क्या दशहरा केवल रावण-वध का उत्सव है ?
नवरात्रि की पूर्णाहुति से श्रीराम की विजय तक —
पुराणों, रामायणों और भारत की विभिन्न परम्पराओं में वर्णित इस पर्व के अनेक स्वरूप।
लेखक: कुलदीप ठुसू “पम्पोष”
नवरात्रि के नौ दिनों में हमने भगवती के नौ दिव्य स्वरूपों का दर्शन किया। माँ शैलपुत्री से आरंभ हुई यह यात्रा माँ सिद्धिदात्री की आराधना तक पहुँची।
नौ दिनों की उपासना पूर्ण हुई। अब आता है आश्विन शुक्ल पक्ष का दसवाँ दिन—विजयदशमी, जिसे हम दशहरा भी कहते हैं।
दशहरा सुनते ही सामान्यतः हमारे मन में भगवान श्रीराम की रावण पर विजय, रामलीला और रावण-दहन का दृश्य उभर आता है।
हममें से अधिकांश लोग यही जानते हैं कि इसी दिन श्रीराम ने रावण का संहार किया था और उसी विजय की स्मृति में दशहरा मनाया जाता है।
लेकिन हमारे पौराणिक ग्रंथों में इस पर्व का स्वरूप कहीं अधिक व्यापक है।
कालिकापुराण में नवमी को भगवती द्वारा महिषासुर-वध और दशमी को उनकी विदाई का उल्लेख मिलता है।
इसी पुराण में नवमी को श्रीराम द्वारा रावण-संहार तथा दशमी को भगवती के उत्सवपूर्वक विसर्जन का प्रसंग भी आता है।
श्रीमद्देवीभागवत की बात करें तो वहाँ भी एक महत्वपूर्ण विवरण मिलता है—रावण के विरुद्ध युद्ध से पहले स्वयं भगवान श्रीराम ने नवरात्रि में भगवती की आराधना की थी और दशमी को विजयापूजन करके युद्ध के लिए प्रस्थान किया था।
इतना ही नहीं, हमारे धर्मग्रंथों में इसी पर्व से जुड़े अपराजिता पूजा, शमी वृक्ष की आराधना, अस्त्र-शस्त्रों के पूजन, शत्रु की प्रतिकृति पर बाण चलाने तथा विजय-यात्रा के विधान भी मिलते हैं।
आज भारत के विभिन्न क्षेत्रों में दशहरे के अनेक स्वरूप देखने को मिलते हैं।
कहीं देवी को विदाई दी जाती है, कहीं भगवान रघुनाथ की रथयात्रा निकलती है, कहीं माँ चामुण्डेश्वरी की भव्य शोभायात्रा होती है और कहीं छोटे बच्चों को जीवन का पहला अक्षर लिखना सिखाया जाता है।
कुछ क्षेत्रों में तो दशहरा बड़े उत्साह से मनाया जाता है, लेकिन वहाँ रावण का पुतला जलाया ही नहीं जाता।
तो आखिर एक ही तिथि के साथ इतनी अलग-अलग धार्मिक परम्पराएँ कैसे जुड़ीं?
क्या वास्तव में विजयदशमी को ही रावण-वध हुआ था?
और इस पर्व को ‘विजया’ तथा ‘दशहरा’ क्यों कहा जाता है?
इन प्रश्नों के उत्तर हमें नवरात्रि की आराधना से आरंभ होकर पुराणों, रामायणों, धर्मशास्त्रों और भारत की जीवंत सांस्कृतिक परम्पराओं तक ले जाते हैं।
1. नवरात्रि की पूर्णाहुति और भगवती की विजय
शारदीय नवरात्रि में नौ दिनों तक भगवती के विभिन्न स्वरूपों की उपासना की जाती है।
व्रत, जप, हवन, दुर्गासप्तशती का पाठ तथा विशेष पूजन इस पर्व के प्रमुख अंग हैं।
शरद् ऋतु में होने वाली इस वार्षिक महापूजा का उल्लेख स्वयं दुर्गासप्तशती में मिलता है।
मार्कण्डेयपुराण — देवीमाहात्म्य (दुर्गासप्तशती), अध्याय 12, श्लोक 12–13
शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी।
तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः॥ १२॥सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः॥ १३॥
अर्थ: भगवती कहती हैं कि शरद् ऋतु में होने वाली मेरी वार्षिक महापूजा में जो भक्त श्रद्धापूर्वक मेरे माहात्म्य का श्रवण करता है, वह मेरी कृपा से समस्त बाधाओं से मुक्त होकर धन-धान्य तथा परिवार-सुख से सम्पन्न होता है।
इसी शारदीय महापूजा के साथ भगवती द्वारा महिषासुर के संहार का विशेष संबंध है।
महिषासुर-वध और देवी की विजय
दुर्गासप्तशती के दूसरे और तीसरे अध्याय में महिषासुर के अत्याचारों तथा भगवती के हाथों उसके विनाश का विस्तृत वर्णन है।
महिषासुर के आतंक से देवता अपने अधिकारों से वंचित हो चुके थे।
तब ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा अन्य देवताओं के तेज से भगवती का दिव्य स्वरूप प्रकट हुआ।
देवताओं ने उन्हें अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए।
इसके बाद भगवती और महिषासुर की सेना के बीच भीषण युद्ध हुआ।
महिषासुर कभी भैंसे का रूप धारण करता, कभी सिंह का और कभी अन्य रूप में भगवती पर आक्रमण करता।
अंततः देवी ने उसका संहार करके देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्त किया।
लेकिन इस विजय का नवरात्रि और दशमी से क्या संबंध है?
