चाय: आदत, नशा या ज़रूरत ?

कुछ लोग चाय के बिना रह क्यों नहीं पाते?

लेखक – “पम्पोष” 


हम खुश हों… तो चाय।

स्ट्रेस में हों… तो चाय।

अकेले हों… तो चाय।

किसी के साथ हों… तो चाय।

घर पर मेहमान आएँ… तो चाय।

पेट साफ़ न हो… तो चाय।

काम में मन न लगे… तो चाय।

बारिश हो… तो चाय।

ठंड हो… तो चाय।

नींद आए… तो चाय।

नींद न आए… तो भी चाय।

कुछ करने को न हो… तब भी चाय।

कभी-कभी तो लगता है, भारत में हर समस्या का पहला इलाज, बस चाय ही है।

सुख हो या दुख, उल्लास हो या तनाव… चाय का प्रवेश कहीं भी वर्जित नहीं है।

और मज़े की बात यह है कि किसी को यह अजीब भी नहीं लगता।

चाय हमारे जीवन में इतनी घुल-मिल चुकी है कि अब हम यह सोचते ही नहीं कि हम चाय पी क्यों रहे हैं। बस… पी रहे हैं।

अगर कभी आपने कह दिया— “नहीं, चाय नहीं पीऊँगा”—तो सामने वाले के चेहरे के भाव ही बदल जाते हैं।

“क्या हुआ?”,

“तबीयत ठीक है?”

“चाय क्यों नहीं पियोगे?”

“पी लो एक कप!”

ऐसा लगता है जैसे चाय से मना नहीं किया… कोई सामाजिक नियम तोड़ दिया हो।

आख़िर ऐसा क्यों है? क्या चाय वाकई हमारी ज़रूरत है? सिर्फ़ एक आदत है? या नशा है?

या फिर इसके पीछे कोई ऐसा मनोविज्ञान काम कर रहा है, जिसे हम रोज़ जीते तो हैं… लेकिन कभी समझने की कोशिश नहीं करते?


दिन की शुरुआत — बेड टी से !

जब तक बेड टी नहीं मिलतीआँख ही नहीं खुलती!”

कुछ लोगों के लिए दिन की शुरुआत अलार्म से नहीं, चाय से होती है।

कई घरों में आज भी सुबह की पहली चाय बिस्तर पर ही पहुँचती है।

कई लोगों की शिकायत तो यह भी रहती है कि चाय न मिले, तो पेट साफ़ नहीं होता।

मानो सुबह का पूरा System, एक कप पर टिका हो — चाय आई, दो घूँट अंदर गए… और ज़िंदगी पटरी पर।

लेकिन क्या रात भर आराम करने के बाद शरीर को सचमुच सबसे पहले चाय की ही ज़रूरत होती है?

या सालों से दोहराया जा रहा एक छोटा-सा Routine, हमारे दिमाग़ में इतना गहराई से बैठ चुका है कि अब वही हमारी सुबह की पहचान बन गया है?

व्यवहार विज्ञान, यानी Behavioral Psychology, बताता है कि कोई काम रोज़ एक ही क्रम में दोहराया जाए तो वह धीरे-धीरे Habit Loop का हिस्सा बन जाता है।

यह चाय हो सकती है, अख़बार पढ़ना, उठते ही मोबाइल देखना या फिर सिगरेट पीना भी हो सकता है।

और अगर फिर उस क्रम की कोई कड़ी गायब हो जाए, तो लगता है — “आज कुछ Missing है।”

लेकिन अगर बात सिर्फ़ Routine की है, तो कुछ लोगों को चाय न मिलने पर सिरदर्द, बेचैनी या चिड़चिड़ापन क्यों होने लगता है?

क्या वहाँ भी आदत ही काम कर रही है… या शरीर भी कुछ कह रहा है?

ऑफिस वाली चाय!

ऑफिस पहुँचते ही या तो Office Boy चाय ले आता है, या आप खुद Tea Machine की ओर चल पड़ते हैं — यानी पहले चाय, फिर काम।

Meeting हो, Boss की चिकचिक हो, या काम का tension — चाय किसी न किसी बहाने बीच में आ ही जाती है।

शाम को दोस्तों के साथ “दिन की आख़िरी चाय” और घर पहुँचते ही फिर सवाल  — “चाय बनाऊँ?”

