभा अवर्णनीय थी।

अनेक प्रकार के दिव्य वृक्ष, सुंदर उपवन, रत्नों से सुशोभित भवन और अलौकिक वातावरण था।

उस दिव्य धाम में परम भगवती भुवनेश्वरी विराजमान थीं।

उनका तेज करोड़ों विद्युत्-प्रभाओं के समान बताया गया है।

भगवती की असंख्य परिचारिकाएँ उनकी सेवा में उपस्थित थीं।

तीनों देवता उनके दर्शन के लिए आगे बढ़े।

लेकिन जैसे ही वे देवी के भवन के द्वार पर पहुँचे, एक अद्भुत घटना घटी।

जब भगवती ने द्वार पर खड़े ब्रह्मा, विष्णु और महेश को देखा।

उन्होंने मंद मुस्कान की।

उसी क्षण तीनों देवता सुंदर स्त्रीरूप में परिवर्तित हो गए।

द्वारस्थान्वीक्ष्य तान्सर्वान्देवी भगवती तदा।
स्मितं कृत्वा चकाराशु तांस्त्रीन्स्त्रीरूपधारिणः॥ ६॥

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 4, श्लोक 6

अर्थ: भगवती ने द्वार पर खड़े उन तीनों देवताओं को देखा और मुस्कुराकर तत्काल उन्हें स्त्रीरूपधारी बना दिया।

तीनों अपने बदले हुए स्वरूप को देखकर विस्मित रह गए।

वे भगवती के समीप पहुँचे और उनके चरणों में प्रणाम किया।

तभी उन्हें एक ऐसा दिव्य दर्शन हुआ, जो इस पूरे प्रसंग का सबसे विलक्षण भाग है।

माँ सिद्धिदात्री की कथा में ब्रह्मा, विष्णु और महेश भगवती भुवनेश्वरी के दिव्य धाम के द्वार पर उनकी मंद मुस्कान से स्त्रीरूप में परिवर्तित होते हुए।
भगवती भुवनेश्वरी की एक मंद मुस्कान से ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्त्रीरूप में परिवर्तित हो गए। देवीभागवत में वर्णित आदिशक्ति की अद्भुत लीला।

भगवती के चरणनखों में दिखाई दिया सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड

ब्रह्माजी बताते हैं कि भगवती के चरणों के नख अत्यंत तेजस्वी थे।

उन नखों में उन्होंने सम्पूर्ण चराचर जगत के दर्शन किए।

ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, इन्द्र, वरुण, यम और अन्य देवता दिखाई दे रहे थे।

पर्वत, समुद्र, नदियाँ, नाग, गंधर्व, सिद्ध, ऋषि और अनेक लोक भी उनमें विद्यमान दिखाई दिए।

यहाँ तक कि ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ और कैलास भी उन दिव्य चरणनखों में दिखाई दिए।

वैकुण्ठो ब्रह्मलोकश्च कैलासः पर्वतोत्तमः।
सर्वं तदखिलं दृष्टं नखमध्यस्थितं च नः॥ १९॥

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 4, श्लोक 19

अर्थ: हमने वैकुण्ठ, ब्रह्मलोक, श्रेष्ठ कैलास पर्वत और सम्पूर्ण जगत को भगवती के नखों के भीतर स्थित देखा।

इस अद्भुत दर्शन से तीनों देवता भावविभोर हो गए।

देवीभागवत के अनुसार उन्होंने भगवती के उस दिव्य धाम में सौ वर्षों तक उनकी महिमा का दर्शन किया।

इसके बाद भगवान विष्णु ने परमेश्वरी की स्तुति आरम्भ की।

उन्होंने भगवती को सम्पूर्ण सृष्टि की जननी तथा सृष्टि, पालन और संहार की परम शक्ति के रूप में वंदना की।

यह वही भगवती थीं, जिनकी शक्ति के बिना देवताओं के महान कार्य भी सम्पन्न नहीं हो सकते।

माँ सिद्धिदात्री की कथा में ब्रह्मा, विष्णु और महेश भगवती भुवनेश्वरी के दिव्य चरणनख में समस्त ब्रह्माण्ड, ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, कैलास, पर्वत, नदियाँ और आकाशगंगाएँ देखकर आश्चर्यचकित होते हुए।
भगवती भुवनेश्वरी के चरणनख में सम्पूर्ण सृष्टि का अद्भुत दर्शन — ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने एक ही नख में ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, कैलास सहित समस्त चराचर जगत को देखा और विस्मित रह गए।