इसका एक महत्वपूर्ण विवरण कालिकापुराण में मिलता है।
कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 80
नवम्यामुपहारैस्तु पूजिता महिषासुरम्।
निजघान दशम्यां तु विसृष्टान्तर्हिता शिवा॥ ८०॥
अर्थ: नवमी को देवताओं द्वारा विशेष उपहारों से पूजित भगवती ने महिषासुर का वध किया। दशमी को विधिपूर्वक विदाई दिए जाने पर वे अन्तर्धान हो गईं।
यहाँ नवमी को महिषासुर-वध और दशमी को भगवती की विदाई का विशेष उल्लेख मिलता है।
इसी अध्याय में दशमी के दिन देवी-विसर्जन का स्पष्ट विधान भी है।
कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 11
विसर्जनं दशम्यां तु कुर्याद् वै साधकोत्तमः।
कृत्वा विसर्जनं तस्यां तिथौ नक्तं समाचरेत्॥ ११॥
अर्थ: उत्तम साधक दशमी तिथि को देवी का विधिपूर्वक विसर्जन करे तथा उसके बाद निर्धारित रात्रिकालीन नियम का पालन करे।
कालिकापुराण के अध्याय 61, श्लोक 17–19 में भी अष्टमी और नवमी की विशेष पूजा के पश्चात् दशमी को देवी के उत्सवपूर्वक विसर्जन का विधान मिलता है।
इस प्रकार दशमी का एक महत्वपूर्ण शास्त्रीय स्वरूप है—भगवती की विजय के बाद उनकी विधिपूर्वक विदाई तथा शारदीय महापूजा की पूर्णाहुति।
आज बंगाल तथा पूर्वी भारत के अनेक क्षेत्रों में होने वाली दुर्गापूजा में इसी धार्मिक भावना का सुंदर स्वरूप दिखाई देता है।
लेकिन नवरात्रि में भगवती की इस आराधना का भगवान श्रीराम से भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण संबंध है।

2. भगवान श्रीराम की नवरात्रि आराधना
भगवान श्रीराम की रावण पर विजय का प्रसंग लगभग सभी प्रमुख रामायणों में मिलता है।
लेकिन श्रीमद्देवीभागवत महापुराण में उस युद्ध से पहले की एक विशेष धार्मिक घटना वर्णित है।
श्रीमद्देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 30
इस प्रसंग में देवर्षि नारद भगवान श्रीराम को भगवती की आराधना करने का परामर्श देते हैं।
नारदजी बताते हैं कि रावण अत्यंत पराक्रमी है और उसके विनाश तथा अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए भगवती का अनुग्रह प्राप्त करना आवश्यक है।
श्रीराम उनसे इस आराधना की विधि पूछते हैं।
तब देवर्षि नारद उन्हें नौ दिनों तक भगवती की उपासना करने का निर्देश देते हैं।
श्रीमद्देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 30, श्लोक 39
पीठं कृत्वा समे स्थाने संस्थाप्य जगदम्बिकाम्।
उपवासान्नवैव त्वं कुरु राम विधानतः॥ ३९॥
अर्थ: नारदजी कहते हैं—हे राम! समतल स्थान पर वेदी बनाकर वहाँ जगदम्बिका की स्थापना करो और विधिपूर्वक नौ दिनों तक उपवास एवं आराधना करो।
श्रीराम देवर्षि नारद के निर्देश का पालन करते हैं।
आश्विन मास में भगवती की स्थापना करके वे नवरात्र-व्रत आरंभ करते हैं। नारदजी स्वयं इस अनुष्ठान का मार्गदर्शन करते हैं।
अष्टमी की मध्यरात्रि में भगवती सिंह पर आरूढ़ होकर श्रीराम को दर्शन देती हैं।
देवी उन्हें आशीर्वाद प्रदान करती हैं और रावण-वध तथा अपने उद्देश्य की सिद्धि का आश्वासन देती हैं।
इसके पश्चात् भगवती अन्तर्धान हो जाती हैं।
श्रीराम अपना नवरात्र-व्रत पूर्ण करते हैं।
और फिर आता है दशमी का दिन।
श्रीमद्देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 30, श्लोक 60
समाप्य तद्व्रतं चक्रे प्रयाणं दशमीदिने।
विजयापूजनं कृत्वा दत्त्वा दानान्यनेकशः॥ ६०॥
अर्थ: श्रीराम ने नवरात्र-व्रत पूर्ण करके दशमी के दिन विजयापूजन किया, अनेक प्रकार के दान दिए और फिर प्रस्थान किया।
अगले श्लोक में श्रीराम के समुद्रतट पर पहुँचने, सेतु निर्माण करने और उसके पश्चात् रावण-वध का वर्णन आता है।
यहाँ विजयदशमी का एक महत्वपूर्ण स्वरूप सामने आता है।
दशमी केवल विजय प्राप्त हो जाने का उत्सव नहीं, बल्कि विजय की कामना से भगवती का आशीर्वाद लेकर शुभ कार्य के लिए प्रस्थान करने की तिथि भी है।

कालिकापुराण में भी श्रीराम की भगवती आराधना
श्रीमद्देवीभागवत की भाँति कालिकापुराण में भी श्रीराम के रावण-वध के साथ भगवती की आराधना का विशेष प्रसंग मिलता है।
कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 25–32
इस प्रसंग में बताया गया है कि श्रीराम के अनुग्रह और रावण के विनाश के लिए ब्रह्माजी ने भगवती का जागरण किया था।
महामाया भगवती ने श्रीराम और रावण के युद्ध में अपना अनुग्रह प्रदान किया।
ग्रंथ में सात रातों तक युद्ध चलने, रावण-वध होने और उसके बाद देवताओं द्वारा भगवती की विशेष पूजा का वर्णन है।
इस प्रकार देवी की आराधना, श्रीराम की विजय और दशमी का उत्सव एक ही धार्मिक प्रसंग में जुड़े दिखाई देते हैं।
लेकिन इन विवरणों से एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है।

3. क्या विजयदशमी के दिन ही रावण का संहार हुआ था ?