कप वही है, लेकिन उसका किरदार बदलता रहता है — कभी काम शुरू करने का संकेत, कभी दो मिनट का Break, कभी मन हल्का करने का बहाना और कभी किसी से बात शुरू करने का आसान-सा ज़रिया।

लेकिन अगर मक़सद सिर्फ़ चाय पीना है, तो लोग ऑफिस की मशीन छोड़कर बाहर टपरी तक क्यों जाते हैं?

टपरी वाली चाय

ऑफिस में Air Conditioning है, Pantry है, Tea/Coffee Machine है और चाय Free भी है।

फिर भी Break होते ही आवाज़ आती है — “चल… टपरी तक चलते हैं। सिर्फ़ पाँच मिनट।” और वही पाँच मिनट कभी-कभी आधा घंटा बन जाते हैं।

धूप हो, बारिश हो या ठंड… टपरी पर भीड़ कम नहीं होती।

वहाँ कई बार चाय से ज़्यादा बातें होती हैं — राजनीति, क्रिकेट, ऑफिस, Boss, घर या ज़िंदगी की कोई परेशानी।

कहीं हँसी-मज़ाक, कहीं शिकायत; और कोई अकेला, चुपचाप कप हाथ में लिए अपने ही अंतर्द्वंद्व से जूझ रहा होता है।

अगर मक़सद सिर्फ़ चाय होता, तो ऑफिस की मशीन भी काम चला देती। फिर टपरी में ऐसा क्या है?

क्या वहाँ की चाय सचमुच बेहतर है?

या हमें ऑफिस की चार दीवारों से कुछ देर की दूरी चाहिए—थोड़ी खुली हवा, परिचित चेहरे, बिना Agenda की बातचीत और यह छोटा-सा एहसास कि ज़िंदगी सिर्फ़ Deadlines, Mails और Meetings नहीं है।

शायद कई बार हम टपरी पर सिर्फ़ चाय पीने नहीं जातेहम वहाँ ज़िंदगी के कुछ पल जीने जाते हैं।

 

लेकिन आखिर ऐसा क्यों?

इस दौड़ती-भागती ज़िंदगी में हमारा दिन काम, ज़िम्मेदारियों और छोटी-बड़ी चिंताओं से घिरा रहता है।

ऐसे में हम जाने-अनजाने कुछ छोटे ठिकाने तलाशते हैं, जहाँ दो मिनट रुक सकें, ठहर सकें… थोड़ा सुकून पा सकें।

कोई Reels देखता है, कोई संगीत सुनता है, कोई सिगरेट पीता है और कोई बस कुछ देर अकेला बैठ जाता है।

मगर करोड़ों लोगों के लिए यह छोटा-सा विराम चाय का एक कप है।

हमारे दिमाग़ को छोटी-छोटी राहतें (Micro Rewards), परिचित Routine और पहले से सुकून से जुड़े अनुभव, बहुत पसंद आते हैं।

शायद इसीलिए चाय धीरे-धीरे केवल एक पेय नहीं रहती — कभी Break, कभी Comfort और कभी दिन के बीच मिलने वाला एक छोटा-सा Pause बन जाती है।

यही चाय का मनोविज्ञान है।

यानी कई बार हमें चाय की तलब सिर्फ़ उसके स्वाद की वजह से नहीं होती; उसके साथ जुड़ी आदत, समय, जगह, लोग और सुकून का एहसास भी हमें उस कप की ओर खींचता है।

लेकिन क्या हर बार वजह हमारे मन और आदतों में ही छिपी होती है?  शायद नहीं।

क्योंकि अगर पूरा मामला सिर्फ़ मनोविज्ञान का होता, तो चाय न मिलने पर कुछ लोगों को सिरदर्द, सुस्ती या चिड़चिड़ापन क्यों होता?

यहीं चाय के कप में विज्ञान की एंट्री होती है। और उसे समझने के लिए पहले यह जानना होगा कि आखिर इस कप के अंदर ऐसा है क्या।

चाय की Chemistry

चाय का सबसे चर्चित तत्व कैफीन (Caffeine) है।

यह दिमाग़ में Adenosine नाम के उस रसायन के असर को कुछ समय के लिए रोकती है, जो दिन बढ़ने के साथ थकान और नींद का एहसास कराने में भूमिका निभाता है।

इसलिए चाय के बाद अक्सर लगता है—“अब थोड़ा दिमाग़ खुला।”

असल में चाय से शरीर को कोई नई ऊर्जा नहीं मिलती; बल्कि कुछ समय के लिए थकान का अहसास, या दिमाग को जाने वाला संदेश दब जाता है।

चाय में L-theanine नाम का amino acid भी पाया जाता है। शोध से यह पता चला  है कि ये alertness  और ध्यान केंद्रित करने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

इसके अलावा Polyphenols जैसे प्राकृतिक compounds होते हैं, जिनमें antioxidant गुण पाए जाते हैं और जो चाय के स्वाद व कसैलेपन में भी भूमिका निभाते हैं।

 


हर मर्ज़ की दवा — चाय!