जगदम्बा द्वारा भगवान शिव को मंत्रोपदेश 

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 1–24

भगवान विष्णु की स्तुति के पश्चात् देवाधिदेव महादेव ने भी भगवती का गुणगान किया।

उन्होंने जगदम्बा से प्रार्थना की कि वे उन्हें उस दिव्य नौ अक्षरों वाले मंत्र का पुनः उपदेश दें, जिसे वे पूर्व में प्राप्त कर चुके थे।

भगवती ने महादेव की प्रार्थना स्वीकार कर ली।

इत्युक्ता सा तदा देवी शिवेनाद्भुततेजसा।
उच्चचाराम्बिका मन्त्रं प्रस्फुटं च नवाक्षरम्॥ २२॥

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 22

अर्थ: अद्भुत तेजस्वी भगवान शिव की प्रार्थना सुनकर भगवती अम्बिका ने स्पष्ट रूप से नौ अक्षरों वाले दिव्य मंत्र का उच्चारण किया।

मंत्र प्राप्त करके भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए।

उन्होंने भगवती के चरणों में प्रणाम किया और उसी स्थान पर मंत्र का जप करने लगे।

देवीभागवत के अगले श्लोकों में इस मंत्र को कामनाओं की पूर्ति और मोक्ष प्रदान करने वाला कहा गया है।

इसके पश्चात् भगवती ने तीनों देवताओं को सृष्टि के संचालन हेतु उनकी शक्तियाँ प्रदान कीं।


आदिशक्ति का ब्रह्मा, विष्णु और महेश को उनकी शक्तियाँ प्रदान करना 

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 6

परम भगवती ने ब्रह्माजी को समझाया कि संसार का प्रत्येक कार्य शक्ति पर ही आधारित है।

अग्नि की ऊष्मा, सूर्य का प्रकाश तथा जल की शीतलता — ये सब शक्ति के ही विभिन्न रूप हैं।

वे बताती हैं कि समस्त पदार्थों और प्राणियों में कार्य करने की जो सामर्थ्य है, उसका मूल उनकी शक्ति में है।

जले शीतं तथा वह्नावौष्ण्यं ज्योतिर्दिवाकरे।
निशानाथे हिमा कामं प्रभवामि यथा तथा॥ १६॥

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 6, श्लोक 16

अर्थ: जल में शीतलता, अग्नि में ऊष्मा, सूर्य में प्रकाश और चन्द्रमा में शीतल प्रभाव के रूप में मैं ही अपनी शक्ति प्रकट करती हूँ।

इसके पश्चात् भगवती ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश को उनकी-उनकी शक्तियाँ प्रदान कीं।

ब्रह्माजी को महासरस्वती

सबसे पहले भगवती ने ब्रह्माजी को महासरस्वती प्रदान कीं और उन्हें सृष्टि की रचना का कार्य सौंपा।

स्रोत: देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 6, श्लोक 32–36

भगवान विष्णु को महालक्ष्मी

इसके बाद भगवती ने भगवान विष्णु को महालक्ष्मी प्रदान कीं।

उन्होंने महालक्ष्मी को अपनी दिव्य विभूति बताते हुए भगवान विष्णु को उनका सम्मान करने और उनके साथ जगत के पालन का दायित्व निभाने का निर्देश दिया।

स्रोत: देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 6, श्लोक 49–52

भगवान शिव को महाकाली

अंत में भगवती ने भगवान शिव को महाकाली स्वरूपिणी शक्ति प्रदान की।

गृहाण हरगौरीं त्वं महाकालीं मनोहराम्॥ ६५॥

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 6, श्लोक 65 का उत्तरार्ध।

अर्थ: हे हर! आप इस मनोहर महाकाली स्वरूपिणी गौरी को स्वीकार करें।

भगवती ने महादेव को कैलास में निवास करने और अपने नियत कार्य का पालन करने का निर्देश दिया।

इसके पश्चात् ब्रह्माजी इस दिव्य घटना का वर्णन करते हुए कहते हैं—

विष्णवेऽथ महालक्ष्मीं महाकालीं शिवाय च।
महासरस्वतीं मह्यं स्थानात्तस्माद्विसर्जिताः॥ ८२॥

