नवदुर्गा: आठवाँ दर्शन — माँ महागौरी
पार्वती की तपस्या, गौर स्वरूप का प्राकट्य और जगदम्बा की अद्भुत करुणा
लेखक: कुलदीप ठुसू “पम्पोष”
माँ महागौरी की कथा केवल गौर स्वरूप प्राप्त करने की कथा नहीं है। इसमें माता पार्वती की कठोर तपस्या, कौशिकी का प्राकट्य और एक हिंसक व्याघ्र के सोमनन्दी बनने का विलक्षण प्रसंग भी जुड़ा है। शिवपुराण में वर्णित इस दिव्य लीला के पीछे देवताओं का कल्याण और भगवान शिव का एक विशेष उद्देश्य था।
नवरात्रि के आठवें दिन पूजित माँ महागौरी का स्वरूप अत्यंत सौम्य, शांत और दिव्य है। श्वेत वस्त्र धारण किए, श्वेत वृषभ के साथ सुशोभित भगवती के गौर स्वरूप की प्राप्ति का विस्तृत प्रसंग हमें शिवमहापुराण की वायवीयसंहिता में मिलता है।
किन्तु माता पार्वती को दूसरी बार तपस्या क्यों करनी पड़ी? भगवान शिव ने उन्हें ‘काली’ कहकर क्यों सम्बोधित किया? और उनकी तपस्या का सम्बन्ध शुम्भ–निशुम्भ के विनाश से कैसे जुड़ा था?
आइए, मूल पौराणिक ग्रंथों के आधार पर इस दिव्य प्रसंग का दर्शन करते हैं।
देवी कवच में नवदुर्गाओं के नामों का उल्लेख करते हुए कहा गया है—
देवी कवच, श्लोक 4
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥ ४॥
अर्थ: पाँचवाँ स्वरूप स्कन्दमाता, छठा कात्यायनी, सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरूप महागौरी कहलाता है।
किन्तु माता पार्वती को गौरी नाम कैसे प्राप्त हुआ ?
माँ महागौरी की कथा — शिवपुराण में गौरी का प्राकट्य
स्रोत: शिवमहापुराण, वायवीयसंहिता, पूर्वभाग, अध्याय 24–27
भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह सम्पन्न हो चुका था।
विवाह के उपरान्त दोनों मन्दराचल पर्वत पर निवास करने लगे।
शिवपुराण में उस पर्वत की रमणीयता, उसके वनों, नदियों और दिव्य वातावरण का सुंदर वर्णन मिलता है।
वहाँ भगवान शिव और भगवती पार्वती का समय अत्यंत आनंदपूर्वक व्यतीत हो रहा था।
किन्तु इसी अवधि में देवताओं के सामने एक गंभीर संकट उत्पन्न हुआ – शुम्भ और निशुम्भ ।
शुम्भ–निशुम्भ का वरदान और ब्रह्माजी की शिवजी से प्रार्थना
शिवपुराण के अनुसार, शुम्भ और निशुम्भ नामक दो अत्यंत शक्तिशाली दैत्य भाइयों ने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया।
उन्होंने ऐसा वरदान प्राप्त किया कि संसार का कोई भी पुरुष उनका वध न कर सके।
अपने वध के लिए दोनों ने एक अत्यंत असाधारण शर्त भी रखी।
शिवपुराण, वायवीयसंहिता, पूर्वभाग, अध्याय 24, श्लोक 26–27
अयोनिजा तु या कन्या ह्यम्बिकांशसमुद्भवा।
अजातपुंस्पर्शरतिरविलङ्घ्यपराक्रमा॥ २६॥तया तु नौ वधः सङ्ख्ये तस्यां कामाभिभूतयोः।
इति चाभ्यर्थितो ब्रह्मा ताभ्यां प्राह तथास्त्विति॥ २७॥
अर्थ: अम्बिका के अंश से उत्पन्न, सामान्य गर्भ से जन्म न लेने वाली, पुरुष-संसर्ग तथा रति से रहित और अदम्य पराक्रम वाली कन्या के प्रति कामभाव से अभिभूत होने पर युद्ध में उसी के हाथों हमारा वध हो। दोनों दैत्यों की इस प्रार्थना पर ब्रह्माजी ने ‘तथास्तु’ कह दिया।
वरदान प्राप्त करके दोनों दैत्यों ने देवताओं को पराजित कर दिया और स्वर्ग पर अधिकार कर लिया।
उनके अत्याचारों से यज्ञ तथा वैदिक अनुष्ठान बाधित होने लगे।
ब्रह्माजी जानते थे कि शुम्भ–निशुम्भ के विनाश के लिए भगवती अम्बिका के अंश से ऐसी दिव्य शक्ति का प्राकट्य आवश्यक है, जो उनके वरदान की सभी शर्तों को पूरा करती हो।
इसी उद्देश्य से वे भगवान शिव के पास पहुँचे।
शिवपुराण, अध्याय 24, श्लोक 29–30
तयोर्वधाय देवेशं ब्रह्माभ्यर्थितवान्पुनः।
विनिन्द्यापि रहस्यम्बां क्रोधयित्वा यथा तथा॥ २९॥तद्वर्णकोशजां शक्तिमकामां कन्यकात्मिकाम्।
निशुम्भशुम्भयोर्हन्त्रीं सुरेभ्यो दातुमर्हसि॥ ३०॥
अर्थ: ब्रह्माजी ने दोनों दैत्यों के वध के लिए भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे एकांत में, आवश्यकता पड़ने पर अप्रिय वचन कहकर भी, किसी प्रकार भगवती को अप्रसन्न करें, ताकि उनके शरीर के वर्ण-आवरण से ऐसी कामभावना से रहित कन्यारूपा शक्ति प्रकट हो, जो शुम्भ–निशुम्भ का संहार कर सके।
भगवान शिव ने ब्रह्माजी की प्रार्थना स्वीकार कर ली।
और यहीं से आरम्भ हुई भगवती पार्वती के गौरी स्वरूप के प्राकट्य की दिव्य लीला।
भगवान शिव ने पार्वती को ‘काली’ क्यों कहा ?