सामान्य मान्यता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था और उसी विजय की स्मृति में दशहरा मनाया जाता है।
यह श्रीराम की विजय से जुड़ी एक अत्यंत प्रसिद्ध धार्मिक परम्परा है।
हालाँकि रावण-वध की तिथि के संबंध में विभिन्न पुराणों में कुछ अन्य विवरण भी मिलते हैं।
कालिकापुराण — नवमी को रावण-वध
कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 29–32 के अनुसार सात रातों के युद्ध के पश्चात् भगवती महामाया की कृपा से श्रीराम ने नवमी को रावण का वध किया।
ग्रंथ में कहा गया है—
तावत् तु सप्तरात्राणि सैव देवैः सुपूजिता।
निहते रावणे वीरे नवम्यां सकलैः सुरैः॥ ३१॥
विशेषपूजां दुर्गायाश्चक्रे लोकपितामहः।
ततः सम्प्रेषिता देवी दशम्यां शार्वरोत्सवैः॥ ३२॥
अर्थ: सात रातों तक देवताओं ने भगवती की पूजा की। नवमी को वीर रावण के मारे जाने पर ब्रह्माजी ने सभी देवताओं के साथ भगवती दुर्गा की विशेष आराधना की। दशमी को देवी की उत्सवपूर्वक विदाई हुई।
बृहद्धर्मपुराण — नवमी को वध, दशमी को विजय का आनंद
बृहद्धर्मपुराण, पूर्वखण्ड, अध्याय 22 में भी नवमी के अपराह्ण में रावण-वध का वर्णन मिलता है।
इसी पौराणिक परम्परा में दशमी को विजयी श्रीराम के आनंद तथा माता सीता से पुनर्मिलन का विवरण आता है।
यहाँ भी रावण-वध और विजय के उत्सव को क्रमशः नवमी तथा दशमी से जोड़ा गया है।
स्कन्दपुराण और पद्मपुराण — चैत्र कृष्ण चतुर्दशी का विवरण
स्कन्दपुराण, ब्रह्मखण्ड, धर्मारण्यखण्ड, अध्याय 30, श्लोक 76–79 में राम–रावण युद्ध का विस्तृत तिथिवार वर्णन है।
इसमें चैत्र कृष्ण चतुर्दशी तक युद्ध चलने और श्रीराम द्वारा रावण-वध किए जाने का उल्लेख मिलता है।
इसी प्रकार पद्मपुराण, पातालखण्ड, अध्याय 36, श्लोक 65–69 में भी चैत्र कृष्ण चतुर्दशी तक युद्ध का विवरण आता है।
देवीभागवत — दशमी को विजयापूजन और प्रस्थान
वहीं श्रीमद्देवीभागवत, तृतीय स्कन्ध, अध्याय 30 के अनुसार श्रीराम ने दशमी को विजयापूजन करके युद्ध के लिए प्रस्थान किया।
इसके बाद सेतु निर्माण और रावण-वध का वर्णन मिलता है।
महर्षि वाल्मीकि की रामायण तथा तुलसीदास की रामचरितमानस में भी रावण-वध का विस्तृत वर्णन है,
लेकिन उनके संबंधित प्रसंगों में आश्विन शुक्ल दशमी को वध की निश्चित तिथि बताने वाला स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता।
इस प्रकार विभिन्न पौराणिक परम्पराओं में रावण-वध का कालक्रम अपने-अपने प्रसंगों के अनुसार वर्णित है।
इन सभी परम्पराओं में भगवान श्रीराम की विजय का गौरव समान रूप से प्रतिष्ठित है।
विजयदशमी का उनसे संबंध केवल युद्ध की एक तिथि तक सीमित नहीं, बल्कि देवी-आराधना, विजयापूजन और विजय के उत्सव से भी जुड़ा है।
अलग-अलग रामायणों में श्रीराम की विजय
भगवान श्रीराम की कथा भारत की अनेक भाषाओं और परम्पराओं में पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रही है।
महर्षि वाल्मीकि की रामायण के युद्धकाण्ड में रावण-वध का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है।
गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामचरितमानस के लंकाकाण्ड में इस विजय का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण किया है।
रामचरितमानस, लंकाकाण्ड, दोहा 102 के बाद की चौपाई
सायक एक नाभि सर सोषा।
अपर लगे भुज सिर करि रोषा॥
अर्थ: श्रीराम के एक बाण ने रावण की नाभि में स्थित अमृत को सुखा दिया और अन्य बाणों ने उसके सिर तथा भुजाओं का संहार किया।
दक्षिण भारत की प्रसिद्ध तमिल कम्ब रामायणम्, जिसे रामावतारम् भी कहा जाता है,
उसके युद्धकाण्ड के ‘रावण-वध पटलम्’ में भी श्रीराम के दिव्य बाण से रावण के अंत का सुंदर वर्णन मिलता है।
वहीं बंगाल की कृत्तिवासी रामायण में श्रीराम की शारदीय दुर्गा-आराधना का विशेष प्रसंग है, जिससे बंगाल की अकाल-बोधन परम्परा जुड़ी है।
इस रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम ने भगवती दुर्गा की आराधना की।
दशमी को देवी की पूजा और विसर्जन करने के पश्चात् वे रावण के विरुद्ध युद्ध के लिए प्रस्थान करते हैं।
संदर्भ: कृत्तिवासी रामायण, लंकाकाण्ड, दुर्गापूजा एवं दशमी-विसर्जन प्रसंग।
इस प्रकार विभिन्न रामायणों तथा पुराणों में श्रीराम की विजय का गौरव मिलता है।
कुछ परम्पराओं में उस विजय के साथ भगवती की आराधना का विशेष संबंध भी वर्णित है।
अब एक और महत्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है—
आश्विन मास की इस दशमी को ‘विजया’ क्यों कहा जाता है?
4. विजयदशमी का शास्त्रीय परिचय — नारदपुराण में ‘विजया’ तिथि
आश्विन शुक्ल दशमी को ‘विजया’ कहने का स्पष्ट पौराणिक प्रमाण नारदपुराण में मिलता है।
नारदपुराण, पूर्वार्ध, अध्याय 119, श्लोक 20–21
आश्विने शुक्लदशमी विजया सा प्रकीर्तिता।
चतुर्गोमयपिंडानि प्रातर्न्यस्य गृहांगणे॥ २०॥चक्रवालस्वरूपेण तन्मध्ये रामलक्ष्मणौ।
तथा भरतशत्रुघ्नौ पूजयेच्चतुरोऽपि हि॥ २१॥
अर्थ: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को ‘विजया’ कहा गया है। इस दिन प्रातः घर के आँगन में चार गोमय-पिण्ड स्थापित करके श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की पूजा करने का विधान है।
यहाँ दो महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं।
पहली, आश्विन शुक्ल दशमी का ‘विजया’ नाम स्वयं पुराण में मिलता है।
दूसरी, इस अवसर पर भगवान श्रीराम के साथ उनके तीनों भाइयों की पूजा का विधान भी बताया गया है।
आगे इसी अध्याय में शमी वृक्ष की पूजा, सेना तैयार करने, शत्रु की प्रतिकृति बनाकर उसे बाण से भेदने तथा विजय के उद्देश्य से प्रस्थान करने जैसे अनुष्ठान वर्णित हैं।
इस प्रकार नारदपुराण में विजयदशमी का धार्मिक स्वरूप विजय की स्मृति के साथ विजय की कामना और उससे संबंधित अनुष्ठानों से भी जुड़ा है।
विजयदशमी, दशहर और दशहरा — नाम का क्या अर्थ है?