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 6, श्लोक 82

अर्थ: भगवती ने भगवान विष्णु को महालक्ष्मी, भगवान शिव को महाकाली और मुझे महासरस्वती प्रदान करके उस स्थान से विदा किया।

इस प्रकार तीनों देवताओं को सृष्टि, पालन और संहार के लिए उनकी शक्तियाँ प्राप्त हुईं।

देवीभागवत का यह प्रसंग भगवती की उस महिमा को प्रकट करता है, जिसके अनुसार समस्त देवशक्तियों का मूल आधार स्वयं आदिशक्ति हैं।

माँ सिद्धिदात्री की उपासना में हम भगवती के इसी अनुग्रहपूर्ण स्वरूप का दर्शन करते हैं।

परम भगवती दिव्य सिंहासन पर विराजमान होकर ब्रह्मा को महासरस्वती, विष्णु को महालक्ष्मी और शिव को महाकाली स्वरूप की शक्तियाँ प्रदान करती हुईं।
देवीभागवत में वर्णित दिव्य प्रसंग — जब परम भगवती ने ब्रह्मा को महासरस्वती, विष्णु को महालक्ष्मी और महादेव को महाकाली स्वरूप की शक्तियाँ प्रदान कीं।

भगवान शिव का अर्धनारीश्वर स्वरूप और भगवती की अनुग्रहशक्ति

स्रोत: शिवमहापुराण, शतरुद्रसंहिता, अध्याय 3 — शिवस्यार्धनारीश्वरावतारवर्णनम्।

माँ सिद्धिदात्री की प्रचलित नवदुर्गा परम्परा में भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप को भी भगवती की शक्ति से जोड़ा जाता है।

शिवमहापुराण में अर्धनारीश्वर के प्राकट्य का विस्तृत वर्णन मिलता है।

जब ब्रह्माजी की सृष्टि आगे नहीं बढ़ रही थी

शिवपुराण के अनुसार ब्रह्माजी ने आरम्भ में अनेक प्रजाओं की रचना की।

लेकिन वे प्रजाएँ आगे अपनी संख्या नहीं बढ़ा रही थीं।

ब्रह्माजी चिंतित हो गए।

तभी उन्हें आकाशवाणी सुनाई दी कि वे स्त्री और पुरुष के संयोग से सृष्टि का विस्तार करें।

किन्तु उस समय तक नारीसृष्टि की शक्ति उनके पास नहीं थी।

उन्होंने विचार किया कि भगवान शिव की कृपा के बिना यह कार्य संभव नहीं होगा।

तब ब्रह्माजी ने परमशक्ति से संयुक्त भगवान शिव का ध्यान करते हुए कठोर तपस्या आरम्भ की।

उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव प्रकट हुए।

लेकिन इस बार उनका स्वरूप अत्यंत विलक्षण था।

उनके शरीर का एक भाग पुरुष का और दूसरा भाग नारी का था।

ततः पूर्णचिदीशस्य मूर्तिमाविश्य कामदाम्।
अर्द्धनारीनरो भूत्वा ततो ब्रह्मान्तिकं हरः॥ ८॥

स्रोत: शिवमहापुराण, शतरुद्रसंहिता, अध्याय 3, श्लोक 8

अर्थ: भगवान हर अर्धनारीनर स्वरूप धारण करके ब्रह्माजी के समीप प्रकट हुए।

भगवान शिव के इस अद्भुत स्वरूप का दर्शन करके ब्रह्माजी ने उन्हें प्रणाम किया।

तब महादेव ने अपने शरीर से भगवती शिवा को पृथक् प्रकट किया।

ब्रह्माजी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव अर्धनारीश्वर रूप में प्रकट होते हुए, आधा शरीर शिव और आधा भगवती पार्वती का, सामने हाथ जोड़कर आराधना करते ब्रह्माजी।
ब्रह्माजी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव अर्धनारीश्वर स्वरूप में प्रकट हुए। शिव और शक्ति के इस दिव्य स्वरूप का दर्शन कर ब्रह्माजी ने नारीसृष्टि के लिए आवश्यक शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की।

