नवरात्रि विशेष – 7

नवदुर्गा: सातवाँ दर्शन — माँ कालरात्रि

प्राकट्य की अनेक कथाएँ, दिव्य स्वरूप और महाकाली का रहस्य

लेखक:  कुलदीप ठुसू “पम्पोष”


पार्वती, काली, कालिका, कौशिकी, चण्डी और महाकाली का संबंध; 

रुरु असुर का संहार; और वह विलक्षण शाक्त आख्यान —

जिसमें भगवती काली श्रीकृष्ण तथा भगवान शिव श्रीराधा के रूप में अवतरित होते हैं।

नवदुर्गा के छठे दर्शन में हमने माँ कात्यायनी के प्राकट्य और महिषासुर के संहार से संबंधित उनकी दिव्य महिमा का अध्ययन किया। 

अब सातवें दर्शन में हम भगवती के उस स्वरूप के सम्मुख हैं, जिनका वर्ण स्याही के समान गहरा कृष्ण है।

जिनका रूप अत्यन्त उग्र है, जो दैत्यों के लिए भय का कारण हैं, किन्तु अपने भक्तों की समस्त कामनाएँ पूर्ण करने वाली हैं।

वे हैं—माँ कालरात्रि।

देवीकवच में नवदुर्गा के सातवें स्वरूप के रूप में उनका स्पष्ट उल्लेख मिलता है—

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥

स्रोत: देवीकवच, श्लोक 4

अर्थ: पाँचवाँ स्वरूप स्कन्दमाता, छठा कात्यायनी, सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ महागौरी है।

माँ कालरात्रि के प्राकट्य की कथाएँ हमें विभिन्न पुराणों में मिलती हैं।

इन कथाओं में पार्वती, काली, कालिका, कौशिकी, चण्डी, चामुण्डा और महाकाली जैसे नाम भी सामने आते हैं।

कहीं ये भगवती के नाम हैं, कहीं उनके विशिष्ट स्वरूप और कहीं उनसे प्रकट हुई दिव्य शक्तियाँ।

इनका संबंध समझने के लिए हमें  फिर से नवदुर्गा के पहले दर्शन, माँ शैलपुत्री, की ओर लौटना होगा।


हिमालय की पुत्री काली

हमने नवदुर्गा दर्शन की पहली कड़ी में कालिका पुराण के आधार पर जाना था कि भगवती सती ने हिमालय और मेना के यहाँ पुत्री के रूप में जन्म लिया।

उनका वर्ण श्याम था। पर्वतराज हिमालय ने अपनी पुत्री को काली नाम दिया और वे पार्वती तथा कालिका नामों से भी प्रसिद्ध हुईं।

संदर्भ: कालिका पुराण, अध्याय 42, श्लोक 45–48

इस प्रकार पार्वती और काली का संबंध उनके जन्म से ही स्थापित होता है।

किन्तु भगवती के इसी स्वरूप से जुड़ी एक और अद्भुत घटना श्रीमद्देवीभागवत महापुराण में मिलती है।


पहला प्राकट्य — पार्वती से कौशिकी और कालरात्रि

स्रोत: श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, पंचम स्कन्ध, अध्याय 23

शुम्भ और निशुम्भ नामक दो महाबली असुरों ने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था।

इन्द्र, सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वायु और अन्य देवताओं के अधिकार छिन गए।

असुरों के अत्याचार से व्याकुल देवता हिमालय पहुँचे और भगवती की स्तुति करने लगे।

उसी समय पार्वती वहाँ आईं।

उनके शरीर से एक अत्यन्त तेजस्विनी देवी प्रकट हुईं।

पार्वती के शरीर के कोश से उत्पन्न होने के कारण वे कौशिकी नाम से प्रसिद्ध हुईं।

किन्तु कौशिकी के प्रकट होते ही भगवती पार्वती के स्वरूप में एक अद्भुत परिवर्तन हुआ।

उनका वर्ण अत्यन्त गहरा कृष्ण हो गया।

देवीभागवत में कहा गया है—

निःसृतायां तु तस्यां सा पार्वती तनुव्यत्ययात्।
कृष्णरूपाथ सञ्जाता कालिका सा प्रकीर्तिता॥ ३॥

मषीवर्णा महाघोरा दैत्यानां भयवर्धिनी।
कालरात्रीति सा प्रोक्ता सर्वकामफलप्रदा॥ ४॥

स्रोत: देवीभागवत, पंचम स्कन्ध, अध्याय 23, श्लोक 3–4

अर्थ: कौशिकी के प्रकट होने के बाद पार्वती का स्वरूप कृष्णवर्ण हो गया और वे कालिका नाम से प्रसिद्ध हुईं। स्याही के समान गहरे कृष्णवर्ण वाली, अत्यन्त उग्र तथा दैत्यों में भय उत्पन्न करने वाली वही भगवती कालरात्रि कहलायीं। वे समस्त कामनाओं का फल प्रदान करने वाली हैं।

यहाँ हमें माँ कालरात्रि के प्राकट्य का एक अत्यन्त स्पष्ट पुराणिक वर्णन मिलता है।

पार्वती से कौशिकी प्रकट हुईं और जिसके बाद पार्वती गहन कृष्णवर्णा हुईं और उनका यह स्वरूप कालिका तथा कालरात्रि नाम से प्रसिद्ध हुआ। 

दुर्गासप्तशती में भी कौशिकी के प्रकट होने के पश्चात् पार्वती के कालिका नाम से प्रसिद्ध होने का उल्लेख मिलता है—

तस्यां विनिर्गतायां तु कृष्णाभूत्सापि पार्वती।
कालिकेति समाख्याता हिमाचलकृताश्रया॥

स्रोत: दुर्गासप्तशती, अध्याय 5, श्लोक 88

अर्थ: उस देवी के प्रकट होने पर पार्वती कृष्णवर्णा हो गईं और हिमालय में निवास करने वाली कालिका नाम से प्रसिद्ध हुईं।

इस प्रकार देवीभागवत और दुर्गासप्तशती दोनों में कौशिकी तथा कालिका का संबंध भगवती पार्वती से स्थापित होता है।

हिमालय में देवताओं की स्तुति के बीच श्यामवर्णा माता पार्वती के शरीर से तेजस्विनी देवी कौशिकी का प्राकट्य और पार्वती का गहन कृष्णवर्णा कालरात्रि स्वरूप में परिवर्तन। आसपास देवता हाथ जोड़कर वंदना कर रहे हैं।
माँ कालरात्रि का प्रथम प्राकट्य: भगवती पार्वती से देवी कौशिकी का उद्भव और पार्वती का कालिका एवं कालरात्रि स्वरूप में प्रकट होना।