विजयदशमी का सामान्य अर्थ है—विजय से संबंधित दशमी तिथि।
लेकिन यही पर्व सामान्य बोलचाल में ‘दशहरा’ और कुछ क्षेत्रों में ‘दसरा’ भी कहलाता है।
हिन्दी के ‘दशहरा’ नाम का संबंध संस्कृत के ‘दशहरा’ तथा ‘दशहर’ जैसे शब्दरूपों से जोड़ा जाता है।
शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में अलग-अलग भाषाई और धार्मिक व्याख्याएँ मिलती हैं।
एक व्याख्या इसका संबंध दसवें दिन से बताती है, जबकि दूसरी व्याख्या में ‘दश’ का संबंध दस से तथा ‘हर’ का संबंध हरण करने से है।
इस विषय में नारदपुराण का एक रोचक श्लोक मिलता है।
नारदपुराण, पूर्वार्ध, अध्याय 119, श्लोक 9
हरते दश पापानि तस्माद्दशहरः स्मृतः॥
अर्थ: दस प्रकार के पापों का हरण करने के कारण उसे ‘दशहर’ कहा गया है।
‘दशहर’ का अर्थ — वे दस पाप कौन-से हैं ?
स्कन्दपुराण, काशीखण्ड, पूर्वार्ध, अध्याय 27 श्लोक 139 में माँ गंगा की महिमा का वर्णन करते हुए उन्हें ‘दशहरा’ कहा गया है।
नमः शिवायै प्रथमं नारायण्यै पदं ततः।
दशहरायै पदमिति गंगायै मंत्र एष वै॥ १३९॥
अर्थ: भगवान शिव गंगा-पूजन के मन्त्र में शिवा, नारायणी, दशहरा और गंगा नामों के प्रयोग का निर्देश देते हैं।
यहाँ ‘दशहरा’ का अर्थ दस प्रकार के पापों का हरण करने वाली भगवती गंगा से जुड़ा है।
लेकिन ये दस पाप कौन-से हैं?
स्कन्दपुराण इसी अध्याय के श्लोक 152–155 में मनुष्य के दस प्रकार के पापों का वर्णन करता है। इन्हें तीन भागों में बाँटा गया है।
1. शरीर से किए जाने वाले तीन पाप — कायिक
अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः।
परदारोपसेवा च कायिकं त्रिविधं स्मृतम्॥ १५२॥
- चोरी: बिना अनुमति दूसरे की वस्तु अथवा धन लेना।
- अनुचित हिंसा: धर्मविरुद्ध हिंसा करना या दूसरों को अनुचित शारीरिक कष्ट पहुँचाना।
- परदारगमन: वैवाहिक मर्यादा का उल्लंघन करते हुए अनुचित यौन संबंध बनाना।
2. वाणी से किए जाने वाले चार पाप — वाचिक
पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चैव सर्वशः।
असंबद्धप्रलापश्च वाङ्मयं स्याच्चतुर्विधम्॥ १५३॥
- कठोर वचन: अपमानजनक अथवा दूसरों को पीड़ा देने वाले शब्द बोलना।
- असत्य भाषण: जानबूझकर झूठ बोलना।
- चुगली और परनिन्दा: दूसरों की बुराई करके उनके बीच द्वेष उत्पन्न करना।
- असंबद्ध प्रलाप: निरर्थक और अनुचित बातें करना।
3. मन से किए जाने वाले तीन पाप — मानसिक
परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसानिष्टचिंतनम्।
वितथाभिनिवेशश्च मानसं त्रिविधं स्मृतम्॥ १५४॥
- परधन का लोभ: दूसरे के धन या सम्पत्ति को अनुचित रूप से प्राप्त करने की इच्छा रखना।
- अनिष्ट चिंतन: मन में किसी दूसरे का अहित करने की भावना रखना।
- मिथ्या धारणाओं में आग्रह: असत्य विचारों और गलत मान्यताओं को हठपूर्वक पकड़े रहना।
इन दसों का उल्लेख करने के बाद स्कन्दपुराण कहता है—
श्लोक 155
एतैर्दशविधैः पापैर्दशजन्मसमुद्भवैः।
मुच्यते नात्र संदेहः सत्यं सत्यं गदाधर॥ १५५॥
अर्थ: हे गदाधर! इस विधि से आराधना करने वाला मनुष्य दस जन्मों से संचित इन दस प्रकार के पापों से मुक्त होता है। इसमें कोई संदेह नहीं।
यहाँ दस पापों का संबंध केवल बाहरी कर्मों से नहीं है। शास्त्र मनुष्य के शरीर, वाणी और मन—तीनों के आचरण का उल्लेख करता है।
लेकिन एक महत्वपूर्ण अंतर ध्यान देने योग्य है।
गंगा-दशहरा और विजयदशमी दो अलग पर्व हैं। गंगा-दशहरा ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को मनाया जाता है और माँ गंगा के पृथ्वी पर अवतरण तथा दस प्रकार के पापों के हरण की मान्यता से जुड़ा है।
वहीं विजयदशमी आश्विन शुक्ल दशमी को मनाई जाती है। इसका संबंध भगवती की विजय, श्रीराम की विजय, अपराजिता पूजा और अन्य धार्मिक परम्पराओं से है।
इस प्रकार दोनों पर्वों के नाम में ‘दशहरा’ शब्द मिलता है, लेकिन स्कन्दपुराण में वर्णित दस पापों का हरण करने वाला विशेष प्रसंग गंगा-दशहरा से संबंधित है, न कि आश्विन की विजयदशमी से।
5. अपराजिता पूजा — विजय के लिए भगवती का आशीर्वाद
विजयदशमी के धार्मिक अनुष्ठानों में भगवती अपराजिता की पूजा का विशेष महत्व है।
‘अपराजिता’ अर्थात् जिन्हें पराजित न किया जा सके।
धर्मशास्त्रीय निबंध धर्मसिन्धु के विजयादशमीनिर्णय में इस पूजा का विधान मिलता है।
इसके अनुसार दशमी के अपराह्ण में ईशान दिशा की ओर जाकर स्वच्छ भूमि पर अष्टदल कमल बनाया जाता है।
उसके मध्य भगवती अपराजिता तथा दोनों ओर जया और विजया का आवाहन किया जाता है।
पूजा में तीन मन्त्रों का विशेष उल्लेख है—
अपराजितायै नमः।