भगवती से ब्रह्माजी ने माँगी नारीसृष्टि की शक्ति

अपने सामने परम भगवती को देखकर ब्रह्माजी ने उनकी स्तुति की।

उन्होंने स्वीकार किया कि समस्त शक्तियों का उद्गम उन्हीं से है।

सर्वासामेव शक्तीनां त्वत्तः खलु समुद्भवः।
तस्मात्त्वां परमां शक्तिं प्रार्थयाम्यखिलेश्वरीम्॥ १९॥

स्रोत: शिवमहापुराण, शतरुद्रसंहिता, अध्याय 3, श्लोक 19

अर्थ: हे अखिलेश्वरी! समस्त शक्तियों की उत्पत्ति आपसे ही होती है। इसीलिए मैं आप परमशक्ति से प्रार्थना करता हूँ।

ब्रह्माजी ने भगवती से नारीसृष्टि करने की शक्ति प्रदान करने का अनुरोध किया।

इसके साथ ही उन्होंने प्रार्थना की कि जगत के कल्याण के लिए भगवती उनके पुत्र दक्ष की पुत्री के रूप में भी अवतरित हों।

भगवती ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।

उन्होंने ब्रह्माजी को आवश्यक शक्ति प्रदान की और अपने भ्रूमध्य से अपने समान तेजस्वी एक शक्ति प्रकट की।

शिवपुराण में आगे वर्णन है कि वह शक्ति दक्ष की पुत्री सती बनी।

इसके पश्चात् भगवती पुनः भगवान शिव के शरीर में समाहित हो गईं और महादेव अन्तर्धान हो गए।

इस प्रकार स्त्री और पुरुष के संयोग से सृष्टि के विस्तार का मार्ग प्रशस्त हुआ।

स्रोत: शिवमहापुराण, शतरुद्रसंहिता, अध्याय 3, श्लोक 20–29

अर्धनारीश्वर के इस प्रसंग में भगवती की सृजनशक्ति और भगवान शिव के साथ उनकी अभिन्नता का दिव्य दर्शन होता है।

यद्यपि इस अध्याय में देवी को सीधे ‘सिद्धिदात्री’ नाम से संबोधित नहीं किया गया है, लेकिन नारीसृष्टि की शक्ति प्रदान करने वाली भगवती की महिमा माँ सिद्धिदात्री की प्रचलित उपासना-परम्परा से जुड़ी हुई है।


माँ सिद्धिदात्री की अष्टसिद्धियाँ

माँ सिद्धिदात्री को आठ महा-सिद्धियाँ प्रदान करने वाली देवी माना जाता है।

ये आठ सिद्धियाँ योगपरम्परा में वर्णित असाधारण सामर्थ्य हैं।

स्कन्दपुराण में इनके नाम इस प्रकार मिलते हैं—

अणिमा महिमा चैव गरिमा लघिमा तथा।
ईशित्वं च वशित्वं च प्राप्तिः प्राकाम्यमेव च॥ ४१॥

स्रोत: स्कन्दपुराण, 3.3.7, श्लोक 41

इन आठ सिद्धियों के नाम हैं — अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, ईशित्व, वशित्व, प्राप्ति और प्राकाम्य।

इन आठ सिद्धियों का अर्थ इस प्रकार है—

  1. अणिमा: अपने शरीर को अणु के समान अत्यंत सूक्ष्म बना लेने की सिद्धि।
  2. महिमा: अपने शरीर या स्वरूप को अत्यंत विशाल कर लेने की शक्ति।
  3. गरिमा: शरीर को अत्यधिक भारी बना लेने का सामर्थ्य।
  4. लघिमा: अपने शरीर को अत्यंत हल्का बना लेने की सिद्धि।
  5. प्राप्ति: सामान्य सीमाओं से परे इच्छित वस्तु या स्थान तक पहुँचने का सामर्थ्य।
  6. प्राकाम्य: इच्छित अनुभव अथवा संकल्प को सिद्ध करने की विशेष शक्ति।
  7. ईशित्व: प्रकृति और उसके कार्यों पर विशेष आधिपत्य का सामर्थ्य।
  8. वशित्व: विषयों और शक्तियों को अपने वश में रखने की सिद्धि।