दूसरा प्राकट्य — शिवपुराण में कौशिकी और काली

स्रोत: शिवपुराण, वायवीय संहिता, पूर्वभाग, अध्याय 25

शिवपुराण में कौशिकी के प्राकट्य का एक अन्य दिव्य वृत्तान्त मिलता है।

देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए ब्रह्माजी भगवती पार्वती के पास पहुँचते हैं और उनसे एक विशेष शक्ति प्रकट करने की प्रार्थना करते हैं।

भगवती उनकी प्रार्थना स्वीकार कर अपने शरीर का कृष्णवर्ण आवरण त्याग देती हैं।

उस आवरण से काले मेघ के समान कृष्णवर्णा एक दिव्य कन्या प्रकट होती है।

ब्राह्मणाऽभ्यर्थिता चैव देवी गिरिवरात्मजा।
त्वक्कोशं सहसोत्सृज्य गौरी सा समजायत॥ ३८॥

सा त्वक्कोशात्मनोत्सृष्टा कौशिकी नाम नामतः।
काली कालाम्बुदप्रख्या कन्यका समपद्यत॥ ३९॥

स्रोत: शिवपुराण, वायवीय संहिता, पूर्वभाग, अध्याय 25, श्लोक 38–39

अर्थ: ब्रह्माजी की प्रार्थना पर पर्वतराज की पुत्री ने अपने शरीर का आवरण त्याग दिया और गौरी स्वरूप में प्रकट हुईं। उस त्यागे हुए आवरण से काले मेघ के समान कृष्णवर्णा कन्या प्रकट हुईं, जो कौशिकी और काली नाम से प्रसिद्ध हुईं।

शिवपुराण के अगले श्लोकों में इस देवी को मायामयी शक्ति, वैष्णवी योगनिद्रा तथा आठ भुजाओं वाली बताया गया है।

उनके हाथों में शंख, चक्र, त्रिशूल आदि आयुधों का उल्लेख मिलता है।

इस प्रकार शिवपुराण में कौशिकी-काली के प्राकट्य का एक अन्य स्वरूप सामने आता है।

दोनों पुराणों में भगवती पार्वती से कौशिकी का प्राकट्य होता है, किन्तु उसके वर्णन की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं।

हिमालय में ब्रह्माजी और देवताओं की उपस्थिति में माता पार्वती अपने शरीर का कृष्णवर्ण आवरण त्यागकर गौरवर्णा स्वरूप धारण करती हुईं। त्यागे गए आवरण से काले मेघ के समान श्यामवर्णा देवी कौशिकी-काली प्रकट होती हुईं।
माँ कालरात्रि का दूसरा प्राकट्य: ब्रह्माजी की प्रार्थना पर भगवती पार्वती का गौरी स्वरूप में प्रकट होना और उनके त्यागे हुए कृष्णवर्ण आवरण से देवी कौशिकी-काली की उत्पत्ति।

तीसरा प्राकट्य — वराह पुराण में माँ कालरात्रि

स्रोत: वराह पुराण, अध्याय 96

माँ कालरात्रि की महिमा का एक और अद्भुत वर्णन वराह पुराण में मिलता है।

इस कथा में भगवान वराह पृथ्वी देवी को भगवती रौद्री के महान पराक्रम का वर्णन करते हैं।

भगवती रौद्री भगवान रुद्र की शक्ति के रूप में वर्णित हैं।

वे नील पर्वत पर पंचाग्नि के मध्य कठोर तपस्या कर रही थीं।

उसी समय रुरु नामक एक महाबली असुर ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया।

ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त रुरु अत्यन्त शक्तिशाली था। उसके साथ असंख्य असुरों की विशाल सेना थी।

देवताओं ने उससे युद्ध किया, किन्तु उसकी प्रचण्ड शक्ति के सामने टिक न सके।

अन्ततः वे नील पर्वत पहुँचे, जहाँ भगवती रौद्री तपस्या कर रही थीं।

देवताओं ने भगवती से अपनी रक्षा की प्रार्थना की।

उनकी व्यथा सुनकर भगवती ने उन्हें अभय दिया और रुरु से रक्षा करने का आश्वासन दिया।

इसके बाद भगवती हँसीं।

उनके मुख से असंख्य उग्र देवियाँ प्रकट हो गईं।

उन देवियों के हाथों में पाश, अंकुश, त्रिशूल, धनुष और बाण जैसे अस्त्र थे।

उन्होंने रुरु की विशाल सेना पर आक्रमण कर दिया।

असुरों की सेना का विनाश होने लगा।

अन्ततः रुरु स्वयं युद्धभूमि में आगे आया।

उसने अपनी मायाशक्ति से देवताओं को निद्रा में डाल दिया।

तब भगवती रौद्री स्वयं युद्ध में उतरीं और अपने त्रिशूल से रुरु पर प्रहार किया।

उस प्रहार से रुरु का सिर और शरीर का आवरण अलग हो गए।

इस घटना के बाद वराह पुराण में भगवती के चामुण्डा नाम की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है—

रुरोस्तु दानवेन्द्रस्य चर्ममुण्डे क्षणाद्यतः।
अपहृत्याहरद् देवी चामुण्डा तेन साऽभवत्॥

स्रोत: वराह पुराण, अध्याय 96, श्लोक 32

अर्थ: दानवराज रुरु के चर्म और मुण्ड को अपने अधिकार में लेने के कारण भगवती चामुण्डा कहलायीं।

इसके अगले ही श्लोक में भगवती के कालरात्रि नाम का स्पष्ट उल्लेख मिलता है—

सर्वभूतमहारौद्री या देवी परमेश्वरी।
संहारिणी तु या चैव कालरात्रिः प्रकीर्तिता॥

स्रोत: वराह पुराण, अध्याय 96, श्लोक 33

अर्थ: जो परमेश्वरी देवी महारौद्र स्वरूप धारण करने वाली तथा संहार करने वाली हैं, वे कालरात्रि नाम से प्रसिद्ध हुईं।

रुरु-वध के पश्चात् भगवान रुद्र स्वयं भगवती की स्तुति करते हैं।

उस स्तुति में वे उन्हें चामुण्डा, कालरात्रि, काली और कराली जैसे नामों से सम्बोधित करते हैं।