जयायै नमः।
विजयायै नमः।
इसके बाद भगवती से विजय तथा मंगल की प्रार्थना की जाती है।
अपराजिता पूजा का प्रार्थना-मन्त्र
हारेण तु विचित्रेण भास्वत्कनकमेखला।
अपराजिता भद्ररता करोतु विजयं मम॥
अर्थ: विविध आभूषणों तथा चमकती स्वर्ण-मेखला से सुशोभित, मंगलमयी भगवती अपराजिता मुझे विजय प्रदान करें।
इस आराधना का संबंध विशेष रूप से विजय की कामना, शुभ यात्रा और मंगलकारी कार्यों के आरंभ से जुड़ा है।
यहाँ विजयदशमी का एक अलग स्वरूप मिलता है—किसी युद्ध की समाप्ति का उत्सव ही नहीं, बल्कि आगामी कार्यों में सफलता के लिए भगवती का आशीर्वाद प्राप्त करना।
इसी भावना से जुड़े कुछ अन्य अनुष्ठान भी हमारे ग्रंथों में मिलते हैं।
6. शमी पूजन — महाभारत में अर्जुन के अस्त्र-शस्त्रों से जुड़ी परम्परा
विजयदशमी पर शमी वृक्ष की पूजा भारत के अनेक क्षेत्रों में की जाती है।
इस वृक्ष से महाभारत का एक प्रसिद्ध प्रसंग जुड़ा है।
पाण्डवों को अपने वनवास का अंतिम वर्ष अज्ञातवास में बिताना था। यदि उनकी पहचान हो जाती, तो उन्हें पुनः वनवास भोगना पड़ता।
इसलिए विराटनगर में प्रवेश करने से पहले उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र एक शमी वृक्ष पर सुरक्षित रख दिए।
जब कौरवों ने विराटराज की गायों को अपने अधिकार में करने का प्रयास किया, तब अर्जुन को पुनः शस्त्र उठाने पड़े।
उन्होंने राजकुमार उत्तर को उसी शमी वृक्ष के पास ले जाकर अपने अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किए और युद्ध के लिए प्रस्थान किया।
स्रोत: महाभारत, विराटपर्व, शस्त्र-स्थापन एवं शस्त्र-ग्रहण प्रसंग।
यह महाभारत में शमी वृक्ष और अर्जुन के अस्त्र-शस्त्रों के संबंध का स्पष्ट उदाहरण है।
लेकिन विजयदशमी से जुड़े पूजन-विधानों में शमी वृक्ष की पूजा का स्वतंत्र पौराणिक उल्लेख भी उपलब्ध है।
नारदपुराण, पूर्वार्ध, अध्याय 118, श्लोक 17–18 में आश्विन शुक्ल नवमी के अपराह्ण में शमी वृक्ष की पूजा का विधान बताया गया है।
इसके अगले अध्याय में भी शमी से संबंधित अनुष्ठानों के साथ विजय के लिए प्रस्थान का विवरण मिलता है।
इस प्रकार शमी पूजन केवल महाभारत की एक घटना की स्मृति नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र धार्मिक पूजा-परम्परा के रूप में भी उपस्थित है।
सीमोल्लंघन — विजय के लिए सीमा पार करना
शमी पूजा से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण परम्परा है—सीमोल्लंघन।
इसका सामान्य अर्थ है किसी स्थान की सीमा को पार करना।
पुरानी राजकीय तथा सैन्य परम्पराओं में विजय की कामना से सेना सहित नगर या ग्राम की सीमा के बाहर निकलने का विशेष महत्व था।
नारदपुराण, अध्याय 119, श्लोक 25–30 में शमी पूजन के पश्चात् सेना तैयार करने, गाँव के बाहर जाने तथा शत्रु पर विजय प्राप्त करने से संबंधित अनुष्ठान मिलता है।
समय के साथ अनेक स्थानों पर इस परम्परा का प्रतीकात्मक स्वरूप विकसित हुआ।
आज महाराष्ट्र और कुछ अन्य क्षेत्रों में लोग दशहरे पर सीमोल्लंघन करते हैं तथा शमी अथवा आपटा वृक्ष की पूजा करके लौटते हैं।
यहाँ विजयदशमी का एक महत्वपूर्ण भाव सामने आता है—विजय प्राप्त करने के लिए शुभ संकल्प लेकर आगे बढ़ना।
7. आयुध पूजा —
अस्त्र-शस्त्रों के साथ पुस्तक और तुला की पूजा का भी शास्त्रीय आधार
दक्षिण भारत में नवरात्रि के अंतिम दिनों तथा विजयदशमी के आसपास आयुध पूजा की विशेष परम्परा है।
आज लोग अपने औजारों, मशीनों, वाहनों, वाद्ययंत्रों तथा अन्य कार्य-साधनों की पूजा करते हैं।
लेकिन इस परम्परा का एक प्राचीन धार्मिक आधार नारदपुराण में भी मिलता है।
नारदपुराण, पूर्वार्ध, अध्याय 118, श्लोक 17–20
यहाँ आश्विन शुक्ल नवमी के अवसर पर शमी पूजा के बाद विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों तथा उपयोगी वस्तुओं के पूजन का वर्णन है।
ग्रंथ में खड्ग, धनुष, बाण, गदा, शूल तथा परशु जैसे शस्त्रों के साथ अन्य वस्तुओं का भी उल्लेख है—
छत्रं ध्वजं गजं चाश्वं गोवृषं पुस्तकं तुलाम्।
अर्थ: छत्र, ध्वज, हाथी, घोड़े, गाय-बैल, पुस्तक और तुला आदि की भी पूजा की जाए।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है।
पूजा की वस्तुओं में केवल युद्ध के अस्त्र नहीं, बल्कि पुस्तक और तुला भी शामिल हैं।
पुस्तक ज्ञान और अध्ययन से जुड़ी है, जबकि तुला व्यापार तथा माप-तौल का साधन है।
इस प्रकार प्राचीन धार्मिक विधान में जीवन के विभिन्न कार्यों में उपयोगी वस्तुओं का पूजन भी मिलता है।
इसी प्रकार कालिकापुराण में दशमी को सेना के नीराजन का उल्लेख है।