ये आठ महा-सिद्धियाँ भारतीय योगपरम्परा का महत्वपूर्ण विषय रही हैं।

अन्य ग्रंथों में सिद्धियों की संख्या और वर्गीकरण भिन्न भी मिलते हैं।

लेकिन माँ सिद्धिदात्री की आराधना में अष्टसिद्धियों का विशेष महत्व माना जाता है।

किन्तु माँ सिद्धिदात्री की महिमा इन शक्तियों तक सीमित नहीं है।

माँ सिद्धिदात्री उन समस्त सिद्धियों की अधिष्ठात्री भगवती हैं, जिनकी कृपा से देवताओं के महान कार्य सम्पन्न होते हैं और साधकों की आराधना सफल होती है।

माँ सिद्धिदात्री की कथा में कमल पर विराजमान चार भुजाओं वाली भगवती, चारों ओर अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व की आठ महा-सिद्धियों का प्रतीकात्मक चित्रण।
माँ सिद्धिदात्री — समस्त सिद्धियों की अधिष्ठात्री भगवती। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व जैसी आठ महा-सिद्धियाँ उनकी सिद्धिदायिनी महिमा को प्रकट करती हैं।

श्रीकृष्ण का महादेव को समस्त सिद्धियों का वरदान 

स्रोत: ब्रह्मवैवर्त महापुराण, ब्रह्मखण्ड, अध्याय 6

ब्रह्मवैवर्तपुराण में भगवान शिव और श्रीकृष्ण के मध्य एक विशेष संवाद मिलता है।

इस प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण महादेव को सिंहवाहिनी प्रकृति स्वीकार करने के लिए कहते हैं।

लेकिन भगवान शिव उस समय गृहस्थ जीवन के स्थान पर श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति और सेवा में लगे रहना चाहते हैं।

वे भगवान श्रीकृष्ण से भक्ति का वरदान माँगते हैं।

अपनी प्रार्थना के दौरान महादेव विभिन्न मुक्तियों और योगसिद्धियों का उल्लेख करते हैं।

इसी क्रम में वे अठारह सिद्धियों के नाम बताते हैं—

अणिमा लघिमा प्राप्तिः प्राकाम्यं महिमा तथा।
ईशित्वं च वशित्वं च सर्वकामावसायिता॥ १८॥

स्रोत: ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्मखण्ड, अध्याय 6, श्लोक 18

इसके अगले दो श्लोकों में सर्वज्ञता, दूरश्रवण, परकायप्रवेश, वाक्सिद्धि, कल्पवृक्षत्व और अन्य सामर्थ्यों का उल्लेख करते हुए सिद्धियों की संख्या अठारह बताई गई है।

किन्तु इस संवाद की सबसे सुंदर बात केवल सिद्धियों की संख्या नहीं है।

महादेव कहते हैं कि ये सिद्धियाँ, तप, योग और अन्य महान उपलब्धियाँ भी श्रीकृष्ण की भक्ति की एक अत्यंत छोटी कला के बराबर नहीं हैं।

भगवान शिव की यह प्रार्थना सुनकर श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

वे महादेव को आशीर्वाद देते हुए कहते हैं—

अमरत्वं लभ भव भव मृत्युंजयो महान्।
सर्वसिद्धिं च वेदांश्च सर्वज्ञत्वं च मद्वरात्॥ २८॥

स्रोत: ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्मखण्ड, अध्याय 6, श्लोक 28

अर्थ: हे भव! तुम अमरत्व प्राप्त करो और महान मृत्युंजय बनो। मेरे वरदान से तुम्हें समस्त सिद्धियाँ, वेदों का ज्ञान और सर्वज्ञत्व प्राप्त हो।

इस प्रकार ब्रह्मवैवर्तपुराण की इस कथा में भगवान श्रीकृष्ण महादेव को समस्त सिद्धियों का वरदान देते हैं।

इस प्रसंग में एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक भाव भी है।

महादेव सिद्धियों का महत्व जानते हुए भी उनकी अपेक्षा अनन्य भक्ति को अधिक मूल्यवान मानते हैं।

माँ सिद्धिदात्री की आराधना के संदर्भ में यह प्रसंग स्मरण कराता है कि साधना का उद्देश्य केवल असाधारण सामर्थ्य प्राप्त करना नहीं, बल्कि परमात्मा के प्रति भक्ति और आध्यात्मिक कल्याण भी है।


माँ सिद्धिदात्री का दिव्य स्वरूप

नवदुर्गा की ध्यान और चित्रण परम्परा में माँ सिद्धिदात्री का स्वरूप अत्यंत सौम्य, तेजस्वी और कल्याणकारी है।