इस प्रकार वराह पुराण में रुरु असुर के संहार के साथ माँ कालरात्रि की महिमा का एक और दिव्य प्रसंग मिलता है।

वराह पुराण में वर्णित रुरु असुर के संहार का पौराणिक दृश्य। भगवती रौद्री-काली अपने उग्र कृष्णवर्णा स्वरूप में युद्धभूमि पर खड़ी हैं। उनके चरणों में पराजित रुरु असुर है तथा भगवान शिव और अन्य देवता भगवती की वंदना कर रहे हैं।
माँ कालरात्रि का तीसरा प्राकट्य: भगवती रौद्री द्वारा रुरु असुर का संहार। वराह पुराण में इसी प्रसंग से भगवती के चामुण्डा और कालरात्रि नामों की महिमा का वर्णन मिलता है।

रुरु का पुत्र दुर्ग और कालरात्रि का दूती-स्वरूप

स्रोत: स्कन्द पुराण, काशीखण्ड, उत्तरार्ध, अध्याय 71

रुरु असुर के बाद एक और प्रसंग सामने आता है।

स्कन्द पुराण में रुरु के पुत्र दुर्ग नामक असुर का वर्णन मिलता है।

उसने कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त किया और तीनों लोकों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

देवताओं और ऋषियों पर उसके अत्याचार बढ़ने लगे।

अन्ततः देवता भगवान शिव की शरण में पहुँचे।

भगवान शिव की आज्ञा से भगवती भवानी ने असुर के संहार का संकल्प लिया।

किन्तु युद्ध आरम्भ करने से पहले भगवती भवानी ने कालरात्रि को दूत बनाकर दुर्ग असुर के पास भेजा।

कालरात्रि ने उसे संदेश दिया कि वह देवताओं के अधिकार लौटा दे और अधर्म का मार्ग छोड़ दे।

किन्तु दुर्ग असुर ने भगवती की चेतावनी स्वीकार नहीं की।

उसने कालरात्रि को पकड़ने का आदेश दे दिया।

तब कालरात्रि ने अपनी प्रचण्ड शक्ति प्रकट की।

उनके हुंकार से निकली अग्नि ने उन्हें पकड़ने आए असुरों को भस्म कर दिया।

इसके बाद दुर्ग ने एक विशाल असुर सेना उत्पन्न की।

किन्तु कालरात्रि के प्रचण्ड वेग के सामने वह सेना भी टिक नहीं सकी।

कालरात्रि आकाशमार्ग से भगवती के पास लौट आईं और उन्हें असुर के व्यवहार का समाचार दिया।

इस प्रसंग में कालरात्रि केवल युद्ध करने वाली देवी नहीं, बल्कि भगवती की आज्ञा से धर्म का संदेश देने वाली एक महान शक्ति के रूप में भी दिखाई देती हैं।


चण्डी, काली और चामुण्डा — दुर्गासप्तशती का दिव्य प्रसंग

स्रोत: दुर्गासप्तशती, अध्याय 7

शुम्भ और निशुम्भ के अत्याचारों से देवताओं की रक्षा के लिए भगवती ने युद्ध आरम्भ किया।

शुम्भ ने चण्ड और मुण्ड नामक दो असुर सेनानायकों को विशाल सेना के साथ भगवती को पकड़ने के लिए भेजा।

उस समय भगवती अम्बिका सिंह पर विराजमान थीं।

असुरों को अपनी ओर बढ़ते देखकर भगवती अत्यन्त क्रोधित हुईं।

उनका मुख क्रोध से कृष्णवर्ण हो गया।

और तभी उनके ललाट से एक विकराल देवी प्रकट हुईं—

भ्रुकुटीकुटिलात्तस्या ललाटफलकाद्द्रुतम्।
काली करालवदना विनिष्क्रान्तासिपाशिनी॥

स्रोत: दुर्गासप्तशती, अध्याय 7, श्लोक 6

अर्थ: भगवती की टेढ़ी हुई भृकुटियों के मध्य ललाट से तत्काल विकराल मुखवाली काली प्रकट हुईं, जिनके हाथों में खड्ग और पाश थे।

तब काली ने असुरों की विशाल सेना पर आक्रमण कर दिया।

हाथियों, घोड़ों और रथों सहित अनेक असुर उनके प्रचण्ड वेग के सामने टिक नहीं सके।

अन्ततः काली ने चण्ड और मुण्ड का वध किया तथा उनके मस्तक भगवती चण्डिका के समक्ष प्रस्तुत किए।

तब चण्डिका ने उन्हें एक नया नाम दिया—

यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता।
चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि॥

स्रोत: दुर्गासप्तशती, अध्याय 7, श्लोक 27

अर्थ: हे देवी! क्योंकि तुम चण्ड और मुण्ड को जीतकर उनके मस्तक लेकर मेरे पास आई हो, इसलिए संसार में चामुण्डा नाम से प्रसिद्ध होगी।

इस प्रसंग में चण्डिका से काली का प्राकट्य होता है और चण्ड-मुण्ड के संहार के बाद वही काली चामुण्डा कहलाती हैं।

वराह पुराण में चामुण्डा नाम का संबंध रुरु के चर्म और मुण्ड से मिलता है, जबकि दुर्गासप्तशती में चण्ड और मुण्ड के संहार से।

इस प्रकार दोनों पुराण भगवती के उग्र स्वरूप की अलग-अलग दिव्य लीलाओं का वर्णन करते हैं।


महाकाली कौन हैं ? दुर्गासप्तशती के प्रथम चरित्र का रहस्य

अब भगवती का एक और महत्त्वपूर्ण नाम सामने आता है—महाकाली।

दुर्गासप्तशती में भगवती की महिमा तीन चरित्रों में वर्णित है।

प्रथम चरित्र की अधिष्ठात्री देवी महाकाली, मध्यम चरित्र की महालक्ष्मी और उत्तम चरित्र की महासरस्वती हैं।

प्रथम चरित्र के विनियोग में स्पष्ट उल्लेख मिलता है—

प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः। महाकाली देवता। गायत्री छन्दः।

अर्थात् इस चरित्र के ऋषि ब्रह्माजी हैं और इसकी अधिष्ठात्री देवी महाकाली हैं।

अब देखें कि इस चरित्र में भगवती की महिमा किस प्रकार प्रकट होती है।

सृष्टि के आरम्भिक काल में भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में स्थित थे।