कालिकापुराण, अध्याय 60, श्लोक 21
सम्प्रेषणं दशम्यां तु क्रीडाकौतुकमङ्गलैः।
नीराजनं दशम्यां तु बलवृद्धिकरं महत्॥ २१॥
अर्थ: दशमी को मंगलोत्सव के साथ देवी की विदाई तथा सेना की शक्ति-वृद्धि के लिए नीराजन का विधान है।
इस प्रकार नवरात्रि के अंतिम दिनों और विजयदशमी के अनुष्ठानों में अस्त्र-शस्त्रों, राजकीय साधनों तथा अन्य उपयोगी वस्तुओं की पूजा के शास्त्रीय आधार मिलते हैं।
विजयनगर साम्राज्य का महानवमी उत्सव
इस धार्मिक परम्परा का भव्य ऐतिहासिक स्वरूप दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य में भी देखने को मिलता था।
आज कर्नाटक के हम्पी में स्थित विशाल ‘महानवमी डिब्बा’ इस इतिहास की स्मृति है।
सोलहवीं शताब्दी के पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पेस ने लगभग 1520 ईस्वी में विजयनगर के महानवमी उत्सव का विस्तृत विवरण दिया था।
उनके वर्णन में हाथियों, घोड़ों, सैनिक प्रदर्शन, राजकीय समारोहों तथा भव्य सांस्कृतिक आयोजनों का उल्लेख मिलता है।
इससे पता चलता है कि नवरात्रि के उत्सवों का महत्व व्यक्तिगत पूजा के अतिरिक्त राजकीय तथा सैन्य परम्पराओं में भी रहा है।
आज आयुध पूजा का स्वरूप और व्यापक हो गया है।
किसान अपने कृषि उपकरणों की, कारीगर अपने औजारों की, संगीतकार अपने वाद्ययंत्रों की तथा अनेक व्यवसायों से जुड़े लोग अपनी मशीनों और कार्य-साधनों की पूजा करते हैं।
दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में आयुध पूजा महानवमी पर की जाती है और विजयदशमी को उन उपकरणों का पुनः उपयोग आरंभ किया जाता है।
8. नवरात्रि में रामलीला — रामकथा से विजयदशमी तक
भारत के अनेक भागों में शारदीय नवरात्रि के दौरान एक ओर भगवती दुर्गा की आराधना होती है, तो दूसरी ओर रामलीला का आयोजन किया जाता है।
इन आयोजनों में भगवान श्रीराम के जीवन के विभिन्न प्रसंगों का मंचन होता है।
अनेक स्थानों पर नवरात्रि के दिनों में रामकथा क्रमशः प्रस्तुत की जाती है और विजयदशमी पर रावण-वध के मंचन के साथ उत्सव का समापन होता है।
रामकथा को जनसमुदाय के सामने प्रस्तुत करने की परम्परा का एक महत्वपूर्ण साहित्यिक आधार स्वयं वाल्मीकि रामायण में मिलता है।
वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग 4, श्लोक 8
पाठ्ये गेये च मधुरं प्रमाणैस्त्रिभिरन्वितम्।
जातिभिः सप्तभिर्युक्तं तन्त्रीलयसमन्वितम्॥ ८॥
अर्थ: रामायण-काव्य पाठ और गायन, दोनों में मधुर था। उसमें संगीत की विभिन्न गतियों, स्वर-विन्यास तथा तन्त्रीवाद्यों की लय का सुंदर समन्वय था।
इसी सर्ग में महर्षि वाल्मीकि द्वारा लव-कुश को रामायण सिखाने और उनके द्वारा ऋषियों तथा अन्य श्रोताओं के सामने रामकथा का गायन करने का वर्णन है।
आगे स्वयं भगवान श्रीराम भी अपनी सभा में दोनों भाइयों से रामायण का गायन सुनते हैं।
यह रामकथा के सार्वजनिक गायन का शास्त्रीय प्रमाण है।
हालाँकि वर्तमान स्वरूप की मंचीय रामलीला का विकास बाद की धार्मिक एवं लोकनाट्य परम्पराओं में हुआ।
उत्तर भारत की रामलीलाओं में गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस का विशेष योगदान रहा है।
सोलहवीं शताब्दी में रचित इस ग्रंथ के दोहे और चौपाइयाँ अनेक रामलीलाओं के संवादों तथा गायन का आधार बनीं।
समय के साथ रामलीला भगवान श्रीराम की कथा को जन-जन तक पहुँचाने का एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक माध्यम बन गई।
इसके सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए UNESCO ने वर्ष 2008 में रामलीला को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया।
और उत्तर भारत की अनेक रामलीलाओं का सबसे प्रसिद्ध अंतिम दृश्य है—भगवान श्रीराम द्वारा रावण-वध और उसके पुतले का दहन।
लेकिन दशहरे पर रावण का पुतला बनाकर जलाने की इस परम्परा का आधार कहाँ मिलता है?
क्या हमारे शास्त्रों में भी शत्रु की प्रतिकृति बनाकर उसे बाण से भेदने का उल्लेख है?
इसका एक महत्वपूर्ण प्रमाण नारदपुराण में मिलता है।

9. रावण-दहन की परम्परा — शास्त्रों में शत्रु की प्रतिकृति का उल्लेख
आज दशहरे के अवसर पर अनेक स्थानों पर रावण, मेघनाद और कुम्भकर्ण के विशाल पुतले बनाए जाते हैं।
रामलीला के समापन पर भगवान श्रीराम का पात्र निभाने वाला कलाकार बाण चलाता है और पुतलों में अग्नि प्रज्वलित कर दी जाती है।
यह दृश्य उत्तर भारत में दशहरे की सबसे परिचित पहचान बन चुका है।
लेकिन क्या हमारे धर्मग्रंथों में भी पुतला बनाकर उसे बाण से भेदने का विधान मिलता है?