भगवती को सामान्यतः पूर्ण विकसित कमल पर विराजमान दिखाया जाता है।

सिंह को भी उनका वाहन माना गया है।

माँ की चार भुजाएँ हैं।

उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल सुशोभित होते हैं।

माता दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित हैं। उनके शांत मुखमण्डल पर प्रसन्नता और करुणा का भाव दिखाई देता है।

नवदुर्गा की ध्यान-परम्परा में उनकी स्तुति इस प्रकार की जाती है—

वन्दे वाञ्छितमनोरथार्थं चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
कमलस्थितां चतुर्भुजां सिद्धिदां यशस्वनीम्॥

स्रोत: नवदुर्गास्तुतिः, सिद्धिदात्री ध्यानम्।

अर्थ: मैं उन यशस्विनी, चार भुजाओं वाली, सिद्धियाँ प्रदान करने वाली भगवती को प्रणाम करता हूँ, जो कमल पर विराजमान हैं और जिनके मस्तक पर अर्धचन्द्र सुशोभित है।

माँ सिद्धिदात्री की कथा में वर्णित नवदुर्गा का नौवाँ स्वरूप, गुलाबी कमल पर विराजमान चार भुजाओं वाली भगवती, हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल, समीप सिंह तथा स्वर्णिम आभामंडल।
माँ सिद्धिदात्री — नवदुर्गा की नौवीं देवी, समस्त सिद्धियों की अधिष्ठात्री भगवती। कमल पर विराजमान माता शंख, चक्र, गदा और कमल धारण किए हुए अपने दिव्य एवं कल्याणकारी स्वरूप में।

माँ सिद्धिदात्री की विशेष आराधना

माँ सिद्धिदात्री की महिमा का एक सुंदर वर्णन श्रीनवदुर्गास्तोत्रम् में मिलता है—

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥ ९॥

स्रोत: श्रीनवदुर्गास्तोत्रम्, सिद्धिदात्री स्तुति, श्लोक 9

अर्थ: सिद्धों, गंधर्वों, यक्षों, असुरों और देवताओं द्वारा पूजित, सिद्धियाँ प्रदान करने वाली भगवती सिद्धिदात्री सदा हमारा कल्याण करें।

इस स्तुति में माँ सिद्धिदात्री की महिमा का व्यापक स्वरूप सामने आता है।

केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि देवता, गंधर्व, यक्ष और सिद्ध भी भगवती की आराधना करते हैं।


महानवमी पर माँ सिद्धिदात्री की आराधना

नवरात्रि की नवमी तिथि माँ सिद्धिदात्री की उपासना को समर्पित मानी जाती है।

इस दिन भक्त भगवती का ध्यान, स्तोत्रपाठ, मंत्रजप और पूजन करते हैं।

माँ सिद्धिदात्री का नाममंत्र —

ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥

अनेक परिवारों में अष्टमी अथवा नवमी पर कन्यापूजन, हवन और नवरात्रि व्रत के समापन की परम्परा भी निभाई जाती है।

इन विधियों में क्षेत्र और कुलपरम्परा के अनुसार अंतर मिलता है।

माँ सिद्धिदात्री की आराधना में भक्त भगवती से सद्बुद्धि, आत्मबल, कल्याण, साधना की पूर्णता और जीवन के शुभ उद्देश्यों की सिद्धि की प्रार्थना करते हैं।

॥ जय माँ सिद्धिदात्री ॥


नौ स्वरूप — एक ही परम जगदम्बा

नवरात्रि की नौ दिनों की आराधना अब अपने अंतिम चरण में पहुँचती है।

इस यात्रा का आरम्भ माँ शैलपुत्री के दिव्य स्वरूप से हुआ था।

माँ ब्रह्मचारिणी के रूप में भगवती की कठोर तपस्या और अटल संकल्प का दर्शन हुआ।

माँ चन्द्रघण्टा के रूप में उनका तेज और पराक्रम सामने आया।

माँ कूष्माण्डा में उनकी सृजनशक्ति तथा माँ स्कन्दमाता में मातृत्व की दिव्य महिमा का अनुभव हुआ।

माँ कात्यायनी के स्वरूप में भगवती की दैत्यसंहारिणी शक्ति, माँ कालरात्रि में उनका प्रचण्ड रूप और माँ महागौरी में उनकी सौम्य, कल्याणमयी महिमा के दर्शन हुए।