उसी समय उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नामक दो महाबली असुर उत्पन्न हुए।

वे दोनों ब्रह्माजी का वध करने के लिए आगे बढ़े।

ब्रह्माजी ने देखा कि भगवान विष्णु गहन निद्रा में हैं।

तब उन्होंने उस दिव्य शक्ति की स्तुति आरम्भ की, जिसके प्रभाव से स्वयं भगवान विष्णु भी योगनिद्रा में स्थित थे।

वह शक्ति थीं—भगवती महामाया, जिन्हें इस प्रथम चरित्र में महाकाली के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।

ब्रह्माजी की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवती ने भगवान विष्णु को योगनिद्रा से मुक्त किया।

भगवान विष्णु जागृत हुए और मधु-कैटभ के साथ उनका भीषण युद्ध आरम्भ हुआ।

अन्ततः भगवती महामाया के प्रभाव से दोनों असुर मोहित हुए और भगवान विष्णु ने उनका संहार कर दिया।

इस प्रकार दुर्गासप्तशती के प्रथम चरित्र में महाकाली की महिमा केवल असुर-संहार से संबंधित नहीं है।

वे उस महान योगनिद्रा और महामाया शक्ति की अधिष्ठात्री हैं, जिनके प्रभाव से भगवान विष्णु निद्रा में स्थित होते हैं और जिनकी कृपा से पुनः जागृत होकर असुरों का संहार करते हैं।

प्रथम चरित्र के ध्यान में महाकाली का दस मुख, दस चरण और दस भुजाओं वाला दिव्य स्वरूप वर्णित है।

उनके हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डी, मस्तक और शंख का उल्लेख मिलता है।

यह महाकाली का विशिष्ट ध्यानरूप है, जबकि नवदुर्गा के सातवें स्वरूप माँ कालरात्रि का ध्यान गर्दभवाहिनी देवी के रूप में मिलता है।

इस प्रकार भगवती महाकाली और माँ कालरात्रि, दोनों का संबंध आदिशक्ति की उग्र और महान सत्ता से है, किन्तु उनके प्राकट्य तथा ध्यान के प्रसंगों की अपनी विशिष्टताएँ हैं।


कालरात्रि और महाकाल —

भगवती का नाम कालरात्रि है।

काली और कालिका के नामों में भी काल का भाव विद्यमान है।

भगवान शिव महाकाल नाम से प्रसिद्ध हैं, जबकि भगवती का एक स्वरूप महाकाली है।

इन नामों का संबंध शाक्त तन्त्रों में और अधिक गहराई से प्रकट होता है।

महानिर्वाण तन्त्र के चतुर्थ उल्लास में भगवान सदाशिव भगवती की परम सत्ता का वर्णन करते हैं।

इसमें महाकाल द्वारा समस्त जगत के संहार और भगवती द्वारा स्वयं महाकाल को भी अपने में समाहित कर लेने का तात्त्विक वर्णन मिलता है।

इस शाक्त दृष्टि में भगवती आद्या कालिका उस परमशक्ति का स्वरूप हैं, जिनके अधीन काल और महाकाल भी हैं।

महाकाली केवल संहार की देवी नहीं, बल्कि उस आदिशक्ति का नाम भी है जिसके बिना सृष्टि, स्थिति और लय की कल्पना नहीं की जा सकती।

और भगवती की इसी व्यापक सत्ता का एक अत्यन्त विलक्षण वर्णन हमें महाभागवत उपपुराण में मिलता है।


माँ काली के चरणों के नीचे महादेव —

क्रोध के शांत होने की कथा या शिव-शक्ति का गूढ़ रहस्य ?

माँ काली का एक स्वरूप ऐसा भी है, जिसे देखकर मन में एक साथ श्रद्धा, विस्मय और जिज्ञासा उत्पन्न होती है।

भगवती का गहन कृष्णवर्ण शरीर, बिखरे हुए केश, बाहर निकली हुई जिह्वा, गले में मुण्डमाला और हाथों में आयुध।

किंतु इस स्वरूप की सबसे विलक्षण बात कुछ और है।

स्वयं भगवान शिव भगवती के चरणों के नीचे निश्चल लेटे हुए हैं।

वही महादेव, जिन्हें देवों का देव कहा जाता है। वही महाकाल, जिनके अधीन स्वयं काल भी है।

फिर ऐसा क्या हुआ कि भगवान शिव को भगवती काली के चरणों के नीचे स्थान लेना पड़ा ?

माँ काली का रौद्र आवेग 

इस स्वरूप के पीछे एक अत्यन्त प्रसिद्ध कथा सुनाई जाती है।

असुरों के साथ भीषण युद्ध समाप्त हो चुका था।

भगवती काली ने दैत्यों का संहार कर दिया था, किंतु उनका रौद्र आवेग अभी शांत नहीं हुआ था।

युद्धभूमि में उनका प्रचण्ड नृत्य जारी था।

उनके प्रत्येक पदाघात से धरती काँपने लगी।

देवता चिंतित हो उठे कि यदि भगवती का यह रौद्र नृत्य इसी प्रकार चलता रहा, तो सृष्टि का संतुलन बिगड़ सकता है।

तब देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की।

महादेव भगवती के मार्ग में जाकर निश्चल लेट गए।

अपने रौद्र आवेग में आगे बढ़ती हुई माँ काली का चरण अचानक भगवान शिव के वक्षस्थल पर पड़ा।

और उसी क्षण भगवती ठिठक गईं।

उन्होंने नीचे देखा। उनके चरणों के नीचे स्वयं उनके आराध्य महादेव थे।

महादेव को इस स्थिति में देखकर भगवती संकुचित हुईं। उनकी जिह्वा बाहर निकल आई और उनका प्रचण्ड आवेग शांत हो गया।

इसी क्षण को माँ काली की अनेक प्रसिद्ध प्रतिमाओं में भी दर्शाया जाता है।

यह कथा विशेष रूप से बंगाल की काली-उपासना और भक्तिपरम्परा में प्रसिद्ध है।

इस स्वरूप का उल्लेख तान्त्रिक ग्रंथों में भी मिलता है—लेकिन वहाँ इसका संदर्भ कुछ भिन्न है।

तान्त्रिक ग्रंथों में भगवती के चरणों के नीचे महादेव

दक्षिणकाली की ध्यान-परम्परा में भगवती के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है—