इसका एक रोचक उत्तर नारदपुराण में है।
नारदपुराण, पूर्वार्ध, अध्याय 119, श्लोक 28–29
ततः शत्रुप्रतिकृतिं निर्मितां पत्रकादिभिः॥
अर्थ: इसके पश्चात् पत्तों आदि से शत्रु की प्रतिकृति बनाई जाए।
अगले श्लोक में उस प्रतिकृति को बाण से भेदने का विधान मिलता है।
यह अनुष्ठान शमी पूजन तथा विजय के उद्देश्य से प्रस्थान करने वाले प्रसंग का हिस्सा है।
इसी प्रकार लक्ष्मीनारायणसंहिता, प्रथम खण्ड, अध्याय 275, श्लोक 20–21 में भी शत्रु की प्रतिकृति बनाकर उसे बाण से भेदने का उल्लेख मिलता है।
इन दोनों ग्रंथों में मिलते-जुलते अनुष्ठान वर्णित हैं।
लेकिन यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है।
नारदपुराण में इसे ‘शत्रुप्रतिकृति’ कहा गया है, विशेष रूप से रावण का दस सिर वाला पुतला नहीं।
वहाँ प्रतिकृति को बाण से भेदने का विधान है, उसे अग्नि में जलाने का नहीं।
इसलिए यह अनुष्ठान आज के रावण-दहन से मिलती-जुलती एक शास्त्रीय परम्परा का प्रमाण तो है, लेकिन वर्तमान रावण-दहन की सम्पूर्ण विधि का प्रत्यक्ष वर्णन नहीं।
रावण के पुतले जलाने का पुराना ऐतिहासिक प्रमाण
सार्वजनिक रामलीला में रावण का पुतला बनाकर जलाने की परम्परा कब और कहाँ आरंभ हुई, इसकी निश्चित तिथि उपलब्ध नहीं है।
लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी में इसका एक महत्वपूर्ण प्रत्यक्षदर्शी विवरण मिलता है।
अंग्रेज लेखक जॉन कैम्पबेल ओमान (John Campbell Oman) ने अपनी पुस्तक The Great Indian Epics: The Stories of the Ramayana and the Mahabharata में लाहौर के समीप मियाँ मीर छावनी में आयोजित रामलीला का वर्णन किया है।
इस पुस्तक का पहला संस्करण 1894 ईस्वी में प्रकाशित हुआ था।
लेखक ने स्वयं वहाँ की रामलीला देखी थी।
उनके अनुसार खुले मैदान में रावण और कुम्भकर्ण के दो विशाल पुतले बनाए गए थे, जिनकी ऊँचाई लगभग 40 फुट थी।
उन्होंने उस समय की रामलीलाओं में लंका तथा राक्षसी पात्रों की प्रतिकृतियों को अग्नि के हवाले करने की प्रथा का भी वर्णन किया है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक उत्तर भारत में विशाल रावण-पुतलों का निर्माण तथा दहन सार्वजनिक रामलीला का स्थापित अंग था।
यह उस परम्परा के उस समय तक प्रचलित होने का ऐतिहासिक प्रमाण है, उसकी निश्चित शुरुआत का नहीं।
रामलीला, श्रीराम की विजय की स्मृति तथा शत्रु की प्रतिकृति को बाण से भेदने जैसी विधियों के बीच कुछ अनुष्ठानिक समानताएँ दिखाई देती हैं।
हालाँकि आज के रावण-दहन का ऐतिहासिक विकास किस क्रम में हुआ, इसे निश्चित रूप से स्थापित करने के लिए और पुराने प्रमाण आवश्यक हैं।
इतना अवश्य स्पष्ट है कि दशहरे पर रावण-दहन भारत की एक महत्वपूर्ण धार्मिक-सांस्कृतिक परम्परा बन चुका है।
लेकिन देश के सभी क्षेत्रों में विजयदशमी इसी प्रकार नहीं मनाई जाती।
10. भारत में विजयदशमी के अनेक क्षेत्रीय स्वरूप
भारत की विभिन्न धार्मिक तथा सांस्कृतिक परम्पराओं ने नवरात्रि और विजयदशमी के अलग-अलग पक्षों को विशेष महत्व दिया है।
यही कारण है कि एक ही पर्व देश के विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न रूपों में मनाया जाता है।
बंगाल —
माँ दुर्गा की विदाई
बंगाल में विजयादशमी का प्रमुख स्वरूप भगवती दुर्गा की विदाई है।
यहाँ दुर्गापूजा के दौरान भगवती को मायके आई हुई पुत्री के समान मानने की एक आत्मीय परम्परा भी मिलती है।
दशमी को देवी की विशेष पूजा के पश्चात् उनकी विदाई की तैयारी होती है।
‘सिंदूर खेला’ की परम्परा में विवाहित महिलाएँ देवी को सिंदूर अर्पित करती हैं तथा एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर मंगल और सौभाग्य की कामना करती हैं।
इसके बाद देवी-प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।
यहाँ कालिकापुराण के दशमी-विसर्जन विधान के साथ क्षेत्रीय पारिवारिक तथा सांस्कृतिक भावनाओं का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
मैसूरु, कर्नाटक —
माँ चामुण्डेश्वरी की विजय
कर्नाटक के मैसूरु का दशहरा देश के सबसे भव्य उत्सवों में गिना जाता है।
यहाँ माँ चामुण्डेश्वरी की महिषासुर पर विजय की धार्मिक परम्परा विशेष महत्व रखती है।
नवरात्रि के दिनों में मैसूरु का राजमहल सुसज्जित किया जाता है। सांस्कृतिक कार्यक्रम, संगीत, नृत्य तथा अनेक धार्मिक आयोजन होते हैं।
विजयदशमी के दिन प्रसिद्ध ‘जम्बू सवारी’ निकाली जाती है।
इस भव्य शोभायात्रा में माँ चामुण्डेश्वरी की प्रतिमा स्वर्ण हौदे में विराजमान होती है, जिसे सुसज्जित हाथी लेकर चलता है।
मैसूरु के दशहरे में भगवती की आराधना और पुरानी राजकीय उत्सव-परम्परा का सुंदर संगम दिखाई देता है।
बस्तर, छत्तीसगढ़ —
लगभग 75 दिनों का दशहरा, लेकिन रावण-दहन नहीं
छत्तीसगढ़ के बस्तर का दशहरा अपने स्वरूप में अत्यंत विशिष्ट है।
यह उत्सव लगभग 75 दिनों तक चलता है।
इसका प्रमुख केंद्र माँ दंतेश्वरी तथा क्षेत्र के स्थानीय देवी-देवताओं की आराधना है।
विभिन्न जनजातीय समुदायों की सहभागिता, विशाल लकड़ी के रथों का निर्माण, विशेष अनुष्ठान, देवताओं की यात्राएँ तथा सामूहिक धार्मिक आयोजन इसका महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
विशेष बात यह है कि बस्तर के दशहरे में रावण का पुतला नहीं जलाया जाता।
बस्तर की यह परम्परा बताती है कि भारत में दशहरे का धार्मिक स्वरूप केवल श्रीराम–रावण युद्ध की स्मृति तक सीमित नहीं है।
कुल्लू, हिमाचल प्रदेश —
जहाँ दशमी को आरंभ होता है दशहरा
भारत के अनेक भागों में विजयदशमी को नवरात्रि के उत्सव का समापन होता है।
लेकिन हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में इसी दिन से प्रसिद्ध दशहरे का मुख्य उत्सव आरंभ होता है।