अब नौवें दिन माँ सिद्धिदात्री के रूप में भगवती की उस अनुग्रहशक्ति का दर्शन होता है, जो देवताओं को सामर्थ्य और साधकों को सिद्धियाँ प्रदान करती है।

ये नौ स्वरूप नौ अलग-अलग परम शक्तियाँ नहीं, बल्कि एक ही जगदम्बा की विविध दिव्य अभिव्यक्तियाँ हैं।

कालिकापुराण में इसी भाव को अत्यंत सुंदर शब्दों में व्यक्त किया गया है—

तासामेवाङ्गरूपाणि वक्तव्यानि मया तव।
एकैव तु महामाया कार्यार्थं भिन्नतां गता॥ ५१॥

स्रोत: कालिकापुराण, अध्याय 58, श्लोक 51

अर्थ: ये सभी उसी महामाया के विभिन्न अंगरूप हैं। एक ही महामाया विभिन्न कार्यों के लिए अनेक रूपों में प्रकट होती हैं।

माँ सिद्धिदात्री के दर्शन के साथ नवदुर्गा की यह आराधना पूर्णता को प्राप्त होती है।

सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा हों, पालनकर्ता भगवान विष्णु हों, देवाधिदेव महादेव हों अथवा सृष्टि के प्रथम मनु — पुराणों के विभिन्न प्रसंगों में सभी भगवती की कृपा और शक्ति का आश्रय लेते दिखाई देते हैं।

यही माँ सिद्धिदात्री की दिव्य महिमा है।

भगवती केवल सिद्धियों की दात्री नहीं, बल्कि स्वयं समस्त शक्तियों का आधार हैं।

श्रीदुर्गासप्तशती में उन्हीं परम भगवती की वंदना करते हुए कहा गया है—

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥ ९॥

स्रोत: श्रीदुर्गासप्तशती, अध्याय 11, श्लोक 9

अर्थ: हे समस्त मंगलों में मंगलस्वरूपा, कल्याणमयी, सभी प्रयोजनों को सिद्ध करने वाली, शरण देने वाली त्रिनेत्रधारिणी गौरी नारायणी! आपको नमस्कार है।

नवदुर्गा के संयुक्त चित्र में माँ शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री अपने-अपने पारम्परिक स्वरूपों में एक साथ विराजमान।
नवदुर्गा के नौ दिव्य स्वरूपों का संयुक्त दर्शन — शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक, एक ही परम भगवती की विविध शक्तियों, भावों और लीलाओं का भव्य समेकित चित्रण।

॥ जय माता दी ॥


एक यात्रा का समापन — दूसरी यात्रा का आरम्भ

अब नवदुर्गा श्रृंखला यहाँ पूर्ण होती है।

इन नौ अध्यायों में हमने भगवती के नौ दिव्य स्वरूपों, उनके प्राकट्य, उनकी महिमा और उनसे जुड़े पौराणिक प्रसंगों को मूल शास्त्रों के माध्यम से समझने का प्रयास किया।

मगर हमारी जिज्ञासा अभी पूर्ण नहीं हुई है।

यह यात्रा जारी रहेगी।

अगला पड़ाव — विजयदशमी / दशहरा

— Pumposh | TheWhyLens



 

1 thought on “नवरात्रि विशेष – 9”

  1. कुलदीप जी, आप का बहुत बहुत आभार । माँ सिद्धिदात्री के आशीर्वाद से और आपके अथक प्रयासों से हमें नवदुर्गा के प्रकटीकरण की प्रामाणिक पौराणिक कथाओं का पता चला । बहुत ही विस्तृत, अद्भुत, दिव्य और अलौकिक चित्रण आँखों के सामने अनुभव किया । माँ महामाया, योगमाया, योगनिद्रा, सिद्धयोगिनी, सिद्धिदात्री… माँ के अनेकों रूपों का भव्य व दिव्य विस्तार और संपूर्ण ब्रह्मांड की हर्ता व कर्ता …. ऐसी हमारी बीज शक्ति , सृजन करता को हमारा बारम्बार नमस्कार हो ।
    माँ सिद्धिदात्री का आशीर्वाद हम सब पर हो ।

    ।। जय माता की ।।

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