शवरूपमहादेवहृदयोपरिसंस्थिताम्॥

अर्थ: भगवती शवरूप में स्थित भगवान महादेव के हृदय अथवा वक्षस्थल पर विराजमान हैं।

यहाँ भगवान शिव की स्थिति स्पष्ट है। वे भगवती के नीचे शवरूप में स्थित हैं।

किन्तु इस ध्यान-वर्णन में ऐसा नहीं कहा गया कि माँ काली ने क्रोध में अनजाने में उन पर चरण रख दिया था।

एक और महत्त्वपूर्ण प्रमाण योगिनी तन्त्र के आठवें पटल में मिलता है।

कृष्णवर्णा महाघोरा महाकालोपरि स्थिता ॥ ६५ ॥

अर्थ: वे भगवती कृष्णवर्णा, अत्यन्त उग्र स्वरूप वाली और महाकाल के ऊपर स्थित हैं।

स्रोत: योगिनी तन्त्र, अष्टम पटल, श्लोक 65

इसी वर्णन में भगवती के मुक्त केश, मुण्डमाला, बाहर निकली हुई जिह्वा और त्रिनेत्र का भी उल्लेख मिलता है।

अर्थात् जिस स्वरूप में आज हम माँ काली को महादेव के ऊपर विराजमान देखते हैं, उसके प्रमुख लक्षण तान्त्रिक साहित्य में वर्णित हैं।

और इस संबंध का एक अत्यन्त भावपूर्ण पक्ष योगिनी तन्त्र के अगले पटल में मिलता है।

भगवान शिव भगवती से प्रार्थना करते हैं—

तिष्ठामि सततं मातस्त्वदीये चरणाम्बुजे ॥ ६९ ॥

अर्थ: हे माता! मैं सदा आपके चरणकमलों में स्थित रहूँ।

स्रोत: योगिनी तन्त्र, नवम पटल, श्लोक 69

यहाँ प्रसंग का भाव बिल्कुल बदल जाता है।

लोकप्रचलित कथा में महादेव भगवती का रौद्र आवेग शांत करने के लिए उनके मार्ग में लेटते हैं।

जबकि योगिनी तन्त्र के इस प्रसंग में भगवान शिव स्वयं भगवती के चरणकमलों में सदा स्थित रहने की अभिलाषा व्यक्त करते हैं।

शिव और शक्ति — दो स्वरूप, एक ही परम सत्ता

अब इस दिव्य स्वरूप को समझने के लिए एक और शास्त्रीय वचन की ओर ध्यान देना आवश्यक है।

सौन्दर्यलहरी का प्रथम श्लोक कहता है—

शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि।

अर्थ: भगवान शिव शक्ति से संयुक्त होकर ही कार्य करने में समर्थ होते हैं। शक्ति के बिना वे स्पन्दन करने में भी समर्थ नहीं होते।

स्रोत: सौन्दर्यलहरी, श्लोक 1

इस श्लोक में शिव और शक्ति के उस अभिन्न संबंध का प्रतिपादन है, जो शाक्त दर्शन का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण आधार है।

शिव परम चेतना हैं और शक्ति उसी चेतना की क्रियाशील सामर्थ्य।

शक्ति के बिना शिव की क्रियाशीलता की कल्पना नहीं की जाती, और शिव से पृथक शक्ति की परम सत्ता को भी इस अभिन्न संबंध में समझा जाता है।

इसी दृष्टि से देखें तो माँ काली के चरणों के नीचे भगवान शिव का होना किसी की पराजय अथवा अपमान का दृश्य नहीं है।

यह उस दिव्य संबंध का प्रतिमात्मक निरूपण है, जिसमें निश्चल चेतना और सक्रिय महाशक्ति एक-दूसरे से अभिन्न हैं।

लोकपरम्परा में यही स्वरूप भगवती के रौद्र आवेग के शांत होने की कथा से जुड़ता है, जबकि तान्त्रिक परम्परा में यह शिव और शक्ति के गहन आध्यात्मिक संबंध को प्रकट करता है।

और शायद इसी कारण माँ काली का यह स्वरूप जितना उग्र दिखाई देता है, उसके भीतर उतना ही गहरा शिव-शक्ति का ऐक्य समाया हुआ है।

युद्धभूमि में भगवान शिव के वक्षस्थल पर चरण रखे हुए माँ महाकाली का दिव्य रौद्र स्वरूप। भगवती कृष्णवर्णा, चार भुजाओं, मुक्त केशों, मुण्डमाला और बाहर निकली जिह्वा के साथ दिखाई दे रही हैं। महादेव भूमि पर निश्चल लेटे हैं तथा आसपास देवगण उपस्थित हैं।
माँ काली के चरणों में महादेव: लोकप्रचलित कथा के अनुसार, असुर-संहार के पश्चात् भगवती काली के प्रचण्ड रौद्र आवेग को शांत करने के लिए भगवान शिव उनके मार्ग में निश्चल लेट गए। महादेव के वक्षस्थल पर चरण पड़ते ही भगवती ठिठक गईं। तान्त्रिक परम्परा में यह दिव्य स्वरूप शिव और शक्ति के अभिन्न संबंध को भी प्रकट करता है।

भगवती काली का श्रीकृष्ण, और भगवान शिव का श्रीराधा के रूप में अवतरण 

स्रोत: महाभागवत उपपुराण, अध्याय 49

भगवती काली और भगवान शिव के संबंध का एक अत्यन्त विलक्षण वर्णन महाभागवत उपपुराण में मिलता है।

इस शाक्त ग्रंथ में भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा के अवतरण की एक ऐसी कथा प्रस्तुत की गई है, जिसमें भगवती काली स्वयं कृष्णरूप धारण करती हैं और भगवान शिव राधारूप में अवतरित होते हैं।

इस दिव्य प्रसंग का वर्णन भगवान महादेव और देवर्षि नारद के संवाद में मिलता है।

देवर्षि नारद की जिज्ञासा

एक समय देवर्षि नारद ने भगवान शिव से भगवती काली के कृष्णावतार का रहस्य जानना चाहा।

उन्होंने पूछा कि जगज्जननी भगवती ने पृथ्वी पर पुरुष रूप धारण करके श्रीकृष्ण के रूप में अवतार क्यों लिया।

तब भगवान शिव ने उन्हें कैलास पर्वत पर घटित एक पुराना प्रसंग सुनाया।

इस प्रसंग के अनुसार एक समय भगवान शिव और भगवती पार्वती कैलास पर्वत पर एक साथ विराजमान थे।