ब्रह्माजी के निवेदन पर भगवान शिव ने एकांत में माता पार्वती को मुस्कुराते हुए ‘काली’ कहकर सम्बोधित किया।
शिवपुराण, अध्याय 24, श्लोक 31
एवमभ्यर्थितो धात्रा भगवान्नीललोहितः।
कालीत्याह रहस्यं वां निन्दयन्निव सस्मितः॥ ३१॥
अर्थ: ब्रह्माजी द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर भगवान नीललोहित शिव ने एकांत में मुस्कुराते हुए, मानो निन्दा करते हुए, देवी को ‘काली’ कहा।
यहाँ श्लोक में प्रयुक्त ‘निन्दयन्निव’ शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है। इसका अर्थ है—मानो निन्दा करते हुए।
शिवपुराण पहले ही बता चुका है कि भगवान शिव ने ब्रह्माजी की प्रार्थना पर यह सम्बोधन किया था।
अतः इसका उद्देश्य माता पार्वती के श्याम वर्ण में कोई कमी बताना नहीं, बल्कि देवकल्याण के लिए एक विशेष परिस्थिति उत्पन्न करना था।
किन्तु भगवान शिव के इन शब्दों से भगवती पार्वती अप्रसन्न हो गईं।
उन्होंने महादेव से कहा कि यदि उनका श्याम वर्ण उन्हें प्रिय नहीं है, तो वे तपस्या करके दूसरा वर्ण प्राप्त करेंगी।
और भगवती ने तपस्या के लिए प्रस्थान करने का संकल्प ले लिया।
माता पार्वती की अप्रसन्नता देखकर भगवान शिव ने उन्हें अत्यंत स्नेहपूर्वक समझाया।
शिवपुराण के अनुसार, उन्होंने भवानी के चरणों में प्रणाम करके कहा—
शिवपुराण, अध्याय 24, श्लोक 41–42
अजानती च क्रीडोक्तिं प्रिये किं कुपितासि मे।
रतिः कुतो वा जायेत त्वत्तश्चेदरतिर्मम॥ ४१॥माता त्वमस्य जगतः पिताहमधिपस्तथा।
कथं तदुपपद्येत त्वत्तो नाभिरतिर्मम॥ ४२॥
अर्थ: हे प्रिये! मेरे परिहास को न समझकर तुम मुझसे क्यों रुष्ट हो गईं? यदि मुझे तुमसे अनुराग न होता, तो हमारा पारस्परिक प्रेम कैसे सम्भव होता? तुम इस सम्पूर्ण जगत की माता हो और मैं इसका पिता हूँ। फिर यह कैसे सम्भव है कि मेरा तुम्हारे प्रति प्रेम न हो ?
इसके बाद भगवान शिव ने उस परिहास के पीछे छिपे वास्तविक उद्देश्य को भी स्पष्ट किया।
शिवपुराण, अध्याय 24, श्लोक 46
विहारोऽप्यावयोरस्य जगतस्त्राणकारणात्।
ततस्तदर्थं त्वय्यद्य क्रीडोक्तिं कृतवानहम्॥ ४६॥
अर्थ: हमारा यह विहार भी संसार की रक्षा के निमित्त है। उसी प्रयोजन से आज मैंने तुमसे परिहास में ये वचन कहे हैं।
भगवान शिव के इन वचनों से स्पष्ट होता है कि यह प्रसंग माता पार्वती के श्याम वर्ण के प्रति किसी वास्तविक अप्रसन्नता से उत्पन्न नहीं हुआ था।
यह जगत की रक्षा के लिए भगवान शिव द्वारा रची गई एक दिव्य लीला थी।
भगवती पार्वती स्वयं आदिशक्ति हैं। उनका श्याम और गौर, दोनों ही स्वरूप समान रूप से दिव्य तथा वन्दनीय हैं।
किन्तु माता पार्वती ने अपना संकल्प नहीं बदला।
भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि वे चाहें तो अपनी इच्छा से ही गौर वर्ण प्राप्त कर सकती हैं। इसके लिए कठोर तपस्या करने की आवश्यकता नहीं है।
परन्तु भगवती ने तपस्या का मार्ग ही चुना।
शिवपुराण, अध्याय 24, श्लोक 53
नेच्छामि भवतो वर्णं स्वयं वा कर्तुमन्यथा।
ब्रह्माणं तपसाराध्य क्षिप्रं गौरी भवाम्यहम्॥ ५३॥
अर्थ: देवी ने कहा—मैं न तो आपकी इच्छा से और न अपनी इच्छा मात्र से अपना वर्ण बदलना चाहती हूँ। मैं तपस्या द्वारा ब्रह्माजी की आराधना करके गौरी बनूँगी।
भगवान शिव जानते थे कि भगवती के इस संकल्प से देवताओं का एक महान कार्य सिद्ध होने वाला है।
इसलिए उन्होंने माता पार्वती को तपस्या के लिए जाने से नहीं रोका।

भगवती की दूसरी तपस्या
स्रोत: शिवपुराण, अध्याय 25, श्लोक 1–7