सिरदर्द में चाय क्यों याद आती है?

मनोविज्ञानअगर किसी व्यक्ति ने वर्षों तक रोज़ एक निश्चित समय पर चाय पी है, तो उसका मस्तिष्क उसे सामान्य दिनचर्या का हिस्सा मानने लगता है।

जब चाय नहीं मिलती, तो रोज़ वाला क्रम अधूरा-सा लगता है।

विज्ञानलेकिन कई लोगों में वजह सिर्फ़ आदत नहीं होती। नियमित कैफीन अचानक बंद करने पर Caffeine Withdrawal Headache हो सकता है।

मगर हर सिरदर्द का कारण कैफीन नहीं, लेकिन कुछ लोगों में उसकी कमी सिरदर्द की वजह बन सकती है।

टेंशन में सबसे पहले चाय क्यों?

मनोविज्ञानतनाव के समय इंसान परिचित, Comforting और अपने नियंत्रण में लगने वाली चीज़ की ओर जाता है।

चाय का कप कई लोगों के लिए वही छोटा-सा सुरक्षित विराम बन जाता है।

विज्ञानकुछ मिनट बैठना, काम से हटना, साँस सामान्य करना और किसी से बात करना तनाव को हल्का महसूस करा सकता है।

दूसरी ओर कैफीन stimulant है; ज्यादा मात्रा कुछ लोगों में बेचैनी या anxiety बढ़ा भी सकती है।

इसलिए कई बार राहत चाय से कम और चाय पीने के पूरे अनुभव से ज़्यादा मिलती है।

मूड खराब हो तो चाय क्यों?

मनोविज्ञानअगर वर्षों से चाय आराम, परिवार, दोस्तों या सुखद पलों से जुड़ी रही है, तो खराब mood में दिमाग़ उसी परिचित अनुभव की ओर लौट सकता है।

चाय की खुशबू, स्वाद और उससे जुड़ी Positive Memories Comfort देने लगती हैं।

विज्ञानकैफीन कुछ समय के लिए alertness बढ़ा सकती है और थकान का एहसास कम कर सकती है।

लेकिन भावनात्मक परेशानी का समाधान नहीं करती। कई बार चाय मूड नहीं बदलती… मूड बदलने का अवसर देती है।

बारिश और चाय का रिश्ता?

मनोविज्ञानबारिश, चाय और पकौड़े का रिश्ता Association का अच्छा उदाहरण है।

बचपन से ये अनुभव साथ जुड़े हों तो बारिश की आवाज़, ठंडक या मिट्टी की खुशबू वही यादें जगा सकती है और दिमाग़ चाय की इच्छा से उसे जोड़ देता है।

विज्ञानठंडे मौसम में गर्म पेय शरीर को आरामदायक महसूस करा सकता है।

यानी यहाँ यादों का Association और गर्माहट का physical comfort दोनों साथ काम कर सकते हैं।

अकेले हों तो चाय क्यों?

मनोविज्ञानअकेलेपन में चाय कई लोगों के लिए Companion Ritual बन जाती है—बालकनी, खिड़की या कोई शांत कोना और कुछ मिनट खुद के साथ।

परिचित Ritual मन को स्थिरता और नियमितता का एहसास देते हैं।

विज्ञानयहाँ विज्ञान का हिस्सा बहुत सीधा है: बार-बार दोहराए गए शांत Rituals शरीर और दिमाग़ को ‘अब थोड़ी देर रुकना है’ जैसा परिचित संकेत दे सकते हैं।

इसलिए हर बार कैफीन ही मुख्य कारण नहीं होती।

काम में मन न लगे तो चाय?

मनोविज्ञानकई बार दिमाग़ चाय नहीं, Mental Reset माँग रहा होता है।

चाय बनाना या लेने जाना, काम से थोड़ी देर की दूरी देता है और वापस लौटने का एक नया starting point बन जाता है।

विज्ञानस्क्रीन से नज़र हटाना, थोड़ी देर चलना, शरीर की मुद्रा बदलना और कैफीन से मिली हल्की सतर्कता—ये सब मिलकर कुछ समय के लिए ध्यान बेहतर करने में मदद करते हैं।

सुख-दुख, जन्म-मरण… हर जगह चाय क्यों?