भगवान शिव ने भगवती से कहा कि उनके के मन में एक इच्छा हो रही है। 

भगवती ने उनसे पूछा कि वह कौन-सी इच्छा है।

तब महादेव ने निवेदन किया कि वे एक ऐसी लीला करना चाहते हैं जिसमें भगवती पुरुष रूप धारण करें और वे स्वयं स्त्रीरूप में अवतरित हों।

भगवती ने उनकी इच्छा स्वीकार कर ली।

उन्होंने कहा कि वे पृथ्वी पर वसुदेव के घर श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेंगी।

तब भगवान शिव ने भी अपना संकल्प प्रकट किया कि वे वृषभानु की पुत्री राधा के रूप में जन्म लेंगे।

भगवान शिव ने आगे कहा कि उनकी आठ मूर्तियाँ रुक्मिणी, सत्यभामा आदि पटरानियों के रूप में भी अवतरित होंगी।

इस प्रकार महाभागवत उपपुराण की इस विशिष्ट शाक्त कथा में भगवती काली का श्रीकृष्ण और भगवान शिव का श्रीराधा रूप में अवतरण वर्णित है।

संदर्भ: महाभागवत उपपुराण, अध्याय 49, श्लोक 10–21

महाभागवत उपपुराण की शाक्त अवतार-कथा का दिव्य चित्रण। अग्रभाग में भगवती महाकाली श्रीकृष्ण के रूप में बाँसुरी बजा रही हैं और भगवान शिव श्रीराधा के रूप में उनके समीप विराजमान हैं। पृष्ठभूमि में कैलास पर्वत पर शिव-पार्वती का दिव्य स्वरूप दिखाई देता है।
काली से कृष्ण, शिव से राधा: महाभागवत उपपुराण में वर्णित एक विलक्षण शाक्त अवतार-कथा, जिसमें भगवती काली श्रीकृष्ण और भगवान शिव श्रीराधा के रूप में अवतरित होते हैं।

जया-विजया, बलराम और अर्जुन का अवतरण

महाभागवत उपपुराण में इस अवतरण के साथ अन्य देवशक्तियों के पृथ्वी पर आने का भी उल्लेख मिलता है।

भगवती की सखियाँ जया और विजया श्रीदाम और वसुदाम के रूप में अवतरित होती हैं।

इसी प्रसंग में भगवती भगवान विष्णु के साथ हुई एक पूर्व प्रतिज्ञा का स्मरण करती हैं।

उसके अनुसार भगवान विष्णु उनके बड़े भाई के रूप में अवतरित होंगे।

वे हल धारण करने वाले महान बलशाली बलराम नाम से प्रसिद्ध होंगे।

संदर्भ: महाभागवत उपपुराण, अध्याय 49, श्लोक 22–27

आगे इसी अध्याय में भगवान विष्णु के पाण्डुपुत्र अर्जुन के रूप में अवतरण का भी उल्लेख मिलता है।

ब्रह्माजी की प्रार्थना पर भगवान विष्णु कुन्ती के गर्भ से अर्जुनरूप में जन्म लेने की बात स्वीकार करते हैं।

संदर्भ: महाभागवत उपपुराण, अध्याय 49, श्लोक 46–49 तथा 63–68

इस प्रकार इस शाक्त आख्यान में बलराम और अर्जुन, दोनों के साथ भगवान विष्णु का संबंध वर्णित है।


पृथ्वी का गौ-रूप और भगवती का कृष्णावतार

किन्तु भगवती के इस अवतरण के पीछे एक और महत्त्वपूर्ण उद्देश्य था।

पृथ्वी पर कंस, दुर्योधन और अन्य अत्याचारी राजाओं के कारण अधर्म बढ़ गया था।

उनके अत्याचारों से पीड़ित पृथ्वी गौ का रूप धारण करके ब्रह्माजी के पास पहुँची और उनसे अपनी रक्षा की प्रार्थना की।

पृथ्वी के इस गौ-रूप का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण में भी मिलता है—

गौर्भूत्वाश्रुमुखी खिन्ना क्रन्दन्ती करुणं विभोः।
उपस्थितान्तिके तस्मै व्यसनं समवोचत॥

स्रोत: श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कन्ध, अध्याय 1, श्लोक 18

अर्थ: पृथ्वी गौ का रूप धारण करके, आँखों में आँसू लिए, अत्यन्त दुःखी अवस्था में ब्रह्माजी के समीप पहुँची और रोते हुए अपना कष्ट सुनाया।

महाभागवत उपपुराण में ब्रह्माजी देवताओं के साथ भगवती के पास पहुँचते हैं और पृथ्वी का भार दूर करने की प्रार्थना करते हैं।

तब भगवती कहती हैं कि उनका भद्रकाली स्वरूप वसुदेव के घर पुरुषरूप में जन्म लेगा।

वे नवीन मेघ के समान श्यामवर्ण, दो भुजाओं, वनमाला और श्रीवत्स चिह्न से सुशोभित श्रीकृष्ण रूप में प्रकट होंगी।

इस अवतरण के माध्यम से वे कंस आदि अत्याचारियों का संहार करेंगी तथा महाभारत के महान युद्ध द्वारा पृथ्वी को अधर्मी राजाओं के भार से मुक्त करेंगी।

संदर्भ: महाभागवत उपपुराण, अध्याय 49, श्लोक 30–62


गौ-रूप में पृथ्वी की पुकार और गोपाल श्रीकृष्ण की लीला

इस प्रसंग में एक अत्यन्त सुंदर संबंध दिखाई देता है।

जिस पृथ्वी ने गौ का रूप धारण करके अपनी रक्षा की प्रार्थना की थी, उसी पृथ्वी पर श्रीकृष्ण की बाललीलाओं में गायों और बछड़ों का विशेष स्थान रहा।

गोकुल और वृन्दावन में श्रीकृष्ण गायों के बीच पले-बढ़े। वे अपने सखाओं के साथ वन में गोचारण के लिए जाते थे।

श्रीमद्भागवत में वर्णित है कि उनकी बाँसुरी की ध्वनि सुनकर गायें और बछड़े तक भावविभोर हो जाते थे।

गावश्च कृष्णमुखनिर्गतवेणुगीत-
पीयूषमुत्तभितकर्णपुटैः पिबन्त्यः।
शावाः स्नुतस्तनपयःकवलाः स्म तस्थु-
र्गोविन्दमात्मनि दृशाश्रुकलाः स्पृशन्त्यः॥