भगवान शिव की अनुमति प्राप्त करके माता पार्वती हिमालय की ओर चल पड़ीं।
वहाँ उन्होंने अपने पिता हिमवान और माता मेना से भेंट की। उन्हें अपना संकल्प बताया और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।
इसके बाद देवी उसी तपोवन में पहुँचीं जहाँ उन्होंने पूर्वकाल में भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी।
उन्होंने अपने आभूषण उतार दिए और तपस्विनी का पवित्र वेश धारण कर लिया।
शिवपुराण, अध्याय 25, श्लोक 4–6
पुनस्तपोवनं गत्वा भूषणानि विसृज्य च।
स्नात्वा तपस्विनो वेषं कृत्वा परमपावनम्॥ ४॥संकल्प्य च महातीव्रं तपः परमदुश्चरम्।
सदा मनसि सन्धाय भर्तुश्चरणपङ्कजम्॥ ५॥तमेव क्षणिके लिङ्गे ध्यात्वा बाह्यविधानतः।
त्रिसन्ध्यमभ्यर्चयन्ती वन्यैः पुष्पैः फलादिभिः॥ ६॥
अर्थ: देवी पुनः तपोवन में पहुँचीं। उन्होंने अपने आभूषण त्यागकर स्नान किया और तपस्विनी का पवित्र वेश धारण किया। अत्यंत कठिन तपस्या का संकल्प लेकर वे निरंतर भगवान शिव के चरणकमलों का ध्यान करती रहीं। वे प्रतिदिन तीनों संध्याओं में वन के पुष्पों और फलों से शिवलिंग की आराधना करती थीं।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर है।
माता पार्वती की पहली तपस्या भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए थी, जिसका वर्णन हम ब्रह्मचारिणी स्वरूप के प्रसंग में पढ़ चुके हैं।
किन्तु अब भगवान शिव उनके पति थे।
इस दूसरी तपस्या का प्रयोजन गौर स्वरूप की प्राप्ति था, जिसके साथ देवताओं की रक्षा के लिए एक दिव्य शक्ति का प्राकट्य भी जुड़ा हुआ था।
समय बीतता गया और भगवती की तपस्या निरंतर कठोर होती गई।
इसी बीच एक अत्यंत विचित्र घटना घटी।
तपोवन में एक हिंसक व्याघ्र का आगमन
स्रोत: शिवपुराण, अध्याय 25, श्लोक 8–17
एक दिन माता पार्वती तपस्या में लीन थीं। उसी समय वन से एक अत्यंत हिंसक व्याघ्र वहाँ पहुँचा।
वह भगवती को अपना आहार बनाना चाहता था।
किन्तु जैसे ही वह उनके निकट पहुँचा, उसका शरीर स्तब्ध हो गया। वह आगे बढ़ नहीं सका।
भूख से व्याकुल वह व्याघ्र माता के सामने खड़ा रहा।
उसकी दृष्टि निरंतर देवी पर टिकी हुई थी। उसे प्रतीक्षा थी कि कब वह उन्हें अपना आहार बना सकेगा।
किन्तु भगवती पार्वती ने उस व्याघ्र की ओर किसी साधारण मनुष्य की भाँति नहीं देखा।
माता के हृदय में उसके लिए करुणा उत्पन्न हुई।
उन्होंने उसे अपना उपासक समझा, जो तपोवन में रहकर दूसरे हिंसक प्राणियों से उनकी रक्षा कर रहा था।
शिवपुराण, अध्याय 25, श्लोक 13–14
देव्याश्च हृदये नित्यं ममैवायमुपासकः।
त्राता च दुष्टसत्त्वेभ्य इति प्रववृते कृपा॥ १३॥तस्या एव कृपायोगात्सद्योनष्टमलत्रयः।
बभूव सहसा व्याघ्रो देवीं च बुबुधे तदा॥ १४॥
अर्थ: देवी के हृदय में उस व्याघ्र के प्रति यह करुणाभाव उत्पन्न हुआ कि यह मेरा उपासक है और दुष्ट जीवों से मेरी रक्षा करता है। माता की कृपा से उस व्याघ्र के तीनों मल नष्ट हो गए और उसे भगवती का ज्ञान प्राप्त हुआ।
माता की कृपा होते ही उस व्याघ्र की भूख और उसकी हिंसक प्रवृत्ति शांत हो गई।
अब वह भगवती का भक्त बन गया।
वह तपोवन में रहकर माता की सेवा करने लगा और दूसरे हिंसक जीवों को उस स्थान से दूर रखने लगा।
जिस व्याघ्र ने हिंसा की भावना से भगवती के निकट आने का प्रयास किया था, उसी के भीतर माता की कृपा से भक्ति का उदय हो गया।
आगे चलकर इसी व्याघ्र को भगवान शिव के गणों में स्थान प्राप्त हुआ।

कौशिकी का प्राकट्य और माँ पार्वती का गौरी स्वरूप
स्रोत: शिवपुराण, अध्याय 25, श्लोक 18–42