मनोविज्ञानयहाँ चाय Social Ritual बन जाती है।

मेहमान आएँ, बच्चे का जन्म हो, अस्पताल में किसी अपने का इंतज़ार हो या किसी प्रियजन के निधन पर लोग शोक व्यक्त करने पहुँचे हों—एक कप चाय स्वागत, संवेदना और साथ का माध्यम बन जाता है।

विज्ञानएक साथ बैठना, गर्म पेय हाथ में होना और बातचीत के लिए कुछ समय मिलना Social Bonding को आसान बना देता है।

हर बार लोगों को चाय की तलब नहीं होती; कई बार कप सिर्फ़ साथ बैठने का अवसर देता है।


चाय सिर्फ़ कप में नहीं, हमारे रिश्तों में भी है

चाय लोगों को साथ भी लाती है और अकेले में भी साथ रहती है।

बारिश में उसकी याद Association से उठ सकती है, अकेलेपन में वह निजी Ritual बन सकती है और मेहमान के सामने वही कप स्वागत की भाषा बन जाती है।

इसलिए आप “चाय लेंगे?” का अर्थ कई बार सिर्फ़ “आपको चाय पीनी है?” नहीं होता; दरअसल हम कहना चाहते हैं  — “आइए, कुछ देर हमारे साथ बैठिए।”

यही कारण है कि सुख हो या दुख, अस्पताल की प्रतीक्षा हो या किसी प्रियजन के निधन के बाद का मौन—चाय मौजूद मिलती है।

उसका काम खुशी या दुख पैदा करना नहीं; कई बार लोगों को कुछ देर साथ बैठाए रखना होता है।

जब शब्द कम पड़ जाएँ, किसी के सामने चुपचाप एक कप रख देना भी संवाद बन सकता है।

और कॉफी?

कैफीन की बात आए और कॉफी का ज़िक्र न हो, यह मुश्किल है।

आम तौर पर एक कप brewed coffee में चाय के मुकाबले कैफीन अधिक हो सकती है, हालाँकि मात्रा cup size, किस्म और बनाने के तरीके पर निर्भर करती है।

फिर भी भारत में दोनों का सामाजिक किरदार एक जैसा नहीं है।

चाय घर, मेहमाननवाज़ी और नुक्कड़ तक फैली हुई है।

कॉफी की अपनी समृद्ध परंपरा है—खासकर दक्षिण भारत की Filter Coffee संस्कृति ।

शहरों में भी  Café Culture ने तेज़ी से अपनी जगह बना ली है।

मगर एक फर्क फिर भी दिखता है — “चाय अक्सर परिस्थिति के साथ अपने आप चली आती है, जबकि कॉफी कई बार एक choice की तरह चुनी जाती है।”


तो आखिर चाय है क्या — आदत, नशा या ज़रूरत?

अब तक इतना तो साफ़ हो गया कि हर कप की वजह एक सी नहीं होती।

सुबह की चाय Routine हो सकती है, टपरी की चाय Break या दोस्ती, बारिश की चाय यादों का Association और सिरदर्द वाली चाय में Caffeine Withdrawal की भूमिका हो सकती है।

आदत, शारीरिक निर्भरता और Addiction एक ही चीज़ नहीं हैं।

शरीर कैफीन का अभ्यस्त हो जाए और अचानक न मिलने पर Withdrawal हो, तो यह Physical Dependence हो सकती है।

Addiction उससे आगे की स्थिति है, जिसमें इस्तेमाल को नियंत्रित करना कठिन हो और नुकसान के बावजूद व्यवहार जारी रहे।

इसलिए रोज़ चाय पीने वाले हर व्यक्ति को “नशे का शिकार” कहना सही नहीं।

तो क्या चाय ज़रूरत है ?

पानी, भोजन और नींद शरीर की मूल ज़रूरतें हैं; चाय नहीं।

लेकिन जो चीज़ वर्षों से Routine, शरीर, भावनाओं और सामाजिक जीवन से जुड़ी हो, वह ज़रूरत जैसी महसूस होने लगने लगती है।

“ज़रूरत होना” और “ज़रूरत महसूस होना”—चाय की पहेली –  इसी फर्क में छिपी है।

चाय पीजिए… मगर चाय आपको न पीने लगे !