स्रोत: श्रीमद्भागवत महापुराण, 10.21.13

अर्थ: गायें श्रीकृष्ण की बाँसुरी से निकलने वाली अमृतमयी ध्वनि को अपने उठे हुए कानों से मानो पी रही थीं। बछड़े दूध पीते-पीते ठहर गए और उनकी आँखें प्रेमाश्रुओं से भर गईं।

जब इन्द्र के प्रकोप से व्रज में भयंकर वर्षा हुई, तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर समस्त व्रजवासियों और गौधन की रक्षा की।

इसके पश्चात् दिव्य गौ सुरभि ने अपने दूध से भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक किया।

और इस के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण का गोविन्द नाम विशेष रूप से प्रतिष्ठित हुआ। 

स्रोत: श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कन्ध, अध्याय 27, श्लोक 19–23

एक ओर पृथ्वी गौ का रूप धारण करके अपनी रक्षा की प्रार्थना करती है और दूसरी ओर श्रीकृष्ण की लीला में गौ-रक्षा, गोपालन तथा गोविन्द स्वरूप की विशेष महिमा मिलती है।

इन प्रसंगों को साथ पढ़ने पर श्रीकृष्ण के अवतरण और उनकी गोपाल-लीला के बीच एक अत्यन्त सुंदर संबंध दिखाई देता है।

भगवान श्रीकृष्ण अपनी बाईं कनिष्ठा उँगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर मूसलाधार वर्षा से ब्रजवासियों, गायों और बछड़ों की रक्षा करते हुए। पर्वत के नीचे स्त्री-पुरुष, बच्चे और गौवंश सुरक्षित आश्रय लिए हुए हैं।
गोवर्धन लीला: देवराज इन्द्र के प्रकोप से ब्रजवासियों और गौवंश की रक्षा के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उँगली पर गोवर्धन पर्वत धारण किया।

तोडल तन्त्र में काली और कृष्ण का संबंध

महाभागवत उपपुराण के अतिरिक्त तोडल तन्त्र में भी भगवती काली को कृष्णमूर्ति से संबंधित बताया गया है।

दशम पटल में भगवान शिव विभिन्न महाविद्याओं तथा अवतारों के संबंध का वर्णन करते हैं।

वहाँ कहा गया है—

महालक्ष्मीर्भवेद् बुद्धो दुर्गा स्यात् कल्किरूपिणी।
स्वयं भगवती काली कृष्णमूर्तिः समुद्भवा॥

स्रोत: तोडल तन्त्र, दशम पटल, श्लोक 11

अर्थ: महालक्ष्मी बुद्धरूप और दुर्गा कल्किरूप से संबंधित हैं; स्वयं भगवती काली कृष्णमूर्ति के रूप में प्रकट होती हैं।

इस प्रकार शाक्त साहित्य में भगवती काली के श्रीकृष्ण रूप में प्राकट्य का उल्लेख केवल महाभागवत उपपुराण तक सीमित नहीं है।

तोडल तन्त्र में भी इस संबंध का स्पष्ट वर्णन मिलता है।

महाभागवत उपपुराण इसी संबंध को एक विस्तृत दिव्य अवतार-कथा के रूप में प्रस्तुत करता है।


कालरात्रि — काल, महारात्रि और महामाया

माँ कालरात्रि के नाम में स्वयं काल  समाहित है।

दुर्गासप्तशती के प्रथम अध्याय में ब्रह्माजी भगवान विष्णु की योगनिद्रा स्वरूपा महामाया की स्तुति करते हैं।

इस स्तुति में भगवती को कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि कहा गया है—

प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी।
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा॥

स्रोत: दुर्गासप्तशती, अध्याय 1, श्लोक 59

अर्थ: हे भगवती! आप समस्त सृष्टि की मूल प्रकृति हैं और तीनों गुणों को प्रकट करने वाली हैं। आप ही कालरात्रि, महारात्रि और भयंकर मोहरात्रि हैं।

यहाँ भगवती को केवल रात्रि की अधिष्ठात्री शक्ति नहीं, बल्कि सृष्टि की मूल प्रकृति के रूप में सम्बोधित किया गया है।

उनकी सत्ता में सृष्टि का प्राकट्य, पालन और अन्ततः लय समाहित है।

इसीलिए माँ कालरात्रि के स्वरूप का संबंध केवल असुर-संहार से नहीं, बल्कि आदिशक्ति की व्यापक महिमा से भी है।


माँ कालरात्रि का दिव्य स्वरूप और ध्यान

नवदुर्गा के सातवें स्वरूप का ध्यान अत्यन्त विशिष्ट है।

प्रचलित नवदुर्गा स्तोत्र में भगवती का वर्णन इस प्रकार मिलता है—

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

स्रोत: प्रचलित नवदुर्गा स्तोत्र, कालरात्रि ध्यान।

इस ध्यान में माँ कालरात्रि के स्वरूप की अनेक विशेषताएँ मिलती हैं।

कृष्णवर्ण: देवीभागवत में भगवती को मषीवर्णा कहा गया है। अर्थात् उनका वर्ण स्याही के समान अत्यन्त गहरा कृष्ण है।

एकवेणी: उनके केश एक वेणी में वर्णित हैं।

जपापुष्प: ध्यानश्लोक में भगवती के कानों के साथ जपा अर्थात् गुड़हल के पुष्पों का उल्लेख है।

तैलाभ्यक्त शरीर: माँ का शरीर तेल से अभ्यक्त बताया गया है।

लौह-कण्टकयुक्त आभूषण: उनके बाएँ चरण में लौह-कण्टकयुक्त अलंकरण का वर्णन मिलता है।

गर्दभ वाहन: ध्यानश्लोक में खरास्थिता शब्द का प्रयोग हुआ है। खर अर्थात् गर्दभ। इस प्रकार माँ कालरात्रि का वाहन गर्दभ है।

मस्तक की विशेषता: वर्धन्मूर्धध्वजा शब्द से मस्तक पर ध्वजा के समान ऊपर उठी हुई आकृति का वर्णन मिलता है।


माँ की भुजाएँ और आयुध

माँ कालरात्रि की प्रचलित प्रतिमाओं में उन्हें चार भुजाओं के साथ दर्शाया जाता है।

उनके एक हाथ में खड्ग और दूसरे में लौह-अस्त्र दिखाई देता है, जबकि शेष दो हाथ अभय और वरद मुद्राओं में होते हैं।

उनके तीन नेत्र और मुख से निकलती अग्नि भी प्रचलित स्वरूप-वर्णन की विशेषताएँ हैं।

ऊपर दिए गए नवदुर्गा ध्यानश्लोक में इन सभी विशेषताओं की स्पष्ट गणना नहीं है। इसलिए ध्यानश्लोक में वर्णित स्वरूप और प्रचलित प्रतिमा-परम्परा के विवरण को उनके अपने स्थान पर समझना उचित है।


माँ कालरात्रि को शुभंकरी क्यों कहा जाता है ?