इधर शुम्भ–निशुम्भ के अत्याचार निरंतर बढ़ रहे थे।
देवताओं ने पुनः ब्रह्माजी से सहायता की प्रार्थना की।
ब्रह्माजी को भगवान शिव के साथ हुई पूर्व चर्चा का स्मरण था।
वे जानते थे कि भगवती की तपस्या के माध्यम से अब देवताओं की रक्षा का उपाय प्रकट होने वाला है।
वे स्वयं माता पार्वती के तपोवन में पहुँचे।
वहाँ उन्होंने भगवती को कठोर तपस्या में लीन देखा।
ब्रह्माजी ने जगन्माता को प्रणाम किया और उनसे पूछा कि वे किस उद्देश्य से इतनी कठिन तपस्या कर रही हैं, जबकि समस्त तपस्याओं के फल उन्हीं की शक्ति के अधीन हैं।
भगवती ने ब्रह्माजी के समक्ष गौर स्वरूप प्राप्त करने की अपनी इच्छा प्रकट की।
ब्रह्माजी ने देवी को स्मरण कराया कि वे स्वयं जगन्माता हैं। उनकी इच्छा मात्र से सब कुछ सम्भव है।
फिर उन्होंने शुम्भ–निशुम्भ के अत्याचारों का उल्लेख करते हुए देवताओं के कल्याण के लिए भगवती से उस दिव्य शक्ति को प्रकट करने की प्रार्थना की, जिसके हाथों दोनों दैत्यों का विनाश होना निर्धारित था।
ब्रह्माजी की प्रार्थना स्वीकार करके माता पार्वती ने अपने शरीर का श्यामवर्णीय बाहरी आवरण त्याग दिया।
और उसी क्षण भगवती गौरवर्णा हो गईं।
शिवपुराण, अध्याय 25, श्लोक 38–39
ब्राह्मणाभ्यर्थिता चैव देवी गिरिवरात्मजा।
त्वक्कोशं सहसोत्सृज्य गौरी सा समजायत॥ ३८॥सा त्वक्कोशात्मनोत्सृष्टा कौशिकी नाम नामतः।
काली कालाम्बुदप्रख्या कन्यका समपद्यत॥ ३९॥
अर्थ: ब्रह्माजी की प्रार्थना पर पर्वतराज हिमालय की पुत्री ने अपने शरीर का बाहरी आवरण त्याग दिया और वे गौरी हो गईं। उस त्यागे हुए आवरण से वर्षाकाल के मेघों के समान श्याम वर्ण वाली एक दिव्य कन्या प्रकट हुई, जो कौशिकी नाम से प्रसिद्ध हुई।
यह भगवती की दिव्य लीला का अत्यंत महत्त्वपूर्ण क्षण था।
एक ओर माता पार्वती ने गौर स्वरूप धारण किया, दूसरी ओर उनके श्यामवर्णीय शरीरकोश से भगवती कौशिकी का प्राकट्य हुआ।
यही कौशिकी वह अयोनिजा शक्ति थीं जिनके प्राकट्य के लिए ब्रह्माजी ने भगवान शिव से प्रार्थना की थी।

भगवती कौशिकी का दिव्य स्वरूप
शिवपुराण के अनुसार कौशिकी का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी था।
शिवपुराण, अध्याय 25, श्लोक 40–41
सा तु मायात्मिका शक्तिर्योगनिद्रा च वैष्णवी।
शङ्खचक्रत्रिशूलादिसायुधाष्टमहाभुजा॥ ४०॥सौम्या घोरा च मिश्रा च त्रिनेत्रा चन्द्रशेखरा।
अजातपुंस्पर्शरतिरधृष्या चातिसुन्दरी॥ ४१॥
अर्थ: वे मायामयी शक्ति, वैष्णवी योगनिद्रा स्वरूपा, शंख, चक्र और त्रिशूल आदि आयुधों से सुशोभित आठ विशाल भुजाओं वाली थीं। वे सौम्य और उग्र दोनों प्रकार के स्वरूपों से सम्पन्न, तीन नेत्रों वाली, मस्तक पर चन्द्रमा धारण करने वाली, पुरुष-संसर्ग से रहित, अपराजेय तथा अत्यंत मनोहर थीं।
ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर उन्हें एक शक्तिशाली सिंह वाहन के रूप में प्रदान किया।
इसके बाद कौशिकी ने अपनी जननी गौरी को प्रणाम किया और शुम्भ–निशुम्भ के संहार के लिए विंध्याचल की ओर प्रस्थान किया।
कौशिकी के प्राकट्य का उद्देश्य पूर्ण हुआ
दुर्गा सप्तशती में वर्णन है कि जब शुम्भ ने देवी के अनुपम सौन्दर्य के विषय में सुना, तो उसने उन्हें अपनी पत्नी बनाने के लिए दूत भेजा।
भगवती ने स्पष्ट कर दिया कि जो उन्हें युद्ध में पराजित करेगा, वही उनका पति बन सकेगा।
वामनपुराण के युद्ध-वर्णन में निशुम्भ के स्वयं देवी पर मोहित होने और उन्हें विवाह का प्रस्ताव देने का भी उल्लेख है।