चाय को कटघरे में खड़ा करने की जरूरत नहीं है।

सवाल तब पैदा होता है जब पसंद, मजबूरी बनने लगे।

हर कप में कैफीन समान नहीं होती; किस्म, पत्ती की मात्रा, brewing time और cup size से फर्क पड़ता है।

कैफीन कॉफी, Cola, Energy Drinks, Chocolate और कुछ दवाओं में भी हो सकती है, इसलिए केवल कप नहीं, दिन भर की कुल कैफीन भी मायने रखती है।

अधिकांश स्वस्थ वयस्कों के लिए लगभग 400 mg कैफीन प्रतिदिन सामान्यतः ऐसी मात्रा मानी जाती है जो नकारात्मक प्रभावों से जुड़ी नहीं होती, लेकिन इसे लक्ष्य नहीं समझना चाहिए।

हर व्यक्ति में Sensitivity, अलग होती है। तेज़ धड़कन, हाथ काँपना, बेचैनी, पेट की परेशानी या नींद बिगड़ना संकेत हो सकते हैं कि मात्रा या समय पर ध्यान दिया जाए।

शाम की चाय… रात की नींद

शाम को थकान हुई, कड़क चाय पी, चुस्ती आई और काम पूरा हो गया — लेकिन रात को नींद देर से आई।

अगली सुबह नींद अधूरी, फिर थकान और फिर चाय। कैफीन कई घंटों तक असर कर सकती है, इसलिए देर शाम की चाय कुछ लोगों की नींद प्रभावित कर सकती है।

अगर ऐसा pattern दिखे तो शाम की कैफीन कम करके देखना उपयोगी हो सकता है।

दूध-चीनी वाली चाय

भारत में चाय अक्सर सिर्फ़ Tea + Water नहीं होती; उसमें दूध और कई बार “दिल खोलकर” चीनी भी होती है।

दिन में कई कप और हर कप में दो चम्मच चीनी हो, तो हिसाब सिर्फ़ कैफीन का नहीं रहता—added sugar भी जुड़ती जाती है।

कभी-कभी समस्या चाय की पत्ती से कम, उसमें रोज़ डाली जाने वाली चीज़ों से ज्यादा हो सकती है।

खाली पेट चाय ?

कुछ लोगों को खाली पेट चाय के बाद acidity, जलन, मितली या पेट में असहजता हो सकती है।

असर हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता, इसलिए अपने शरीर की प्रतिक्रिया देखना ज्यादा उपयोगी है।

अगर रोज़ पेट शिकायत करता है और फिर भी हम कहते हैं—“चाय के बिना सुबह नहीं होती”—तो शायद शरीर और आदत अलग-अलग बातें कह रहे हैं।


चाय के कुछ सवाल…

“चाय के बिना पेट साफ़ नहीं होता!”

कुछ लोगों में गर्म पेय और कैफीन पाचन तंत्र की गतिविधि को प्रभावित कर सकते हैं।

साथ ही वर्षों से सुबह की चाय और बाथरूम एक ही Routine में जुड़े हों तो Habit Loop भी मजबूत हो जाता है।

अनुभव काल्पनिक नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि शरीर चाय के बिना यह काम कर ही नहीं सकता।

“कड़क बनाना… आज बहुत नींद आ रही है।”

कड़क का मतलब हमेशा ज्यादा कैफीन नहीं होता।

रंग, स्वाद, पत्ती की मात्रा और कैफीन चारों एक ही बात नहीं हैं।

कैफीन की मात्रा चाय की किस्म, पत्ती, पानी के तापमान और brewing time पर निर्भर करती है; ज्यादा tea leaves और लंबा extraction आम तौर पर कैफीन बढ़ा सकते हैं।

Green Tea — चाय नहीं, अमृत है ?

Green Tea में polyphenols, खासकर catechins, पाए जाते हैं और उनके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों पर शोध हुआ है।

लेकिन यह अकेले वजन घटाने, “detox” करने या खराब lifestyle की भरपाई करने वाला जादुई पेय नहीं है।

और हाँ, Green Tea में भी कैफीन होती है।

क्या चाय शरीर का पानी सुखा देती है ?