माँ कालरात्रि का स्वरूप अत्यन्त उग्र है।

किन्तु उनके उग्र स्वरूप का उद्देश्य अधर्म का विनाश और धर्म की रक्षा है।

वराह पुराण में वे रुरु जैसे महाबली असुर का संहार करती हैं।

स्कन्द पुराण में वे दुर्ग असुर के पास जाकर उसे अधर्म छोड़ने का संदेश देती हैं और उसके सैनिकों को पराजित करती हैं।

देवीभागवत में वे दैत्यों में भय उत्पन्न करने वाली कही गई हैं।

किन्तु उसी श्लोक में उन्हें समस्त कामनाओं का फल प्रदान करने वाली भी बताया गया है—

मषीवर्णा महाघोरा दैत्यानां भयवर्धिनी।
कालरात्रीति सा प्रोक्ता सर्वकामफलप्रदा॥

स्रोत: देवीभागवत, पंचम स्कन्ध, अध्याय 23, श्लोक 4

अर्थ: स्याही के समान गहरे कृष्णवर्ण वाली, अत्यन्त उग्र स्वरूप धारण करने वाली तथा दैत्यों के भय को बढ़ाने वाली भगवती कालरात्रि कहलाती हैं। वे अपने भक्तों की समस्त कामनाओं का फल प्रदान करने वाली हैं।

यही उनके स्वरूप की विशेषता है।

जो शक्ति अत्याचारियों के लिए भय का कारण बनती है, वही अपने भक्तों के लिए कल्याणकारी होती है।

इसीलिए माँ कालरात्रि को शुभंकरी नाम से भी स्मरण किया जाता है।

भगवती की इसी कल्याणमयी सत्ता की स्तुति दुर्गासप्तशती में की गई है—

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

स्रोत: दुर्गासप्तशती, अध्याय 11, श्लोक 10

अर्थ: हे समस्त मंगलों में परम मंगलमयी, कल्याणस्वरूपिणी, सभी पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरण देने वाली त्रिनेत्रा नारायणी! आपको नमस्कार है।

माँ कालरात्रि का स्वरूप भी उसी परम कल्याणमयी आदिशक्ति की अभिव्यक्ति है।


सातवें दर्शन का सार

माँ कालरात्रि के इस दर्शन में हमें भगवती के अनेक दिव्य स्वरूपों और प्राकट्य की कथाओं का परिचय प्राप्त हुआ।

कालिका पुराण में हिमालय की श्यामवर्णा पुत्री पार्वती काली नाम से प्रसिद्ध हैं।

देवीभागवत में पार्वती से कौशिकी का प्राकट्य होता है और भगवती का कृष्णवर्णा स्वरूप कालिका तथा कालरात्रि कहलाता है।

शिवपुराण में कौशिकी-काली के प्राकट्य का एक अन्य दिव्य वृत्तान्त मिलता है।

वराह पुराण में भगवती रौद्री रुरु असुर का संहार करती हैं और कालरात्रि तथा चामुण्डा नामों से प्रसिद्ध होती हैं।

स्कन्द पुराण में कालरात्रि रुरु के पुत्र दुर्ग असुर के पास भगवती की दूती बनकर जाती हैं।

दुर्गासप्तशती में चण्डिका के ललाट से काली का प्राकट्य होता है, जो चण्ड और मुण्ड का वध करके चामुण्डा नाम प्राप्त करती हैं।

उसी दुर्गासप्तशती के प्रथम चरित्र में महाकाली की महिमा का वर्णन है।

शाक्त तन्त्रों में भगवती का संबंध काल और महाकाल की परम सत्ता से स्थापित होता है।

और महाभागवत उपपुराण में भगवती काली के श्रीकृष्ण तथा भगवान शिव के श्रीराधा रूप में अवतरण की अत्यन्त विलक्षण कथा सामने आती है।

इन सभी प्रसंगों में भगवती की अनन्त शक्ति के विविध दर्शन होते हैं।

माँ कालरात्रि का स्वरूप उग्र है, किन्तु उनका आश्रय कल्याणकारी है।

वे अधर्म का संहार करने वाली, देवताओं की रक्षा करने वाली और अपने भक्तों को अभय प्रदान करने वाली परमेश्वरी हैं।

ऐसी जगज्जननी माँ कालरात्रि के चरणों में बारम्बार प्रणाम।

जय माँ कालरात्रि।

गहन कृष्णवर्णा माँ कालरात्रि का दिव्य चित्र। भगवती चार भुजाओं, त्रिनेत्र, खड्ग, अभय मुद्रा और अन्य आयुधों के साथ गर्दभ पर विराजमान हैं। उनके पीछे अग्निमय आभामण्डल तथा चारों ओर असुरों के संहार का दृश्य दिखाई देता है।
माँ कालरात्रि — नवदुर्गा का सातवाँ स्वरूप। गर्दभवाहिनी, कृष्णवर्णा और महारौद्र स्वरूप धारण करने वाली भगवती दैत्यों के लिए भयकारी तथा भक्तों के लिए कल्याणकारी शुभंकरी हैं।

माँ कालरात्रि के गहन कृष्णवर्ण और महारौद्र स्वरूप के दर्शन के बाद अब हमारी यात्रा नवदुर्गा के आठवें स्वरूप माँ महागौरी की ओर बढ़ेगी।

नवरात्रि विशेष की अगली कड़ी में हम माँ महागौरी के प्राकट्य, दिव्य स्वरूप और उनसे जुड़ी शास्त्रीय कथाओं का अन्वेषण करेंगे।

अगला दर्शन — माँ महागौरी।



 

1 thought on “नवरात्रि विशेष – 7”

  1. जय माँ कालरात्रि…हमारी भी यही प्रार्थना है कि पूरे विश्व में अधर्म, अन्याय व अत्याचार का विनाश करो व धर्म की रक्षा करो…।
    जय माँ कालरात्रि ।

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