इस प्रकार दोनों दैत्यों की कामभावना से जुड़ी वह परिस्थिति उत्पन्न हुई, जिसका उल्लेख उनके वरदान में था।
अंततः भगवती ने शुम्भ और निशुम्भ का संहार किया।
दुर्गा सप्तशती में इस युद्ध के दौरान देवी को चण्डिका और अम्बिका जैसे नामों से सम्बोधित किया गया है।
इस प्रकार माता पार्वती के गौरी स्वरूप के प्राकट्य के साथ देवताओं की रक्षा का वह प्रयोजन भी सिद्ध हुआ, जिसके लिए कौशिकी का जन्म हुआ था।

व्याघ्र का उद्धार — सोमनन्दी बनने की कथा
स्रोत: शिवपुराण, अध्याय 26–27
कौशिकी के प्राकट्य के बाद माता पार्वती ने ब्रह्माजी से अपने तपोवन में रहने वाले व्याघ्र के विषय में निवेदन किया।
उन्होंने कहा कि वह व्याघ्र उनकी शरण में है और तपोवन की रक्षा करता रहा है। इसलिए वे उसे भी अपने साथ ले जाना चाहती हैं।
ब्रह्माजी ने बताया कि वह कोई साधारण व्याघ्र नहीं, बल्कि व्याघ्र का रूप धारण करने वाला एक दुष्ट निशाचर था।
उसने पूर्वकाल में अनेक पापकर्म किए थे।
किन्तु माता पार्वती ने उसके पूर्वकर्मों के कारण उसे त्यागना स्वीकार नहीं किया।
शिवपुराण, अध्याय 26, श्लोक 11
यदुक्तं भवता सर्वं तथ्यमस्त्वयमीदृशः।
तथापि मां प्रपन्नोऽभून्न त्याज्यो मामुपाश्रितः॥ ११॥
अर्थ: देवी ने कहा—आपने जो कुछ कहा, वह सत्य हो सकता है। किन्तु यह मेरी शरण में आ चुका है। जो मेरी शरण में आ गया हो, उसे मैं त्याग नहीं सकती।
भगवती के इन वचनों में उनकी असीम करुणा प्रकट होती है।
जिस प्राणी का पूर्व जीवन हिंसा और पापकर्मों से भरा था, उसके लिए भी माता ने अपनी शरण के द्वार बंद नहीं किए।
ब्रह्माजी ने देवी की कृपा को स्वीकार किया।
इसके बाद भगवती उस व्याघ्र को अपने साथ लेकर मन्दराचल लौट आईं।
भगवान शिव ने व्याघ्र को ‘सोमनन्दी’ नाम दिया
भगवान शिव ने माता गौरी का अत्यंत स्नेहपूर्वक स्वागत किया।
भगवती ने महादेव को उस व्याघ्र के विषय में बताया और इच्छा प्रकट की कि उसे उनके अन्तःपुर के द्वार पर रक्षक के रूप में नियुक्त किया जाए।
भगवान शिव ने माता की प्रार्थना स्वीकार कर ली।
तत्क्षण वह व्याघ्र एक दिव्य गण के रूप में प्रतिष्ठित हो गया।
शिवपुराण, अध्याय 27, श्लोक 35
यस्मात्सोमो महादेवो नन्दी चानेन नन्दितः।
सोमनन्दीति विख्यातस्तस्मादेष समाख्यया॥ ३५॥
अर्थ: क्योंकि उसने भगवान महादेव और नन्दी को प्रसन्न किया था, इसलिए वह ‘सोमनन्दी’ नाम से प्रसिद्ध हुआ।
यह प्रसंग माँ गौरी की महिमा का अत्यंत सुंदर परिचय देता है।
भगवती की कठोर तपस्या, उनका दिव्य तेज और उनके स्वरूप का प्राकट्य तो इस कथा के प्रमुख अंग हैं ही, किन्तु एक हिंसक प्राणी पर उनकी करुणा इस प्रसंग को और भी विशिष्ट बनाती है।

वामनपुराण में गौरी प्राकट्य का वर्णन
स्रोत: वामनपुराण, अध्याय 54, श्लोक 6–29
शिवपुराण के अतिरिक्त वामनपुराण में भी माता पार्वती के गौर स्वरूप की प्राप्ति का एक विस्तृत प्रसंग मिलता है।
इस वर्णन में भगवान शिव द्वारा परिहास में देवी को ‘काली’ कहे जाने के बाद माता पार्वती हिमालय जाकर तपस्या आरम्भ करती हैं।
उनके साथ जया, विजया, जयन्ती और अपराजिता नामक चार सखियाँ भी उपस्थित थीं।
एक हिंसक व्याघ्र के आगमन का प्रसंग यहाँ भी मिलता है।
वामनपुराण के अनुसार, माता पार्वती ने एक पैर पर खड़े होकर कठोर तपस्या की। उन्होंने सौ वर्षों तक ब्रह्माजी की आराधना की।
जब ब्रह्माजी प्रसन्न होकर प्रकट हुए, तो माता ने पहले अपने समीप उपस्थित व्याघ्र के कल्याण का वरदान माँगा।
ब्रह्माजी ने उस व्याघ्र को शिवभक्ति, गणों का पद, अजेयता तथा धार्मिक प्रवृत्ति का वरदान दिया।