कैफीन का हल्का diuretic effect हो सकता है, लेकिन चाय में पानी भी होता है और सामान्य मात्रा में उससे मिलने वाला fluid hydration में योगदान करता है।

इसलिए हर कप चाय शरीर से पानी “सुखा” देता है, यह कहना सही नहीं। पानी की अपनी जगह है, चाय की अपनी।

दूध डाल दिया… फायदे खत्म ?

दूध के proteins चाय के कुछ polyphenols के साथ interact कर सकते हैं, लेकिन यह कहना कि दूध डालते ही सारे अच्छे compounds बेकार हो जाते हैं, ऐसा कहना भी सही नहीं है। ये जरूरत से बड़ा दावा होगा।

दूध वाली चाय में अधिक व्यावहारिक सवाल कई बार चीनी का है — दिन भर के कपों में added sugar कितनी जुड़ रही है? यह सवाल ज़्यादा व्यवहारिक है।

मीमांसा | The Deep Dive

तो आखिर चाय आदत है, नशा है या ज़रूरत? शायद इसका, एक जवाब नहीं है।

चाय शरीर की वैसी मूल ज़रूरत नहीं है, जैसी पानी, भोजन या नींद है।  लेकिन Routine, कैफीन, यादें, रिश्ते और सामाजिक व्यवहार मिलकर उसे कभी-कभी ज़रूरत जैसा महसूस करा देते हैं।

क्या ही होगा अगर कभी चाय नहीं मिली तो ?

बस मन करता रहेगा कि चाय मिल जाती,   दिन थोड़ा अधूरा लगेगा, सिरदर्द या चिड़चिड़ापन होगा।

या आप आराम से कह देंगे — “कोई बात नहीं… आज चाय नहीं तो नहीं सही।”

इसी जवाब में आदत और निर्भरता के बीच की दूरी छिपी हो सकती है।

चाय को चाय ही रहने दीजिए — सुकून का एक कप, रिश्तों का बहाना, कभी थोड़ी चुस्ती और कभी बस स्वाद।

बस इतना ध्यान रहे कि जिसे हमने अपनी मर्ज़ी से ज़िंदगी में जगह दी है, वह धीरे-धीरे हमारी मर्ज़ी पर कब्ज़ा न कर ले।

“तो फिर एक चाय हो जाए?”

“बिल्कुल! चाय से बैर थोड़े ही है… पड़ताल तो बस तलब की थी।”

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चाय का प्रभाव दिखाता चित्र

6 thoughts on “चाय: आदत, नशा या ज़रूरत ?”

    1. Thank you!

      I’m delighted that you found the article informative and engaging. Chai is such a common part of our lives that we rarely stop to ask why we are so attached to it. I’m glad this exploration resonated with you.

      Thanks for reading and for taking the time to comment.

  1. सुनीता कपूर

    वाह!
    यह लेख पढ़कर तो आज चाय और अधिक मज़ेदार लगी !!
    बहुत ही रोचक लेख है । लेखक के लिखने का अंदाज भी ऐसा है जैसे लगता हो कि आपस की बातचीत हो रही है ।

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद!

      मुझे सबसे ज़्यादा खुशी इस बात की हुई कि आपको लेख बातचीत जैसा लगा। यही कोशिश थी कि चाय पर चर्चा किसी क्लासरूम में नहीं, बल्कि चाय के कप के साथ बैठकर की जाए।

      और अगर लेख पढ़ने के बाद चाय और स्वादिष्ट लगने लगी है, तो शायद लेखक की मेहनत सफल हो गई!

      स्नेह और प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद।

  2. इसने मुझे आकाशवाणी जे दिनों की याद ताज़ा कर दी. मैंने अपने जीवन की जो पहली रेडियो डॉक्यूमेंट्री में काम किया था। उसका नाम भी “the tea time tales “ tha.

    1. चंद्र सिंह जी
      बहुत सुंदर स्मृति साझा की आपने। बहुत बहुत धन्यवाद !

      यह जानकर खुशी हुई कि इस लेख ने आपको आकाशवाणी के दिनों में पहुँचा दिया।

      संयोग देखिए, लेख चाय पर था और आपकी पहली रेडियो डॉक्यूमेंट्री का नाम भी “The Tea Time Tales” था। शायद चाय की यही खासियत है—यह केवल कप में नहीं मिलती, यादों में भी मिलती है।

      कुछ स्वाद समय के साथ बदल जाते हैं, लेकिन कुछ यादें उम्र भर अपनी खुशबू बनाए रखती हैं।

      आपकी यह स्मृति साझा करने के लिए हार्दिक धन्यवाद।

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