यहाँ भगवान रघुनाथजी उत्सव के केंद्र में हैं।
कुल्लू घाटी के विभिन्न गाँवों से स्थानीय देवी-देवताओं की पालकियाँ ढालपुर मैदान में पहुँचती हैं।
भगवान रघुनाथजी की भव्य रथयात्रा निकाली जाती है और लगभग एक सप्ताह तक धार्मिक तथा सांस्कृतिक आयोजन चलते हैं।
इस उत्सव में भगवान श्रीराम की भक्ति और हिमालय की स्थानीय देव-परम्पराएँ एक साथ दिखाई देती हैं।
महाराष्ट्र —
शमी पूजन, सीमोल्लंघन और सोने के पत्ते
महाराष्ट्र में दशहरा शमी पूजन, सीमोल्लंघन तथा आपटा वृक्ष के पत्ते बाँटने की परम्पराओं से जुड़ा है।
आपटा वृक्ष के पत्तों को प्रतीकात्मक रूप में ‘सोना’ माना जाता है।
लोग ये पत्ते अपने परिजनों, मित्रों और परिचितों को देकर मंगल तथा समृद्धि की कामना करते हैं।
यहाँ शमी पूजन और विजय-यात्रा की धार्मिक परम्पराओं के साथ सामाजिक संबंधों तथा शुभकामनाओं का भाव भी जुड़ गया है।
केरल —
विद्यारम्भम्, अर्थात् ज्ञान का पहला अक्षर
केरल में विजयदशमी का एक अत्यंत सुंदर स्वरूप ‘विद्यारम्भम्’ है।
इस दिन छोटे बच्चों को पहली बार अक्षर लिखना सिखाया जाता है।
गुरु, माता-पिता अथवा परिवार का कोई बड़ा सदस्य बच्चे की उँगली पकड़कर चावल या रेत पर अक्षर लिखवाता है।
नवरात्रि के अंतिम दिनों में भगवती सरस्वती की विशेष आराधना की जाती है।
पुस्तकों तथा अध्ययन-सामग्री को पूजास्थल पर रखा जाता है और विजयदशमी को उन्हें पुनः अध्ययन के लिए उठाया जाता है।
इस प्रकार केरल में विजयदशमी का संबंध ज्ञान, शिक्षा और जीवन की नई शुरुआत से भी है।
तमिलनाडु —
गोलू, सरस्वती पूजा और आयुध पूजा
तमिलनाडु में नवरात्रि के दिनों में ‘गोलू’ की विशेष परम्परा है।
घरों में सीढ़ीनुमा मंच तैयार करके देवी-देवताओं, पौराणिक पात्रों तथा सामाजिक जीवन से संबंधित सुंदर प्रतिमाएँ सजाई जाती हैं।
इन दिनों परिवार तथा परिचित एक-दूसरे के घर जाते हैं, भजन गाते हैं और भगवती की आराधना करते हैं।
नवरात्रि के अंतिम दिनों में सरस्वती पूजा तथा आयुध पूजा की जाती है।
विजयदशमी को शिक्षा, संगीत, नृत्य और अन्य कलाओं का अध्ययन आरंभ करना भी शुभ माना जाता है।
तेलंगाना —
फूलों के माध्यम से भगवती की आराधना
तेलंगाना में शारदीय नवरात्रि के दौरान ‘बथुकम्मा’ का विशेष उत्सव मनाया जाता है।
महिलाएँ विभिन्न स्थानीय फूलों से सुंदर पुष्प-संरचनाएँ तैयार करती हैं।
इनके चारों ओर पारम्परिक गीत गाए जाते हैं और सामूहिक उत्सव होता है।
बथुकम्मा का मुख्य समापन सामान्यतः विजयदशमी से पहले होता है।
फिर भी यह शारदीय देवी-आराधना से जुड़े उस सांस्कृतिक वातावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें प्रकृति, ऋतु और भगवती के प्रति श्रद्धा का सुंदर मेल दिखाई देता है।

11. मीमांसा —विजय का उत्सव और विजय का संकल्प
विजयदशमी के विभिन्न शास्त्रीय प्रसंगों में एक विशेष बात सामने आती है।
कहीं विजय प्राप्त हो जाने का उत्सव है, तो कहीं विजय की कामना से भगवती की आराधना और शुभ कार्य के लिए प्रस्थान।
अर्थात् विजयदशमी केवल प्राप्त हुई विजय की स्मृति नहीं, बल्कि आने वाली विजय के लिए किए गए संकल्प का भी पर्व है।
नवरात्रि के नौ दिनों में भगवती की आराधना और उसके बाद दशमी को विजयापूजन तथा प्रस्थान का विधान इसी भाव को और गहराई देता है।
इस दृष्टि से विजयदशमी उपासना से कर्म की ओर बढ़ने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी है।
यही व्यापक भाव इस पर्व को केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं रहने देता। विजय की कामना जीवन के अनेक कार्यों, ज्ञान की साधना और मंगलकारी आरंभ से भी जुड़ जाती है।
विजयदशमी का संदेश केवल विजय का उत्सव मनाना नहीं, बल्कि धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए शक्ति, साहस और शुभ संकल्प प्राप्त करना भी है।
हमारी शास्त्रीय यात्रा आगे भी जारी रहेगी…
नवरात्रि में भगवती के नौ दिव्य स्वरूपों से आरंभ हुई हमारी यह यात्रा विजयदशमी की अनेक धार्मिक और पौराणिक परम्पराओं तक पहुँची है।
लेकिन हमारी खोज यहीं समाप्त नहीं होती।
अब आगे है दीपावली का पाँच-दिवसीय महापर्व, जिसके प्रत्येक दिन के साथ अलग-अलग धार्मिक प्रसंग, पौराणिक कथाएँ और अनूठी परम्पराएँ जुड़ी हैं।
धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज—इन पाँचों पर्वों का शास्त्रीय आधार क्या है?
इनकी शुरुआत कैसे हुई और हमारे पुराणों में इनके बारे में क्या बताया गया है?
अपनी अगली शास्त्रीय यात्रा में हम इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोजेंगे।
एक बार फिर पुराणों और धर्मग्रंथों के मूल प्रसंगों के माध्यम से उन परम्पराओं को समझने का प्रयास करेंगे, जो पीढ़ियों से हमारे जीवन का हिस्सा रही हैं।
हमारी यह ज्ञानयात्रा जारी रहेगी…
जय माँ भगवती। जय श्रीराम।
आप सभी को विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
— पम्पोष | TheWhyLens










मां नवदुर्गा-स्वरूपों को जानने की यह यात्रा विजयदशमी पर पूर्ण हुई । यह यात्रा हमें कई पौराणिक प्रसंगों तक ले आई । लगभग सभी प्रसंग ऐसे थे जिनसे हम अनभिज्ञ थे । आपकी कढी मेहनत से हम अपने पर्वों को समझने लगे हैं…मेरा तो यही अनुभव रहा । कुछ ज्ञान भी मिला कुछ संतोष व आनंद भी । आशा है आगे भी आप हमारा ज्ञान वर्धन करते रहेंगे । आभार।
जय माता की
आपके आत्मीय शब्दों के लिए हृदय से आभार। यह जानकर बहुत संतोष होता है कि हमारी यह शास्त्रीय यात्रा आपके लिए ज्ञान के साथ आनंद का भी माध्यम बनी। आप जैसे पाठकों का स्नेह ही आगे और गहराई से खोज करने की प्रेरणा देता है। हमारी यह यात्रा आगे भी जारी रहेगी।
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