इसके बाद भगवती ने स्वयं अपने लिए गौर वर्ण प्राप्त करने का वर माँगा।
वामनपुराण, अध्याय 54, श्लोक 22–24
ततो वरं गिरिसुता प्राह देवी पितामहम्।
वरः प्रदीयतां मह्यं वर्णं कनकसंनिभम्॥ २२॥तथेत्युक्त्वा गतो ब्रह्मा पार्वती चाभवत् ततः।
कोशं कृष्णं परित्यज्य पद्मकिञ्जल्कसन्निभा॥ २३॥तस्मात्कोशाच्च संजाता भूयः कात्यायनी मुने।
तामभ्येत्य सहस्राक्षः प्रतिजग्राह दक्षिणाम्।
प्रोवाच गिरिजां देवो वाक्यं स्वार्थाय वासवः॥ २४॥
अर्थ: पर्वतराज की पुत्री ने ब्रह्माजी से स्वर्ण के समान कान्ति वाला वर्ण प्राप्त करने का वर माँगा। ब्रह्माजी ने ‘तथास्तु’ कहा। इसके बाद पार्वती ने अपना कृष्णवर्णीय आवरण त्याग दिया और वे कमल के केसर के समान कान्तिमयी हो गईं। उस त्यागे हुए आवरण से कात्यायनी का प्राकट्य हुआ।
इस वर्णन में एक और विशेष प्रसंग मिलता है।
जब इन्द्र ने उस दिव्य शक्ति का दर्शन किया, तो उन्होंने भगवती पार्वती से उसे अपनी बहन के रूप में स्वीकार करने की प्रार्थना की।
वामनपुराण, अध्याय 54, श्लोक 25
इयं प्रदीयतां मह्यं भगिनी मेऽस्तु कौशिकी।
त्वत्कोशसम्भवा चेयं कौशिकी कौशिकोऽप्यहम्॥ २५॥
अर्थ: इन्द्र ने कहा—इस देवी को मुझे प्रदान कीजिए। यह कौशिकी मेरी बहन हो। आपके शरीरकोश से उत्पन्न होने के कारण यह कौशिकी हैं और मैं भी कौशिक कहलाता हूँ।
इन्द्र देवी को विंध्याचल ले गए और वहाँ उन्हें स्थापित किया।
वामनपुराण के अनुसार, इन्द्र ने उन्हें सिंह वाहन के रूप में प्रदान किया और वे विंध्यवासिनी नाम से प्रसिद्ध हुईं।
इस प्रकार वामनपुराण में भगवती पार्वती के गौरी स्वरूप के साथ कौशिकी, कात्यायनी और विंध्यवासिनी से जुड़ा प्रसंग भी मिलता है।
स्कन्दपुराण में गौरी-तपोवन की एक अन्य कथा
स्रोत: स्कन्दपुराण, प्रभासखण्ड, प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य, अध्याय 68
स्कन्दपुराण में भगवती के गौर स्वरूप की प्राप्ति से जुड़ा एक अन्य वर्णन मिलता है।
इस अध्याय में भगवान शिव स्वयं देवी को गौरी-तपोवन का माहात्म्य बताते हैं।
इस वर्णन के अनुसार, भगवान शिव द्वारा ‘काली’ कहकर सम्बोधित किए जाने पर देवी ने तपस्या का निश्चय किया।
किन्तु यहाँ तपस्या का स्थान हिमालय के स्थान पर प्रभासक्षेत्र बताया गया है।
भगवती अपनी सखियों के साथ प्रभासक्षेत्र पहुँचीं।
वहाँ उन्होंने भगवान शिव का एक लिंग स्थापित किया और उसकी आराधना आरम्भ की।
उनकी तपस्या अत्यंत कठोर थी।
स्कन्दपुराण, प्रभासखण्ड, अध्याय 68, श्लोक 9–10
ततो लिङ्गसमीपस्था एकपादे स्थिता सती।
लिङ्गमाराधयन्ती सा चकार सुमहत्तपः॥ ९॥पञ्चाग्निसाधिका देवी ग्रीष्मे जाप्यपरायणा।
वर्षास्वाकाशशयना हेमन्ते सलिलाशया॥ १०॥
अर्थ: देवी शिवलिंग के समीप एक पैर पर खड़ी होकर उसकी आराधना करने लगीं। ग्रीष्म ऋतु में वे पंचाग्नि के मध्य जप करती थीं, वर्षा ऋतु में खुले आकाश के नीचे रहती थीं और शीतकाल में जल के भीतर रहकर तपस्या करती थीं।
देवी की तपस्या निरंतर बढ़ती गई।
स्कन्दपुराण के अनुसार, जैसे-जैसे उनकी तपस्या बढ़ती गई, वैसे-वैसे उनके शरीर की गौर कान्ति भी प्रकट होती गई।
स्कन्दपुराण, अध्याय 68, श्लोक 11–12
यथा यथा तपो वृद्धिं याति तस्या महाप्रभा।
तथातथा शरीरस्य गौरत्वं प्रतिपद्यते॥ ११॥कालेन महता गौरी सर्वाङ्गेणाथ साऽभवत्।
ततो विहस्य भगवानुवाच शशिशेखरः॥ १२॥
अर्थ: जैसे-जैसे भगवती की महान तपस्या बढ़ती गई, वैसे-वैसे उनके शरीर में गौर वर्ण प्रकट होता गया। बहुत समय बीतने पर वे सम्पूर्ण रूप से गौरी हो गईं। तब मस्तक पर चन्द्रमा धारण करने वाले भगवान शिव ने मुस्कुराकर उनसे कहा।
भगवान शिव ने उन्हें ‘गौरी’ कहकर सम्बोधित किया और मनोवांछित वरदान माँगने को कहा।
भगवती ने उस स्थान पर अपनी उपासना करने वाले भक्तों के कल्याण का वरदान माँगा।
उन्होंने यह भी इच्छा प्रकट की कि उनके द्वारा स्थापित शिवलिंग गौरीश्वर नाम से प्रसिद्ध हो।
स्कन्दपुराण, अध्याय 68, श्लोक 17
गौरीश्वरेति विख्यातं नाम तस्य भवेत्प्रभो।
तथेत्यहं प्रतिज्ञाय तत्र स्थाने स्थितोऽभवम्॥ १७॥
अर्थ: देवी ने कहा—हे प्रभो! इस शिवलिंग का नाम गौरीश्वर प्रसिद्ध हो। भगवान शिव ने इस प्रार्थना को स्वीकार किया और उस स्थान पर प्रतिष्ठित हुए।
इस प्रकार स्कन्दपुराण की यह कथा भगवती की तपस्या के साथ गौरीश्वर तीर्थ की महिमा को भी प्रकट करती है।
देवीभागवत और दुर्गा सप्तशती में कौशिकी का प्राकट्य
स्रोत: देवीभागवत महापुराण, पंचम स्कन्ध, अध्याय 23 तथा दुर्गा सप्तशती, अध्याय 5
माता पार्वती के शरीर से कौशिकी के प्राकट्य का उल्लेख देवीभागवत महापुराण तथा दुर्गा सप्तशती में भी मिलता है।
किन्तु यहाँ एक विशेष अंतर है।
शिवपुराण में श्यामवर्णीय आवरण के त्याग से पार्वती का गौरी स्वरूप प्रकट होता है।
जबकि देवीभागवत तथा दुर्गा सप्तशती में कौशिकी के प्रकट होने के बाद पार्वती के कृष्णवर्णा होकर कालिका कहलाने का वर्णन मिलता है।
देवीभागवत महापुराण, पंचम स्कन्ध, अध्याय 23, श्लोक 2–4
पार्वत्यास्तु शरीराद्वै निःसृता चाम्बिका यदा।
कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु पठ्यते॥ २॥निःसृतायां तु तस्यां सा पार्वती तनुव्यत्ययात्।
कृष्णरूपाथ सञ्जाता कालिका सा प्रकीर्तिता॥ ३॥मषीवर्णा महाघोरा दैत्यानां भयवर्धिनी।
कालरात्रीति सा प्रोक्ता सर्वकामफलप्रदा॥ ४॥
अर्थ: जब पार्वती के शरीर से अम्बिका का प्राकट्य हुआ, तब वे कौशिकी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। उनके निकलने पर पार्वती कृष्णवर्णा हो गईं और कालिका कहलायीं। स्याही के समान कृष्ण वर्ण वाली, दैत्यों में भय उत्पन्न करने वाली उस देवी को कालरात्रि कहा गया है। वे समस्त कामनाओं का फल प्रदान करने वाली हैं।
दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय में भी यही क्रम मिलता है।
वहाँ देवता हिमालय पर भगवती की स्तुति कर रहे थे। उसी समय पार्वती गंगा में स्नान करने के लिए पहुँचीं।
उनके शरीर से अम्बिका का प्राकट्य हुआ, जो कौशिकी कहलायीं।
दुर्गा सप्तशती, अध्याय 5, श्लोक 87–88
शरीरकोशाद्यत्तस्याः पार्वत्या निःसृताम्बिका।
कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु गीयते॥ ८७॥तस्यां विनिर्गतायां तु कृष्णाभूत्सापि पार्वती।
कालिकेति समाख्याता हिमाचलकृताश्रया॥ ८८॥
अर्थ: पार्वती के शरीरकोश से प्रकट होने के कारण अम्बिका समस्त लोकों में कौशिकी कहलायीं। उनके निकलने के बाद पार्वती कृष्णवर्णा हो गईं और हिमालय में निवास करने के कारण कालिका नाम से प्रसिद्ध हुईं।
इस प्रकार विभिन्न पुराणों में भगवती के शरीर से कौशिकी के प्राकट्य का उल्लेख मिलता है, किन्तु स्वरूप-परिवर्तन का क्रम एक समान नहीं है।
इन सभी वर्णनों में भगवती आदिशक्ति की ही विभिन्न दिव्य लीलाओं का दर्शन होता है।
माँ महागौरी का दिव्य स्वरूप
नवदुर्गा स्तोत्र में माँ महागौरी के स्वरूप की अत्यंत सुंदर स्तुति मिलती है।
प्रचलित नवदुर्गा स्तोत्र — महागौरी स्तुति
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
अर्थ: श्वेत वृषभ पर विराजमान, श्वेत वस्त्र धारण करने वाली, परम पवित्र तथा भगवान महादेव को आनंद प्रदान करने वाली माँ महागौरी हमें शुभ फल प्रदान करें।
माता महागौरी का स्वरूप सौम्य, शांत और अत्यंत मनोहर है।
उनका वाहन श्वेत वृषभ है। वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं और उनका शरीर निर्मल कान्ति से प्रकाशित है।
प्रचलित नवदुर्गा स्वरूप-परंपरा में माँ महागौरी चार भुजाओं वाली मानी जाती हैं।
उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू सुशोभित है। शेष दो हाथ अभय तथा वरद मुद्रा में हैं।
उनके स्वरूप में भगवान शिव से जुड़ी अनेक विशेषताएँ भी दिखाई देती हैं—वृषभ, त्रिशूल और डमरू।
महाष्टमी पर माँ महागौरी की आराधना
नवरात्रि की अष्टमी तिथि माँ महागौरी की आराधना को समर्पित है।
इस दिन भक्त भगवती के सौम्य और कल्याणकारी स्वरूप का ध्यान करते हैं।
नवरात्रि के अवसर पर कन्या-पूजन की भी विशेष परंपरा है।
देवीभागवत महापुराण के तृतीय स्कन्ध, अध्याय 26 में कुमारिका-पूजन की विधि का विस्तृत वर्णन मिलता है।
वहाँ विभिन्न आयु की कन्याओं के लिए अलग-अलग पूजन-संज्ञाएँ बताई गई हैं।
माता महागौरी की आराधना में उनके चरणों में श्रद्धा और भक्ति समर्पित की जाती है।
माँ महागौरी का नाम-मंत्र
ॐ देवी महागौर्यै नमः॥

मीमांसा — गौर और श्याम, एक ही आदिशक्ति के दिव्य स्वरूप
माँ महागौरी की पौराणिक कथा में भगवती के अनेक गुणों का दर्शन होता है।
शिवपुराण में वर्णित उनकी कठोर तपस्या, अपने संकल्प के प्रति दृढ़ता, देवताओं के कल्याण के लिए शक्ति का प्राकट्य और एक हिंसक व्याघ्र पर भी उनकी असीम करुणा—ये सभी उनके दिव्य चरित्र के विशेष गुण हैं।
इस कथा में गौर और श्याम, दोनों स्वरूप एक ही जगदम्बा के हैं।
कालिकापुराण में भगवती के अनेक स्वरूपों के विषय में कहा गया है—
कालिकापुराण, अध्याय 58, श्लोक 51
तासामेवाङ्गरूपाणि वक्तव्यानि मया तव।
एकैव तु महामाया कार्यार्थं भिन्नतां गता॥ ५१॥
अर्थ: वे सभी देवी के ही अंगरूप हैं। एक ही महामाया विभिन्न कार्यों की सिद्धि के लिए अनेक रूप धारण करती हैं।
इसलिए माता का गौर स्वरूप और उनका श्याम स्वरूप किसी श्रेष्ठता अथवा हीनता का विषय नहीं है।
दोनों ही उसी सनातन आदिशक्ति के दिव्य और वन्दनीय स्वरूप हैं।
माँ महागौरी की कथा हमें केवल उनके गौर वर्ण की प्राप्ति का प्रसंग नहीं सुनाती। यह भगवती के संकल्प, उनकी तपस्या, लोककल्याण और उनकी अनंत करुणा का भी दर्शन कराती है।
जिन माता की कृपा से एक हिंसक व्याघ्र भी सोमनन्दी बनकर शिवगणों में स्थान प्राप्त कर सकता है, उनकी शरण में आए भक्त के लिए भला क्या असम्भव है!
माँ महागौरी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।
ॐ देवी महागौर्यै नमः॥
नवरात्रि विशेष की अगली और अंतिम कड़ी — नवम दर्शन: माँ सिद्धिदात्री।







बहुत अच्छा लगा पढ़कर । माँ महागौरी के दिव्य स्वरूप के दर्शनों के साथ साथ उन्के करुणामय, भक्तवत्सल , दृढ़संकल्प और सौम्य स्वभाव का चित्रण भी अनुभव हुआ । यह आप के लेखन शैली का प्रभाव लग रहा है। आनंद का अनुभव हो रहा है ।
माँ सबका कल्याण करें।
जय माँ महागौरी
आपकी इतनी आत्मीय प्रतिक्रिया पढ़कर मन प्रसन्न हो गया। माँ महागौरी के दिव्य गुणों और उनकी करुणा को लेख के माध्यम से आप अनुभव कर सकीं, यही मेरे लेखन की सार्थकता है। आपके स्नेह और प्रोत्साहन के लिए हृदय से आभार।
माँ महागौरी की कृपा हम सभी पर बनी रहे।
जय माँ महागौरी!